यात्रा विवरण...
जय श्री हरिः
श्री राधा सर्वेश्वरो विजयते
जीवन परिचय
19 जनवरी 1994 में वृन्दावन के पास ग्राम - भाईपुर ब्राह्मणान् (ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश ) के छोटे गाँव में वैष्णवाचार्य श्री धर्मेन्द्र वत्स जी का जन्म हुआ, पंडित श्रीमान् टेकचंद वत्स और श्रीमति महेन्द्री देवी उनके धार्मिक माता पिता हैं जो भागवत के महाकाव्य और पवित्र गाय की सेवा में समर्पित हैं।
```जीवन चरित्र``
आचार्य श्री के दादा श्रीमान् बावूराम वत्स जी धार्मिक भजन एवं श्रीकृष्ण चरित्र की कहानियों के साथ बाल अवस्था में आचार्य श्री को प्रसन्न करते थे। आचार्य श्री इन कहानियों से उत्साहित होते थे और पूर्ण भक्ति के साथ सुनते थे। आचार्य श्री अपनी बाल अवस्था 6 वर्ष कुछ महीने की उम्र में प्राचीन वैदिक पद्धति गुरुकुल में विद्वान् आचार्यों के सानिध्य में भारतीय संस्कृति तथा वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए चले गये। इनकी प्रारंभिक शिक्षा विश्व हिन्दू परिषद् के द्वारा स्थापित वद्री भगत वेद विद्यालय (दिल्ली) में आचार्य श्री रामकुमार शर्मा जी एवं आचार्य श्री चन्द्रभानु शर्मा जी के सानिध्य में प्रारम्भ हुई। यही इन्होने सामवेद, शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिनीय संहिता आदि शास्त्रों का गूढ़ अध्ययन किया। इसके उपरान्त सन् 2008 में हरियाणा के एक महान विद्वान् संत जगतगुरू रामानुजाचार्य स्वामी श्री सुदर्शनाचार्य जी महाराज के द्वारा स्थापित स्वामी श्री सुदर्शनाचार्य संस्कृत वेद वेदाङ्ग महाविद्यालय में रामानुज पूजा पद्धति एवं कर्मकाण्ड आदि का गायत्री उपासना मे निमग्न होकर अध्ययन किया। तदुपरांत सन् 2012 में वृन्दावन के तपस्वी विद्वान संत भागवत रत्न श्री मुनिराज जी महाराज के संपर्क में आकर श्रीमद् भागवत कथा एवं ज्योतिष व्याकरण तथा संगीत विद्या का स्नातकोत्तर पद प्राप्त कर लिया। आचार्य श्री बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के एवं भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में रमे रहते अन्य बालकों की तरह खेल इत्यादि में कोई ध्यान नहीं था।
शन्कादिक संशैव्य श्री राधा सर्वेश्वर भगवान की कृपा से आचार्य श्री को राजस्थान में स्थित किसनगढ़ निम्बार्क तीर्थ जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्री राधासर्वेश्वर शरण देवाचार्य श्री श्री जी महाराज की शरण प्राप्त हुई।
जहाँ उन्हें महाराज श्री ने वैष्णव सम्प्रदाय में शामिल किया एवं उन्हें सम्प्रदाय के नियम अनुसार वैष्णव धर्म, सत्संग, प्रवचन करने की सेवा सौंपी गयी। और जल्द ही आध्यात्मिक समाज में भव्यता एवं प्रसिद्धता को देख कर देश के संतों एवं आचार्यों ने( वैष्णवाचार्य) के नाम से सम्मानित किया। आचार्य श्री ने कठिन परिश्रम से संतों के आशीर्वाद एवं सानिध्य से देश विदेशों में धार्मिक प्रवचन, श्रीमद् भागवत कथा, गऊ सेवा, धर्म सेवा, राष्ट्र सेवा, एवं वेद सेवा में तत्पर रहकर अपने जीवन को निरन्तर निःस्वार्थ भाव से पूर्णत: समर्पित कर दिया है ।आचार्य श्री का आशीर्वाद और सानिध्य एक विलक्षण अमूल्य निधि है जो जीवन के हर कष्ट का निवारण और हर प्रश्न का उत्तर है।सभी भक्तजनो को आचार्य श्री का शुभ आशीर्वाद
जय श्री हरि: