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महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर (महादेव) को प्रिय आक (मदार) का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों, पुराणों और लोक-आस्था—तीनों...
15/02/2026

महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर (महादेव) को प्रिय आक (मदार) का विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों, पुराणों और लोक-आस्था—तीनों में आक का स्थान अत्यंत पवित्र है।

🌿 महाशिवरात्रि पर आक के पौधे का महत्व

तप और वैराग्य का प्रतीक

आक का पौधा कठोर, शुष्क और उपेक्षित भूमि पर भी पनप जाता है। यह भगवान शिव के तपस्वी, वैराग्यपूर्ण और लोक-बंधन से परे स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

अमरत्व और स्थायित्व का संकेत

आक अत्यंत सहनशील पौधा है, इसलिए इसे अमरत्व और दृढ़ता का प्रतीक माना गया है—जो शिव के नाश और पुनर्सृजन के तत्त्व से जुड़ता है।

औषधीय गुणों से युक्त

आयुर्वेद में आक के पत्ते, फूल और जड़ औषधीय माने गए हैं। शिव को औषधि और वैद्यनाथ भी कहा जाता है, इसलिए आक का संबंध उनके उपचारकारी स्वरूप से भी जुड़ता है।

तामसिक गुणों का शमन

मान्यता है कि आक शिव के उग्र और तामसिक गुणों को शांत करता है, इसलिए महाशिवरात्रि पर इसकी अर्पण-परंपरा प्रचलित है।

🌼 आक के फूल का विशेष महत्व

1. शिवलिंग पर अर्पण हेतु प्रिय
आक का फूल शिवलिंग पर चढ़ाने से शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं—यह लोक-मान्यता है।
2. श्वेत आक: शुद्धता और शांति
सफेद आक का फूल मन, वाणी और कर्म की शुद्धता का प्रतीक माना जाता है और इसे विशेष रूप से शुभ माना गया है।
3. कर्म-दोष और भय से मुक्ति
धार्मिक विश्वास के अनुसार आक के फूल अर्पण से भय, दोष और नकारात्मक प्रभावों में कमी आती है।
4. सरल भक्ति का प्रतीक
आक का फूल सहज, अलंकारहीन और सरल है—जैसे शिव की भक्ति। यही कारण है कि यह शिव को अत्यंत प्रिय माना गया।

🔱 महाशिवरात्रि पर आक अर्पण का भावार्थ

आक का पौधा और उसका फूल यह संदेश देते हैं कि भगवान शिव दिखावे से नहीं, बल्कि तप, त्याग, सरलता और सच्चे भाव से प्रसन्न होते हैं।







  एक समय की बात है।माता पार्वती के मन में एक अत्यंत गूढ़ जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने अपने पति भगवान शिव से निवेदन किय...
15/02/2026


एक समय की बात है।
माता पार्वती के मन में एक अत्यंत गूढ़ जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने अपने पति भगवान शिव से निवेदन किया—
“प्रभु, मुझे वह रहस्य बताइए जो जन्म और मृत्यु के बंधन से परे हो। मुझे अमरत्व का ज्ञान चाहिए।”

भगवान शिव जानते थे कि यह ज्ञान अत्यंत गोपनीय है। यदि यह किसी अयोग्य प्राणी के हाथ लग गया, तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता है। इसी कारण वे माता पार्वती को लेकर एक निर्जन और एकांत स्थान पर गए और वहाँ एक गुफा में प्रवेश किया। गुफा का मुख उन्होंने योगबल से बंद कर दिया, ताकि बाहर की कोई भी चेतना भीतर प्रवेश न कर सके।

फिर भगवान शिव ने अमरत्व की कथा सुनानी आरंभ की।
माता पार्वती बीच-बीच में हुंकारी भरकर अपनी जागरूकता प्रकट करती रहीं, किंतु कुछ समय बाद वे ध्यानमग्न होकर निद्रा में चली गईं।

उसी गुफा में एक शुक (तोते) का घोंसला था। उसी समय एक अंडा फूटा और एक तोते का बच्चा जन्मा। वह बाल शुक शिवजी की दिव्य कथा सुन रहा था। उस कथा के प्रभाव से उसमें अलौकिक चेतना जाग्रत हो गई।

