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गृहस्थ गुरु श्रेष्ठ है। गुरुर्गृहस्थ एव स्यान्न कदाचिद् यतिर्गुरू:।वानप्रस्थ यतीनां तु गुरुत्वं निष्फलं भवेत्।। (चन्द्रज...
04/03/2026

गृहस्थ गुरु श्रेष्ठ है।
गुरुर्गृहस्थ एव स्यान्न कदाचिद् यतिर्गुरू:।
वानप्रस्थ यतीनां तु गुरुत्वं निष्फलं भवेत्।। (चन्द्रज्ञानागम)

शैवे शाक्ते वैष्णवे च गाणपत्ये तथैन्दवे।
महाशैवे च सौरे च स गुरुर्नात्र संशय:।।
मंत्रवक्ता सैव स्यान्नापर: परमेश्वरि!॥ (योगिनीतंत्र)

गुरु योग्यतानुसार ही शिष्य को मंत्र प्रदान करता है। जिससे बंधन से मुक्ति मिले वही सच्चा गुरू होता हैं।
अविद्याहृदयग्रंथिबंधमोक्षो यतो भवेत्।
तमेव गुरुरित्याहुर्गुरुशब्देन योगिन:।।

यदि गुरु निर्मल चित्त और तपस्वी है तो उसके द्वारा दी गयी दीक्षा के मंत्र भी उस तेजस्वी आचार्य के समान स्वच्छ, तेजस्वी और सिद्धिप्रद होते हैं –

यद्याचार्यो निर्मल:.........ततस्तदुद्भूतास्तच्छक्तिवीर्यसारतया उच्चरन्तो मंत्रा अपि तत्समा निर्मला: सर्वसिद्धिप्रदा भवन्ति। (नेत्रतंत्र)

मंत्र शास्त्र के अनेक मार्ग हैं, अतः भ्रमित न होकर अपने गुरु के अनुसार करना चाहिए। करोड़ों मंत्र हैं लेकिन गुरू प्रदत्त एक मंत्र ही पर्याप्त है। गुरू का स्थान माता पिता से भी बढ़कर है –
पन्थानो बहव: प्रोक्ता: मंत्रशास्त्रमनीषिभि:।
स्वगुरोर्मतमाश्रित्य शुभं कार्यं नान्यथा।।
अनेककोटि मंत्राणि चित्तव्याकुलकारणम्।
मन्त्रं गुरो: कृपाप्राप्तमेकं स्यात् सर्वसिद्धिदम्।।
गुरुर्गरीयान् मातृत: पितृश्चेति मे मति:।। ( शारदा. १०८/१७)

गुरू पूजा के बिना इष्टदेव का पूजन जो करते हैं उनका तेज भैरव जी हरण कर लेते हैं –
गुरू पूजां बिना देवि स्वेष्ट पूजां करोति य:।
मन्त्रस्य तस्य तेजांसि हरते भैरव: स्वयं।। काली विलास तंत्र)

मन, वचन और कर्म से गुरु को क्रोधित न करें। क्योंकि उसके क्रोध से आयु, श्री, ज्ञान और सत्कर्म नष्ट हो जाते हैं। गोवध, ब्राह्मण वध करने से जो पाप लगता है उतना ही पाप गुरू के आगे झूठ बोलने से लगता है। देवता और गुरू के आगे ऊंचे आसन पर नहीं बैठना चाहिये। गुरू को सिंहासन देकर, श्रेष्ठ पुरुषों को उत्तमोत्तम आसन देना चाहिए-

कर्मणा मनसा वाचा गुरो: क्रोधं न कारयेत्।
तस्य क्रोधेन दह्यन्ते आयु: श्रीर्ज्ञानं सत्क्रिया:।।
गोब्राह्मणवधं कृत्वा यत्पापं समवाप्नुयाद्।
तत्पापसममवाप्नोति गुर्वग्रेऽनृतभाषणम्।।
न विशेदासने देवि देवतागुरूसन्निधौ।
गुरौ सिंहासनं देयं ज्येष्ठानामुत्तमासनम्।।

जिसके दर्शन, संभाषण से आनन्द मिले उसको ही गुरु बनाना चाहिए। जो कुंडलिनी शक्ति, मंत्र, बिंदु और परब्रह्म को जानता है वही गुरु है –

गुरोर्यस्यैव सम्पर्कात् परानन्दोऽभिजायते।
गुरूं तमेव वृणुयान्नापर: मतिमान्नर:।।
पिंडं पदं तथा रूपं रूपातीतं चतुष्ट्यम्।
यो वा सम्यग् विजानाति स गुरु परिकीर्तित:।।
पिंडं कुंडलिनी शक्ति: पदं हंस: परिकीर्तित:।
रूपं बिंदुरिति ज्ञेय: रूपातीत: निरंजनम्।।

