Sethi Rasayan Shala

Sethi Rasayan Shala Herbal Ayurvedic & Patent Medicine We are Manufacturers, Suppliers and Exporters of a qualitative range of Ayurvedic Medicines.

Our range is well-received in the market. Sethi Rasayan Shala established in the year 1980, is a leading manufacturer of Ayurvedic herbal products and pharmaceutical bulk drugs.The factory is established in Indore.

मुंह के छाले (मुखपाक) का आयुर्वेदिक समाधान : कारण, उपचार और बचावमुंह के छाले देखने में छोटे होते हैं लेकिन दर्द, जलन और ...
16/02/2026

मुंह के छाले (मुखपाक) का आयुर्वेदिक समाधान : कारण, उपचार और बचाव
मुंह के छाले देखने में छोटे होते हैं लेकिन दर्द, जलन और खाने-पीने में तकलीफ के कारण काफी परेशानी देते हैं । आयुर्वेद में इसे “मुखपाक” कहा गया है और यह केवल मुंह का रोग नहीं बल्कि शरीर के अंदर चल रहे पित्त असंतुलन और पाचन कमजोरी का संकेत माना जाता है ।

आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी के अनुसार बार बार छाले होना इस बात का संकेत है कि शरीर में पित्त बढ़ रहा है, अग्नि मंद है या रक्त दूषित हो रहा है, इसलिए समय रहते ध्यान देना आवश्यक है ।

मुखपाक मुंह के छाले का मुख्य कारण
आयुर्वेद अनुसार प्रायः पित्त वृद्धि, अम्लता, अग्निमांद्य या रक्तदोष के कारण होते हैं । जिनमें मुंह के अंदर जलन, दर्द और छोटे घाव बन जाते हैं । अत्यधिक तीखा, खट्टा और तला-भुना भोजन, ज्यादा चाय-कॉफी, अनियमित भोजन समय, कब्ज, गैस, अपच, तनाव, नींद की कमी, विटामिन B12 या आयरन की कमी तथा धूम्रपान इसके मुख्य कारण है ।

आयुर्वेदिक उपाय और औषधियां
इसके लिए यष्टिमधु (मुलेठी) चूर्ण शहद के साथ लगाना या काढ़े से कुल्ला करना लाभकारी है। त्रिफला चूर्ण रात को गुनगुने पानी से लेना व त्रिफला जल से कुल्ला करना पाचन व रक्तशोधन में सहायक है। कामदुधा रस, प्रवाल पिष्टी या मुक्ताशुक्ति भस्म जलन एवं पित्त शांत करता है । शतावरी चूर्ण शीतलता व पोषण देता है । नारियल तेल या घी छालों पर लगाने से आराम मिलता है । गिलोय सत्व रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है । खदिरादि वटी और अविपत्तिकर चूर्ण का सेवन उपयोगी होता है ।
यष्टिमधु (मुलेठी) से कुल्ला करना, शहद और हल्दी का लेप लगाना, नारियल तेल या शुद्ध घी लगाना, और धनिया पानी पीना लाभकारी होता है । सभी औषधियां चिकित्सकीय सलाह से सेवन करें।

क्या नहीं करें
तीखा-खट्टा भोजन न लें, पर्याप्त पानी पिएं, कब्ज न होने दें और तनाव कम रखें, इस दौरान बहुत गरम, मसालेदार और खट्टा भोजन, अधिक चाय-कॉफी, धूम्रपान और छालों को बार-बार छेड़ने से बचना चाहिए । यदि छाले 10-15 दिन में ठीक न हों, बार बार हों या अत्यधिक दर्द के साथ हों तो चिकित्सकीय जांच आवश्यक है ।
आयुर्वेद का सिद्धांत है कि रोग के मूल कारण को दूर करने से ही स्थायी समाधान मिलता है, इसलिए संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या और पित्त शमन ही मुखपाक से बचाव की कुंजी है।
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सरल जीवनशैली : आयुर्वेद का मूल मंत्रजितना सरल जीवन, उतना ही सशक्त स्वास्थ्य । आयुर्वेद हमें सिखाता है कि स्वास्थ्य केवल ...
16/02/2026

