23/11/2025
#आयुर्वेद में अडूसा को आमतौर पर वासा के नाम से जाना जाता है, यह एक लोकप्रिय #औषधीय पौधा है। इस पौधे के सभी भागों ( #पत्तियाँ, #फूल, #जड़, #तना, #फल) में औषधीय गुण होते हैं। इसकी एक खास गंध और #कड़वा स्वाद होता है।
अडूसा पाउडर को #शहद के साथ सेवन करना
#काली_खांसी, #ब्रोंकाइटिस, #अस्थमा जैसे #श्वसन #संक्रमण के मामलों में फायदेमंद माना जाता है क्योंकि यह अपने #कफ को बाहर निकालने वाले गुण के कारण #वायुमार्ग से #बलगम के स्राव को बढ़ावा देने में मदद करता है। अडूसा ( #वासाका) अपने #एंटीऑक्सीडेंट और #एंटी_इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण #गठिया के लक्षणों को प्रबंधित करने में भी मदद कर सकता है। यह गठिया और गाउट से जुड़े #जोड़ों_के_दर्द और #सूजन को कम करता है। यह अपने #एंटीस्पास्मोडिक गुण के कारण ऐंठन को भी कम करता है।
अडूसा #त्वचा की समस्याओं के प्रबंधन के लिए एक प्रभावी घरेलू उपाय है। त्वचा पर ताजे अडूसा के पत्तों का #पेस्ट लगाने से इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण के कारण प्रभावित क्षेत्र में #दर्द और #सूजन को कम करके फोड़े और अल्सर को ठीक करने में मदद मिलती है। अडूसा पाउडर को शहद के साथ प्रभावित क्षेत्र पर समान रूप से लगाने से इसके #जीवाणुरोधी गुण के कारण #दाद, #खुजली और त्वचा पर #चकत्ते को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। अडूसा का पेस्ट, पाउडर और जड़ का #काढ़ा भी इसके ज्वरनाशक गुण के कारण शरीर के #तापमान को कम करके बुखार को कम करने में मदद करता है
अडूसा एक औषधीय पौधा है जिसे आमतौर पर आयुर्वेदिक चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसके पत्तों, दूधी, गोंद, जड़ और बीजों में औषधीय गुण पाए जाते हैं। अस्थमा एवम् स्वास संबंधी रोगों में तो यह रामबाण औषधि है। अडूसा काढ़ा का प्रयोग नियमित करने से पुराने से पुराना बुखार एवम् स्वांस रोग छु मंतर हो जाता है। इसके 2 भेद होते हैं।
1 श्वेत अडूसा
2 कृष्ण अडूसा
श्वेत अडूसा सामान्य रूप से मिल जाता है, किन्तु कृष्ण अडूसा की उपलब्धता बहुत कम देखने को मिलती है।
1.अगर किसी इंफेक्शन के कारण मुंह में घाव या सूजन हुआ है, तो अडूसा का प्रयोग जल्दी आराम देता है. यदि केवल मुख में छाले हों तो अडूसा के 2-3 पत्तों को चबाकर उसके रस को चूसने से लाभ होता है,इसकी लकड़ी का दातौन करने से मुख के रोग दूर हो जाते हैं,वासा के 50 मिली काढ़े में एक चम्मच गेरू और दो चम्मच मधु मिलाकर मुख में रखने से मुंह का घाव सूख जाता है।
2.अगर आप दांत दर्द से परेशान हैं, इसके लिए अडूसा के पत्तों के काढ़े से कुल्ला करने से दांत दर्द कम होता है.
3.अक्सर हर किसी को सिरदर्द की शिकायत रहती है, सिर दर्द से निजात पाने के लिए पेन किलर की जगह अडूसा का सेवन करें, अडूसा के छाया में सूखे हुए फूलों को पीस लें 1-2 ग्राम फूलों के चूर्ण में समान मात्रा में गुड़ मिलाकर खाएं आपको सिर दर्द से राहत मिलेगी।
4.अर्थराइटिस के दर्द में फायदेमंद जोड़ों में दर्द है तो आप वासा की मदद से उसे दूर कर सकते हैं,वासा में एंटी-इंफ्लामेटरी गुण होते हैं. यूरिक एसिड बढ़ने के कारण घुटनों में दर्द होता है. आप अगर वासा का पाउडर पानी के साथ लें, तो यूरिक एसिड कम होगा और दर्द ठीक हो जाएगा. आप चाहें तो वासा की पत्तियों का मिश्रण बनाकर लेप की तरह घुटने या ज्वॉइंट्स पर लगा सकते हैं।
5.खांसी व सांस फूलने की बीमारी में फायदेमंद अगर किसी की सांस फूलता है या फिर सूखी खांसी है तो आप वासा की पत्तियों का रस निकाल कर उसमें शहद मिलाकर उसका सेवन करें, सूखी खांसी को दूर करने के लिए अडूसा के पत्ते, मुनक्का और मिश्री का काढ़ा पीने से जल्द से जल्द खांसी से राहत मिलेगी।
6.तपेदिक जैसे संक्रामक रोग में भी वासा का औषधीय गुण बहुत फायदेमंद तरीके से काम करता है। अडूसा के पत्तों के 20-30 मिली काढ़े में छोटी पीपल का 1 ग्राम चूर्ण मिलाकर पिलाने से तपेदिक और खांसी में आराम मिलता है।