गुरु वैद्यवत् है दवा दे देता है। पथ्यापथ्य शिष्य के हाथ में है। प्रयत्न शिष्य करेगा, अन्त में उसकी प्रतिभा ही मुक्ति मार्ग दिखाएगी—(तंत्रालोक)
गुरू की सेवा मात्र से भी बिना मंत्र होमादि के सिद्धि प्राप्त हो जाती है –
सेवया सिद्धिमाप्नोति किं वा जपहुताभि:।। (अन्नदाकल्पं)

गुरूयात्रा, देवयात्रा, तीर्थयात्रा, इन तीन यात्राओं में गुरु से मिलने जाने वाली यात्रा श्रेष्ठ है। अतः यथा समय गुरुदेव से मिलने अवश्य जाना चाहिए –
गुरूयात्रा देवयात्रा तीर्थयात्रेति च त्रिधा।
आसां त्रिविधयात्राणां गुरूयात्रा फलाधिका।। (चंद्रज्ञानागम)

गुरु शिष्य मर्यादा- अनुचित आचरण करने पर शिष्य को गुरु तीन बार सावधान करें, वह फिर भी न माने तो गुरू को दोष नहीं लगता। अन्यथा शिष्य का दोष गुरु को, पत्नी का पति को तथा मंत्री का दोष राजा को लगता ही है –
गुरुस्त्रिवारमाचारं कथयेच्च कुलेश्वरि।
न गृह्णाति हि शिष्यश्चेत्तदा पापं गुरोर्न हि।।
मंत्रिदोषश्च राजानं जायादोष: पतिं यथा।
तथा प्राप्नोत्यसंदेहं शिष्यपापं गुरुं प्रिये।। ( कुलार्णवतंत्र)

अनुभूत ही प्रशस्त है जो सर्वगुण सम्पन्न और अनुभव से परिपूर्ण हो वही गुरु श्रेष्ठ है।

गुरू पूजा- दीक्षा के बाद नित्य उपासना में पीठ के उत्तर भाग में गुरु पंक्ति का पूजन करना चाहिए।
पीठस्योत्तरे भागे गुरुपंक्तिं पूजयेच्चमंत्रवित्।
यावद् गिरीशकोणं वायो: कोणं समारभ्य।।
अथ गुरूपरमगुरू द्वौ परमेष्टिगुरूं तथाभ्यर्च्य।
परमाचार्यगुरूञ्चादि सिद्धगुरूमथार्चयेत्स्वगुरूम्।

इष्टदेव कौन? सिद्ध विद्या कौनसी ?
बहुत बार यह मन में रहता है कि किस देवता की उपासना करनी चाहिए। इसका समाधान शास्त्रों में दिया गया है कि जो तीन पीढ़ियों से उपासित हो वह विद्या शीघ्र सिद्धिप्रद होती है। उसकी ही दीक्षा लेकर उपासना करनी चाहिए –

उपासिता यदि भवेत् शिष्यै: त्रिपुरुषै: क्रमात्।
तदा तद् ग्रहणे धीरो विचारं नैव कारयेत्।।
(अन्नदाकल्पं) (विद्याग्रहणे चक्रादिकं)
अथवा अन्तः करण का झुकाव जिस देवता की ओर हो उसकी उपासना शीघ्र सिद्धिप्रद है –
अन्त:करणवृत्तैर्वा यत्र श्रद्धा गरीयसी।
सैवोपास्या प्रयत्नेन विचारस्तत्र निष्फल:।। (अन्नदाकल्पं)

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जप के प्रकार और कौन से जप से क्या होता है?? जप के कुछ मुख्य प्रकार ये हैं- 1. नित्य जप 2. नैमित्तिक जप 3. काम्य जप 4. नि...
03/03/2026

जप के प्रकार और कौन से जप से क्या होता है??
जप के कुछ मुख्य प्रकार ये हैं-

1. नित्य जप 2. नैमित्तिक जप 3. काम्य जप
4. निषिद्ध जप 5. प्रायश्चित जप 6. अचल जप
7. चल जप 8. वाचिक जप 9. उपांशु जप
10. भ्रमर जप 11. मानस जप 12. अखंड जप
13. अजपा जप और 14. प्रदक्षिणा जप इत्यादि।