जब शुक ने देखा कि माता पार्वती सो रही हैं और यदि हुंकारी न मिली तो भगवान शिव कथा रोक सकते हैं, तब उसने स्वयं माता पार्वती की जगह हुंकारी भरनी शुरू कर दी।
कुछ समय पश्चात भगवान शिव को ज्ञात हो गया कि यह हुंकारी देवी पार्वती की नहीं है। वे कुपात्र तक अमरत्व का ज्ञान पहुँचने से क्रोधित हो उठे और शुक का वध करने के लिए उठ खड़े हुए।

शुक भयभीत होकर वहाँ से उड़ चला। भागते-भागते वह महर्षि वेदव्यास के आश्रम में पहुँचा। उसी समय व्यास जी की पत्नी अरुणी (कुछ परंपराओं में वटिका) जम्हाई ले रही थीं। शुक ने सूक्ष्म रूप धारण किया और उनके मुख से होकर गर्भ में प्रवेश कर गया।

भगवान शिव भी वहाँ पहुँचे, किंतु जब उन्होंने देखा कि शुक अब महर्षि व्यास की शरण में है, तो उन्होंने उसका वध नहीं किया।

शुक गर्भ में ही वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराणों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर चुका था। संसार की माया को वह पहले ही समझ चुका था, इसलिए वह पृथ्वी लोक में जन्म नहीं लेना चाहता था। इसी कारण वह बारह वर्षों तक गर्भ से बाहर नहीं आया।
इस विलंब के कारण व्यास जी की पत्नी अत्यंत पीड़ा में आ गईं और मरणासन्न हो गईं। व्यास जी ने गर्भस्थ शिशु से बाहर आने की प्रार्थना की, किंतु शुक ने स्पष्ट कहा—
“यह संसार मोह-माया से भरा है, मैं इसमें नहीं आना चाहता।”

तभी इस घटना का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण को हुआ। वे स्वयं व्यास आश्रम पहुँचे और गर्भस्थ शुक से बोले—
“यदि तुम बाहर आओगे, तो माया तुम्हें बाँध नहीं पाएगी। मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ।”

भगवान श्रीकृष्ण के वचन सुनकर शुक गर्भ से बाहर आए।
जन्म लेते ही उन्होंने अपने माता-पिता, महर्षि व्यास और भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और तुरंत तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान कर गए।

महर्षि व्यास उनके पीछे-पीछे “पुत्र! पुत्र!” कहकर पुकारते रहे, किंतु शुकदेव ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।
पुत्र को रोकने के लिए व्यास जी ने एक युक्ति अपनाई। उन्होंने श्रीकृष्ण लीला पर आधारित एक श्लोक की रचना की और उसका आधा भाग अपने शिष्यों को रटा कर उस मार्ग पर भेज दिया जहाँ शुकदेव तपस्या कर रहे थे।

जब शुकदेव ने वह श्लोक सुना, तो श्रीकृष्ण लीला का रस उनके हृदय को स्पर्श कर गया। वे स्वयं चलकर अपने पिता महर्षि व्यास के आश्रम पहुँचे।

वहीं महर्षि व्यास ने उन्हें श्रीमद्भागवत के अठारह हज़ार श्लोकों का विधिवत उपदेश दिया।

आगे चलकर यही श्रीमद्भागवत राजा परीक्षित को सुनाई गई, जिसके प्रभाव से उन्होंने मृत्यु के भय पर विजय प्राप्त की।

#शुकदेव
#अमरत्वका_ज्ञान
#भागवत_कथा
#महर्षिव्यास
#श्रीकृष्णकृपा
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  शिव का सामाजिक संदेश: समानता, समावेशिता और आंतरिक शांतिसामाजिक दृष्टि से देखें तो शिव का संदेश अत्यंत स्पष्ट और कालजयी...
15/02/2026


शिव का सामाजिक संदेश: समानता, समावेशिता और आंतरिक शांति

सामाजिक दृष्टि से देखें तो शिव का संदेश अत्यंत स्पष्ट और कालजयी है—समानता और समावेशिता। वे सभी वर्गों को एक समान दृष्टि से देखते हैं, चाहे व्यक्ति किसी भी पृष्ठभूमि, जाति, धर्म या संप्रदाय से क्यों न आता हो। शिव का दर्शन हमें याद दिलाता है कि समाज की वास्तविक शक्ति विभाजन में नहीं, बल्कि एकता और करुणा में निहित है।