7.अक्सर मसालेदार या बाजार का कुछ भी तला हुआ खाने संक्रमण हो जाता है ,अगर ऐसे संक्रमण के कारण दस्त हो रहा और ठीक नहीं हो रहे है ,तो वासा का घरेलू उपाय जल्द आराम दिलाने में मदद करेगा। 10-20 मिली वासा पत्ते के रस को दिन में तीन-चार बार पीने से दस्त में लाभ होता है।
8.फोड़ा अगर सूख नहीं रहा है तो वासा का इस तरह से प्रयोग करने पर जल्दी सूख जाता है। फोड़े पर प्रारंभ में ही इसके पत्तों को पानी के साथ पीसकर लेप कर दें, तो फोड़ा बैठ जाता है और कोई कष्ट नहीं होता।
9.वासा का औषधीय गुण किडनी के दर्द से आराम दिलाने में बहुत फायदेमंद है। अडूसे और नीम के पत्तों को गर्म कर नाभि के निचले भाग पर सेंक करने से तथा वासा के पत्तों के 5 मिली रस में 5 मिली शहद मिलाकर पिलाने से गुर्दे के भयंकर दर्द में आश्चर्यजनक रूप से लाभ पहुंचता है।
10.अगर पीलिया हुआ है और आप इसके लक्षणों से परेशान हैं तो वासा का सेवन इस तरह से कर सकते हैं। वासा पञ्चाङ्ग के 10 मिली रस में मधु और मिश्री समान मात्रा में मिलाकर पिलाने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
🇮🇳 वासा (अडूसा) – एक बेहतरीन औषधि है जिसके बारे में लोगो को नहीं पता है या बहुत कम लोगो को पता है
⭐. खांसी और बलगम में असरदार
यह सूखी और बलगमी खांसी को दूर करने में मदद करता है।
वासा के पत्तों का काढ़ा पीने से फेफड़ों की सफाई होती है और बलगम बाहर निकलता है।
⭐दमा (अस्थमा) और सांस की बीमारियों में उपयोगी
श्वसन नलियों (Airways) को साफ करता है और सांस लेने में आसानी होती है।
अस्थमा के मरीजों के लिए वासा का काढ़ा बहुत लाभकारी होता है।
⭐ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की सुरक्षा
यह फेफड़ों के संक्रमण और सूजन को कम करने में मदद करता है।
नियमित सेवन से फेफड़े मजबूत होते हैं और संक्रमण से बचाते हैं।
⭐टी.बी. (क्षय रोग) में लाभदायक
टी.बी. के मरीजों के लिए वासा का सेवन फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाता है।
यह खून में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाने में सहायक है।
⭐ पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद
अपच, गैस, और कब्ज जैसी समस्याओं में मदद करता है।
इसका काढ़ा पेट को ठंडा रखता है और आंतों की सफाई करता है।
⭐ रक्तस्राव (Bleeding Disorders) को रोकता है
अगर किसी को नाक से खून (नकसीर), पेशाब में खून या अत्यधिक माहवारी होती है, तो वासा का रस फायदेमंद होता है।
⭐. त्वचा रोगों में लाभदायक
खुजली, जलन, फोड़े-फुंसी और घाव भरने में मदद करता है।
वासा के पत्तों का रस लगाने से घाव जल्दी ठीक होता है।
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कैसे करें उपयोग?
⭐. वासा का काढ़ा:
4-5 ताजे पत्तों को 1 गिलास पानी में उबालें।
इसे छानकर दिन में 2 बार पिएं।
⭐. वासा का रस:
1 चम्मच वासा का ताजा रस शहद के साथ लें।
यह खांसी और बलगम के लिए बहुत फायदेमंद है।
⭐. सूखे पत्तों का चूर्ण:
1-2 ग्राम पाउडर शहद या गर्म पानी के साथ लें।
अस्थमा और खांसी में मदद करता है।
⭐. वासा की चाय:
तुलसी, अदरक और वासा के पत्ते डालकर हर्बल चाय बना सकते हैं।
वासा (अडूसा) फेफड़ों की सफाई, खांसी, अस्थमा और टी.बी. के इलाज में बेहद उपयोगी है। यह आयुर्वेद की सबसे अच्छी जड़ी-बूटियों में से एक है, जिसे सही मात्रा में लेने पर जबरदस्त स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं।
पेट रोगों की सुरक्षा: अडूसा का सेवन पेट संबंधी समस्याओं से बचाने में मदद करता है। यह पाचन प्रक्रिया को सुधारता है, अपच, अम्लता, एसिडिटी और पेट के विषाणुजन्य संक्रमण को कम करता है।
श्वसन संबंधी समस्याओं को कम करना: अडूसा श्वसन संबंधी समस्याओं, जैसे खांसी, ठंड, गले के रोग, और श्वसन नली के संक्रमण को कम करने में मदद करता है। इसका नियमित सेवन श्वसन प्रणाली को स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण है।
बुखार और इन्फेक्शन को कम करना: अडूसा में मौजूद विषाणुनाशी गुण बुखार और इन्फेक्शन को कम करने में मदद कर सकते हैं। यह शरीर के रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है।
