Vaidya Dr. Ajay Gupta

Vaidya Dr. Ajay Gupta Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.

Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU

01/02/2026

Soyabean उच्च गुणवत्ता वाला plant protein है, जो मांसपेशियों की मजबूती और कमजोरी दूर करने में मदद करता है। Soyabean डायबिटीज़ में ब्लड शुगर कंट्रोल, महिलाओं में हार्मोन बैलेंस, और हड्डियों की मजबूती के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। इसमें फाइबर होने से पाचन अच्छा रहता है और वजन नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

कुछ दिन पहले एक मरीज मिलने आये । उन्होंने बताया कि  उन्हें बिना किसी चेतावनी के हाथ-पैरों और पीठ पर लाल-लाल उभरे हुए चकत...
01/02/2026

कुछ दिन पहले एक मरीज मिलने आये । उन्होंने बताया कि उन्हें बिना किसी चेतावनी के हाथ-पैरों और पीठ पर लाल-लाल उभरे हुए चकत्ते निकल आते हैं। शुरुआत में उन्होंने सोचा कि शायद कुछ गलत खा लिया होगा, लेकिन जब यह समस्या हफ्तों तक रोज होने लगी और एंटी-एलर्जिक दवा लेना शुरू किया। कुछ दिन आराम रहा लेकिन दवा छोड़ते ही फिर उभर आई।

🔥 आजकल बहुत-से लोगों को स्किन रैश, खुजली, लाल चकत्ते, या Urticaria (हाइव्स) जैसी एलर्जी की समस्या बार-बार हो रही है। कोई कहता है “अचानक पूरे शरीर में दाने निकल आए”, कोई बताता है “रात में खुजली से नींद नहीं आती”, तो किसी के होंठ या आँखों के आसपास सूजन आ जाती है।
👉 वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो Urticaria में शरीर की मास्ट सेल्स (Mast cells) से Histamine नामक रसायन निकलता है। यही हिस्टामिन त्वचा की रक्त नलिकाओं को फैला देता है, जिससे लालिमा, सूजन और तेज खुजली होती है। यह प्रतिक्रिया खाने-पीने की चीजों (जैसे मूंगफली, समुद्री भोजन), दवाओं (Painkiller, Antibiotic), ठंड-गर्मी, धूप, पसीना, संक्रमण, तनाव और कभी-कभी ऑटोइम्यून कारणों से भी हो सकती है।
👉 रिसर्च बताती है कि लंबे समय तक रहने वाली Urticaria में लगभग 30–40% मामलों में तनाव और इम्यून असंतुलन की बड़ी भूमिका होती है।

🔥 कई लोग बार-बार होने वाले स्किन रैश को सिर्फ “खून की गर्मी” या “मौसम का असर” मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि बार-बार होने वाली एलर्जी शरीर के अंदर चल रहे मेटाबॉलिक या इम्यून डिसऑर्डर का संकेत हो सकती है।
🍁 आयुर्वेद के अनुसार, ऐसी त्वचा संबंधी एलर्जी का संबंध मुख्य रूप से पित्त और कफ दोष की विकृति, कमजोर अग्नि (Digestive fire) और आम (Toxins) के संचय से होता है। चरक संहिता में इसे शीतपित्त, उदर्द और कोठ जैसे नामों से वर्णित किया गया है।
👉 आयुर्वेद मानता है कि केवल ऊपर से मलहम लगाने या दवा खाने से स्थायी लाभ नहीं मिलता, जब तक कि पाचन सुधार, रक्त शुद्धि और दोष संतुलन न किया जाए।
आयुर्वेद में ऐसे रोगो के इलाज के लिए एक बहुत ही बेहतरीन औषधि का उल्लेख मिलता है और उसका नाम है -

🍁"शीतपित्तभंजन रस"🍁

🍁 मात्रा और अनुपान-
वैद्य से मिलकर परामर्श लेने के बाद ही सेवन करें।

🍁 गुण और उपयोग-
• यह रस शीतपित्त (पित्ती निकलना), कोठ (चकत्ते पड़ना) आदि विकारों में उत्तम लाभ करता है ।
• यह पित्त का रेचन और शोधन करके शमन करने में अद्भुत प्रभावशाली है।
• पाण्डु, कामला , हलीमक , उदर रोग , यकृत्, प्लीहा , शोथ , अजीर्ण , कफज गुल्म , अश्मरी आदि विकारों में भी इसके प्रयोग से श्रेष्ठ लाभ होता है ।
• यह तीक्ष्ण एवं उग्र स्वभाववाली होने के कारण इसके सेवन-काल में तीक्ष्ण एवं गरम पदार्थों का परहेज रखना आवश्यक है।