आज का आधुनिक समाज अनेक प्रकार के कष्टों से जूझ रहा है। विज्ञान और तकनीक ने सुविधाएँ तो बढ़ा दी हैं, परंतु मनुष्य जाति, धर्म, वर्ग और संप्रदाय के नाम पर पहले से कहीं अधिक बँटती चली गई है। हमारा सामाजिक ढाँचा इतनी गहराई से विभाजित हो चुका है कि हम मनुष्य होने की अपनी मूल पहचान को भूलते जा रहे हैं। शिव इस भ्रम को तोड़ते हैं। वे सिखाते हैं कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसकी कर्मशीलता, उसकी सोच और उसके आचरण से होती है।

शिव का यह सिद्धांत यदि हम जीवन में आत्मसात कर लें, तो समाज में व्याप्त असमानता, भेदभाव और अनेक प्रकार के सामाजिक विकारों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। जब कर्म को मानक बनाया जाएगा, तब ऊँच-नीच, श्रेष्ठता और हीनता के कृत्रिम भेद स्वतः ही समाप्त होने लगेंगे। यही सच्ची सामाजिक क्रांति का आधार है।

इसके साथ ही, आज मानसिक तनाव और अवसाद वैश्विक समस्या बन चुके हैं। लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन पीछे छूट गया है। शिव का योग और ध्यान से जुड़ा दर्शन इस संकट का समाधान प्रस्तुत करता है। वे बताते हैं कि वास्तविक शांति बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और आत्मचिंतन में है। ध्यान, संयम और सरल जीवन—ये शिव के मार्ग के मूल स्तंभ हैं।

शिव न तो भोग-विलास के पक्षधर हैं और न ही दिखावटी वैभव के। वे विनाशक नहीं, बल्कि अज्ञान और अहंकार के विनाशक हैं। उनका संदेश स्पष्ट है—समानता अपनाओ, भीतर झाँको, और जीवन को संतुलन में जियो। यदि आधुनिक समाज शिव के इस दर्शन को समझ ले, तो न केवल सामाजिक विभाजन कम होगा, बल्कि मानसिक शांति और मानवीय संवेदनाएँ भी पुनः जागृत होंगी।

शिव का मार्ग हमें मनुष्य बनने का मार्ग दिखाता है—सचेत, समतामूलक और करुणामय।

#शिवदर्शन #समानता #समावेशिता #कर्मसिद्धांत #मानवता #योग #ध्यान

आज वेलेंटाइन डे दोस्ती के नाम रहा,बचपन से मेरी खास  दोस्त कंचन  के संग हर पल खास रहा।बेस्ट जोड़ी का खिताब और इनाम भी मिल...
14/02/2026

आज वेलेंटाइन डे दोस्ती के नाम रहा,
बचपन से मेरी खास दोस्त कंचन के संग हर पल खास रहा।
बेस्ट जोड़ी का खिताब और इनाम भी मिला,
दोस्ती के रंग में ये दिन यादगार बन गया। 💖🤝

 #करुणा_और_धर्म🌊🕊️ अगस्त्य मुनि और पक्षी की प्रतिज्ञा 🕊️🌊समुद्र के तट पर महान तपस्वी अगस्त्य मुनि कठोर व्रत और तपस्या मे...
14/02/2026

#करुणा_और_धर्म
🌊🕊️ अगस्त्य मुनि और पक्षी की प्रतिज्ञा 🕊️🌊

समुद्र के तट पर महान तपस्वी अगस्त्य मुनि कठोर व्रत और तपस्या में लीन रहते थे। उसी समुद्र तट से कुछ दूरी पर एक छोटी-सी पक्षी अपने अंडों को सेहते हुए मातृत्व का सुख अनुभव कर रही थी। वह निश्चिंत थी, क्योंकि प्रकृति की गोद में उसे कोई भय न था।