बलगम को दूर करना: अडूसा बलगम को दूर करने में मदद कर सकता है। यह श्वसन प्रणाली में जमा हुए बलगम को कम करता है और सांस लेने में आसानी प्रदान करता है।
आंत्र को संरक्षित रखना: अडूसा आंत्र की सेहत को सुरक्षित रखने में मदद करता है। यह आंत्र संबंधी समस्याओं, जैसे कब्ज़, आंत्रिक दर्द और आंत्र के संक्रमण को कम कर सकता है।
अडूसा का सेवन आप देसी काढ़ा, चूर्ण, अर्क, रस, या संग्रहणीय औषधि के रूप में कर सकते हैं। ध्यान दें कि इसे उपयोग करने से पहले आपको अपने वैद्यकीय सलाह लेनी चाहिए और संबंधित खुराक की सलाह पर चलना चाहिए।
अडूसा/वासा के 8-10 फूलों को रात्रि के समय एक गिलास जल में भिगोकर सुबह मसलकर छानकर पीने से मूत्रदाह या मूत्र करते हुए जलन, पेशाब करते हुए दर्द होना, पेशाब रुक रुक कर आने से आराम मिलता है।
श्वास रोग की अचूक औषधि वासा अवलेह बनाने के लिए अडूसा की जड़ इकट्ठा करते हुए। वासावलेह बनाने की विधि - दो सेर अडूसे की छाल और १६ सेर पानी को एक कलईदार वर्तन में चढ़ाकर काढ़ा बनाओ। जव चौथाई पानी रह जाय, उतार कर छान लो। फिर इस काढ़े में एक सेर 'बूरा' और पाव भर 'घी' डाल कर पकाओ। जब गाढ़ा होने पर आवे, उसमें छोटी पीपरों का पाव भर "चूर्ण" मिलाकर नीचे उतार लो। जब शीतल हो जाय, उसमें एक सेर "शहद" भी मिला दो। यही "वासावलेह" है।
इस अवलेह के चाटने से यक्ष्मा, खाँसी, श्वास, पसली का दर्द, हृदय का शूल, ज्वर और रक्तपित्त ये आराम होते हैं। पिछले आठ सालों से बना रहे हैं।
अडूसा/वासा खांसी, सांस फूलने की बहुत अच्छी दवा है। अडूसा के 5 पत्ते, तुलसी के 10 पत्ते और आधा चम्मच सोंठ का काढ़ा बनाकर नियमित रूप से पीने पर खांसी, श्वास रोगों में आराम मिलता ही है
(* ठंडी चीजों, फलों और चिकनाई वाली चीजों का परहेज जरूर करना पड़ेगा, बगैर परहेज के कोई भी दवा सही से काम नहीं करती)
81 रोगों में लाभदायक अडूसा वासा
अडूसा (वासा) के औषधीय प्रयोग
(1) क्षय (टी.बी.) :- अडूसा के फूलों का चूर्ण 10 ग्राम की मात्रा में लेकर इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर 1 गिलास दूध के साथ सुबह-शाम 6 माह तक नियमित रूप से खिलाएं।
*अडूसा (वासा) टी.बी. में बहुत लाभ करता है इसका किसी भी रूप में नियमित सेवन करने वाले को खांसी से छुटकारा मिलता है। कफ में खून नहीं आता, बुखार में भी आराम मिलता है। इसका रस और भी लाभकारी है। अडूसे के रस में
शहद मिलाकर दिन में 2-3 बार देना चाहिए।
*वासा अडूसे के 3 किलो रस में 320 ग्राम मिश्री मिलाकर धीमी आंच पर पकायें जब गाढ़ा होने को हो, तब उसमें 80 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण मिलायें जब ठीक प्रकार से चाटने योग्य पक जाय तब उसमें गाय का घी 160 ग्राम मिलाकर पर्याप्त चलायें तथा ठंडा होने पर उसमें 320 ग्राम शहद मिलायें। 5 ग्राम से 10 ग्राम तक टी.बी. के रोगी को दे सकते हैं। साथ ही यह खांसी, सांस के रोग, कमर दर्द, हृदय का दर्द, रक्तपित्त तथा बुखार को भी दूर करता है।
*वासा के रस में शहद मिलाकर पीने से अधिक खांसी युक्त श्वास में लाभ होता है। यह क्षय, पीलिया, बुखार और रक्तपित्त में लाभकारी होता है।
*अडूसा की जड़ की छाल को लगभग आधा ग्राम से 12 ग्राम या पत्ते के चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक खुराक के रूप में सुबह और शाम शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता हैं।
(2) दमा :- अड़ूसा के सूखे पत्तों का चूर्ण चिलम में भरकर धूम्रपान करने से दमा रोग में बहुत आराम मिलता है।
*अडूसा के ताजे पत्तों को सुखाकर उनमें थोड़े से काले धतूरे के सूखे हुए पत्ते मिलाकर दोनों के चूर्ण का धूम्रपान (बीड़ी बनाकर पीने से) करने से पुराने दवा में आश्चर्यजनक लाभ होता है।
*यवाक्षार लगभग आधा ग्राम, अडू़सा का रस 10 बूंद और लौंग का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ मिलता है।
*लगभग आधा ग्राम अर्कक्षार या अड़ूसा क्षार शहद के साथ भोजन के बाद सुबह-शाम दोनों समय देने से दमा रोग ठीक हो जाता है।
*श्वास रोग (दमा) में अडू़सा (बाकस), अंगूर और हरड़ के काढ़े को शहद और शर्करा में मिलाकर सुबह-शाम दोनों समय सेवन करने से लाभ मिलता है।