बहुत से मरीजो पर इस औषधि का प्रयोग किया गया है और बेहद सफल परिणाम है इस औषधि के। यदि किसी को भी समस्या है तो वैद्य के परामर्श से इसका सेवन करे तो लाभ होगा।
आज की जानकारी अच्छी लगी तो शेयर जरूर करे और पेज को लाइक करे।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
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#एलर्जी

सुबह उठते ही गर्म पानी पीने की आदत आजकल बहुत आम हो गई है। लोग इसे वजन घटाने, पेट साफ करने और शरीर को डिटॉक्स करने का आसा...
01/02/2026

सुबह उठते ही गर्म पानी पीने की आदत आजकल बहुत आम हो गई है। लोग इसे वजन घटाने, पेट साफ करने और शरीर को डिटॉक्स करने का आसान उपाय मानते हैं।

🍁 आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान—दोनों मानते हैं कि सही मात्रा और सही तापमान में लिया गया गुनगुना पानी शरीर के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन इसे बिना समझे अपनाना कभी-कभी नुकसान भी कर सकता है।

👉 रात भर सोने के बाद हमारा पाचन तंत्र सुस्त रहता है। ऐसे में सुबह खाली पेट हल्का गुनगुना पानी पीने से जठराग्नि सक्रिय होती है, जिससे पाचन सुधरता है और कब्ज, गैस व भारीपन जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।
👉 आयुर्वेद में इसे अग्नि को प्रज्वलित करने वाला और आम (विषैले तत्व) को बाहर निकालने में सहायक माना गया है। इसी कारण कई लोगों को कुछ ही दिनों में पेट साफ होने का अनुभव होने लगता है।
👉 गर्म पानी शरीर के मेटाबॉलिज्म को भी थोड़ी गति देता है, जिससे वजन घटाने की प्रक्रिया में सहायता मिल सकती है। यह चर्बी को सीधे नहीं पिघलाता, लेकिन भूख को संतुलित करता है और शरीर की आंतरिक क्रियाओं को बेहतर बनाता है। यही कारण है कि डाइट और हल्के व्यायाम के साथ लिया गया गुनगुना पानी वजन नियंत्रण में मददगार हो सकता है।
👉 सर्दी, खांसी और बलगम की समस्या में भी सुबह गर्म पानी राहत देता है। यह गले में जमा कफ को ढीला करता है और सांस की नलियों को साफ करने में मदद करता है। कई लोगों को सुबह की जकड़न, सिर भारी लगना या नाक बंद रहने की शिकायत में भी इससे आराम मिलता है। बेहतर रक्त संचार के कारण मांसपेशियों का तनाव कम होता है और शरीर हल्का महसूस करता है।

🍁 हालाँकि, रोज सुबह गर्म पानी पीना हर किसी के लिए फायदेमंद हो—यह जरूरी नहीं।
• बहुत ज्यादा गर्म पानी पीने से गले और भोजन नली को नुकसान पहुँच सकता है।
• पित्त प्रकृति वाले लोगों में इससे सीने में जलन, एसिडिटी और मुंह में छाले बढ़ सकते हैं।
• इसी तरह खाली पेट बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने से कमजोरी या इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन की समस्या भी हो सकती है।

निष्कर्ष यही है कि सुबह गर्म पानी पीना तभी लाभकारी है जब वह हल्का गुनगुना हो और सीमित मात्रा में लिया जाए। अपनी प्रकृति, उम्र और किसी भी पुरानी बीमारी को ध्यान में रखते हुए ही इस आदत को अपनाना सबसे समझदारी भरा कदम है। ज्यादा जानकारी के लिए नजदीकी वैद्य से संपर्क करें।

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45 वर्ष के रमेश जी जो ऑफिस में बैठकर काम करते थे, रोज़ सुबह ब्रेड-बटर और शाम को समोसा या बिस्किट लेते थे। उन्हें धीरे-धी...
01/02/2026

45 वर्ष के रमेश जी जो ऑफिस में बैठकर काम करते थे, रोज़ सुबह ब्रेड-बटर और शाम को समोसा या बिस्किट लेते थे। उन्हें धीरे-धीरे कब्ज की शिकायत होने लगी। शुरू में 2–3 दिन में एक बार शौच होता था, फिर गैस, पेट फूलना और सीने में जलन रहने लगी।
जाँच में कोई बड़ी बीमारी नहीं निकली, लेकिन उनकी डाइट हिस्ट्री में मैदा की मात्रा बहुत अधिक थी। जब मैदा बंद कराकर साबुत अनाज और फाइबर बढ़ाया गया, तो 3–4 हफ्तों में बिना किसी दवा के उनकी कब्ज और गैस में स्पष्ट सुधार दिखा।