सरल जीवनशैली : आयुर्वेद का मूल मंत्र
जितना सरल जीवन, उतना ही सशक्त स्वास्थ्य । आयुर्वेद हमें सिखाता है कि स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या, आहार और विचारों से बनता है । जब हम जीवन को सरल रखते हैं सात्विक भोजन करते हैं, नियमित दिनचर्या अपनाते हैं और प्रकृति के नियमों के अनुसार चलते हैं तो शरीर स्वतः ही संतुलित और मजबूत बनता है ।
सरल जीवन का अर्थ है कम तनाव, शुद्ध आहार, पर्याप्त नींद और सकारात्मक सोच । आयुर्वेद के अनुसार जब मन शांत और शरीर संतुलित होता है, तब रोगों की संभावना कम हो जाती है ।
प्राकृतिक जड़ी बूटियों और आयुर्वेदिक सिद्धांतों का उद्देश्य शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना और भीतर से शुद्धता प्रदान करना है । इसलिए जितना हम कृत्रिम चीजों से दूर रहेंगे और प्रकृति के करीब रहेंगे, उतना ही हमारा स्वास्थ्य सशक्त होगा ।
स्वस्थ जीवन के लिए जटिल उपायों की नहीं, बल्कि सरल और नियमित आदतों की आवश्यकता है । यही आयुर्वेद का सच्चा संदेश है ।
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🌺🔱 महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ 🔱🌺देवों के देव महादेव की कृपा आप और आपके परिवार पर सदा बनी रहे ।भोलेनाथ आपके जीवन ...
15/02/2026

🌺🔱 महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ 🔱🌺
देवों के देव महादेव की कृपा आप और आपके परिवार पर सदा बनी रहे ।
भोलेनाथ आपके जीवन से सभी बाधाएँ दूर करें और सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य व शांति प्रदान करें ।
इस पावन अवसर पर
आपको आध्यात्मिक शक्ति, सकारात्मक ऊर्जा
और सफल जीवन की मंगलकामनाएँ ।
हर हर महादेव 🙏
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आयुर्वेद : स्वास्थ्य संरक्षण की प्राचीन विज्ञान परंपराभोजन औषधि बने, यही आयुर्वेद का उद्देश्य है । आयुर्वेद केवल रोगों क...
14/02/2026

आयुर्वेद : स्वास्थ्य संरक्षण की प्राचीन विज्ञान परंपरा
भोजन औषधि बने, यही आयुर्वेद का उद्देश्य है । आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को संतुलित, स्वस्थ और दीर्घायु बनाने की संपूर्ण पद्धति है । आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि सही आहार, उचित दिनचर्या और प्राकृतिक औषधियों के माध्यम से शरीर को इस प्रकार संतुलित रखा जाए कि रोग उत्पन्न ही न हों ।
जब हमारा भोजन ही औषधि के समान गुणकारी हो जाता है, तब शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, पाचन सुधरता है और जीवन में स्फूर्ति बनी रहती है । आयुर्वेद प्रकृति के तत्वों वात, पित्त और कफ के संतुलन पर आधारित है, जो संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार हैं ।
नियमित और संतुलित जीवनशैली अपनाकर हम आयुर्वेद के सिद्धांतों से न केवल रोगों से बच सकते हैं, बल्कि एक स्वस्थ, ऊर्जावान और सुखमय जीवन भी प्राप्त कर सकते हैं ।
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पंच तुलसी अर्क प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता का आयुर्वेदिक आधारपंच तुलसी अर्क पाँच प्रकार की तुलसी जैसे राम तुलसी, श्या...
13/02/2026