*श्वास रोग (दमा) में अड़ूसे के पत्तों का धूम्रपान करने से श्वास रोग ठीक हो जाता है। अडूसे के पत्ते के साथ धतूरे के पत्ते को भी मिलाकर धूम्रपान किया जाए तो अधिक लाभ प्राप्त होता है।
*अड़ूसे के रस में तालीस-पत्र का चूर्ण और शहद मिलाकर खाने से स्वर भंग (गला बैठना) ठीक हो जाता है।
*अड़ू़सा (वासा) और अदरक का रस पांच-पांच ग्राम मिलाकर दिन में 3-3 घंटे पर पिलाएं। इससे 40 दिनों में दमा दूर हो जाता है।
*अड़ूसा के पत्तों का एक चम्मच रस शहद, दूध या पानी के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से पुरानी खांसी, दमा, टी.बी., मल-मूत्र के साथ खून का आना, खून की उल्टी, रक्तपित्त रोग और नकसीर आदि रोगों में लाभ होता है।"
(3) खांसी और सांस की बीमारी में :- अडूसा के पत्तों का रस और शहद समान मात्रा में मिलाकर दिन में 3 बार 2-2 चम्मच की मात्रा में ले सकते हैं।
(4) नकसीर व रक्तपित्त :- अड़ूसा की जड़ की छाल और पत्तों का काढ़ा बराबर की मात्रा में मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन कराने से नाक और मुंह से खून आने की तकलीफ दूर होती है।
(5) फोड़े-फुंसियां :- अडूसा के पत्तों को पीसकर गाढ़ा लेप बनाकर फोड़े-फुंसियों की प्रारंभिक अवस्था में ही लगाकर बांधने से इनका असर कम हो जाएगा। यदि पक गए हो तो शीघ्र ही फूट जाएंगे। फूटने के बाद इस लेप में थोड़ी पिसी हल्दी मिलाकर लगाने से घाव शीघ्र भर जाएंगे।
(6) पुराना जुकाम, साइनोसाइटिस, पीनस में :- अडूसा के फूलों से बना गुलकन्द 2-2 चम्मच सुबह-शाम खाएं।
(7) खुजली :- अडूसे के नर्म पत्ते और आंबा हल्दी को गाय के पेशाब में पीसे और उसका लेप करें अथवा अडूसे के पत्तों को पानी में उबाले और उस पानी से स्नान करें।
(8) गाढ़े कफ पर :- गर्म चाय में अडूसे का रस, शक्कर, शहद और दो चने के बराबर संचल डालकर सेवन करना चाहिए।
(9) बिच्छू के जहर पर :- काले अडूसे की जड़ को ठंडे पानी में घिसकर काटे हुए स्थान पर लेप करें।
(10) सिर दर्द :- *अडूसा के फलों को छाया में सुखाकर महीन पीसकर 10 ग्राम चूर्ण में थोड़ा गुड़ मिलाकर 4 खुराक बना लें। सिरदर्द का दौरा शुरू होते ही 1 गोली खिला दें, तुरंत लाभ होगा।
*अडूसे की 20 ग्राम जड़ को 200 ग्राम दूध में अच्छी प्रकार पीस-छानकर इसमें 30 ग्राम मिश्री 15 कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से सिर का दर्द, आंखों की बीमारी, बदन दर्द, हिचकी, खांसी आदि विकार नष्ट होते हैं।
*छाया में सूखे हुए वासा के पत्तों की चाय बनाकर पीने से सिर-दर्द या सिर से सम्बंधी कोई भी बाधा दूर हो जाती है। स्वाद के लिए इस चाय में थोड़ा नमक मिला सकते हैं।
(11) नेत्र रोग (आंखों के लिए) :- इसके 2-4 फूलों को गर्मकर आंख पर बांधने से आंख के गोलक की पित्तशोथ (सूजन) दूर होती है।
(12) मुखपाक, मुंह आना (मुंह के छाले) :- *यदि केवल मुख के छाले हो तो अडूसा के 2-3 पत्तों को चबाकर उसके रस को चूसने से लाभ होता है। पत्तों को चूसने के बाद थूक देना चाहिए।
*अडूसा की लकड़ी की दातुन करने से मुख के रोग दूर हो जाते हैं।
*अडूसा (वासा) के 50 मिलीलीटर काढे़ में एक चम्मच गेरू और 2 चम्मच शहद मिलाकर मुंह में रखने करने से मुंह के छाले, नाड़ीव्रण (नाड़ी के जख्म) नष्ट होते हैं।"
(13) दांतों का खोखलापन :- दाढ़ या दांत में कैवटी हो जाने पर उस स्थान में अडूसे का सत्व (बारीक पिसा हुआ चूर्ण) भर देने से आराम होता है।
(14) मसूढ़ों का दर्द :- अडूसे (वासा) के पत्तों के काढ़े यानी इसके पत्तों को उबालकर इसके पानी से कुल्ला करने से मसूढ़ों की पीड़ा मिटती है।
(15) दांत रोग :- अडू़से के लकड़ी से नियमित रूप से दातुन करने से दांतों के और मुंह के अनेक रोग दूर हो जाते हैं।
(16) चेचक निवारण :- यदि चेचक फैली हुई हो तो वासा का एक पत्ता तथा मुलेठी तीन ग्राम इन दोनों का काढ़ा बच्चों को पिलाने से चेचक का भय नहीं रहता है|
(17) कफ और श्वास रोग :- *अडूसा, हल्दी, धनिया, गिलोय, पीपल, सोंठ तथा रिगंणी के 10-20 ग्राम काढे़ में एक ग्राम मिर्च का चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार पीने से सम्पूर्ण श्वांस रोग पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं।
