Awadhesh Pain Relief Clinic

Awadhesh Pain Relief Clinic ।। समस्त जीव सुखी हों, स्वस्थ हों ।।

12/01/2026
05/01/2026
17/04/2024

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*पिताजी का उपदेश..*
एक डॉक्टर साहब हैं।खूब बड़े नगर में रहते हैं।उनके यहाँ रोगियों की बड़ी भीड़ रहती है।घर बुलाने पर उनको फीस के बहुत रुपये देने पड़ते हैं।वे बड़े प्रसिद्द हैं।उनकी दवा से रोगी बहुत शीघ्र अच्छे हो जाते हैं।

डॉक्टर साहब के लिये प्रसिद्ध है कि कोई गरीब उन्हें घर बुलाने आवे तो वे तुरंत अपने ताँगे पर बैठकर देखने चले जाते हैं।उसे बिना दाम लिये दवा देते हैं और आवश्यकता हुई तो रोगी को दूध देने के लिये पैसे भी दे आते हैं।

डॉक्टर साहब ने बताया कि उस समय हमारे पिता जीवित थे।मैंने डॉक्टर की नयी-नयी दूकान खोली थी।पर मेरी डॉक्टरी अच्छी चल गयी थी।एक दिन दूर गाँव से एक किसान आया।उसने प्रार्थना की कि ‘मेरी स्त्री बहुत बीमार है।डॉक्टर साहब! चलकर उसे देख आवें।’

डॉक्टर ने कहा – ‘इतनी दूर मैं बिना बीस रुपये लिये नहीं जा सकता।मेरी फीस यहाँ दे दो और ताँगा ले आओ तो मैं चलूँगा।’

किसान बहुत गरीब था।उसने डॉक्टर के पैरों पर पाँच रुपये रख दिये।वह रोने लगा और बोला – ‘मेरे पास और रुपये नहीं हैं।आप मेरे घर चलें।मैं ताँगा ले आता हूँ। आपके पंद्रह रुपये फसल होने पर अवश्य दे जाऊँगा।’

डॉक्टर साहब ने उसे फटकार दिया।रुपये फेंक दिये और कहा – ‘मैंने तुम-जैसे भिखमंगों के लिये डॉक्टरी नहीं पढ़ी है।मुझसे इलाज कराने वाले को पहले रुपयों का प्रबन्ध करके मेरे पास आना चाहिये।तुम-जैसों से बात करने के लिये हमारे पास समय नहीं है।’

किसान ने गिड़गिड़ाकर रोते हुए कहा – ‘सरकार! मैं गाँव में किसी से कर्ज लेकर जरूर आपको रुपये दूँगा,आप जल्दी चलिये| मेरी स्त्री मर जायगी,सारे बच्चे अनाथ हो जायँगे।मेरी गृहस्थी चौपट हो जायगी।’

किसान की बात सुनकर डॉक्टर झुँझला उठे और बोले – ‘जहन्नुम में जाय तेरी गृहस्थी और बच्चे। पहले रुपये ला और फिर चलने की बात कर।’

उनके पिताजी छत पर से सब सुन रहे थे।उन्होंने डॉक्टर साहब को पुकारा।जैसे ही डॉक्टर साहब पिता के सामने गये,उनके मुख पर एक थप्पड़ पड़ा।इतने जोर का थप्पड़ कि हट्टे-कट्टे बेचारे डॉक्टर चक्कर खाकर गिर पड़े।

पिताजी ने कहा – ‘मैंने तुझे इसलिये पढ़ाकर डॉक्टर नहीं बनाया कि तू गरीबों के साथ ऐसा बुरा व्यवहार करेगा,उन्हें गालियाँ बकेगा और उनका गला दबायेगा। जा,अभी मेरे घर से निकल जा और तेरे पालने तथा पढ़ाने में जितने रुपये लगे हैं,चुपचाप दे जा! नहीं तो अभी उस गरीब के घर अपने ताँगे में बैठकर जा। उससे एक पैसा भी दवा का दाम लिया तो मैं मिट्टी का तेल डालकर तेरी दूकान में आग लगा दूँगा।’ डॉक्टर ने हाथ जोड़ लिये।तब पिताजी कुछ नम्र होकर बोले – ‘तेरे ऐसे व्यवहार से मुझे बड़ी लज्जा आती है।देख यदि आज बहु बीमार होती,तेरे हाथ में पैसे न होते,तू किसी डॉक्टर के यहाँ जाता और हाथ जोड़कर उससे इलाज के लिये प्रार्थना करता और वह तुझे जवाब में वही बातें कहता,जो तूने इस किसान से कही हैं,तो तेरे हृदय में कितना दुःख होता।मनुष्य को दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिये, जो वह अपने लिये चाहता है।ऐसा करेगा तो तू गरीबों का आशीर्वाद पायेगा और फूले-फलेगा।’