1. नित्य जप
प्रात:-सायं गुरुमंत्र का जो नित्य-नियमित जप किया जाता है, वह नित्य जप है। यह जप जपयोगी को नित्य ही करना चाहिए। आपातकाल में, यात्रा में अथवा बीमारी की अवस्‍था में, जब स्नान भी नहीं कर सकते, तब भी हाथ, पैर और मुंह धोकर कम से कम कुछ जप तो अवश्य कर ही लेना चाहिए, जैसे झाड़ना, बुहारना, बर्तन मलना और कपड़े धोना रोज का ही काम है, वैसे ही नित्य कर्म भी नित्य ही होना चाहिए। उससे नित्य दोष दूर होते हैं, जप का अभ्यास बढ़ता है, आनंद बढ़ता जाता है और चित्त शुद्ध होता जाता है और धर्म विचार स्फुरने लगते हैं। और जप संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-त्यों ईश्वरी कृपा अनुभूत होने लगती और अपनी निष्ठा दृढ़ होती जाती है।

2. नैमित्तिक जप
किसी निमित्त से जो जप होता है, वह नैमित्तिक जप है। देव-पितरों के संबंध में कोई हो, तब यह जप किया जाता है। सप्ताह में अपने इष्ट का एक न एक बार होता ही है। उस दिन तथा एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्व दिनों में और महाएकादशी, महाशिवरात्रि, श्री रामनवमी, श्री कृष्णाष्टमी, श्री दुर्गानवरात्र, श्री गणेश चतुर्थी, श्री रथ सप्तमी आदि शुभ दिनों में तथा ग्रहणादि पर्वों पर एकांत स्थान में बैठकर अधिक अतिरिक्त जप करना चाहिए। इससे पुण्य-संग्रह बढ़ता है और पाप का नाश होकर सत्यगुण की वृद्धि होती है और ज्ञान सुलभ होता है। यह जप रात में एकांत में करने से दृष्टांत भी होते हैं। 'न देवतोषणं व्यर्थम'- देव को प्रसन्न करना कभी व्यर्थ नहीं होता, यही मंत्रशास्त्र का कहना है।

इष्टकाल में इसकी सफलता आप ही होती है। पितरों के लिए किया हुआ जप उनके सुख और सद्गति का कारण होता है और उनसे आशीर्वाद मिलते हैं। हमारा उनकी कोख से जन्म लेना भी इस प्रकार चरितार्थ हो जाता है। जिसको उद्देश्य करके संकल्पपूर्वक जो जप किया जाता है, वह उसी को प्राप्त होता है, यह मंत्रशास्त्र का सिद्धांत है। इस प्रकार पुण्य जोड़कर वह पितरों को पहुंचाया जा सकता है। इससे उनके ऋण से मुक्ति मिल सकती है। इसलिए कव्य कर्म के प्रसंग में और पितृपक्ष में भी यह जप अवश्य करना चाहिए। गुरु मंत्र से हव्यकर्म भी होता है।

3. काम्य जप
किसी कामना की सिद्धि के लिए जो जप किया जाता है, उसे काम्य जप कहते हैं। यह काम्य कर्म जैसा है, मोक्ष चाहने वाले के काम का नहीं है। आर्त, अर्थार्थी, कामकामी लोगों के लिए उपयोगी है। इसके साधन में पवित्रता, नियमों का पूर्ण पालन, सावधानता, जागरूकता, धैर्य, निरलसता, मनोनिग्रह, इन्द्रिय निग्रह, वाक् संयम, मिताहार, मितशयन, ब्रह्मचर्य इन सबका होना अत्यंत ही आवश्यक है। योग्य गुरु से योग्य समय में लिया हुआ योग्य मंत्र हो, विधिपूर्वक जप हो, मन की एकाग्रता हो, दक्षिणा दे, भोजन कराएं, हवन करें, इस सांगता के साथ अनुष्ठान हो तो साधक की कामना अवश्य पूर्ण होती है।

इसमें कोई गड़बड़ हो तो मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। काम्य जप करने के अनेक मंत्र हैं। जप से पुण्य संग्रह तो होता है, पर भोग से उसका क्षय भी होता है। इसलिए प्राज्ञ पुरुष इसे अच्‍छा नहीं समझते। परंतु सभी साधक समान नहीं होते। कुछ ऐसे भी कनिष्ठ साधक होते ही हैं, जो शुद्ध मोक्ष के अतिरिक्त अन्य धर्माविरुद्ध कामनाएं भी पूरी करना चाहते हैं। क्षुद्र देवताओं और क्षुद्र साधनों के पीछे पड़कर अपनी भयंकर हानि कर लेने की अपेक्षा वे अपने इष्ट मंत्र का काम्य जप करके चित्त को शांत करें और परमार्थ प्रवण हों, यह अधिक अच्छा है।

4. निषिद्ध जप
मनमाने ढंग से अविधिपूर्वक अनियम जप जपने को निषिद्ध जप कहते हैं। निषिद्ध कर्म की तरह यह बहुत बुरा है। मंत्र का शुद्ध न होना, अपवित्र मनुष्य से मंत्र लेना, देवता कोई और मंत्र कोई और ही, अनेक मंत्रों को एकसाथ अविधिपूर्वक जपना, मंत्र का अर्थ और विधि न जानना, श्रद्धा का न होना, देवताराधन के बिना ही जप करना, किसी प्रकार का भी संयम न रखना- ये सब निषिद्ध जप के लक्षण हैं। ऐसा निषिद्ध जप कोई न करे, उससे लाभ होने के बदले प्राय: हानि ही हुआ करती है।

