16/03/2024
अगर कोचिंग करके १ लाख लोग डॉक्टर बनाते हैं तो बिना कोचिंग के कितने बनेंगे ?
अगर कोचिंग करके १००० लोग सिविल सर्विसेज़ में सेलेक्ट होते हैं तो बिना कोचिंग के कितने बनेंगे ?
अगर प्रचार करके ५४३ सांसद चुने जाते हैं तो बिना प्रचार के कितने चुने जाएँगे?
फिर कोचिंग या प्रचार की क्या आवश्यकता
कोचिंग या प्रचार सामर्थ्य जिसके पास है अर्थात् जिनके पास धन बल या कोई व्यवस्था है उनके लिए अवसर बढ़ देती है। और जिनके पास नहीं है उनके लिये अवसर घटा देती है
कोचिंग के प्रेशर में बच्चा पढ़ पढ़ के तनाव में है हर साल और ज़्यादा टफ़ पढ़ाई जिससे एडवांटेज मिले, जब कि सीट उतनी ही हैं उतने ही लोग चुने जाएँगे।
यही हाल नेता का चुनाव लड़ना मतलब पैसों को प्रचार में पानी की तरह फुकना।
तो क्या ये बंद हो?
आइए सोचते हैं
देश के स्तर पर सोचे तो
राज्य सभा के २५० सांसद
उससे दोगुने से ज़्यादा लोकसभा सांसद (५४३)
लोकसभा से लगभग ८ गुणा ज़्यादा विधायक (४२०० से ज़्यादा)
और हर विधायक पर लोकल बॉडी के ८०० चुने हुए लोग (कुल तीस लाख से ज़्यादा)
इतने लोग चुने जाने हैं हर पाँच साल में।
अब लोकतंत्र है अगर हर सीट पर अगर औसत ५ से दस लोग भी न लड़े ,तो काहे का लोकतंत्र
तो समझिए करोड़ दो करोड़ लोगों को चुनाव लड़वाना है वो भी सारे चुनाव एक साथ नहीं होते।इसलिए पूरे देश की जनता को तीन या अधिक बार सम्मलित होना है
आप पाँच वर्षों के इलेक्टोरल बॉण्ड के बीस हज़ार करोड़ को माने तो इस आयोजन में प्रति सीट लगभग ६० हज़ार खर्चा निकलता है अगर ५-१० लोग हर सीट पर है तो प्रतिव्यक्ति ५-१० हज़ार चुनावी ख़र्च आएगा।अब आप ही बताओ पाँच दस हज़ार में क्या चुनाव होगा।जन्मदिन का सामान्य उत्सव नहीं होता आज इतने में।
हर छोटा चुनाव कई लाख का तो विधान सभा कम से कम कुछ करोड़,लोकसभा सीट तो करोड़ों में खर्चा माँगती है।
उपरोक्त बातों से ये तो पता चलता है कि क़ानून कुछ भी हो चुनाव में आज भी काला धन हावी है। इलेक्टोरल बॉण्ड चुनावी ख़र्चों का बहुत न्यून प्रतिशत है।
अब उपाय क्या हो। क्या एक साथ चुनाव हों जिससे कुल खर्चा घट जाए या एक रास्ता है कि चुनाव का खर्चा टैक्स से हो, उस स्थिति में आमजन पर बोझ बढ़ेगा।दूसरा की कॉर्पोरेट इसका खर्चा उठाये उसमें किकबैक के आपेक्षा होगी।
पर हर कोई,और हर बिज़नेस भी अपने को बढ़ाने के लिए कुछ न कुछ लॉबी करता ही है और लगभग सभी करते हैं चाहे अपना समय देकर आंदोलन का दबाव हो या धनबल का दबाव सभी अपना हित बढ़ाने में ही तो लगते हैं।जिसके पास कुछ नहीं तो दूसरों ने उसका अहित किया इसी इमोशनल शक्तिपात के बल पर जी रहा है। तो उपाय क्या है?
क्या उपाय पारदर्शिता है और कितनी पारदर्शिता?
सबको पता है कि अगर सबके बैंक डिटेल, इनकम टैक्स डिटेल, इंटरनेट उपयोग आदि सार्वजनिक कर दें तो सबको पता तो है ही पर सिद्ध भी हो जाएगा कि सभी मनुष्य ही है कभी सही तो कभी ग़लत।और जिसका कुछ ना मिले उस तक या तो प्रकाश पहुँच ही नहीं पाया या वो भगवान ही होगा।
तो हम कितनी पारदर्शिता चाहते हैं ये भी तो तय करें।
आम तौर पर छूटे मकानों में रहकर किंतु बड़े होटलों में आयोजनों का शौक़ वाले हमारे समाज में, नेता का भोकाल भी हो नेता का कफ़ीला भी हो, नेता सबके काम भी करा दे, पर नेता ये सब कैसे करे।
इसलिए ज़्यादातर लोक नेतागीरी से दूर ही रहते हैं।और पूछते हैं दूसरों से हिसाब।
अब क्या नेतागीरी अगर इतनी गतिशील है तो उस गति में ऊर्जा तो खर्च होगी, ऊर्जा देश कैसे देगा कौन देगा। और नेता अगर सुस्त हो तो नेता लापता है ये भी तो हम ही कहते हैं।
तो उपाय क्या है?
और ये समस्या अपने देश की ही नहीं है हर लोकतंत्र की है?
चर्चा शुरू करते हैं
य: पश्यति स पश्यति
अजय शुक्ला