Aarogya Kalyan Sewa Utthan Sansthan

Aarogya Kalyan Sewa Utthan Sansthan Aarogya Kalyan Sewa Utthan Sansthan is completely charitable and all treatment in the Sansthan are free of cost and no amount is charged against fees, lodg

Shri Suneel Yogiji is expert in pulse curing system. He cures some incurable disease within no time. He has been working in the field of health for more than 12 years and had cured more than 4 lakhs patients came from throughout India as well as foreign also. Most of the patients were suffering from different type of diseases including Slip disk, cervical, sciatica and more. Main treatment by Shri Suneel Yogiji is to cure Polio and paralyses patients. Up to certain age limits Polio patient who are having polio since more than 10 years they are also being cured, who were not able even in standing are moving own their own. Shri Suneel Yogi ji is also brining awareness among the people about Nadi Chikitsa (Pulse curing system) and guiding them to cure themselves without any medicine . He also helps to improve health of the people through self awareness and also people not able to afford costly medicine, and Allopathic treatment. His global aim is to make India and the world "AAROGYA BHARAT AND DUNIYA" (Healthy India and the World) as far as concern these disease and many more. TIMELINE OF LEARNING AND EXPERIENCE
Exposure through childhood and growing years in Indian tradition. Learnt the art of Nadi Chiktsa (Pulse curing) in the
foothills of the Himalayas in Kotdwar. Training and certification as a DNYS (Diploma in Naturopathy) from Akhil Bhartiya Ayurvedic Sansthan, Delhi. Over 20 years of experience as a Yoga practitioner and over 12 years of experience as a Nadi Vaidya. Until now - Successfully Treated more than 4,00,000 Patients from all over India and abroad also.

अंत्यत दुखदऊँ शान्ति, ऊँ शान्ति, ऊँ शान्ति
04/01/2025

अंत्यत दुखद
ऊँ शान्ति, ऊँ शान्ति, ऊँ शान्ति

09/04/2024
https://twitter.com/kewalsat/status/1280411568484741120?s=21
21/09/2020

https://twitter.com/kewalsat/status/1280411568484741120?s=21

“‘अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तदैव च’ अर्थात – अहिंसा मनुष्य का परम धर्म हैं और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस.....

24/03/2020

चीन के वुहान शहर से दुनिया के तमाम देशों में फैला कोरोना चीन के ही अन्य बड़े शहरों जैसे शँघाई, बीजिंग आदि में नहीं फैला। हिन्दुस्तानियों को इससे सीखने की ज़रूरत है।

सरकारी निर्देशों का पालन करें। घर में रहें।

विश्व में शांति और समृद्धि हेतु यज्ञ महाशिव रात्रि की शुभकामनाएँ
21/02/2020

विश्व में शांति और समृद्धि हेतु यज्ञ
महाशिव रात्रि की शुभकामनाएँ

28/01/2020
05/10/2019

कमर दर्द है ?
स्लिप डिस्क है ?
तो आइये, बिना आपरेशन, बिना दवाई और निःशुल्क,
माह की 4 से 8 और 16 से 20 तारीख को

03/03/2019

कल दिनांक 4 मार्च को शिवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित किये जा रहे हवन और भनडारे में आप सब सादर आमंत्रित है।
हवन सुबह 8 बंजे
भनडारा 11 बजे