*अडूसे के छोटे पेड़ के पंचाग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) को छाया में सुखाकर कपड़े में छानकर नित्य 10 ग्राम मात्रा की फंकी देने से श्वांस और कफ मिटता है।
(18) फेफड़ों की जलन :- अडूसे के 8-10 पत्तों को रोगन बाबूना में घोंटकर लेप करने से फेफड़ों की जलन में शांति होती है।
(19) आध्यमान (पेट के फूलने) पर :- अडूसे की छाल का चूर्ण 10 ग्राम, अजवायन का चूर्ण 2.5 ग्राम और इसमें 8वां हिस्सा सेंधानमक मिलाकर नींबू के रस में खूब खरलकर 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर भोजन के पश्चात 1 से 3 गोली सुबह-शाम सेवन करने से वातजन्य ज्वर आध्मान विशेषकर भोजन करने के बाद पेट का भारी हो जाना, मन्द-मन्द पीड़ा होना दूर होता है। वासा का रस भी प्रयुक्त किया जा सकता है।
(20) वृक्कशूल (गुर्दे का दर्द) :- अडूसे और नीम के पत्तों को गर्मकर नाभि के निचले भाग पर सेंक करने से तथा अडूसे के पत्तों के 5 ग्राम रस में उतना ही शहद मिलाकर पिलाने से गुर्दे के भयंकर दर्द में आश्यर्चजनक रूप से लाभ पहुंचता है।
(21) मासिक-धर्म :- यदि मासिक-धर्म समय से न आता हो तो वासा पत्र 10 ग्राम, मूली व गाजर के बीज प्रत्येक 6 ग्राम, तीनों को आधा किलो पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई की मात्रा में शेष बचे तो इसे उतार लें। इस तैयार काढ़े को कुछ दिन सेवन करने से लाभ होता है।
(22) मूत्रावरोध :- खरबूजे के 10 ग्राम बीज तथा अडूसे के पत्ते बराबर लेकर पीसकर पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है।
(23) मूत्रदाह (पेशाब की जलन) :- यदि 8-10 फूलों को रात्रि के समय 1 गिलास पानी में भिगो दिया जाए और प्रात: मसलकर छानकर पान करें तो मूत्र की जलन दूर हो जाती है।
(24) शुक्रमेह :- अडूसे के सूखे फूलों को कूट-छानकर उसमें दुगुनी मात्रा में बंगभस्म मिलाकर, शीरा और खीरा के साथ सेवन करने से शुक्रमेह नष्ट होता है।
(25) जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) :- जलोदर में या उस समय जब सारा शरीर श्वेत हो जाए तो अडूसे के पत्तों का 10-20 ग्राम स्वरस दिन में 2-3 बार पिलाने से मूत्रवृद्धि हो करके यह रोग मिटता है।
(26) सुख प्रसव (शिशु की नारमल डिलीवरी) :- *अडू़से की जड़ को पीसकर गर्भवती स्त्री की नाभि, नलो व योनि पर लेप करने से तथा जड़ को कमर से बांधने से बालक आसानी से पैदा हो जाता है।
*पाठा, कलिहारी, अडूसा, अपामार्ग, इनमें किसी एक बूटी की जड़ को नाभि, बस्तिप्रदेश (नाभि के पास) तथा भग प्रदेश (योनि के आस-पास) लेप देने से प्रसव सुखपूर्वक होता है।"
(27) प्रदर :- *पित्त प्रदर में अडूसे के 10-15 मिलीलीटर स्वरस में अथवा गिलोय के रस में 5 ग्राम खांड तथा एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में सुबह और शाम सेवन करना चाहिए।
*अडूसा के 10 ग्राम पत्तों के स्वरस में एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से पित्त प्रदर मिटता है।"
(28) बाइटें (अंगों का सुन्न पड़ जाना) :- 10 ग्राम वासा के फूलों को 2 ग्राम सोंठ के साथ 100 ग्राम जल में पकाकर पिलाने से बाइटों में आराम मिलता है।
(29) ऐंठन :- अडूसे के पत्ते के रस में तिल के तेल मिलाकर गर्म कर लें। इसकी मालिश से आक्षेप (लकवा), उदरस्थ वात वेदना तथा हाथ-पैरों की ऐंठन मिट जाती है।
(30) वातरोग :- वासा के पके हुए पत्तों को गर्म करके सिंकाई करने से जोड़ों का दर्द, लकवा और दर्दयुक्त चुभन में आराम पहुंचाता है।
(31) रक्तार्श (खूनी बवासीर) :- अडूसे के पत्ते और सफेद चंदन इनको बार-बार मात्रा में लेकर महीन चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण की 4 ग्राम मात्रा प्रतिदिन, दिन में सुबह-शाम सेवन करने से रक्तार्श में बहुत लाभ होता है और खून का बहना बंद हो जाता है। बवासीर के अंकुरों में यदि सूजन हो तो इसके पत्तों के काढ़ा का बफारा देना चाहिए।