परंतु अचानक समुद्र में भयानक तूफ़ान उठा। ऊँची-ऊँची लहरें तट से टकराईं और देखते ही देखते पक्षी के अंडे समुद्र की लहरों में बह गए। यह दृश्य उस पक्षी के लिए असहनीय था। पीड़ा और शोक से व्याकुल होकर उसने एक कठोर प्रतिज्ञा कर ली—
“जब तक मैं समुद्र को सुखा नहीं दूँगी, तब तक चैन से नहीं बैठूँगी।”

अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह चोंच से समुद्र का जल भर-भरकर पीने लगी। समय बीतता गया—दिन, महीने, वर्ष—पर समुद्र का जल तनिक भी कम न हुआ। अंततः थक-हारकर, आँखों में आँसू लिए वह पक्षी अगस्त्य मुनि के पास पहुँची और अपनी व्यथा सुनाई।
अगस्त्य मुनि का हृदय करुणा से भर उठा। वे गहन चिंता में डूब गए—
“इस अबला की प्रतिज्ञा कैसे पूरी हो?”

समाधान खोजते हुए उन्होंने विघ्नहर्ता गणेश जी का स्मरण किया और पूर्ण श्रद्धा से चतुर्थी व्रत का पालन किया। तीन मास तक नियम, संयम और भक्ति से व्रत करने पर गणेश जी प्रसन्न हुए और मुनि को मार्ग प्रशस्त किया।

गणेश कृपा से प्राप्त सिद्धि द्वारा अगस्त्य मुनि ने प्रेम और करुणा के साथ समुद्र का जल पीकर उसे सुखा दिया। समुद्र के सूखते ही पक्षी की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई। उसके अंडे सुरक्षित लौट आए और पक्षी आनंद व कृतज्ञता से भर उठी। उसकी आँखों के आँसू अब प्रसन्नता में बदल चुके थे।

🌼 सीख (शिक्षा):

सच्ची करुणा और निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य असंभव को भी संभव बना देता है।
छोटी-सी शक्ति भी यदि दृढ़ संकल्प से जुड़ जाए, तो महान परिवर्तन ला सकती है।
ईश्वर भक्ति, व्रत और श्रद्धा से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएँ दूर होती हैं।
किसी के दुख को अपना समझना ही सच्चा धर्म है।

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#गणेश_कृपा
#प्रतिज्ञा_की_शक्ति
#भारतीय_पुराण
#भक्ति_और_विश्वास

पञ्चतत्व और पृथ्वी : दार्शनिक दृष्टिकोणभारतीय दर्शन में सृष्टि की मूल संरचना को पञ्चतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश...
14/02/2026

पञ्चतत्व और पृथ्वी : दार्शनिक दृष्टिकोण

भारतीय दर्शन में सृष्टि की मूल संरचना को पञ्चतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के रूप में समझाया गया है। ये पाँच तत्व केवल भौतिक घटक नहीं हैं, बल्कि जीवन, चेतना और ब्रह्मांडीय संतुलन के प्रतीक हैं। पृथ्वी इन्हीं पञ्चतत्वों से निर्मित मानी गई है, इसलिए उसे साधारण ग्रह नहीं, बल्कि देवतुल्य सत्ता का दर्जा प्राप्त है।

पृथ्वी तत्व स्थिरता, धैर्य और पोषण का प्रतीक है। समस्त प्राणियों का जीवन इसी पर आधारित है—अन्न, जल, औषधि और आश्रय सब पृथ्वी से ही प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में पृथ्वी को “माता” कहा गया है—माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः—जो यह दर्शाता है कि मानव स्वयं को पृथ्वी का पुत्र मानता है, स्वामी नहीं। यह दृष्टि भोग की नहीं, बल्कि कर्तव्य और कृतज्ञता की है।

जल तत्व जीवनदायिनी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। यह प्रवाह, शुद्धि और करुणा का संकेतक है। अग्नि तत्व रूपांतरण और तप का प्रतीक है—यज्ञ, संस्कार और ऊर्जा का स्रोत। वायु गति, प्राण और जीवनशक्ति का संवाहक है, जबकि आकाश व्यापकता, शून्यता और चेतना का आधार है। इन पाँचों का संतुलन ही सृष्टि का संतुलन है।