हरेंद्र कुमार अहलावत

03/03/2019

शुभ मुहूर्त में करेंगे पूजन तो होगी भगवान शिव की विशेष कृपा फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को महाशिवरात्रि पर्व होता है। इस वर्ष यह महापर्व 4 मार्च, सोमवार को श्रवण नक्षत्र और परिघ नामक महत्वपूर्ण योग में पड़ रहा है। शिवशाक्त में इस महापर्व का उल्लेख करते हुए ऋषियों की वाणी है कि ,शिवरात्रि पर साक्षात् शिव-शक्ति अर्थात् पार्वती के साथ त्रिलोक में विचरण करते हैं।तथा इसी दिन शिव-विवाह का प्रमाण भी प्राप्त होता है। महाशिवरात्रि 4 मार्च सोमवार काे मनाई जाएगी। इस पर्व पर भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। इस खास दिन के संबंध में कुछ मान्यता ये है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। वहीं ईशान संहिता के अनुसार इस दिन भगवान शिव प्रकट हुए थे। इस दिन शिव-भक्त मंदिरों में शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाकर पूजा, व्रत तथा रात्रि-जागरण करते हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से महाशिवरात्रि पर्व का बहुत महत्व है।
#महाशिवरात्रि व्रत का महत्व
' फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।
शिवलिङ्गतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभ।।
ईशान संहिता के इस वाक्य के अनुसार #ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव होने से यह पर्व महाशिवरात्रि के रुप में मनाया जाता है। इस व्रत को सभी कर सकते हैं। इसे न करने से दोष लगता है। ये व्रतराज' के नाम से विख्यात है। शिवरात्रि यमराज के शासन को मिटाने वाली है और शिवलोक को देने वाली है। शास्त्रोक्त विधि से जो इसका जागरण सहित उपवास करते हैं। उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। शिवरात्रि के समान पाप और भय मिटाने वाला दूसरा व्रत नही है। इसके करने मात्र से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।
महाशिवरात्रि का रहस्य
ज्योतिषाचार्य पं गणेश मिश्रा के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप रहता है। अतः वही समय जीवन रूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग- मिलन होता है। अतः इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से मनुष्यों को मनचाहा फल मिलता है।
#शिवरात्रि पर्व भगवान् शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं।
महाशिवरात्रि को कब करें शिव का पूजन
शिवरात्रि को जन्म जन्मांतर तक भ्रमित जीव मात्र को शिव आराधना-पूजा से भय एवं शोक से मुक्ति मिलती है-'जन्तुजन्म सहस्रेषु भ्रमन्ते नात्र संशय:'। ज्‍योतिषाचार्य पंडित चक्रपाणि भट्ट के अनुसार इस वर्ष शिव-पूजन प्रारम्भ करने का शुभ विशेष मुहूर्त प्रातः 6 बजकर 43 मिनट से सायं 4 बजकर 18 मिनट तक सर्वार्थ योग में है। रात्रि पर्यंत रुद्राभिषेक करने से आराधक को शक्ति के साथ शिव का सायुज्य प्राप्त होता है। संकल्प के साथ शिव का षोडशोपचार पूजन करने से व्यक्ति के भीतर का शोक,भय जैसे अनेक दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं।
भगवान #शिव को अर्पित करें
शिव को भांग,बेल्पत्र,धतूर,मदार,भस्म अर्पित करने का विधान है। चूंकि शिव का अर्थ कल्याण होता है,इसलिए विश्व के कल्याण हेतु शिव विषपान के साथ-साथ समस्त हानिकारक वस्तु स्वयम् ग्रहण करके संसार को अमृत प्रदान करते हैं। इसी कारण से शिव को धतूर आदि अर्पित किया जाता है। समस्त कल्याणकारी वस्तुओं को स्वयम् ग्रहण कर सृष्टि को स्वच्छ एवं कल्याणकारी बनाना ही शिवत्व है।
शिव-पूजन के पूर्व संकल्प
पूजन के पहले संकल्‍प लेना आवश्यक होता है, जो इस प्रकार है- 'मम इह जन्मनिजन्मांतरे वा सकल पाप भय क्षयार्थम आयु:आरोग्य ऐश्वर्य पुत्र पौत्रादि व्यापार आदि सकल मनोरथ पूर्तये शिवरात्रि दिनोत्सव शिव पूजनम करिष्ये।' संकल्प के बाद शिवलिंग को पंचामृत अर्थात क्रमशःदूध दही घी शहद चीनी से स्नान करा कर विधिवत श्रृंगार पूर्वक पुष्पादि अर्पित कर कन्द-मूल ऋतुफल भांग-बेल्पत्र चढ़ाने से शिव अर्थात् सन्तुष्टि की प्राप्ति होती है। पूजनोपरांत 'ॐनम:शिवाय शिवाय नम:' इस एकादशाक्षरी महामंत्र का यथा सम्भव अधिक से अधिक जाप करने से वर्ष पर्यंत शिव की कृपा बनी रहती है।