मैदा (Refined Wheat Flour) देखने में सफेद, मुलायम और स्वाद में हल्का होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह गेहूँ का सबसे कम पौष्टिक रूप है।
गेहूँ को जब मैदा बनाया जाता है, तब उसके बाहरी छिलके (Bran) और अंकुर (Germ) को पूरी तरह हटा दिया जाता है। शोध बताते हैं कि इन्हीं हिस्सों में फाइबर, विटामिन-B समूह, आयरन, जिंक और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। परिणामस्वरूप मैदा लगभग शुद्ध स्टार्च (Refined Carbohydrate) बन जाता है, जिसमें ऊर्जा तो होती है लेकिन शरीर को नियंत्रित करने वाले पोषक तत्व नहीं होते।
👉 Journal of Nutrition और BMJ में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार रिफाइंड अनाज का अधिक सेवन पाचन तंत्र और मेटाबॉलिज़्म दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

🔥 क्यो है मैदा नुकसानदेह:-
वैज्ञानिक रूप से मैदा पेट के लिये इसलिए नुकसानदायक माना जाता है क्योंकि इसमें डायटरी फाइबर लगभग शून्य होता है। फाइबर आंतों की गति (intestinal motility) को बनाए रखता है, लेकिन मैदा फाइबर रहित होने के कारण आंतों को सुस्त कर देता है।
👉 American Journal of Gastroenterology में प्रकाशित रिसर्च बताती है कि कम फाइबर वाला भोजन कब्ज, गैस, और पेट फूलने (bloating) की समस्या को बढ़ाता है। मैदा पेट में जाकर जल्दी ग्लूकोज़ में बदल जाता है, जिससे न केवल पाचन धीमा होता है बल्कि आंतों में गैस बनाने वाले बैक्टीरिया भी सक्रिय हो जाते हैं।
👉 मैदा का एक बड़ा नुकसान इसका High Glycemic Index (GI) है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार मैदा से बने खाद्य पदार्थ (जैसे ब्रेड, नूडल्स, पिज़्ज़ा, बिस्किट) ब्लड शुगर को बहुत तेज़ी से बढ़ाते हैं।
👉 Diabetes Care जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स इंसुलिन स्पाइक्स पैदा करते हैं, जिससे लंबे समय में डायबिटीज, फैटी लिवर और मोटापा बढ़ता है। यही कारण है कि मैदा को “खाली कैलोरी” (Empty Calories) कहा जाता है।

🔥 इन रोगों में नही खाना चाहिए :-
👉 IBS (Irritable Bowel Syndrome) के मरीजों में मैदा और भी ज़्यादा नुकसान कर सकता है। शोध बताते हैं कि रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स आंतों में Low-grade Inflammation और गैस उत्पादन बढ़ाते हैं, जिससे पेट दर्द, दस्त या कब्ज बार-बार होता है।
👉 इसी तरह बवासीर, फिशर और पाइल्स के मरीजों में मैदा कब्ज को बढ़ाकर रोग को गंभीर बना सकता है। World Journal of Gastroenterology के अनुसार फाइबर-रहित भोजन पाइल्स के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है।
👉 हालाँकि वैज्ञानिक रूप से यह भी स्वीकार किया गया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में मैदा अस्थायी रूप से दिया जा सकता है। जैसे तीव्र दस्त (Acute Diarrhea) में जब आंतों को आराम देना हो, या सर्जरी के तुरंत बाद जब हल्का और कम फाइबर वाला आहार जरूरी हो। लेकिन शोध स्पष्ट कहते हैं कि यह लंबे समय तक सेवन योग्य भोजन नहीं है।

Dr Ajay Gupta
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किडनी की सेहत समझने के लिए आज सबसे भरोसेमंद पैरामीटर माना जाता है eGFR (Estimated Glomerular Filtration Rate)। आसान शब्द...
31/01/2026

