25/04/2026
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा।।
उद्भव-स्थिति-संहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्।।
जगत्-जननी, पराम्बा माँ जानकी केवल मिथिला की राजकुमारी अथवा रामकथा की करुणामयी नायिका नहीं हैं; वे सम्पूर्ण सृष्टि की मूल प्रकृति, आद्या शक्ति, भगवदनुग्रह की मूर्तिमती अभिव्यक्ति और परात्पर ब्रह्म भगवान् श्रीराम की आह्लादिनी सत्ता हैं। वे उद्भव, स्थिति और संहार की नियामिका हैं - अर्थात् जिनसे जगत् की उत्पत्ति होती है, जिनकी करुणा से उसका पालन होता है और जिनकी दिव्य लीला में पुनः समस्त नाम-रूप लीन हो जाते हैं।
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के अनुसार विदेहराज जनक ने यज्ञभूमि के शोधन हेतु जब क्षेत्र में हल चलाया, तब भूमितल से दिव्य कन्या का प्राकट्य हुआ। इसलिए वे भूमिजा कहलायीं। “सीता” शब्द भी हल की रेखा, पवित्र भूमि की उर्वरा शक्ति और शुद्ध सृजन-चेतना का सूचक है। सामान्य दृष्टि में क्षेत्र खेत है, किन्तु अध्यात्म-दृष्टि में वही क्षेत्र साधक का शरीर, मन, बुद्धि और अंतःकरण भी है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं - “इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।” इस भाव से “क्षेत्रं शोधयता लब्धा” का गूढ़ अर्थ है कि जब मनुष्य जप, तप, स्वाध्याय, संयम, सेवा और सदाचार से अपने अंतःकरण-क्षेत्र को निर्मल करता है, तब उसी शुद्ध भूमि में भगवती सीता रूपी भक्ति, करुणा, मर्यादा और आत्मबोध का दिव्य उदय होता है।
माँ जानकी तत्त्वतः अजा, आद्या, सनातनी और प्रथमा शक्ति हैं। वे किसी काल-सीमा में बंधी हुई सत्ता नहीं, बल्कि काल को भी पवित्र अर्थ प्रदान करने वाली दिव्य चेतना हैं। भक्तों की भावना, धर्म की रक्षा और लोकमंगल की सिद्धि के लिए वे समय-समय पर अवतार रूप में प्रकट होती हैं। मन्वन्तर-भेद से उनके प्राकट्य-दिवस के विविध उल्लेख मिलते हैं; किन्तु भक्त-हृदय के लिए प्रत्येक स्मरण, प्रत्येक नाम-संकीर्तन और प्रत्येक सीताराम-जप ही माँ जानकी का दिव्य आविर्भाव है।
माँ सीता का जीवन त्याग, धैर्य, करुणा, पवित्रता, सहनशीलता, मर्यादा और अनुग्रह का अप्रतिम आदर्श है। वे शक्ति हैं, पर अहंकाररहित; वे सर्वसमर्थ हैं, पर पूर्ण विनयमयी; वे जगदम्बा हैं, पर भक्तवत्सला माता के रूप में सहज उपलब्ध। उनके नीलकमल-दल-सदृश नेत्र करुणा की शीतल धारा बरसाते हैं। उनके श्रीचरणों में शरणागत जीव अपने क्लेश, संशय, भय और संताप से मुक्त होकर धर्म, प्रेम और शान्ति का अनुभव करता है।
भगवान् श्रीराम परात्पर ब्रह्म हैं, तो माँ सीता उनकी नित्य लीला-सहचरी, अनुग्रह-शक्ति और करुणामयी अभिव्यक्ति हैं। राम बिना सीता पूर्ण रूप से अनुभूत नहीं होते और सीता बिना राम की करुणा जगत् में मूर्त नहीं होती। सीता-राम का युगल नाम ही भक्ति, ज्ञान और मर्यादा का परम मंगलमय मंत्र है।
ऐसी भूमिजा, वैदेही, जानकी, मैथिली, रामवल्लभा, जगदम्बा माँ सीता के पावन प्राकट्य दिवस “सीता नवमी” पर हार्दिक शुभकामनाएँ। माँ जानकी समस्त जगत् को शुद्धता, करुणा, संयम, मर्यादा और भगवद्भक्ति का वरदान प्रदान करें।
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✒️साभार- जोशी एस्ट्रोलॉजर लक्ष्मणगढ़ सीकर राज.
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