पंच तुलसी अर्क प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता का आयुर्वेदिक आधार
पंच तुलसी अर्क पाँच प्रकार की तुलसी जैसे राम तुलसी, श्याम तुलसी, वन तुलसी, कपूर तुलसी और नींबू तुलसी के सत्व से निर्मित माना जाता है।
आयुर्वेद में तुलसी को अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि माना गया है। इसके गुणधर्म अनुसार इसका रस कटु और तिक्त, गुण लघु व रुक्ष, वीर्य उष्ण तथा विपाक कटु होता है। यह मुख्य रूप से कफ और वात को शांत करने में सहायक मानी जाती है।
पंच तुलसी अर्क श्वसन तंत्र को मजबूत करने, सर्दी-जुकाम, खांसी, गले की खराश और मौसम परिवर्तन से होने वाली समस्याओं में लाभकारी माना जाता है। यह कफ को पतला कर बाहर निकालने में सहायक होता है तथा ज्वर की प्रारंभिक अवस्था में उपयोगी माना जाता है।
पाचन शक्ति को समर्थ बनाने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी इसका योगदान बताया गया है। सामान्यतः 5 से 10 बूंदें गुनगुने पानी में दिन में एक या दो बार चिकित्सक की सलाह अनुसार दी जाती हैं ।
अधिक पित्त प्रकृति वाले व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों तथा गंभीर रोग से ग्रस्त मरीजों को सेवन से पूर्व वैद्य की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। संतुलित और उचित मात्रा में उपयोग करने पर यह दैनिक स्वास्थ्य संरक्षण में सहायक माना जाता है।
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#पंचतुलसीअर्क #तुलसीकेलाभ
#इम्युनिटीबूस्टर #कफवातशामक #प्राकृतिकस्वास्थ्य

13/02/2026

सीढ़ियाँ, फोन और मस्तिष्क का संतुलन : आयुर्वेद की चेतावनी
एक फोन कॉल । एक सीढ़ी । एक गलत कदम । यह वीडियो श्री शशि थरूर के फोन पर बात करते हुए सीढ़ियाँ उतरते समय फिसलने का है, यह केवल असावधानी नहीं बल्कि हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली का विषय है ।
यह जानकर खुशी है कि श्री शशि थरूर स्वस्थ हैं । हमारा मस्तिष्क एक समय में सीमित कार्यों पर ही पूर्ण ध्यान दे सकता है, विशेषकर जब हम सीढ़ियाँ उतर रहे हों ।
सीढ़ियाँ उतरते समय मस्तिष्क संतुलन, गहराई का अनुमान, पैरों की सही स्थिति और त्वरित प्रतिक्रिया जैसी कई सूक्ष्म क्रियाओं में व्यस्त रहता है ।
जैसे ही फोन पर ध्यान जाता है, एकाग्रता भंग होती है और प्रतिक्रिया समय कम हो जाता है, दुर्घटना के लिए इतना ही काफी है । आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी का कहना है कि आयुर्वेद के अनुसार शरीर और मन का संतुलन “वात दोष” से गहराई से जुड़ा है । वात ही गति, तंत्रिका तंत्र और समन्वय को नियंत्रित करता है ।
जब मन चंचल होता है, ध्यान बंटता है या असावधानी होती है तो वात विकृत होकर असंतुलन, चक्कर, घबराहट और गिरने की संभावना बढ़ा सकता है ।
चरक संहिता में भी “प्रज्ञापराध” अर्थात् बुद्धि का अपराध जानते हुए भी असावधानी करना रोगों का मुख्य कारण बताया गया है । चलते समय फोन का उपयोग करना भी एक प्रकार का प्रज्ञापराध है, जो दुर्घटना का कारण बन सकता है । एक चिकित्सक के रूप में कहना चाहूँगा कि गंभीर सिर की कई चोटें बड़ी दुर्घटनाओं से नहीं बल्कि साधारण गिरने से होती हैं ।
कृपया इन परिस्थितियों में फोन का उपयोग न करें सीढ़ियाँ चढ़ते या उतरते समय, सड़क पार करते समय, ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर चलते समय, वाहन चलाते या सवारी करते समय । आपका मस्तिष्क या तो गति पर ध्यान केंद्रित कर सकता है या फोन पर, दोनों पर सुरक्षित रूप से नहीं ।
सबसे सरल सुरक्षा उपाय कॉल रोक दें, सीढ़ियों पर ध्यान दें, रेलिंग पकड़ें । आयुर्वेद कहता है “सतर्कता ही स्वास्थ्य की रक्षा है”, क्योंकि एक छोटी सी सूचना के लिए अपने अमूल्य मस्तिष्क को जोखिम में डालना बुद्धिमानी नहीं है ।
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#सतर्करहें #प्रज्ञापराध
#वातसंतुलन
Shashi Tharoor