बेचारे डॉक्टर साहब का एक ओर मुख फूल गया था।उन्होंने सिर नवाकर पिताजी की बात मान ली और चुपचाप दवा का बक्स लेकर ताँगे में उस किसान को बैठाकर चल पड़े।वे कहते हैं कि ‘किसी गरीब रोगी के आने पर मुझे पिताजी की उस मूर्ति का स्मरण हो आता है और हाथ तुरंत गाल पर पहुँच जाता है और साथ ही पिताजी का उपदेश भी याद आ जाता है।धन्य थे मेरे वे पिता..!!
*🙏🏽🙏🙏🏿जय श्री कृष्ण*🙏🏻🙏🏼🙏🏾

04/03/2024

मैं तुम्हारी माँ के बंधन मे और नहीं रह सकती, मुझे अलग घर चाहिए जहाँ मैं खुल के साँस ले सकूँ। पलक रवि को देखते ही ज़ोर से चिल्ला उठी।

बात बस इतनी थी कि सुलभा जी ने रवि और पलक को पार्टी मे जाता देख कर इतना भर कहा था कि वो रात दस बजे तक घर वापस आ जाए। बस पलक ने इसी बात को तूल दे दिया और दो दिन बाद ही उसने किरण के घर किटी मे उसे मकान ढूंढने की बात भी कह दी।

मुझे मम्मी जी की गुलामी मे रहना पसंद नहीं है ।

पलक, तुम्हारी तरह एक दिन मैं भी यही सोच कर अपनी सास से अलग हो गई थी। किटी ख़तम होते ही किरण पलक से मुख़ातिब थी।

तभी तो आप आज़ाद हो। पलक ने चहक कर कहा तो किरण का स्वर उदासी से भर गया, किरण पलक से दस वर्ष बड़ी थी।

नहीं,बल्कि तभी से मैं गुलाम हो गई, जिसको मैं गुलामी समझ रही थी वास्तव मे आज़ादी तो वही थी।

वो कैसे,

पलक.. जब मैं ससुराल मे थी दरवाज़े पर कौन आया, मुझे मतलब नहीं था क्योंकि मैं वहाँ की बहू थी। घर मे क्या चीज़ है क्या नहीं इससे भी मैं आज़ाद थी, दोनों बच्चे दादा-दादी से हिले थे। मुझे कहीं आने-जाने पर पाबंदी नहीं थी, पर कुछ नियमों के साथ, जो सही भी थे, पर जवानी के जोश मे मैं अपने आगे कोई सीमा रेखा नहीं चाहती थी। मुझे ये भी नहीं पसंद था कि मेरा पति आफिस से आकर सीधा पहले माँ के पास जाए।

तो!! फिर पलक की उत्सुकता बढ़ गई।

मैंने दिनेश को हर तरह से मना कर अलग घर ले लिया और फिर मैं दरवाज़े की घंटीं, महरी, बच्चों, धोबी, दिनेश सबके वक्त की गुलाम हो गई।

अपनी मरज़ी से मेरे आने-जाने पर भी रोक लग गई क्योंकि कभी बच्चों का होमवर्क कराना है, तो कभी उनकी तबीयत खराब है। हर जगह बच्चों को ले नहीं जा सकते। अकेले भी नहीं छोड़ सकते। तो मजबूरन पार्टियां भी छोड़नी पड़ती जबकि ससुराल मे रहने पर ये सब बंदिश नहीं थीं।

ऊपर से मकान का किराया और फालतू के खर्चे अलग, फिर दिनेश भी अब उतने खुश नहीं रहते।किरण की आँखें नम हो उठीं।

फिर आप वापस क्यों नहीं चली गयीं,

किस मुँह से वापस लौटती,

इन्होंने एक बार मम्मी से कहा भी था, पर पापा ने ये कह कर साफ़ मना कर दिया कि, एक बार हम लोगों ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला है अब दूसरा झटका खाने की हिम्मत नहीं है, बेहतर है अब तुम वहीं रहो।

ओह!

पलक घर से बाहर क़दम रखना बहुत आसान है पर जब तक आप माँ-बाप के आश्रय मे रहते हैं आपको बाहर के थपेड़ों का तनिक भी अहसास नहीं होता, माँ-बाप के साथ बंदिश से ज़्यादा आज़ादी होती है पर हमें वो पसंद नहीं होती। एक बार बाहर निकलने के बाद आपको पता चलता है कि आज़ादी के नाम पर ख़ुद अपने पाँव मे जंज़ीरें डाल लीं। बड़ी होने के नाते तुमसे यही कहूंगी सोच-समझ कर ही ये क़दम उठाना।

मन ही मन ये गणित दोहराते हुए पलक एक क्षण मे निर्णय ले चुकी थी-उसे किरण जैसी गुलामी नहीं चाहिए। घर की ओर चलते बढ़ते कदमों के साथ साथ ही वो मन ही मन बुदबुदा रही थी, की घर पहुंचते ही सासू मां के पैर छूकर क्षमा मांग लूंगी और सदा उनके साथ ही रहूँगी।

मां बाप को साथ नही रखा जाता, मां बाप के साथ रहना होता है...

08/01/2024

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