02/02/2026
📜 शास्त्र प्रमाण:
जब 'अमृत' (घी) भी शरीर के लिए 'विष' बन जाता है!
आयुर्वेद में घी के गुणों की चर्चा तो हर कोई करता है, लेकिन एक चिकित्सक के रूप में मेरा कर्तव्य है कि मैं आपको उन "निषेधों" (Contraindications) के बारे में भी बताऊं जो हमारे ऋषियों ने शास्त्रों में लिखे हैं।
चरक संहिता और अष्टांग हृदय जैसे ग्रंथों के अनुसार, घी हर स्थिति में लाभकारी नहीं होता। आइए जानते हैं शास्त्रीय संदर्भों के साथ:
1. तरुण ज्वर (Acute Fever) में निषेध
शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि बुखार के शुरुआती 7-10 दिनों में घी का सेवन वर्जित है।
सन्दर्भ: "न सर्पिः पिबेत् ज्वरे" — (चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3/130) कारण: यह दोषों को शरीर में जकड़ लेता है और बुखार को गंभीर बना देता है।
2. मंदाग्नि और 'आम' (Toxins)
यदि आपकी पाचन शक्ति कमजोर है या जीभ पर सफेद परत (आम) है, तो घी भारी (गुरु) होने के कारण रोग बढ़ाता है।
सन्दर्भ: "मन्दाग्निनां... न सर्पिः हितम्" — (अष्टांग हृदय, सूत्र स्थान) कारण: घी को पचाने के लिए तीव्र जठराग्नि अनिवार्य है।
3. विरुद्ध आहार (शहद और घी)
शहद और घी को समान मात्रा में मिलाना आयुर्वेद में घातक माना गया है।
सन्दर्भ: "मधुसर्पिः समघृतं विषं भवति..." — (सुश्रुत संहिता) सावधानी: वजन के हिसाब से (By weight) शहद और घी कभी भी बराबर न लें।
4. लीवर और पीलिया (Kamala)
पीलिया और फैटी लीवर की स्थिति में पित्त विकृत होता है और लीवर फैट को मेटाबोलाइज नहीं कर पाता।
सन्दर्भ: चरक संहिता, चिकित्सा स्थान (पाण्डु-कामला चिकित्सा)
5. कफ प्रधान खांसी और अस्थमा
अगर खांसी में बलगम आ रहा है, तो घी का स्नेहक गुण बलगम को और बढ़ा देता है।
सावधानी: "कफव्याधौ न सर्पिः" (कफ के रोगों में घी का सीधा उपयोग सावधानी से करें)।
6. वसंत ऋतु में सावधानी
मार्च-अप्रैल के महीने में शरीर में जमा कफ पिघलता है, इसलिए इस समय घी का अत्यधिक सेवन रोगों को न्योता देता है।
सन्दर्भ: "वसन्ते कफजे रोगे..." (अष्टांग हृदय, ऋतुचर्या)
निष्कर्ष: घी आयुर्वेद का श्रेष्ठ 'संस्कारानुवर्ती' द्रव्य है, जो औषधियों के साथ मिलकर अद्भुत काम करता है। लेकिन यदि आप लीवर रोग, मोटापे या मंदाग्नि से जूझ रहे हैं, तो घी का सेवन बिना चिकित्सकीय परामर्श के न करें।
क्या आप अपने आहार में घी का उपयोग शास्त्रीय विधि से करते हैं? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर साझा करें। 🙏