भगवान शिव का श्रंगार
शिवपुराण में चन्दन,भस्म,अबीर दूब जनेऊ तथा वस्त्रादि से देवाधिदेव का श्रृंगार माहात्म्य कहा गया है।धूप दीप नैवेद्य पान सुपारी लौंग इलायची समर्पित कर सुगन्धित इत्र का लेपन करने से समस्त मनोकामना पूर्ण होती है।शिवरात्रि पर रात्रि जागरण करते हुए शिव स्तोत्र का पाठ या रुद्राभिषेक करने से नर-नारी समस्त वैभव को प्राप्त करते हैं।
शनिवार को चाहिए शनि का आर्शिवाद तो करें इन मंत्रों का जाप
महाशिवरात्रि का महत्‍व व स्‍तुति मंत्र
वर्ष में तीन रात्रि की प्रधानता बताई गई है—कालरात्रि महारात्री एवं मोहरात्रि ।नवरात्रि की सप्तमी कालरात्रि,शिवरात्रि महारात्री तथा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मोहरात्रि बताई गई है।इन तीनों में शिवरात्रि का विशेष महत्व वर्णित है।तन्त्र-शास्त्र के अनुसार महारात्री को साधक मन्त्रों की सिद्धी भी करते हैं।विश्व-कल्याण का प्रत्येक क्षण शिव के चरणों से होकर ही निकलता है।
विजया एकादशी 2019: अशुभता का नाश कर शुभ फल देता है ये व्रत
शिव का स्तुति-मन्त्र अष्टाध्यायी में इस प्रकार आता है-“ॐ नम:श्म्भ्वायच मयोंभवायच नम:शंकरायच मयस्करायच नम:शिवायच शिवतरायच ।। यदि शिवरात्रि के दिन बेलपत्र पर “राम-राम “लिख कर शिव को अर्पण किया जाय तो हरि अर्थात् विष्णु एवं हर अर्थात् शिव की विशेष कृपा होती है।
समुद्र मंथन अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित थी, लेकिन इसके साथ ही कालकूट नामक विष भी पैदा हुआ था। कालकूट विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव का आनंद लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते हैं, भगवान की महिमा गाते हैं और पूरी रात ध्यान करते हैं।[4]
शिकारी कथा
एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'
शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।
पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।
कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।
शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्षपर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृगविनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।
थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।
अनुष्ठान
गेंदे के फूलों की अनेक प्रकार की मालायें जो शिव को चढ़ाई जाती हैं।
इस अवसर पर भगवान शिव का अभिषेक अनेकों प्रकार से किया जाता है। जलाभिषेक : जल से और दुग्‍धाभिषेक : दूध से। बहुत जल्दी सुबह-सुबह भगवान शिव के मंदिरों पर भक्तों, जवान और बूढ़ों का ताँता लग जाता है वे सभी पारंपरिक शिवलिंग पूजा करने के लिए आते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं। भक्त सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं जैसे गंगा, या (खजुराहो के शिव सागर में) या किसी अन्य पवित्र जल स्रोत में। यह शुद्धि के अनुष्ठान हैं, जो सभी हिंदू त्योहारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं, भक्त शिवलिंग स्नान करने के लिए मंदिर में पानी का बर्तन ले जाते हैं महिलाओं और पुरुषों दोनों सूर्य, विष्णु और शिव की प्रार्थना करते हैं मंदिरों में घंटी और "शंकर जी की जय" ध्वनि गूंजती है। भक्त शिवलिंग की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर शिवलिंग पर पानी या दूध भी डालते हैं।
शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि पूजा में छह वस्तुओं को अवश्य शामिल करना चाहिए:
शिव लिंग का पानी, दूध और शहद के साथ अभिषेक। बेर या बेल के पत्ते जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं;
सिंदूर का पेस्ट स्नान के बाद शिव लिंग को लगाया जाता है। यह पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है;
फल, जो दीर्घायु और इच्छाओं की संतुष्टि को दर्शाते हैं;
जलती धूप, धन, उपज (अनाज);
दीपक जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है;
और पान के पत्ते जो सांसारिक सुखों के साथ संतोष अंकन करते हैं।
#राधेराधे

23/11/2018

जय हो

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Meerut City
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