15/03/2026
पोस्ट डालने पर विवश हो गया- अंतिम विदाई 🥹
“सबको माफ करते हुए… अब जाओ, ठीक है।”
कभी-कभी ज़िंदगी इतनी लंबी पीड़ा बन जाती है कि सांसें भी बोझ लगने लगती हैं।
13 साल तक कोमा में पड़े एक इंसान की चुप्पी ने परिवार को हर दिन एक नई परीक्षा दी।
आज जब अंतिम विदाई दी गई, तो यह सिर्फ एक मौत नहीं थी —
यह उन 13 सालों के दर्द, इंतजार और उम्मीदों का अंत था।
"बेटा, तू जा रहा है... पर इज्जत से जा रहा है, यही सहारा है"
गाजियाबाद के उस मोहल्ले में आज हवाएं भी चुप हैं। हरीश के घर के आगे भीड़ है, पर सन्नाटा है। भीड़ के अंदर दो टूटे हुए दिल हैं - अशोक राणा और निर्मला देवी। जिनके बेटे ने 13 साल पहले आंखें बंद की थीं, आज वो आंखें हमेशा के लिए बंद होने वाली हैं।
निर्मला देवी ने हाथ जोड़े - "भगवान के लिए, हमें अकेला छोड़ दो। मेरा बेटा जा रहा है, मैं उसे अपने हाथों से विदा करना चाहती हूं। तस्वीरें मत खींचो, सवाल मत पूछो। एक मां से यह मत पूछो कि उसे कैसा लग रहा है जब उसकी कोख का टुकड़ा हमेशा के लिए उससे दूर जा रहा हो।"
अशोक राणा ने बेटे के सिरहाने बैठकर उसके बाल सहलाए। उन हाथों ने 13 साल में क्या नहीं किया? दिल्ली का तीनमंजिला घर बेचा, सड़कों पर सैंडविच बेचे, हर महीने 70 हजार का इंतजाम किया। बस एक आस थी कि शायद एक दिन बेटा आंख खोले। वो आस आज मिट्टी में मिल रही है।
"डॉक्टरों ने कहा था - कोई उम्मीद नहीं। हमने फिर भी नहीं छोड़ा। दवाएं दीं, दुआएं दीं, रातों की नींदें दीं। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया - बहुत हो गया। बेटे को इज्जत दो। तो हम दे रहे हैं। बेटा जा रहा है, पर इज्जत से जा रहा है। यही सहारा है।"
शुक्रवार को एम्स की चारदीवारी में डॉक्टरों ने लंबी बैठक की। तय हुआ - शनिवार को हरीश एम्स जाएगा। वहां से वापस नहीं आएगा। जिला प्रशासन ने एंबुलेंस का इंतजाम किया, हर तरह की मदद की पेशकश की। मगर अशोक राणा ने हाथ जोड़कर कहा - "बस एक एहसान करो... जब हमारा बेटा आखिरी सफर पर निकले, तो कोई उसे घूरकर मत देखो। वो इंसान है, तस्वीर का कैदी नहीं।"
आज रात हरीश के कमरे में मां बैठी है। बेटे के माथे पर हाथ रखकर कुछ बुदबुदा रही है। शायद वो लोरी गुनगुना रही है, जो 13 साल पहले सुलाते समय गुनगुनाती थी। पिता दरवाजे से लगकर देख रहे हैं। उनकी आंखों से आंसू नहीं गिरते... बस उन आंसुओं ने ठान ली है कि जब तक बेटा जिंदा है, बाप नहीं रोएगा। बेटे के जाने के बाद देखिएगा कि कितने दरिया बहते हैं।
*इच्छा मृत्यु* का सवाल केवल कानून का नहीं, बल्कि इंसानियत, करुणा और सम्मान का भी है।
क्या किसी को अनंत पीड़ा में जीने के लिए मजबूर करना सही है,
या फिर उसे सम्मान के साथ विदा होने का अधिकार देना चाहिए?
कभी-कभी सबसे बड़ा प्यार यही होता है कि हम उस व्यक्ति को जाने दें
जिसे हमने सबसे ज्यादा संभालकर रखा था।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे और परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति दे।
#इच्छा_मृत्यु #मानवता #दर्द_और_करुणा