औषधि से पहले आहार सुधारें  आयुर्वेद का प्रथम सिद्धांतआयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ जीवन की नींव सही आहार पर टिकी होती है । ज...
12/02/2026

औषधि से पहले आहार सुधारें आयुर्वेद का प्रथम सिद्धांत
आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ जीवन की नींव सही आहार पर टिकी होती है । जब हमारा भोजन संतुलित, सात्विक और पचने योग्य होता है, तब शरीर की अग्नि मजबूत रहती है और रोग स्वतः दूर रहते हैं।
अधिकांश रोग गलत खान-पान, अनियमित दिनचर्या और असंतुलित जीवनशैली से उत्पन्न होते हैं । इसलिए आयुर्वेद स्पष्ट रूप से कहता है कि औषधि लेने से पहले अपने आहार को सुधारें ।
सही समय पर भोजन, ताजा और प्राकृतिक आहार, अधिक तला भुना व जंक फूड से परहेज तथा मौसमी फल-सब्जियों का सेवन शरीर को भीतर से सुदृढ़ बनाता है ।
जब आहार शुद्ध होता है तो विचार और शरीर दोनों स्वस्थ रहते हैं । यही आयुर्वेद का मूल संदेश है- पहले जीवनशैली सुधारें, फिर आवश्यकता हो तो औषधि लें ।
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विश्व यूनानी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँहकीम अजमल खान साहब की जयंती पर हम उस महान विरासत को नमन करते हैं, जिन्होंने यूनान...
11/02/2026

विश्व यूनानी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ
हकीम अजमल खान साहब की जयंती पर हम उस महान विरासत को नमन करते हैं, जिन्होंने यूनानी चिकित्सा को नई पहचान दी और इसे जनसेवा से जोड़ा । उनका जीवन संदेश देता है कि चिकित्सा केवल उपचार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है।

आयुर्वेद और यूनानी में बहुत समानता है । आयुर्वेद और यूनानी दोनों ही प्राचीन और समृद्ध चिकित्सा पद्धतियाँ हैं, जिनका उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा का संतुलन बनाए रखना है ।
दोनों प्राकृतिक सिद्धांतों पर आधारित हैं और रोग की जड़ तक पहुँचकर उपचार पर बल देती हैं ।
आयुर्वेद त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन की बात करता है, वहीं यूनानी चार अख़लात (दम, बलग़म, सफ़रा, सऊदा) के संतुलन को महत्व देता है ।
दोनों पद्धतियाँ आहार-विहार, दिनचर्या और जीवनशैली सुधार को उपचार का मूल आधार मानती हैं ।
जड़ी-बूटियों, प्राकृतिक औषधियों और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर दोनों का विशेष जोर है ।

आज के समय में जब जीवनशैली जनित रोग बढ़ रहे हैं, तब आयुर्वेद और यूनानी जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ हमें संतुलित, सरल और प्राकृतिक जीवन की ओर लौटने का संदेश देती हैं ।

सभी यूनानी और आयुर्वेद चिकित्सकों को समर्पित
सेवा, समर्पण और स्वास्थ्य की इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ ।

शुद्ध आहार - स्वस्थ विचार - निरोग शरीरजब आहार शुद्ध और सात्विक होता है, तब केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मन और विचार भी शुद्ध...
11/02/2026