5. प्रायश्चित जप
अपने हाथ से अनजान से कोई दोष या प्रमाद हो जाए तो उस दुरित-नाश के लिए जो जप किया जाता है, वह प्रायश्चित जप है। प्रायश्चित कर्म के सदृश है और आवश्यक है। मनुष्य के मन की सहज गति अधोगति की ओर है और इससे उसके हाथों अनेक प्रमाद हो सकते हैं। यदि इन दोषों का परिमार्जन न हो तो अशुभ कर्मों का संचित निर्माण होकर मनुष्य को अनेक दु:ख भोगने पड़ते हैं और उर्वरित संचित प्रारब्ध बनकर भावी दु:खों की सृष्टि करता है। पापों के नाश के लिए शास्त्र में जो उपाय बताए गए हैं, उनको करना इस समय इतना कठिन हो गया है कि प्राय: असंभव ही कह सकते हैं। इसलिए ऐसे जो कोई हों, वे यदि संकल्पपूर्वक यह जप करें तो विमलात्मा बन सकते हैं।

मनुष्य से नित्य ही अनेक प्रकार के दोष हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है। इसलिए नित्य ही उन दोषों को नष्ट करना मनुष्य का कर्तव्य ही है। नित्य जप के साथ यह जप भी हुआ करे। अल्पदोष के लिए अल्प और अधिक दोष के लिए अधिक जप करना चाहिए। नित्य का नियम करके चलाना कठिन मालूम हो तो सप्ताह में एक ही दिन सही, यह काम करना चाहिए। प्रात:काल में पहले गो‍मूत्र प्राशन करें, तब गंगाजी में या जो तीर्थ प्राप्त हो उसमें स्नान करें। यह भी न हो तो 'गंगा गंगेति' मंत्र कहते हुए स्नान करें और भस्म-चंदनादि लगाकर देव, गुरु, द्विज आदि के दर्शन करें। अश्वत्थ, गौ आदि की परिक्रमा करें। केवल तुलसी दल-तीर्थ पान करके उपवास करें और मन को एकाग्र करके संकल्पपूर्वक अपने मंत्र का जप करें। इससे पवित्रता बढ़ेगी और मन आनंद से झूमने लगेगा। जब ऐसा हो, तब समझें कि अब सब पाप भस्म हो गए। दोष के हिसाब से जप संख्या निश्चित करें और वह संख्‍या पूरी करें।

6. अचल जप
यह जप करने के लिए आसन, गोमुखी आदि साहित्य और व्यावहारिक और मानसिक स्वास्थ्य होना चाहिए। इस जप से अपने अंदर जो गुप्त शक्तियां हैं, वे जागकर विकसित होती हैं और परोपकार में उनका उपयोग करते बनता है। इसमें इच्छाशक्ति के साथ-साथ पुण्य संग्रह बढ़ता जाता है। इस जप के लिए व्याघ्राम्बर अथवा मृगाजिन, माला और गोमुखी होनी चाहिए। स्नानादि करके आसन पर बैठे, देश-काल का स्मरण करके दिग्बंध करें और तब जप आरंभ करें।

अमुक मंत्र का अमुक संख्या जप होना चाहिए और नित्य इतना होना चाहिए, इस प्रकार का नियम इस विषय में रहता है, सो समझ लेना चाहिए और नित्य उतना जप एकाग्रतापूर्वक करना चाहिए। जप निश्चित संख्‍या से कभी कम न हो। जप करते हुए बीच में ही आसन पर से उठना या किसी से बात करना ठीक नहीं, उतने समय तक चित्त की और शरीर की स्थिरता और मौन साधे रहना चाहिए। इस प्रकार नित्य करके जप की पूर्ण संख्या पूरी करनी चाहिए। यह चर्या बीच में कहीं खंडित न हो इसके लिए स्वास्थ्य होना चाहिए इसलिए आहार-विहार संयमित हों। एक स्‍थान पर बैठ निश्चित समय में निश्चित जप संख्‍या एकाग्र होकर पूरी करके देवता को वश करना ही इस जप का मुख्य लक्षण है। इस काम में विघ्न तो होते ही हैं, पर धैर्य से उन्हें पार कर जाना चाहिए। इस जप से अपार आध्यात्मिक शक्ति संचित होती है। भस्म, जल अभिमंत्रित कर देने से वह उपकारी होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है।