देवताओं का दर्जा मिलने का दार्शनिक अर्थ यह है कि पञ्चतत्वों को पूजनीय मानकर मनुष्य उनके साथ सामंजस्य स्थापित करे। पूजा का आशय अंधश्रद्धा नहीं, बल्कि सम्मान, मर्यादा और संरक्षण की भावना है। जब पृथ्वी को देवतुल्य माना जाता है, तब शोषण नहीं, संरक्षण का भाव जन्म लेता है।

अतः पञ्चतत्वों की दार्शनिक समझ हमें यह सिखाती है कि प्रकृति और मानव अलग नहीं हैं। पृथ्वी हमारी माता है, और पञ्चतत्व जीवन के वे स्तंभ हैं जिनके प्रति श्रद्धा ही सच्चा दर्शन और सतत जीवन का मार्ग है।

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नकारात्मकता का बोझ और उससे मुक्ति का मार्गकुछ लोग अपने मन में इतनी गहरी नफ़रत भर लेते हैं कि उनका हृदय निरंतर हिंसा, शत्...
14/02/2026

नकारात्मकता का बोझ और उससे मुक्ति का मार्ग

कुछ लोग अपने मन में इतनी गहरी नफ़रत भर लेते हैं कि उनका हृदय निरंतर हिंसा, शत्रुता और प्रतिशोध से घिरा रहता है। यह नफ़रत केवल किसी एक व्यक्ति या परिस्थिति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे उनके पूरे जीवन का स्वभाव बन जाती है। ऐसे लोग अपने भय, दुख, पुराने घावों और रोज़मर्रा की पीड़ाओं से कभी मुक्त नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप, उनके जीवन में शांति का अभाव बना रहता है और वे स्वयं को हर समय परेशानियों से घिरा हुआ अनुभव करते हैं।

दुख को पहचान बना लेना

जब कोई व्यक्ति अपने दुख को ही अपनी पहचान बना लेता है, तो वह अनजाने में उसे पोषित करने लगता है। दुख की बातें करना, शिकायतें दोहराना और पीड़ा को बार-बार याद करना उसे एक विचित्र-सा अपनापन देता है। ऐसा व्यक्ति तब तक सहज महसूस करता है, जब तक सामने वाला उसके दुख में सहभागी बना रहे—उसे सुने, उसे बढ़ाए और उसी नकारात्मकता में डूबा रहे।

संबंधों पर पड़ता प्रभाव

नकारात्मक व्यक्ति जिन लोगों से जुड़ा होता है, उनके लिए भी सुखी रह पाना कठिन हो जाता है। वे दूसरों की खुशी को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और अनजाने में उसे कम करने लगते हैं। यदि उनसे जुड़ा कोई व्यक्ति किसी आदर्श, विश्वास या आस्था के मार्ग पर भी चल पड़े, तो भी उसके जीवन में स्थायी शांति नहीं टिक पाती—क्योंकि निरंतर नकारात्मक संगति उसकी ऊर्जा को क्षीण करती रहती है।

आंतरिक शांति की बाधा

नकारात्मकता केवल विचारों तक सीमित नहीं रहती; यह धीरे-धीरे मन, व्यवहार और दृष्टिकोण को जकड़ लेती है। जब मन प्रतिशोध और शत्रुता से भरा हो, तो करुणा, क्षमा और संतोष के लिए स्थान ही नहीं बचता। ऐसे में शांति की खोज बाहर नहीं, भीतर से ही असफल हो जाती है।

समाधान: दूरी और विवेक

इसलिए जीवन में विवेकपूर्ण दूरी आवश्यक है। नकारात्मक लोगों से दूर रहना पलायन नहीं, बल्कि आत्म-संरक्षण है। सकारात्मक संगति, आत्मचिंतन और संतुलित दृष्टि से ही मन हल्का होता है। जब हम अपने चारों ओर ऐसी ऊर्जा चुनते हैं जो हमें उठाती है, तो धीरे-धीरे दुख का भार कम होने लगता है और जीवन में सहजता लौट आती है।

निष्कर्ष

शांति और सुख किसी बाहरी परिस्थिति पर निर्भर नहीं होते, वे हमारे चुनावों से जन्म लेते हैं—विशेषकर इस चुनाव से कि हम किन लोगों और किन विचारों को अपने जीवन में स्थान देते हैं। नकारात्मकता से दूरी बनाकर ही हम स्वयं को और अपने संबंधों को स्वस्थ रख सकते हैं।