शुद्ध आहार - स्वस्थ विचार - निरोग शरीर
जब आहार शुद्ध और सात्विक होता है, तब केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मन और विचार भी शुद्ध होते हैं ।
आयुर्वेद के अनुसार भोजन ही औषधि है । जैसा अन्न हम ग्रहण करते हैं, वैसा ही हमारा तन और मन बनता है ।
संतुलित, ताजा और प्राकृतिक आहार अग्नि को मजबूत करता है, दोषों को संतुलित रखता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है ।
आयुर्वेद कहता है कि स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि सही आहार-विहार से प्राप्त होता है ।
यदि भोजन पवित्र, पौष्टिक और प्रकृति के अनुरूप हो, तो विचार सकारात्मक बनते हैं और शरीर निरोग रहता है ।
स्वस्थ जीवन की शुरुआत रसोई से होती है- यही आयुर्वेद का मूल संदेश है ।
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स्वस्थ रहना कोई संयोग नहीं है, यह आयुर्वेदिक जीवनशैली का परिणाम हैआयुर्वेद केवल रोगों का उपचार नहीं करता, बल्कि शरीर, मन...
10/02/2026

स्वस्थ रहना कोई संयोग नहीं है, यह आयुर्वेदिक जीवनशैली का परिणाम है
आयुर्वेद केवल रोगों का उपचार नहीं करता, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन को बनाए रखने की जीवन पद्धति सिखाता है । सही आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और प्राकृतिक औषधियों के नियमित उपयोग से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और व्यक्ति दीर्घकाल तक स्वस्थ रहता है । आयुर्वेद मानता है कि जब जीवन प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलता है, तब स्वास्थ्य स्वतः प्राप्त होता है । यही कारण है कि आयुर्वेद को केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवनशैली कहा गया है ।
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आयुर्वेद में प्रकृति की पहचान : स्वस्थ जीवन की पहली सीढ़ीआयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार हर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक ब...
09/02/2026

आयुर्वेद में प्रकृति की पहचान : स्वस्थ जीवन की पहली सीढ़ी

आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार हर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक बनावट अलग होती है। आयुर्वेद इसे वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों की प्रधानता से समझाता है। नीचे दिए गए सरल प्रश्नोत्तर परीक्षण के माध्यम से व्यक्ति अपनी जन्मजात प्रकृति (Vata-Pitta-Kapha) का अंदाज़ा लगा सकता है ।

खानदानी आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी का कहना है कि आयुर्वेद में इलाज से पहले रोगी की प्रकृति जानना सबसे आवश्यक है । क्योंकि एक ही बीमारी दो व्यक्तियों में अलग-अलग कारणों से होती है और उसी अनुसार उपचार भी भिन्न होता है ।
किसी का शरीर दुबला-पतला, जल्दी थकने वाला और नींद हल्की होती है—यह वात प्रकृति की ओर संकेत करता है । किसी में भूख तेज, पसीना ज्यादा, गुस्सा जल्दी आता है यह पित्त प्रकृति दर्शाता है। वहीं भारी शरीर, गहरी नींद, बलगम की प्रवृत्ति और ठंड के प्रति संवेदनशीलता कफ प्रकृति की पहचान है ।
यह प्रकृति टेस्ट बीमारी का नहीं बल्कि जन्मजात स्वभाव का संकेत देता है, इसलिए बचपन से जो लक्षण स्थिर हों उन्हें अधिक महत्व देना चाहिए । वर्तमान में मौसम, तनाव या खान-पान से जो बदलाव आते हैं, वे विकृति कहलाते हैं, जिन्हें सही आहार-विहार से संतुलित किया जा सकता है ।
वैद्य डॉ. नरेंद्र सेठी बताते हैं कि जब व्यक्ति अपनी प्रकृति समझ लेता है, तो उसके लिए सही आहार, दिनचर्या और औषधि चुनना आसान हो जाता है । यही कारण है कि आयुर्वेद केवल रोग का इलाज नहीं करता, बल्कि व्यक्ति को रोग से पहले ही सुरक्षित रखने की विद्या है । गलत प्रकृति समझकर किया गया उपचार अक्सर सही परिणाम नहीं देता, जबकि प्रकृति अनुसार अपनाई गई जीवनशैली दीर्घकालीन स्वास्थ्य का आधार बनती है ।
प्रकृति जानने के बाद आहार, जीवनशैली और औषधि तीनों का संतुलन ही सच्चा आयुर्वेदिक उपचार है ।

