दादी माँ के घरेलू नुस्खे - Dadi Maa ke Nuskhe

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दादी माँ के घरेलू नुस्खे - Dadi Maa ke Nuskhe जय हो

पंचतत्व “जो ब्रह्मांड में है, वही शरीर में है।”इसी सत्य को प्रकट करते हैं पाँच महाभूत – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।...
05/10/2025

पंचतत्व

“जो ब्रह्मांड में है, वही शरीर में है।”
इसी सत्य को प्रकट करते हैं पाँच महाभूत – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।
यही हमारे अस्तित्व, स्वास्थ्य और सौंदर्य की असली जड़ हैं।

आकाश (Space / Ether) –
विस्तार और शांति का प्रतीक। यह हमें स्वतंत्रता और करुणा देता है, लेकिन असंतुलन में अकेलापन और असुरक्षा ला सकता है।

वायु (Air) –
हर गति का आधार। श्वास, धड़कन और तंत्रिका तंत्र इसकी देन हैं। संतुलन में सृजनशीलता और उत्साह, जबकि असंतुलन में चिंता और बेचैनी।

अग्नि (Fire) –
रूपांतरण और बुद्धि का तत्व। पाचन, दृष्टि और ऊर्जा का स्रोत। संतुलन में प्रकाश और स्पष्टता, लेकिन असंतुलन में क्रोध और अम्लता।

जल (Water) –
स्नेह और पोषण का प्रतीक। रक्त, लसीका, मूत्र और पसीने में इसकी उपस्थिति। संतुलन में प्रेम और संतोष, पर असंतुलन में सूजन और श्लेष्मा।

पृथ्वी (Earth) –
स्थिरता और शक्ति का आधार। हड्डियाँ, त्वचा, दाँत और मांसपेशियाँ इसी से बनी हैं। संतुलन में धैर्य और सहारा, जबकि असंतुलन में भारीपन और आलस्य।

हर कोशिका, हर श्वास और हर विचार इन पाँचों तत्वों का संगम है।
इनका संतुलन ही दीर्घायु, स्वास्थ्य और सौंदर्य का रहस्य है।

वायु ही जीवन है।शरीर की प्रत्येक गतिविधि श्वसन, पाचन, स्मृति, गति और शुद्धि इन पाँच वायु पर आधारित है।प्राण वायु हमें जी...
05/10/2025

वायु ही जीवन है।
शरीर की प्रत्येक गतिविधि श्वसन, पाचन, स्मृति, गति और शुद्धि इन पाँच वायु पर आधारित है।

प्राण वायु हमें जीवनदायिनी श्वास देता है और इन्द्रियों को स्थिर करता है।
उदान वायु वाणी, स्मृति और उत्साह का आधार है।
व्यान वायु रक्तसंचार और गति का संचालक है।
समान वायु भोजन को पचाकर पोषण पूरे शरीर तक पहुँचाता है।
अपान वायु शरीर की शुद्धि और सृजन की शक्ति है।

जब ये पाँचों वायु संतुलन में रहते हैं, तब शरीर तेजस्वी, मन स्थिर और जीवन दीर्घायु होता है।
लेकिन असंतुलन होने पर रोग उत्पन्न होते हैं और शरीर की समग्र क्षमता प्रभावित होती है।

आयुर्वेद का सार यही है
संतुलन ही स्वास्थ्य है, असंतुलन ही रोग।

इसीलिए प्राचीन आचार्यों ने पंच वायु को स्वास्थ्य का सबसे गहरा रहस्य बताया है।

पुराणघृत – समय के साथ निखरी हुई औषधिआयुर्वेद कहता है – “घी जितना पुराना, उतना ही रोगनाशक।”सुश्रुत संहिता में वर्णित है क...
05/10/2025

पुराणघृत – समय के साथ निखरी हुई औषधि

आयुर्वेद कहता है – “घी जितना पुराना, उतना ही रोगनाशक।”
सुश्रुत संहिता में वर्णित है कि पुराणघृत मदपानजन्य विकार, अपस्मार, मूर्च्छा, सिर, कान, नेत्र एवं स्त्रीरोगों में अत्यंत लाभकारी है। यह व्रणों का शोधन करता है और उन्हें शीघ्र भरने में सहायक होता है।

कालानुसार इसके नाम भेद –
•पुराणघृत – १ वर्ष से अधिक पुराना
•कुम्भसर्पि – १०–१५ वर्ष पुराना
•महाघृत – १००–१११ वर्ष से अधिक पुराना

इतिहास में यह घी सामान्य घरों में नहीं, बल्कि केवल बड़े घरानों और वैद्य परंपरा में सुरक्षित रहता था। इसे औषधि के रूप में अत्यंत मूल्यवान माना गया और कई बार पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोया जाता था।

आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि समय के साथ घी के रासायनिक गुण बदलकर उसे केवल औषधीय दृष्टि से उपयुक्त बनाते हैं।

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