7. चल जप
यह जप नाम स्मरण जैसा है। प्रसिद्ध वामन प‍ंडित के कथनानुसार 'आते-जाते, उठते-बैठते, करते-धरते, देते-लेते, मुख से अन्न खाते, सोते-जागते, रतिसुख भोगते, सदा सर्वदा लोकलाज छोड़कर भगच्चिंतन करने' की जो विधि है, वही इस जप की है। अंतर यही कि भगवन्नाम के स्थान में अपने मंत्र का जप करना है। यह जप कोई भी कर सकता है। इसमें कोई बंधन, नियम या प्रतिबंध नहीं है। अन्य जप करने वाले भी इसे कर सकते हैं। इससे वाचा शुद्ध होती है और वाक्-शक्ति प्राप्त होती है। पर इस जप को करने वाला कभी मिथ्या भाषण न करे; निंदा, कठोर भाषण, जली-कटी सुनाना, अधिक बोलना, इन दोषों से बराबर बचता रहे। इससे बड़ी शक्ति संचित होती है। इस जप से समय सार्थक होता है, मन प्रसन्न रहता है, संकट, कष्ट, दु:ख, आघात, उत्पात, अपघात आदि का मन पर कोई असर नहीं होता।

जप करने वाला सदा सुरक्षित रहता है। सुखपूर्वक संसार-यात्रा पूरी करके अनायास परमार्थ को प्राप्त होता है। उसकी उत्तम गति होती है, उसके सब कर्म यज्ञमय होते हैं और इस कारण वह कर्मबंध से छूट जाता है। मन निर्विषय हो जाता है। ईश-सान्निध्य बढ़ता है और साधक निर्भय होता है। उसका योग-क्षेम भगवान वहन करते हैं। वह मन से ईश्वर के समीप और तन से संसार में रहता है। इस जप के लिए यों तो माला की कोई आवश्यकता नहीं है, पर कुछ लोग छोटी-सी 'सुमरिनी' रखते हैं इसलिए कि कहीं विस्मरण होने का-सा मौका आ जाए तो वहां यह सु‍मरिनी विस्मरण न होने देगी। सुमरिनी छोटी होनी चाहिए, वस्त्र में छिपी रहनी चाहिए, किसी को दिखाई न दे। सुमिरन करते हुए होंठ भी न हिेलें। सब काम चुपचाप होना चाहिए, किसी को कुछ मालूम न हो।

8. वा‍चिक जप
जिस जप का इतने जोर से उच्चारण होता है कि दूसरे भी सुन सकें, उसे वाचिक जप कहते हैं। बहुतों के विचार में यह जप निम्न कोटि का है और इससे कुछ लाभ नहीं है। परंतु विचार और अनुभव से यह कहा जा सकता है कि यह जप भी अच्‍छा है। विधि यज्ञ की अपेक्षा वाचिक जप दस गुना श्रेष्ठ है, यह स्वयं मनु महाराज ने ही कहा है। जपयोगी के लिए पहले यह जप सुगम होता है। आगे के जप क्रमसाध्य और अभ्याससाध्य हैं। इस जप से कुछ यौगिक लाभ होते हैं।

सूक्ष्म शरीर में जो षट्चक्र हैं उनमें कुछ वर्णबीज होते हैं। महत्वपूर्ण मंत्रों में उनका विनियोग रहता है। इस विषय को विद्वान और अनुभवी जपयोगियों से जानकर भावनापूर्वक जप करने से वर्णबीज शक्तियां जाग उठती हैं। इस जप से वाक्-सिद्धि तो होती ही है, उसके शब्दों का बड़ा महत्व होता है। वे शब्द कभी व्यर्थ नहीं होते। अन्य लोग उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जितना जप हुआ रहता है, उसी हिसाब से यह अनुभव भी प्राप्त होता है। एक वाक्-शक्ति भी सिद्ध हो जाए तो उससे संसार के बड़े-बड़े काम हो सकते हैं। कारण, संसार के बहुत से काम वाणी से ही होते हैं। वाक्-शक्ति संसार की समूची शक्ति का तीसरा हिस्सा है। यह जप प्रपंच और परमार्थ दोनों के लिए उपयोगी है।

