29/03/2016
पूजनीय सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा कि हम भारत को एक संपन्न, समतायुक्त और शोषणमुक्त देश बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि देश स्वाभिमान और सामर्थ्य संपन्न बनें और संघ चाहता है कि पूरी दुनिया भारत का नाम ले। इसके लिए हमें अपने जीवन में ‘भारत’ को जीना होगा। संघ इसी के लिए कार्य कर रहा है। डॉ.भागवत कोलकाता में फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल सोसाइटी नामक संस्था के सहसंस्थापक दिवंगत मदनलाल अग्रवाल के जीवन पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे।
सरसंघचालक जी ने कहा कि हम लोग भारत के हैं। हम लोग ‘भारतमाता की जय’ कहते हैं। जो भारत शब्द है यह केवल भूमि वाचक शब्द नहीं है, यह गुण वाचक शब्द है। और उन गुणों के साथ जब इस भूमि का वासी खड़ा होता है तब वह भारत कहलाता है। अन्यथा वह भारत नहीं कहलाता।
उन्होंने पाकिस्तान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन गुणों के साथ खड़ा रहना स्वीकार नहीं था इसलिए उन्होंने अपना अलग देश बनाया। उन गुणों का वर्णन जहां से आया वह उदगम स्थल, उन्होंने अपना देश वहां बनाया है, पाकिस्तान में। वेदों की रचना, हमारी देवभाषा, आदिभाषा संस्कृत का व्याकरण वहां रचा गया। वहां से हमारे पूर्वज सारी दुनिया में गए। ये सब होने के बाद भी उन्होंने (पाकिस्तान ने) अलग होते समय हमसे यह नहीं कहा कि हम अपने देश का नाम भारत रखेंगे, तुम अपने देश का नाम दूसरा ढूंढो। ये उन्होंने कहा नहीं, उन्होंने अपना नाम अलग लिया। क्योंकि जिन गुणों को वे नहीं चाहते थे, वो सब भारत नाम लेते ही उनके पीछे-पीछे आ जाते।
एकमात्र दुनिया में भारतवर्ष ऐसा है इसके जो प्राचीनतम जीवन दर्शन है, उसका प्रत्यक्ष आचरण आज भी यहां पर देखने को मिलता है। यह कागज लेखी बात नहीं, आंखन देखि बात है भाई! सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रहमचर्य, तप, संतोष, ईश्वर प्रणिधान, ये सारी बातें जो है यम, नियम, आत्मीयता, आचरण की, ये सारी की सारी आज भी भारत वर्ष में देखी जा सकती है। उस जीवन को भारत कहते हैं | भारत के जीवन की यह परम्परा सब प्रकार की आपत्तियों और कष्टों को पार कर आज तक चलती आई। इसका कारण तो जीवन ही है।