(32) रक्त पित्त :- *ताजे हरे अडूसे के पत्तों का रस निकालकर 10-20 ग्राम रस में शहद तथा खांड को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से भयंकर रक्तपित्त शांत हो जाता है। उर्ध्व रक्तपित्त में इसका प्रयोग होता है।
*अडूसा का 10-20 ग्राम स्वरस, तालीस पत्र का 2 ग्राम चूर्ण तथा शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से कफ विकार, पित्त विकार, तमक श्वास, स्वरभेद (गले की आवाज का बैठ जाना) तथा रक्तपित्त का नाश होता है।
*अडूसे की जड़, मुनक्का, हरड़ इन तीनो को बराबर मिलाकर 20 ग्राम की मात्रा में लेकर 400 ग्राम पानी में पकायें। चौथाई भाग शेष रह जाने पर उस काढ़े में चीनी और शहद डालकर पीने से खांसी, श्वांस तथा रक्तपित्त रोग शांत होते हैं।"
(33) कफ-ज्वर :- हरड़, बहेड़ा, आंवला, पटोल पत्र, वासा, गिलोय, कटुकी, पिपली की जड़ को मिलाकर इसका काढ़ा तैयार कर लें। इस काढ़े में 20 ग्राम शहद मिलाकर सेवन करने से कफ ज्वर में लाभ होता है।
(34) कामला :- *त्रिफला, गिलोय, कुटकी, चिरायता, नीम की छाल तथा अडूसा 20 ग्राम लेकर 320 ग्राम पानी पकायें, जब चौथाई भाग शेष रह जाये तो इस काढे़ में शहद मिलाकर 20 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन कराने से कामला तथा पांडु रोग नष्ट होता है।
*इसके पंचाग के 10 मिलीलीटर रस में शहद और मिश्री बराबर मिलाकर पिलाने से कामला रोग नष्ट हो जाता है।"
(35) दाद, खाज-खुजली :- अडूसे के 10-12 कोमल पत्ते तथा 2-5 ग्राम हल्दी को एकत्रकर गाय के पेशाब के साथ पीसकर लेप करने से खुजली और सूजन शीघ्र नष्ट हो जाती है। इससे दाद, खाज-खुजली में भी लाभ होता है।
(36) आन्त्र-ज्वर (टायफाइड) :- 3 से 6 ग्राम अडूसे की जड़ के चूर्ण की फंकी देने से आन्त्र ज्वर ठीक हो जाता है।
(37) शरीर की दुर्गन्ध :- अडूसे के पत्ते के रस में थोड़ा-सा शंखचूर्ण मिलाकर लगाने से शरीर की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।
(38) जंतुध्न (छोटे-मोटे जीव-जतुंओं के द्धारा होने वाले जल के दोषों) को दूर करने के लिए :- अडूसा जलीय कीड़ों तथा जंतुओं के लिए विषैला है। इससे मेंढक इत्यादि छोटे जीव-जंतु मर जाते हैं। इसलिए पानी को शुद्ध करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता है।
(39) पशुओं के रोग :- गाय तथा बैलों को यदि कोई पेट का विकार हो तो उनके चारे में इसके पत्तों की कुटी मिला देने से लाभ होता है। इससे पशुओं के पेट के कीड़े भी नष्ट हो जाते हैं।
(40) कीड़ों के लिए :- अडूसे के सूखे पत्ते पुस्तकों में रखने से उनमें कीडें नहीं लगते हैं।
(41) वायुप्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) :- * नये वायु प्रणाली के शोथ (ब्रोंकाइटिस) में अड़ूसा, कंटकारी, जवासा, नागरमोथा और सोंठ का काढ़ा उपयोगी होता है।
* वासावलेह 6 से 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में बहुत लाभ मिलता है।
(42) सान्निपात ज्वर :- *अडूसा, पित्तपापड़ा, नीम, मुलहठी, धनिया, सोंठ, देवदारू, बच, इन्द्रजौ, गोखरू और पीपल की जड़ का काढ़ा बना लें। इस काढ़े के सेवन से सिन्नपात बुखार, श्वास (दमा), खांसी, अतिसार, शूल और अरुचि (भूख का न लगना) आदि रोग समाप्त होते हैं।
*सिन्नपातिक ज्वर में पुटपाक विधि से निकाला अडूसा का रस 10 ग्राम तथा थोड़ा अदरक का रस और तुलसी के पत्ते मिलाकर उसमें मुलहठी को घिसें। फिर इसे शहद में मिलाकर सुबह, दोपहर तथा शाम पिलाना चाहिए।
*सिन्नपात ज्वर में इसकी जड़ की छाल 20 ग्राम, सोंठ 3 ग्राम, कालीमिर्च एक ग्राम का काढ़ा बनाकर उसमें शहद मिलाकर पिलाना चाहिए।"
(43) वात-पित्त का बुखार :- अडूसा, छोटी कटेरी और गिलोय को मिलाकर पीस लें, इस मिश्रण को 8-8 ग्राम की मात्रा में लेकर पकाकर काढ़ा बनाकर पिलाने से कफ के बुखार और खांसी के रोग में लाभ मिलता है।
(44) बुखार :- *वासा (अडूसे) के पत्ते और आंवला 10-10 ग्राम मात्रा में लेकर कूटकर पीस लें और किसी बर्तन में पानी में डालकर रख दें। सुबह थोड़ा-सा मसलकर 10 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने से पैत्तिक बुखार समाप्त हो जाता है।