9. उपांशु उपाय
वाचिक जप के बाद का यह जप है। इस जप में होंठ हिलते हैं और मुंह में ही उच्चारण होता है, स्वयं ही सुन सकते हैं, बाहर और किसी को सुनाई नहीं देता। विधियज्ञ की अपेक्षा मनु महाराज कहते हैं कि यह जप सौ गुना श्रेष्ठ है। इससे मन को मूर्च्छना होने लगती है, एकाग्रता आरंभ होती है, वृत्तियां अंतर्मुख होने लगती हैं और वाचिक जप के जो-जो लाभ होते हैं, वे सब इसमें होते हैं। इससे अपने अंग-प्रत्यंग में उष्णता बढ़ती हुई प्रतीत होती है। यही तप का तेज है। इस जप में दृष्टि अर्धोन्मीलित रहती है। एक नशा-सा आता है और मनोवृत्तियां कुंठित-सी होती हैं, यही मूर्च्छना है। इसके द्वारा साधक क्रमश: स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करता है। वाणी के सहज गुण प्रकट होते हैं। मंत्र का प्रत्येक उच्चार मस्तक पर कुछ असर करता-सा मालूम होता है- भालप्रदेश और ललाट में वेदनाएं अनुभूत होती हैं। अभ्यास से पीछे स्थिरता आ जाती है।

10. भ्रमर जप
भ्रमर के गुंजार की तरह गुनगुनाते हुए जो जप होता है, वह भ्रमर जप कहाता है। किसी को यह जप करते, देखते-सुनने से इसका अभ्यास जल्दी हो जाता है। इसमें होंठ नहीं हिलते, जीभ हिलाने का भी कोई विशेष कारण नहीं। आंखें झपी रखनी पड़ती हैं। भ्रूमध्य की ओर यह गुंजार होता हुआ अनुभूत होता है। यह जप बड़े ही महत्व का है। इसमें प्राण सूक्ष्म होता जाता है और स्वाभाविक कुम्भक होने लगता है। प्राणगति धीर-धीमी होती है, पूरक जल्दी होता है और रेचक धीरे-धीरे होने लगता है। पूरक करने पर गुंजार व आरंभ होता है और अभ्यास से एक ही पूरक में अनेक बार मंत्रावृत्ति हो जाती है।

इसमें मंत्रोच्चार नहीं करना पड़ता। वंशी के बजने के समान प्राणवायु की सहायता से ध्यानपूर्वक मंत्रावृत्ति करनी होती है। इस जप को करते हुए प्राणवायु से ह्रस्व-दीर्घ कंपन हुआ करते हैं और आधार चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक उनका कार्य अल्पाधिक रूप से क्रमश: होने लगता है। ये सब चक्र इससे जाग उठते हैं। शरीर पुलकित होता है। नाभि, हृदय, कंठ, तालु और भ्रूमध्य में उत्तरोत्तर अधिकाधिक कार्य होने लगता है। सबसे अधिक परिणाम भ्रूमध्यभाग में होता है। वहां के चक्र के भेदन में इससे बड़ी सहायता मिलती है। मस्तिष्क में भारीपन नहीं रहता। उसकी सब शक्तियां जाग उठती हैं। स्मरण शक्ति बढ़ती है। प्राक्तन स्मृति जागती है। मस्तक, भालप्रदेश और ललाट में उष्णता बहुत बढ़ती है। तेजस परमाणु अधिक तेजस्वी होते हैं और साधक को आंतरिक प्रकाश मिलता है। बुद्धि का बल बढ़ता है। मनोवृत्तियां मूर्च्छित हो जाती हैं। नागस्वर बजाने से सांप की जो हालत होती है, वही इस गुंजार से मनोवृत्तियों की होती है। उस नाद में मन स्वभाव से ही लीन हो जाता है और तब नादानुसंधान का जो बड़ा काम है, वह सुलभ हो जाता है।

11. मानस जप
यह तो जप का प्राण ही है। इससे साधक का मन आनंदमय हो जाता है। इसमें मंत्र का उच्चार नहीं करना होता है। मन से ही मंत्रावृत्ति करनी होती है। नेत्र बंद रहते हैं। मंत्रार्थ का चिंतन ही इसमें मुख्‍य है। श्री मनु महाराज ने कहा है कि विधियज्ञ की अपेक्षा यह जप हजार गुना श्रेष्ठ है। भिन्न मंत्रों के भिन्न-भिन्न अक्षरार्थ और कूटार्थ होते हैं। उन्हें जानने से इष्टदेव के स्वरूप का बोध होता है। पहले इष्टदेव का सगुण ध्यान करके यह जप किया जाता है, पीछे निर्गुण स्वरूप का ज्ञान होता है। और तब उसका ध्यान करके जप किया जाता है। नादानुसंधान के साथ-साथ यह जप करने से बहुत अधिक उपायकारी होता है। केवल नादानुसंधान या केवल जप की अपेक्षा दोनों का योग अधिक अच्‍छा है। श्रीमदाद्य शंकराचार्य नादानुसंधान की महिमा कथन करते हुए कहते हैं- 'एकाग्र मन से स्वरूप चिंतन करते हुए दाहिने कान से अनाहत ध्वनि सुनाई देती है। भेरी, मृदंग, शंख आदि आहत नाद में ही जब मन रमता है तब अनाहत मधुर नाद की महिमा क्या बखानी जाए? चित्त जैसे-जैसे विषयों से उपराम होगा, वैसे-वैसे यह अनाहत नाद अधिकाधिक सुनाई देगा। नादाभ्यंतर ज्योति में जहां मन लीन हुआ, तहां फिर इस संसार में नहीं आना होता है अर्थात मोक्ष होता है।'