#नकारात्मकता #मानसिकशांति #सकारात्मकसोच #जीवनदर्शन #आत्मसंरक्षण #मानसिकस्वास्थ्य

कहानी: सच्चाई के पीछे चलती दुनियाएक समय की बात है। एक राज्य में राजा सत्यदेव का शासन था। राजा धन, वैभव और शक्ति से परिपू...
13/02/2026

कहानी: सच्चाई के पीछे चलती दुनिया
एक समय की बात है। एक राज्य में राजा सत्यदेव का शासन था। राजा धन, वैभव और शक्ति से परिपूर्ण थे, पर उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था—जीवन में सबसे बड़ा बल क्या है?
एक रात उन्होंने स्वप्न देखा। स्वप्न में एक तेजस्वी स्त्री उनके महल से बाहर निकलती दिखाई दी। उसके कदम शांत थे, चेहरे पर तेज था और चाल में अडिग विश्वास। राजा घबरा कर उठे और तुरंत उसके पीछे चल पड़े।
सुबह होते ही उन्होंने देखा—वह स्त्री सचमुच महल के द्वार से बाहर जा रही है। राजा ने पूछा,
“देवी, आप कौन हैं और कहाँ जा रही हैं?”
वह मुस्कराई और बोली,
“मेरा नाम सच्चाई है। मैं वहाँ जाती हूँ जहाँ सच्चे इंसान का वास होता है।”
राजा ने आश्चर्य से कहा,
“क्या आप मेरे महल में नहीं रह सकतीं? यहाँ धन है, सम्मान है, सुरक्षा है।”
सच्चाई ने शांति से उत्तर दिया,
“जहाँ सत्य नहीं टिकता, वहाँ मैं भी नहीं रुकती। धन, यश और वैभव मेरे पीछे-पीछे चलते हैं, पर मैं किसी के पीछे नहीं चलती।”
यह कहकर वह आगे बढ़ गई। राजा उसके पीछे-पीछे चल पड़े। रास्ते में उन्होंने देखा—जहाँ-जहाँ सच्चाई के कदम पड़े, वहाँ भय दूर हुआ, लोगों के चेहरे खिल उठे, विश्वास जन्मा। थोड़ी ही दूर पर एक साधारण-सा व्यक्ति मिला—न तन पर आडंबर, न वाणी में छल। उसके जीवन में सरलता थी और कर्म में ईमानदारी।
सच्चाई उसी के द्वार पर रुक गई।
राजा ने कारण पूछा तो सच्चाई बोली,
“यह इंसान सत्य के साथ जीता है। इसे पाने के लिए मैंने कभी मेहनत नहीं की—यह खुद मेरे साथ चला।”
राजा को समझ आ गया। सच्चा इंसान ही केंद्र होता है; धन, सम्मान, लक्ष्मी और यश उसके पीछे-पीछे आते हैं। जो सत्य को छोड़कर साधन खोजता है, वह खाली हाथ रह जाता है; और जो सत्य को थाम लेता है, उसके पास सब अपने-आप पहुँच जाते हैं।
उसी दिन से राजा ने शासन का आधार बदल दिया—नीति, न्याय और सच्चाई। राज्य में सुख-शांति फैल गई, क्योंकि अब लोग साधनों के नहीं, सत्य के पीछे चल रहे थे।
सीख:
सच्चाई कोई वस्तु नहीं जिसे पाया जाए; यह वह मार्ग है जिस पर चलने से सब कुछ मिल जाता है। सच्चा इंसान बनो—बाक़ी सब अपने-आप पीछे आ जाएगा।

#सच्चाई #सच्चा_इंसान #सत्यका_पथ #जीवन_मूल्य #ईमानदारी #चरित्र #धर्म #नैतिकता #जीवन_सीख

एक क्षत्राणी — जहाँ समर्पण नहीं होता🛡जब अस्मिता पर बन आए तो हर नारी क्षत्राणी होती है। क्षत्राणी की पहचान झुकने में नहीं...
13/02/2026

