12/12/2025
मेरी कलम से ✍️
आजकल सोशल मीडिया पर मैंने ऐसी कई वीडियो देखी हैं जो मन को हिला देती हैं। इनमें भगवान की कहानियों को इस तरह बदल दिया गया है कि उनका स्वरूप ही कुछ और हो जाता है। हाल ही में मैंने एक वीडियो देखी जिसमें बालकृष्ण अपनी माँ से विवाह के बारे में पूछते हैं और मजाक करते हुए कहते हैं— “मैं सुदामा की बहू ले आऊँगा।” पहली नज़र में यह दृश्य किसी हल्के-फुल्के हास्य की तरह लगता है, लेकिन जैसे ही मन गहराई में जाता है, एक चुभन उठती है कि धर्म को आखिर किस दिशा में मोड़ा जा रहा है। जिस बात का शास्त्रों में कहीं उल्लेख नहीं, उसे आज मजाक और तमाशे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, और लोग इसे सच मानकर आनंद भी ले रहे हैं।
कथा-वाचन, जो कभी भक्ति, ज्ञान और आध्यात्मिक उत्थान का माध्यम था, अब बहुत जगहों पर मनोरंजन का साधन बन गया है। कई कथा-वाचक मंच को साधना का स्थान नहीं, बल्कि एक शो की तरह देखते हैं—जहाँ आवाज़ में उतार-चढ़ाव, संवादों में अभिनय और घटनाओं में मनगढ़ंत कल्पना जोड़कर भीड़ को आकर्षित किया जाता है। भगवान, जो जीवन के आदर्श हैं, जिनके चरित्र से हम धैर्य, प्रेम, नीति और सद्गुण सीखते हैं—उन्हें आज मजाक और हास्य के पात्र के रूप में दिखाया जाने लगा है।
सबसे बड़ा खतरा यह है कि आज की पीढ़ी धर्म को किताबों और गुरुओं से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन से सीख रही है। बच्चा जब पहली बार कृष्ण का नाम सुनता है, तो उसके सामने स्क्रीन पर वही छवि आती है जो उसे वीडियो में दिखाई जाती है। अगर उसे भगवान का स्वरूप इस तरह की हास्यमय, मनगढ़ंत कहानियों में दिखाया जाएगा, तो उसकी श्रद्धा भी उसी दिशा में ढल जाएगी। वह भगवान को आध्यात्मिक शक्ति नहीं, बल्कि एक कॉमिक चरित्र की तरह देखना शुरू कर देगा। धीरे-धीरे धर्म मनोरंजन में बदल जाएगा, और भक्ति का भाव सतही होकर रह जाएगा।
हमें यह समझना होगा कि धर्म केवल घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन की दिशा है। भगवान की प्रत्येक कथा का अपना अर्थ और गहराई होती है। कृष्ण का बाल-स्वरूप भी केवल खेल का रूप नहीं, बल्कि प्रेम, मासूमियत, ज्ञान और धर्म के बीजों का स्वरूप है। लेकिन जब कथा-वाचक अपनी कल्पनाएँ जोड़कर घटनाओं का रूप बदल देते हैं, तो न केवल कथा बदलती है, बल्कि उसका सार भी खो जाता है।
आज आवश्यकता है कि हम सच और दिखावे के बीच का अंतर पहचानें। जो भी कथा सुनें, उसे केवल मनोरंजन की दृष्टि से न लें। यह भी समझें कि भगवान का नाम कोई हँसी-मज़ाक का विषय नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। बच्चों को भगवान के बारे में बताते समय उन्हें सही जानकारी दें, क्योंकि उनके मन में जो पहली छवि बनती है, वही जीवनभर रहती है।
धर्म को हल्का बनाकर प्रस्तुत करने से धर्म कमजोर नहीं होता, लेकिन हमारी श्रद्धा अवश्य कमजोर हो जाती है। जब श्रद्धा कमजोर होती है, तो जीवन भी दिशा खो देता है। इसलिए ज़रूरत है कि हम धर्म को उसकी गंभीरता और पवित्रता में समझें और दूसरों को भी समझने दें।
मैंने जो वीडियो देखी, वह केवल एक दृश्य नहीं था—वह इस बात का संकेत था कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं। यह समय है रुककर सोचने का, खुद को संभालने का और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए धर्म की सही रोशनी बचाने का। भगवान को कॉमिक चरित्र नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और प्रकाश के स्वरूप में देखने का। यही धर्म की मर्यादा है और यही हमारी ज़िम्मेदारी भी।
🙏आपकी नित्य शुभाकांशी हेमलता मुरलीधर 🌹