सतत नादानुसंधान करने से मनोलय बन पड़ता है। आसन पर बैठकर, श्वासोच्छवास की क्रिया सावकाश करते हुए, अपने कान बंद करके अंतरदृष्टि करने से नाद सुनाई देता है। अभ्यास से बड़े नाद सुनाई देते हैं और उनमें मन रमता है। मंत्रार्थ का चिंतन, नाद का श्रवण और प्रकाश का अनुसंधान- ये तीन बातें साधनी पड़ती हैं। इस साधन के सिद्ध होने पर मन स्वरूप में लीन होता है, तब प्राण, नाद और प्रकाश भी लीन हो जाते हैं और अपार आनंद प्राप्त होता है।

12. अखंड जप
यह जप खासकर त्यागी पुरुषों के लिए है। शरीर यात्रा के लिए आवश्यक आहारादि का समय छोड़कर बाकी समय जपमय करना पड़ता है। कितना भी हो तो क्या, सतत जप से मन उचट ही जाता है, इसलिए इसमें यह विधि है कि जप से जब चित्त उचटे, तब थोड़ा समय ध्यान में लगाएं, फिर तत्वचिंतन करें और फिर जप करें। कहा है-

जपाच्छ्रान्त: पुनर्ध्यायेद् ध्यानाच्छ्रान्त: पुनर्जपेत्।
जपध्यानपरिश्रान्त: आत्मानं च विचारयेत्।।
'जप करते-करते जब थक जाएं, तब ध्यान करें। ध्यान करते-करते थकें, तब फिर जप करें और जप तथा ध्यान से थकें, तब आत्मतत्व का विचार करें।'

13. अजपा जप
यह सहज जप है और सावधान रहने वाले से ही बनता है। किसी भी तरह से यह जप किया जा सकता है। अनुभवी महात्माओं में यह जप देखने में आता है। इसके लिए माला का कुछ काम नहीं। श्वाछोच्छवास की क्रिया बराबर हो ही रही है, उसी के साथ मंत्रावृत्ति की जा सकती है। अभ्यास से मंत्रार्थ भावना दृढ़ हुई रहती है, सो उसका स्मरण होता है। इसी रीति से सहस्रों संख्‍या में जप होता रहता है। इस विषय में एक महात्मा कहते हैं-

राम हमारा जप करे, हम बैठे आराम।

14. प्रदक्षिणा जप
इस जप में हाथ में रुद्राक्ष या तुलसी की माला लेकर वट, औदुम्बर या पीपल-वृक्ष की अथवा ज्योतिर्लिंगादि के मंदिर की या किसी सिद्धपुरुष की, मन में ब्रह्म भावना करके, मंत्र कहते हुए परिक्रमा करनी होती है। इससे भी सिद्धि प्राप्त होती है- मनोरथ पूर्ण होता है। @संकलित

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सर्वारिष्टनिवारकं शुभकरं पिङ्गाक्षमक्षापहं।सीतान्वेषणतत्परं कपिवरं कोटीन्दुसूर्यप्रभम्।।लङ्काद्वीपभयङ्करं सकलदं सुग्रीवस...
02/03/2026

सर्वारिष्टनिवारकं शुभकरं पिङ्गाक्षमक्षापहं।
सीतान्वेषणतत्परं कपिवरं कोटीन्दुसूर्यप्रभम्।।
लङ्काद्वीपभयङ्करं सकलदं सुग्रीवसम्मानितं।
देवेन्द्रादि समक्तदेवविनुतं काकुत्थदूतं भजे।।

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यो वै सर्गावसाने जगति विनशने नृत्यति ध्वंसकर्ता।स्वर्गे देवेन्द्रपूज्यः शशिधरगिरिजावल्लभः सोपचारैः।।विश्वे संपूजितो यः स...
01/03/2026

यो वै सर्गावसाने जगति विनशने नृत्यति ध्वंसकर्ता।
स्वर्गे देवेन्द्रपूज्यः शशिधरगिरिजावल्लभः सोपचारैः।।
विश्वे संपूजितो यः सुविविधविधिना देवदैत्यादिभिश्च।
तं कन्दर्पद्विषं बालहिमकरधरदेवं नमामि त्रिनेत्रम्।।१।।