*10 ग्राम अडूसे का रस, अदरक का रस 5 ग्राम, थोड़ा-सा शहद मिलाकर दिन में कई बार चाटने से बहुत लाभ होता है।
*अडूसे का रस, अदरक का रस और तुलसी के पत्तों का रस 5-5 ग्राम मिलाकर उसमें 5 ग्राम मुलहठी का चूर्ण डालकर सेवन करने से श्लैष्मिक बुखार समाप्त होता है।
45 गीली खांसी :- 7 से 14 मिलीमीटर वासा के ताजा पत्तों का रस शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 बार सेवन करने से गीली खांसी नष्ट हो जाती है
46 टी.बी. युक्त खांसी :- *वासा के ताजे पत्तों के स्वरस को शहद के साथ चाटने से पुरानी खांसी, श्वास और क्षय रोग (टी.बी.) में बहुत फायदा होता है।
*वासा के पत्तों का रस 1 चम्मच, 1 चम्मच अदरक का रस, 1 चम्मच शहद मिलाकर पीने से सभी प्रकार की खांसी से आराम हो जाता है।
*क्षय रोग (टी.बी.) में अडूसे के पत्तों के 20-30 ग्राम काढ़े में छोटी पीपल का 1 ग्राम चूर्ण बुरककर पिलाने से पुरानी खांसी, श्वांस और क्षय रोग में फायदा होता है।"
47 काली खांसी (कुकर खांसी) :- अड़ूसा के सूखे पत्तों को मिट्टी के बर्तन में रखकर, आग पर गर्म करके उसकी राख को तैयार कर लेते हैं। उस राख को 24 से 36 ग्राम तक की मात्रा में लेकर शहद के साथ रोगी को चटाने से काली खांसी दूर हो जाती है।
48 खांसी :- *अड़ू़सा के रस को शहद के साथ मिलाकर चाटने से नयी और पुरानी खांसी में लाभ होता है। इससे कफ के साथ आने वाला खून भी बंद हो जाता है।
*लगभग एक किलो अड़ूसा के रस में 320 ग्राम सफेद शर्करा, 80-80 ग्राम छोटी पीपल का चूर्ण और गाय का घी मिलाकर धीमी आग पर पकाने के लिए रख दें। पकने के बाद इसे गाढ़ा होने पर उतारकर ठंडा होने के लिए रख देते हैं। अब इसमें 320 ग्राम शहद मिलाकर रख देते हैं। यह राज्ययक्ष्मा (टी.बी.) खांसी, श्वास, पीठ का दर्द, हृदय के शूल, रक्तपित्त तथा ज्वर को भी दूर करता है। इसकी मात्रा एक चम्मच अथवा रोग की स्थिति के अनुसार रोगी को देनी चाहिए।
*अड़ूसा के सूखे पत्तों को जलाकर राख तैयार कर लेते हैं। यह राख और मुलहठी का चूर्ण 50-50 ग्राम काकड़ासिंगी, कुलिंजन और नागरमोथा 10-10 ग्राम सभी को खरल करके एक साथ मिलाकर सेवन करने से खांसी में लाभ मिलता है।
* 40 ग्राम अड़ूसा, 20 ग्राम मुलहठी और 10 ग्राम बड़ी इलायची को लेकर चौगुने पानी के साथ काढ़ा बना लें। इसके आधा बाकी रहने पर उतार लें और उसमें थोड़ा सा छोटी पीपल का चूर्ण और शहद मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से सभी प्रकार की खांसी जैसे कुकर खांसी, श्वास कफ के साथ खून का जाना आदि में बहुत लाभ मिलता है।
*कफयुक्त बुखार में अडू़सा (बाकस) के पत्तों को पीसकर निकाला गया रस 5 से 15 ग्राम, अदरक का रस या छोटी पीपल, सेंधानमक और शहद के साथ सुबह-शाम देने से लाभ मिलता है।
*बच्चों के कफ विकार में 5-10 ग्राम अड़ूसा (बाकस) का रस सुहागे की खीर के साथ रोजाना 2-3 बार देने से आराम आता है।
*अड़ूसा और तुलसी के पत्तों का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से खांसी मिट जाती है।
*अड़ूसा और कालीमिर्च का काढ़ा बनाकर ठंडा करके पीने से सूखी खांसी नष्ट हो जाती है।*अड़ूसा के वृक्ष के पंचांग को छाया में सुखाकर चूर्ण बना लेते हैं। इस चूर्ण को रोजाना 10 ग्राम सेवन करने से खांसी और कफ में लाभ मिलता है।
*अड़ूसा के पत्ते और पोहकर की जड़ का काढ़ा बनाकर सेवन करने श्वांस (सांस) की खांसी में लाभ मिलता है।
*अड़ूसा की सूखी छाल को चिलम में भरकर पीने से श्वांस (सांस) की खांसी दूर हो जाती है।
*अड़ूसा, तुलसी के पत्ते और मुनक्का तीनों को बराबर की मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। इस काढे़ को सुबह-शाम दोनों समय सेवन करने से खांसी दूर हो जाती है।
*अड़ूसा, मुनक्का, सोंठ, लाल इलायची तथा कालीमिर्च सभी को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लेते हैं। इस चूर्ण को सुबह और शाम सेवन करने से खांसी में लाभ होता है।"
49 चतुर्थकज्वर (हर चौथे दिन पर आने वाला बुखार) :- वासा मूल, आमलकी और हरीतकी फल मिश्रण, शालपर्णी पंचांग (शालपर्णी की तना, पत्ती, जड़, फल और फूल), देवदारू की लकड़ी और शुंठी आदि को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें, फिर इस काढ़े को 14 से 28 मिलीलीटर 5 से 10 ग्राम शर्करा और 5 ग्राम शहद के साथ दिन में 3 बार लें।
