15/03/2026
कालसर्प योग का खंडन✓
राहुर्नो ग्रह एव केवलमयं छायासमुत्पादकः
केतुर्नापि स्वतन्त्रदेहगुणवान् केवल्यबिन्दुस्थितः।
चन्द्रः स्वेन पथा गतेन विहरन् सम्पातबिन्दूद्भवौ
ताभ्यां कल्पितकालसर्पभयमेतन्मूढलोकप्रियम्॥
भावार्थ :
राहु कोई वास्तविक ग्रह नहीं बल्कि छाया का बिंदु है, और केतु भी कोई स्वतंत्र देहधारी ग्रह नहीं है। चन्द्रमा जब अपनी कक्षा में चलते हुए पृथ्वी के पथ को काटता है, तब दो सम्पात बिंदु बनते हैं। इन्हीं से कालसर्प का भय कल्पित किया गया है, जो अज्ञानियों को प्रिय लगता है।
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यद्येकत्र न सम्भवौ खलु तदा राहुश्च केतुर्यथा
मासेऽर्धत्रयदिनविलम्बविहितौ भिन्नस्थिती दृश्यते।
तस्मात्कालसर्पनामकभयं शास्त्रे न किञ्चिद्भवेत्
केवलं जनमोहनोपजनि तद्वादो नूतनैर्ज्योतिषैः॥
भावार्थ :
जब राहु और केतु एक साथ उत्पन्न ही नहीं होते और लगभग साढ़े तेरह दिनों के अंतर से निर्मित होते हैं, तब कालसर्प का सिद्धांत कैसे संभव है? इसलिए शास्त्रों में इसका आधार नहीं मिलता; यह केवल कुछ आधुनिक ज्योतिषियों द्वारा फैलाया गया भ्रम है।
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नाभोगोलविचारकौशलवशाद् ज्ञेयं बुधैर्निश्चयं
राहोर्मार्गविभिन्नगोलगतयो मङ्गल्यादयः खेचराः।
तस्माद्ग्रासकथापि तेषु न कदा श्रूयेत शास्त्रेषु वै
नैतद्गुरुग्रहणं न शनि ग्रहणं लोके क्वचित् श्रूयते॥
भावार्थ :
खगोल विज्ञान के अनुसार मंगल, गुरु, शनि आदि ग्रह राहु के मार्ग से अलग कक्षाओं में स्थित हैं। इसलिए राहु द्वारा उन्हें ग्रसित करने की बात शास्त्रों में नहीं मिलती। इसी कारण गुरु ग्रहण या शनि ग्रहण जैसी कोई घटना नहीं सुनी जाती।
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यद्याकाशतले न दृश्यते कदा सर्पाकृतिः सा खगा
किं कुर्वन्ति बुधा भयप्रकटनैर्मोहाय लोकस्य वै।
राशिपन्थनिवेशनादिहि खलु भ्रान्तिर्भवेत् पत्रिके
नाभोगोलविभेदतो ग्रहगणाः स्युर्दूरदूरस्थिताः॥
भावार्थ :
जब आकाश में कभी सर्प के समान कोई योग दिखाई ही नहीं देता, तो लोगों को भयभीत करने का क्या औचित्य है? कुंडली में ग्रहों को केवल राशि के आधार पर रखने से भ्रम होता है, जबकि खगोलीय दृष्टि से वे एक-दूसरे से बहुत दूर होते हैं।
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पराशर्यादिमहर्षिभिर्विहितकाः नाभस्सहस्रद्वयाः
सूक्ष्मा योगगणाः पुरा परिगता ग्रन्थेषु यत्नादपि।
तत्रैकस्यापि कालसर्पकथनं नैवोपलभ्येत किम्
तस्मादेष जनप्रलापजनितो दोषो न शास्त्रोदितः॥
भावार्थ :
महर्षि पराशर आदि ऋषियों ने अपने ग्रंथों में लगभग दो हजार नाभस योगों का वर्णन किया है। इतने सूक्ष्म योगों का वर्णन करने पर भी कालसर्प योग का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, इसलिए यह शास्त्रीय सिद्धांत नहीं है।
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जैमिन्यादिमुनीश्वरैरपि कदा कारेषु नो राहवः
केतुर्नापि दशाविभागविधिषु सर्वत्र संस्थापितः।
भृग्वाद्यैरपि न ग्रहीकृतफलं मङ्गल्यवत् तस्य वै
तस्मादेष जनैरुदीरित इव भ्रान्तिर्न शास्त्रेषु हि॥
भावार्थ :