श्रद्धायुक्तैर्विधिज्ञैः शचिपतिसहितैर्देवगन्धर्वयक्षैः।
संपूज्यः शङ्करो दैत्यसुरमनुजकृत्पूजनेन प्रसन्नः।।
कैलाशे यक्षराट्वैश्रवणसुपरिपूज्यं धनेशस्य मित्रं।
रूद्रं दक्षाध्वरघ्नं पुरमथनकरं नौमि मृत्युञ्जयं च।।२।।

पाताले वासुकीतक्षकविवरगतैर्दिव्यनागैः सुपूज्यः।
मुक्तारत्नादिभिर्ह्याभरणखचितलिङ्गो महादेवदेवः।।
भक्त्या संपूजितो यः प्रथितवरुणलोके च रत्नाकरेण।
तं भूतेशं नमामि त्रिपुररचिततन्त्रस्य विध्वंसकं च।।३।।

यं विष्णुर्भक्तिवेगाच्छुभसरसिजपुष्पैः सहस्रैः सपर्यां।
कर्तुं यत्नं चकार प्रथितविधिविदामग्रगण्यो ह्युपेन्द्रः।।
लीलातोऽलब्धपद्मः स कमलनयनो नेत्रपुष्पं ददौ यं।
तं नौमि ब्रह्मरूपं त्रिगुणरहिततत्वं महोक्षाधिरूढम्।।४।।

यं श्रीरामो विहन्तुं दशमुखविकटं पूजयामास पूर्वे।
त्रेतायां वै दशास्यं तटिनिपतितटे श्रद्धया सोपचारैः।।
शर्वं रामेश्वरं दैत्यमनुजसुरपूज्याशुतोषं महेशं।
तं नौमि ध्वंसकं दक्षविधिरहितयज्ञस्य भूताधिवासम्।।५।।

यं कृष्णो द्वापरे सत्सुतमिह जनितुं पूजयामास भक्त्या।
रूद्रप्रीतिं ह्यवाप्तुं स्वसकलविभवं संपरित्यज्य राज्यम्।।
केदारेशं स्वतीक्ष्णैः स विविधतपसा वै तुतोषाशुतोषं।
तं शम्भुं नीलकण्ठं सकलविभवदं नौमि सन्मार्गदं च।।६।।

यो दक्षो गर्वयुक्तोऽध्वरविधिरहितं यज्ञकार्यं चकार।
मौर्ख्यात् पुत्रीमवज्ञां स्वपरिकरसमेतं चकार प्रमादात्।।
तद्मूढत्वं च यज्ञं प्रबलवपुधरो वीरभद्रो ननाश।
तं नौमि श्रेयदं वै रविशशिनयनं वीरभद्रेश्वरं च।।७।।
नमः शङ्कराय 🌹🌹💐🙏🙏

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कुंडली में सूर्य, गुरु, शुक्र का योग हो तो जातक कुशाग्र बुद्धि, उच्च विद्या प्राप्त विद्वान, उच्च पद पर प्रतिष्ठित, धार्...
28/02/2026

कुंडली में सूर्य, गुरु, शुक्र का योग हो तो जातक कुशाग्र बुद्धि, उच्च विद्या प्राप्त विद्वान, उच्च पद पर प्रतिष्ठित, धार्मिक विचारों से युक्त, पराक्रमी तथा परिश्रमी एवं पुरुषार्थ से धन लाभ व सरकारी क्षेत्र द्वारा विशेष लाभान्वित होता है।

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यदि द्वादशेश निर्बल हो, पापक्रांत हो तो द्वादशेश की दशा में रोग, अपमान, बंधन योग एवं कृष्ण पक्ष के चंद्रमा की भांति संपत...
27/02/2026

यदि द्वादशेश निर्बल हो, पापक्रांत हो तो द्वादशेश की दशा में रोग, अपमान, बंधन योग एवं कृष्ण पक्ष के चंद्रमा की भांति संपत्ति क्षय की संभावनाएं होंगी। द्वादशेश के दोष को दूर करने हेतु लग्नेश का रत्न धारण करना ही समुचित सुरक्षा कवच होगा। लग्नेश का रत्न धारण करने से षष्ठेश, अष्टमेश, द्वादशेश तीनों नियंत्रण में रहेंगे। द्वादशेश यदि (12वें भाव निर्बल हो, तो व्यक्ति के खर्चे अधिक हो सकते हैं, धन का संग्रह मुश्किल हो सकता है, और जीवन में अचानक नुकसान, अस्पताल या क़ानूनी मामलों से जुड़ा तनाव (खासकर विदेश या गुप्त मामलों से संबंधित) बढ़ सकता है; हालांकि, स्थिति के अनुसार, यह मोक्ष, आध्यात्मिकता और विदेश यात्रा के अवसर भी देता है, विशेषकर यदि उस पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो, लेकिन अशुभ प्रभाव होने पर यह पैरों में कष्ट या अनियोजित व्यय का कारण बनता है।

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