50 निमोनिया :- बच्चों के गले और सीने में घड़घड़ाहट होने पर 10 से 20 बूंद अड़ूसा लाल (लाल बाकस) के पत्तों के रस को सुहागा की खील के साथ या छोटी पीपल और शहद के साथ 4 से 6 घंटे के अंतराल पर देने से बच्चे को पूरा लाभ मिलता है।
*निमोनिया के रोग में 4 काले अड़ूसा (बाकस) के पत्तों का रस सहजने की छाल का रस और सामुद्रिक नमक शहद के साथ देने से लाभ होता है।"
51 पुरानी खांसी :- अड़ूसा के अवलेह का सेवन पुरानी खांसी में बहुत उपयोगी होता है
52 सूखी खांसी :- 14 मिलीमीटर वासा के पत्तों के रस में बराबर मात्रा में घी और शर्करा को मिलाकर दिन में 2 बार लेने से खांसी ठीक हो जाती है।
53 मोतियाबिंद :- अडूसे के पत्तों को साफ पानी से धोकर पत्तों का रस निकाल लें। इस रस को अच्छे पत्थर की खल में डालकर (ताकि पत्थर घिसकर दवा में न मिले।) मूसल से खरल करते रहें। शुष्क हो जाने पर आंखों में काजल की तरह लगाएं। यह सब तरह के मोतियाबिंद में आराम आता है।
54 अफारा :- अडूसा (बाकस) के पत्तों का 5 ग्राम से लेकर 15 ग्राम को खुराक के रूप में देने से लाभ होता है।
55 उर:क्षत (हृदय में जख्म) होने पर :- वासा के ताजे पत्तों का रस 7 से 14 मिलीमीटर की मात्रा में शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से उर:क्षत में लाभ मिलता है।
56 जुएं :- *अडूसा के पत्तों से बने काढे़ से बालों को धोने से जूएं मर जाते हैं।
*अडूसा के पत्तों में फल बांधकर रखा जाए तो सड़ नहीं पाता, इसके (एलकोहलिक टिंचर) को छिड़कने से मक्खी, मच्छर एवं पिप्सू आदि भाग जाते हैं। अडूसा के पत्तों से बनी खाद को खेतों में डाला जाए तो फसलों में कीड़े नहीं लगते हैं। ऊनी कपड़ों के तह में पत्तों को रखने से कपड़ों में कीड़े नहीं आते हैं। इसी तरह इसके काढे़ से बालों को धोने से बालों के जूँ मर जाते हैं।."
57 खून की उल्टी :- अडूसे के पत्तों के रस में शहद को मिलाकर सेवन करने से खून की उल्टी होना बंद हो जाती है।
58 जुकाम :- *20 ग्राम अडूसे के पत्तों को 250 ग्राम पानी में डालकर उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी 1 चौथाई बाकी रह जाये तो उसे उतारकर और पानी में ही मलकर अच्छी तरह से छान लें। इस काढ़े को पीने से जुकाम दूर हो जाता है।
*अडूसे के पत्तों का रस निकालकर पीने से जुकाम ठीक हो जाता है।"
59 दस्त आने पर :- अडूसे (बाकस) के पत्तों का रस 5 ग्राम से लेकर 15 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 बार (सुबह और शाम) पीने से अतिसार की बीमारी समाप्त हो जाती है।
60 आमातिसार (दस्त में आंव आना) :- 5 से 15 ग्राम बाकस (अडूसे) के पत्तों का रस निकालकर रोजाना सुबह-शाम शहद के साथ मिलाकर रोगी को देने से आमातिसार में ठीक होता है।
61 खूनी अतिसार :- अडूसे के पत्तों का रस पिलाने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) मिट जाता है।
62 कनफेड :- अडूसा के पत्तों को पीसकर लगाने से कनफेड में लाभ होता है।
63 भगन्दर :- अडूसे के पत्ते को पीसकर उसकी टिकिया बनाकर तथा उस पर सेंधानमक बुरककर बांधने से भगन्दर ठीक होता है।
64 दर्द व सूजन :- *बाकस के पत्ते की पट्टी बांधने से सूजन में आराम होता है।
*लाल बाकस के पत्तों को नारियल के पानी में पीसकर लेप करने से सूजन मिट जाती है। ऊपर से एरंड तेल लगे मदार के पत्ते बांधने और जल्द लाभ देता है।"
65 अम्लपित्त :- *अडूसा, गिलोय और छोटी कटेली को मिलाकर काढ़ा बना लें, फिर इस काढ़े को शहद के साथ सेवन करने से वमन (उल्टी), खांसी, श्वास (दमा) और बुखार आदि बीमारियों में लाभ मिलता है।
*अडूसा, गिलोय, पित्तपापड़ा, नीम की छाल, चिरायता, भांगरा, हरड़, बहेड़ा, आमला और कड़वे परवल के पत्तों को मिलाकर पीसकर पकाकर काढ़ा बनाकर शहद डालकर पीने से अम्लपित्त शांत हो जाती है।"
66 गिल्टी :- काले आडूसे (बाकस) के पत्तों के रस तेल में मिलाकर गांठों पर लगाने से गिल्टी रोग में लाभ होता है।
67 रक्तप्रदर :- *अडूसा के पत