महर्षि जैमिनी ने राहु-केतु को कारकों में स्थान नहीं दिया। अष्टोत्तरी महादशा में केतु की दशा भी नहीं बताई गई। महर्षि भृगु ने भी इन्हें मंगल या शनि की तरह ग्रह मानकर फलित नहीं लिखा। इसलिए कालसर्प का भय शास्त्रसम्मत नहीं है।
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छायाबिन्दुद्वयमेव केवलमिदं राहुकेतू उभौ
नैते देहधराः ग्रहाः खलु यथा सूर्यादयः खेचराः।
तस्मात्तेषु निवेशितं यदि भयं लोकस्य मोहाय वै
ज्योतिष्मत्परमार्थतत्त्वविवरे स्यात् केवलं कल्पना॥
भावार्थ :
राहु और केतु वास्तव में केवल दो छाया बिंदु हैं, सूर्य आदि की तरह देहधारी ग्रह नहीं। इसलिए उनसे इतना भय उत्पन्न करना केवल कल्पना और भ्रम है।
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मोहायैव जनस्य केवलमिदं वाक्यं प्रचार्यते
दोषोऽयं खलु कालसर्प इति यत् सर्वत्र घोष्यते।
दृष्ट्वा लोकभयं धनार्थमनिशं केचिद् वदन्त्येव तं
शास्त्रार्थं न परीक्ष्य केवलमिदं व्यापाररूपं कृतम्॥
भावार्थ :
कुछ लोग धन कमाने के लिए लोगों को डराते हैं और कालसर्प दोष का प्रचार करते हैं। यह शास्त्रीय सिद्धांत नहीं बल्कि व्यापार जैसा बन गया है।
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येषां ज्योतिषशास्त्रबुद्धिरधुना लोभेन संपीडिता
ते लोकान् भयदर्शनेन सततं मोहं प्रयच्छन्ति हि।
ज्ञात्वा सिद्धमतं पुरातनमृषेः शास्त्रेषु युक्तिस्थितं
विद्वान् सत्यपथं वदेत् न तु मिथ्याभीति विस्तारयेत्॥
भावार्थ :
कुछ लोग लोभवश ज्योतिष को भय का साधन बना देते हैं। विद्वानों का कर्तव्य है कि वे प्राचीन ऋषियों के सिद्धांतों के आधार पर सत्य का प्रचार करें, न कि मिथ्या भय फैलाएँ।
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यद्वेदेषु पुराणसङ्ग्रहगते ग्रन्थेषु नो दृश्यते
तत्तत्त्वं कथमद्य नव्यकथया सिद्धं प्रकल्प्येत हि।
शास्त्रार्थप्रणयेषु युक्तिविहितं प्रमाणमेवोचितं
नान्यत् कल्पितभाषितं भ्रमकरं ग्राह्यं बुधैः क्वचित्॥
भावार्थ :
जो बात वेद, पुराण और प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलती, उसे आज नई कल्पना से सिद्ध नहीं किया जा सकता। विद्वानों को प्रमाण और तर्क पर आधारित बात ही स्वीकार करनी चाहिए।
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तस्मात्कालसर्पनामकभयं लोके प्रसृत्यापि यत्
शास्त्रे तस्य न दृश्यते खलु कदा प्रमाणं क्वचित्।
ज्ञात्वैतत् बुधलोकमानसमिदं मोहं विहाय क्षणात्
सत्यं ज्योतिषशास्त्रमार्गमनिशं सम्यग् प्रपद्येत॥
भावार्थ :
इसलिए कालसर्प नामक भय भले ही समाज में फैल गया हो, लेकिन शास्त्रों में उसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। बुद्धिमान लोगों को इस भ्रम को छोड़कर सच्चे ज्योतिष मार्ग को अपनाना चाहिए।
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यस्यास्ति यदि सिद्धिरत्र किल वै शास्त्रेषु प्रमाणं दृढं
सोऽत्राद्य प्रददातु तत्त्वनिरतं युक्त्यन्वितं भाषितम्।
अन्यथ्येतदनर्थकं भयमिदं लोकस्य मोहाय यत्
कालसर्प इति प्रसिद्धमखिलं मिथ्यैव विज्ञायते॥
भावार्थ :
यदि किसी के पास शास्त्रों से कालसर्प का प्रमाण हो तो वह तर्क सहित प्रस्तुत करे। अन्यथा यह कालसर्प नामक भय केवल लोगों को भ्रमित करने वाला मिथ्या प्रचार ही माना जाएगा। @ संकलन
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