5-मिनट का सरल प्रश्नोत्तर टेस्ट
अपनी आयुर्वेदिक प्रकृति (VATA-PITTA-KAPHA) पहचानें
निर्देश: हर प्रश्न में जो विकल्प आप पर सबसे अधिक सही बैठे, वही चुनें ।

1. शरीर की बनावट कैसी है ?
A. दुबला, हल्का, हड्डियाँ दिखती हैं B. मध्यम, संतुलित, गर्म C. भारी, मजबूत, चौड़ा

2. वजन का स्वभाव
A. बढ़ाना मुश्किल, जल्दी घटता B. न बढ़ता न घटता C. जल्दी बढ़ जाता है

3. भूख कैसी रहती है?
A. कभी तेज, कभी बिल्कुल नहीं B. बहुत तेज और समय पर C. धीमी लेकिन स्थिर

4. पाचन शक्ति
A. गैस, कब्ज, आवाजें B. एसिडिटी, जलन C. भारीपन, सुस्ती

5. पसीना
A. बहुत कम B. बहुत ज्यादा C. सामान्य या चिपचिपा

6. मौसम का असर
A. ठंड सहन नहीं होती B. गर्मी सहन नहीं होती C. नमी और ठंड से परेशानी

7. नींद कैसी होती है ?
A. हल्की, बार-बार टूटती B. मध्यम, कम घंटे C. गहरी, ज्यादा

8. स्वभाव
A. बेचैन, जल्दी बदलने वाला B. गुस्सैल, तेज निर्णय C. शांत, धैर्यवान

9. बोलने का तरीका
A. तेज और ज्यादा B. सीधा और तीखा C. धीमा और कम

10. याददाश्त
A. जल्दी याद, जल्दी भूल B. अच्छी और स्पष्ट C. धीरे याद, लंबे समय तक

11. त्वचा
A. रूखी, फटी B. लाल, संवेदनशील C. मुलायम, तैलीय

12. बाल
A. रूखे, पतले B. जल्दी सफेद, झड़ना C. घने, भारी

13. थकान
A. जल्दी थक जाते हैं B. ज्यादा काम से C. कम काम में भी

14. निर्णय लेने में
A. बार-बार बदलते हैं B. तुरंत और पक्के C. धीरे लेकिन स्थिर

15. बीमारियाँ किस तरह की ?
A. कब्ज, दर्द, अनिद्रा B. जलन, बुखार, सूजन C. सर्दी, खांसी, बलगम

रिज़ल्ट: A अधिक → वात प्रकृति | B अधिक → पित्त प्रकृति | C अधिक → कफ प्रकृति | दो बराबर → मिश्रित प्रकृति

यह प्रकृति टेस्ट है, बीमारी का नहीं । हाल की समस्या विकृति हो सकती है । बचपन से जो लक्षण स्थिर हों, उन्हें अधिक महत्व दें । प्रकृति जानने के बाद आहार, जीवनशैली और औषधि सही दिशा में आसान हो जाती है । गलत प्रकृति समझना गलत इलाज की सबसे बड़ी वजह है ।
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सुबह जल्दी उठना और शुद्ध वायु, आयुर्वेद का अमृत हैआयुर्वेद के अनुसार सुबह जल्दी उठना शरीर और मन दोनों के लिए अमृत समान ह...
09/02/2026

सुबह जल्दी उठना और शुद्ध वायु, आयुर्वेद का अमृत है
आयुर्वेद के अनुसार सुबह जल्दी उठना शरीर और मन दोनों के लिए अमृत समान है ।
ब्रह्ममुहूर्त में जागने से वायु शुद्ध होती है, प्राणशक्ति बढ़ती है और दिनभर ऊर्जा बनी रहती है ।
इस समय वातावरण में सकारात्मकता होती है, जिससे मन शांत रहता है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है ।
नियमित रूप से सुबह जल्दी उठने वाले व्यक्ति में पाचन शक्ति बेहतर रहती है, तनाव कम होता है और जीवन में संतुलन बना रहता है ।
यही कारण है कि आयुर्वेद में इसे स्वस्थ जीवन की आधारशिला माना गया है ।
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Indore
452015

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Monday 9am - 6pm
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