एक क्षत्राणी — जहाँ समर्पण नहीं होता🛡
जब अस्मिता पर बन आए तो हर नारी क्षत्राणी होती है।
क्षत्राणी की पहचान झुकने में नहीं, स्वाभिमान को थामे खड़े रहने में होती है।
जहाँ सम्मान पर आँच आती है, वहाँ या तो चूड़ियाँ उतरती हैं और शस्त्र उठते हैं,
या फिर इतिहास के पन्नों पर जौहर स्वाभिमान की अंतिम मुहर बनकर दर्ज होता है।
इतिहास गवाह है—
रानी चेन्नमा, रानी दुर्गावती और रानी कर्णावती जैसी वीरांगनाएँ
समर्पण की भाषा नहीं जानती थीं।
उन्होंने अपमान के आगे सिर नहीं झुकाया—
या तो रणभूमि में लड़ीं,
या फिर आत्मसम्मान की अग्नि में इतिहास बन गईं।
और यह मत भूलो—
हर नारी में एक क्षत्राणी छुपी होती है।
जो तब तक मौन रहती है,
जब तक मर्यादा सुरक्षित रहती है।
पर जिस दिन सीमाएँ लाँघी जाती हैं,
उसी दिन वही नारी
कवच पहनकर रणभूमि में उतरने का साहस भी रखती है।
आज जब कोई मूर्ख स्त्री-सम्मान को शब्दों में अपमानित करने का दुस्साहस करता है,
तो उसे समझ लेना चाहिए—
ठकुराइन की सहनशीलता उसकी दुर्बलता नहीं होती।
सीमाएँ लाँघी जाती हैं तो काल भी अपनी दिशा बदल लेता है।
यह कलम अभी शब्दों के वाण चलाती है—
पर स्वाभिमान के प्रश्न पर
कलम रखकर तलवार उठाने की परंपरा भी इसी मिट्टी की थाती है।
ज़रूरत पड़ी, तो वही नारी
रणचंडी बनकर अन्याय के विरुद्ध खड़ी हो जाती है।
क्योंकि क्षत्राणी डरती नहीं—
वह केवल चेतावनी देती है।
जय राजपूताना 🔱⚜️🔱
जय सनातन धर्म 🚩🚩🚩








13/02/2026

दिलजले जब शायरी लिखते हैं, तो काग़ज़ नहीं—सीधा दिल जलाते हैं।
उनकी कलम में स्याही नहीं, अधजले जज़्बात टपकते हैं।
हर शेर में “वो बेवफ़ा थी” ऐसा घुसा रहता है,
जैसे ब्रह्मांड का सबसे बड़ा अपराध वही करके गई हो।
एक मिस्ड कॉल को महाभारत बना देते हैं,
और “Seen” को ऐसा शाप बताते हैं
मानो इंद्रलोक से सीधा निष्कासन हो गया हो।
दो दिन बात क्या बंद हुई,
जनाब फ़लसफ़ी बन जाते हैं—
“इश्क़ भ्रम है”, “औरत धोखा है”, “ज़िंदगी धोनी है”।
इनकी शायरी में बारिश भी रोती है,
चाँद भी अकेला है,
और रात तो ऐसी काली कि
ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म भी शर्म खा जाए।
अगर चाय ठंडी हो जाए,
तो भी दो लाइनें लिख देंगे—
“वो भी मुझसे ठंडी हो गई…”
मज़े की बात ये है कि
दिलजलों की शायरी सबसे ज़्यादा
व्हाट्सऐप स्टेटस पर जिंदा रहती है,
जहाँ वही “बेवफ़ा” चुपचाप स्टेटस देख भी लेती है
और अगला शेर वहीं से जन्म ले लेता है।
असल में दिलजले कवि नहीं होते,
वो भावनाओं के ओवरएक्टिव रिपोर्टर होते हैं—
जहाँ ज़रा सा दर्द हुआ नहीं,
ब्रेकिंग न्यूज़ बना दी।
अगर थोड़ा सा प्रेम मिला होता,
तो शायद शायरी नहीं,
शुक्रिया लिखा जाता।

#दिलजले
#व्यंग्य
#शायरी_पर_व्यंग
#इश्क_और_ओवरडोज
ा_दर्द
#दिल_और_डायलॉग
#हास्य_व्यंग्य

With Vijay Mohan Mishra – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
13/02/2026

With Vijay Mohan Mishra – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

With Durgesh Kumar Sahu – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
13/02/2026

With Durgesh Kumar Sahu – I just got recognized as one of their top fans! 🎉

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