किडनी की सेहत समझने के लिए आज सबसे भरोसेमंद पैरामीटर माना जाता है eGFR (Estimated Glomerular Filtration Rate)।
आसान शब्दों में कहें तो eGFR यह बताता है कि आपकी किडनी एक मिनट में खून को कितनी अच्छी तरह साफ कर पा रही है। यह रिपोर्ट सीधे-सीधे नहीं मापा जाता, बल्कि सीरम क्रिएटिनिन, उम्र, लिंग और कभी-कभी शरीर की बनावट को ध्यान में रखकर गणना की जाती है।
जितना ज्यादा eGFR, उतनी बेहतर किडनी की कार्यक्षमता।

👉 सामान्यतः 90 या उससे ऊपर eGFR को लगभग सामान्य माना जाता है, जबकि इसका लगातार कम होना किडनी की कमजोरी की ओर इशारा करता है।
👉 आज का पोस्ट उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है जो ब्लड प्रेशर, डायबिटीज जैसे रोगों से परेशान है। यदि आपको या किसी परिचित को ऐसी समस्या है तो नजदीकी वैद्य से मिलकर परामर्श जरूर ले। मुझसे परामर्श लेना हो तो व्हाट्सएप करे।
इस पोस्ट को बढिया लगे तो लाइक करे और शेयर करे जिससे औरों तक यह जानकारी पहुंच सके। तो चलिए वापस आते है टॉपिक पर ...

45 साल के एक मरीज रिपोर्ट लेकर आए और बोले – “डॉक्टर साहब, क्रिएटिनिन तो 1.6 है, ज्यादा नहीं लगता, फिर सब लोग इतना क्यों डरा रहे हैं?”
जब उनकी रिपोर्ट ध्यान से देखी गई, तो eGFR सिर्फ 42 था। मरीज को सूजन नहीं थी, पेशाब भी ठीक लग रहा था, इसलिए उन्हें लगता था कि सब नॉर्मल है।
यही सबसे बड़ी दुविधा होती है – किडनी की बीमारी अक्सर बिना लक्षण के चुपचाप बढ़ती है।
जब समझ आता है, तब काफी नुकसान हो चुका होता है।
जब मरीज पूछता है – “डॉक्टर साहब, मेरी किडनी कितनी खराब है?” तो असली जवाब सिर्फ क्रिएटिनिन से नहीं, बल्कि eGFR के स्टेज देखकर मिलता है।

🔥 किडनी की बीमारी की Grading :-
किडनी की कार्यक्षमता को समझने के लिए eGFR के आधार पर उसे अलग-अलग स्टेज / ग्रेड में बांटा गया है। इसी grading से यह पता चलता है कि किडनी कितनी सुरक्षित है, कितनी कमजोर हो चुकी है और आगे कितना खतरा है।

1️⃣ Stage 1 – Normal या Almost Normal Kidney Function
👉 इस स्टेज में eGFR 90 या उससे अधिक रहता है। किडनी की सफाई क्षमता लगभग सामान्य होती है, लेकिन कई बार पेशाब में प्रोटीन, शुगर या BP की समस्या मौजूद हो सकती है। मरीज को आमतौर पर कोई लक्षण नहीं होते, इसलिए बीमारी अक्सर पकड़ में नहीं आती। यही वह स्टेज है जहाँ सावधानी से आगे की खराबी को रोका जा सकता है।

2️⃣ Stage 2 – Mild Kidney Damage
👉 जब eGFR 60–89 के बीच होता है, तब किडनी की क्षमता हल्की कम मानी जाती है। लेकिन यही वह समय होता है जब डायबिटीज, हाई BP, दर्द की दवाइयाँ या गलत खान-पान किडनी को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचा रहे होते हैं।

3️⃣ Stage 3 – Moderate Kidney Damage
👉 इस ग्रेड को दो भागों में समझा जाता है।
3A: eGFR 45–59 – शुरुआती मध्यम कमजोरी
3B: eGFR 30–44 – स्पष्ट मध्यम कमजोरी
इस स्टेज में थकान, सूजन, पेशाब में बदलाव जैसे लक्षण शुरू हो सकते हैं।

4️⃣ Stage 4 – Severe Kidney Damage
👉 जब eGFR 15–29 तक गिर जाता है, तब किडनी काफी हद तक खराब हो चुकी होती है। इस स्टेज में एनीमिया, सूजन, भूख न लगना, कमजोरी, BP कंट्रोल न होना जैसी समस्याएँ आम हो जाती हैं। यहाँ से आगे बढ़ने पर डायलिसिस की तैयारी पर चर्चा शुरू होती है।

5️⃣ Stage 5 – Kidney Failure / ESRD
👉 इस अंतिम ग्रेड में eGFR 15 से कम हो जाता है। किडनी शरीर का कचरा साफ नहीं कर पाती। मरीज को उल्टी, सांस फूलना, ज्यादा सूजन, पेशाब बहुत कम या बंद होने जैसी गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं। इस स्टेज में डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट जीवन रक्षक विकल्प बन जाते हैं।

