12/12/2024
असली शक्ति की खोज -
स्वामी विवेकानंद के युवावस्था के दिनों की बात है, जब वे आध्यात्मिक सत्य की खोज में देश भर में भ्रमण कर रहे थे। यह वह समय था जब उनके मन में जीवन और ईश्वर के रहस्यों को समझने की तीव्र प्यास थी।
नरेंद्र एक संपन्न परिवार से थे, लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में उन्होंने सब कुछ त्याग दिया। वे भारत के विभिन्न तीर्थ स्थानों की यात्रा करने लगे। उनका एक ही प्रश्न था: “क्या किसी ने सच में भगवान को देखा है?”
वे विभिन्न संतों, गुरुओं और संन्यासियों से मिले, परंतु कोई भी उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया। कोई उन्हें शास्त्रों के जटिल सिद्धांत सुनाता तो कोई दर्शनशास्त्र के कठिन विचार। लेकिन नरेंद्र का हृदय इस सब से संतुष्ट नहीं हुआ।
एक दिन, किसी ने उन्हें बताया कि कोलकाता के निकट दक्षिणेश्वर में रामकृष्ण परमहंस नाम के एक महान संत रहते हैं। नरेंद्र पहले तो संकोच में थे, लेकिन ईश्वर की खोज में उनकी जिज्ञासा उन्हें रामकृष्ण परमहंस के पास ले गई।
जैसे ही नरेंद्र ने सवाल किया:“क्या आपने भगवान को देखा है?”
रामकृष्ण परमहंस की आँखों में एक अनोखी चमक आ गई। उन्होंने शांत भाव से उत्तर दिया:“हाँ, मैंने भगवान को उसी प्रकार देखा है जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ। मैं उनके साथ बात करता हूँ जैसे मैं तुमसे कर रहा हूँ।”
यह उत्तर नरेंद्र के लिए चमत्कारिक था। उन्होंने पहली बार किसी को इतनी सरलता और विश्वास से ऐसा कहते सुना। उन्होंने रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बनने का निर्णय लिया और उनकी शिक्षाओं में गहराई से डूब गए।
परंतु ज्ञान प्राप्त होने के बाद भी उनके जीवन में एक बार कुछ ऐसा हुआ जिस से उन्हें एहसास हुआ कि अभी वो पूरी तरह स्वयं को नियंतृत नहीं कर पायें हैं हुआ कुछ ऐसा की एक बार स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण के दौरान एक छोटे राज्य के राजा के निमंत्रण पर उनके दरबार पहुंचे। राजा ने स्वामी जी के स्वागत के लिए एक भव्य आयोजन रखा। दरबार में राजकीय अधिकारी, मंत्री और विद्वान तो थे ही, साथ ही राजा ने एक प्रसिद्ध नर्तकी (वेश्या) को भी बुलाया, ताकि वह स्वामी जी के स्वागत में अपनी कला का प्रदर्शन कर सके।
जब स्वामी विवेकानंद ने नर्तकी को देखा, तो उनके चेहरे पर असहजता और क्रोध के भाव आ गए। उन्होंने राजा से कहा:“एक संन्यासी के स्वागत के लिए इस तरह का आयोजन अनुचित है। यह स्थान पवित्र होना चाहिए।” ये कह कर वो महल के एक कमरे में चले गए, विवेकानंद की यह बात वेश्या की कानों तक पहुंच गई। स्वामी जी की कड़ी बातों से नर्तकी को गहरा आघात लगा,
राजा और दरबार के सभी लोग स्तब्ध रह गए। पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया।
थोड़ी देर बाद उनके कानों पर हल्की हल्दी की आवाज कलाकार की आने लगी जो कि संगीत गा रही थी, स्वामी जी के कमरे के एक कोने में आके उसको ध्यान से सुनने लगे, गीत सन्यास पर आधारित था। वेश्या ने गाते हुए कहा, 'मैं जानती हूं, मैं आपके योग्य नहीं हूं लेकिन आप मुझ पर थोड़ी दया कर सकते थे। मैं जानती हूं कि मैं रास्ते की गंदगी हूं। लेकिन आपको मुझसे नफरत करने की जरूरत नहीं है। मेरा कोई वजूद नहीं है, मैं अज्ञानी हूं, मैं पापी हूं, लेकिन आप तो एक संत हैं, फिर आप मुझसे डर क्यों रहे हैं?' और जानती हूं कि आप एक महान संन्यासी हैं। परंतु क्या मेरा शरीर अपवित्र होने से मेरी आत्मा भी अपवित्र हो गई है? क्या ईश्वर सिर्फ महलों में रहते हैं? क्या उनका वास मेरे भीतर नहीं हो सकता?”
यह बात जैसे ही विवेकानंद के कानों तक पहुंची, उन्हें तुरंत अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्होंने खुद से पूछा कि आखिर वो वेश्या से डर क्यों रहे हैं? वेश्या के पास जाने में क्या पाप है?
यह सुनकर स्वामी विवेकानंद चकित रह गए। उन्होंने महसूस किया कि वे एक व्यक्ति के बाहरी स्वरूप को देखकर उसका न्याय कर बैठे थे। यह उनकी अपनी शिक्षाओं के विरुद्ध था, जिसमें वे कहते थे कि “हर इंसान में भगवान का अंश है।”
स्वामी जी ने अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी और बोले:“तुमने आज मुझे जीवन का सबसे बड़ा सबक सिखाया है। शरीर तो नश्वर है, पर आत्मा अमर है। हर व्यक्ति में भगवान का वास है, चाहे वह किसी भी स्थिति में क्यों न हो।”इसके बाद विवेकानंद को अहसास हो गया कि उन्हें वेश्या के आक्रर्शन का डर है। अगर वो अपने मन से यह डर निकाल देंगे तो उनका मन शांत हो जाएगा, जिससे वो एक संपूर्ण सन्यासी बनने की तरफ बढ़ सकेंगे। इसके बाद वो फौरन दरवाजे से बाहर निकले और वेश्या को प्रणाम किया। न सिर्फ वो वेश्या के आगे गए ब्लकि उन्होंने वेश्या से बातचीत करते हुए कहा, 'भगवान ने आज एक बड़ा रहस्य खोल दिया है। मुझे डर था कि मेरे अंदर कोई वासना होगी लेकिन आपने मुझे पूरी तरह परास्त कर दिया। मैंने ऐसी शुद्ध आत्मा पहले कभी नहीं देखी।' विवेकानंद ने आगे कहा कि अगर मैं आपके साथ अकेले भी रहूं तो मुझे कोई परवाह नहीं।
इस अनुभव ने स्वामी विवेकानंद की आत्मा को और अधिक मजबूत बना दिया। उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन का उद्देश्य हर मनुष्य में छिपी दिव्यता को पहचानने और जागरूक करने का संदेश देना है।
1893 में शिकागो के विश्व धर्म महासभा में जब उन्होंने अपने प्रसिद्ध भाषण की शुरुआत “अमेरिका के भाइयों और बहनों” से की, तो पूरा विश्व मंत्रमुग्ध हो गया। उन्होंने भारत के आध्यात्मिक संदेश को इन सरल शब्दों में प्रस्तुत किया:“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।”
असली शक्ति हमारे भीतर है। खुद पर विश्वास रखें, सच्चे गुरु की खोज करें, और जीवन के हर संघर्ष को आत्मबल से पार करें। किसी भी इंसान को उसके बाहरी रूप, पेशे या स्थिति के आधार पर मत आंकिए। ईश्वर हर जगह हैं और हर प्राणी में विद्यमान हैं।