04/03/2026
#मूलनिवासी_राष्ट्र
पत्रकारिता छोड़ो, अब चाटुकारिता करो! वरना DSP साहिबा का आदेश तैयार है—सीधे FIR और जेल!*
उत्तर प्रदेश। हाल ही में मेरठ की DSP सौम्या अस्थाना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह सभी थानों को आदेश दे रही हैं कि यदि कोई पत्रकार थाने के भीतर वीडियोग्राफी करता पाया जाए, तो उस पर तत्काल मुकदमा (FIR) दर्ज किया जाए।
*यह फरमान न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि कई गंभीर सवाल भी खड़े करता है!*
पारदर्शिता से डर कैसा? थाना कोई 'गोपनीय सैन्य अड्डा' नहीं है, बल्कि एक सार्वजनिक सेवा केंद्र है। अगर पुलिस का काम कानून सम्मत और ईमानदार है, तो कैमरे की नजर से डर क्यों? क्या वीडियोग्राफी रोकने का उद्देश्य थाने के भीतर होने वाली अनौपचारिक गतिविधियों या संभावित भ्रष्टाचार को छिपाना है?
*पत्रकारिता का दमन:* एक पत्रकार का धर्म है सच्चाई को उजागर करना। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि सार्वजनिक स्थानों पर वीडियोग्राफी करना अपराध नहीं है। ऐसे में पत्रकारों को सीधे मुकदमे की धमकी देना उनके संवैधानिक अधिकारों का गला घोंटने जैसा है।
*सुप्रीम कोर्ट बनाम पुलिसिया आदेश:* माननीय उच्चतम न्यायालय ने थानों में CCTV लगाने का आदेश दिया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे। जब खुद अदालत पारदर्शिता चाहती है, तो स्थानीय प्रशासन वीडियोग्राफी पर पाबंदी लगाकर किसे संरक्षण दे रहा है!
*सामाजिक अधिकार और जवाबदेही:* जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनके करों (Taxes) से चलने वाले सरकारी संस्थानों में क्या हो रहा है। पत्रकारों को जेल भेजने की धमकी देना लोकतंत्र के 'चौथे स्तंभ' को कमजोर करने की कोशिश है।
पुलिस का काम अपराध रोकना है, न कि अपराध की रिपोर्टिंग करने वालों को अपराधी बनाना। यदि पत्रकारिता पर इस तरह के प्रतिबंध लगेंगे, तो व्यवस्था की जवाबदेही पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। हम मांग करते हैं कि ऐसे 'तुगलकी फरमानों' पर पुनर्विचार किया जाए और पत्रकारों को निर्भीक होकर अपना काम करने का सुरक्षित माहौल दिया जाए।
*आपकी क्या राय है! क्या थानों में वीडियोग्राफी पर रोक लगाना सही है या यह सच को दबाने की कोशिश है!
#पत्रकारिता