👉 किडनी की grading सिर्फ डराने के लिए नहीं होती, बल्कि सही समय पर इलाज और जीवनशैली बदलकर किडनी को फेल होने से बचाने का मौका देती है। जितनी जल्दी eGFR की गिरावट पकड़ी जाए, उतना ही बेहतर भविष्य संभव है।

👉 इसलिए किडनी की सही स्थिति जानने के लिए सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि eGFR, यूरिन टेस्ट (प्रोटीन/एल्ब्यूमिन), BP, शुगर और समय-समय पर फॉलो-अप जरूरी है।
सही समय पर डाइट, दवा और जीवनशैली सुधार से किडनी को और बिगड़ने से रोका जा सकता है। याद रखिए – eGFR डराने के लिए नहीं, बचाने के लिए होता है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
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31/01/2026

IBD या IBS
देखिये पूरा वीडियो

अक्सर IBS से पीड़ित मरीज यह बात कहते-कहते थक जाते हैं कि “मेरी रिपोर्ट नॉर्मल है, फिर भी मुझे रोज़ परेशानी क्यों होती है...
31/01/2026

अक्सर IBS से पीड़ित मरीज यह बात कहते-कहते थक जाते हैं कि “मेरी रिपोर्ट नॉर्मल है, फिर भी मुझे रोज़ परेशानी क्यों होती है?”
इसी सवाल के साथ एक और दर्द जुड़ जाता है, जब डॉक्टर या आसपास के लोग कह देते हैं कि “आप तो मानसिक रोगी हो गए हो।”
यह बात सुनकर मरीज खुद पर शक करने लगता है, जबकि उसकी तकलीफ बिल्कुल असली होती है।

पिछले दिनों एक मरीज , रवि (उम्र 36 वर्ष) पिछले पाँच साल से पेट की समस्या झेल रहे हैं। कभी सुबह ऑफिस निकलते समय अचानक पेट में मरोड़, कभी मीटिंग के बीच टॉयलेट जाने की मजबूरी। कई बार ऐसा हुआ कि रास्ते में पसीना छूट गया, दिल तेज़ धड़कने लगा और मन में डर बैठ गया कि कहीं पेट खराब न हो जाए। उन्होंने गैस, दस्त, कब्ज—सब कुछ झेला, लेकिन हर जाँच रिपोर्ट नॉर्मल आई।

इसके पहले कुछ डॉक्टरों को दिखाया भी था, रिपोर्ट नॉर्मल आते ही डॉक्टरों ने कहा, “सब ठीक है, आप बहुत सोचते हो। यह सब मेंटल स्ट्रेस की वजह से है।”
रवि के लिए यह लाइन किसी दवा से ज़्यादा भारी थी। वह सोचने लगे—अगर यह मानसिक है, तो क्या उनका दर्द झूठा है? क्या पेट में होने वाली ऐंठन, बार-बार शौच की बेचैनी, और हर समय पेट पर ध्यान जाना सिर्फ कल्पना है?

👉 असल सच्चाई यह है कि IBS कोई मानसिक बीमारी नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें आंतें दिखने में ठीक होती हैं, लेकिन उनका काम करने का तरीका बिगड़ जाता है।
👉 IBS में दिमाग और पेट के बीच का तालमेल गड़बड़ा जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में Gut-Brain Axis कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि मरीज पागल है, बल्कि यह कि उसका नर्वस सिस्टम ज़्यादा संवेदनशील हो गया है।

👉 जब मरीज तनाव, डर या चिंता में रहता है, तो सबसे पहले उसका असर पेट पर पड़ता है। पेट में मरोड़, गैस, दस्त या कब्ज बढ़ जाते हैं। यही वजह है कि IBS के लक्षण भावनात्मक स्थिति के साथ ऊपर-नीचे होते रहते हैं।
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि बीमारी मन का वहम है। लक्षण असली होते हैं, दर्द असली होता है, और परेशानी भी असली होती है।

🍁 आयुर्वेद में IBS जैसी स्थिति को ग्रहणी रोग कहा गया है। आयुर्वेद पहले से ही मानता है कि चिंता, भय और मानसिक तनाव सीधे पाचन अग्नि को कमजोर करते हैं। यानी आयुर्वेद भी यह स्वीकार करता है कि यह बीमारी सिर्फ पेट की नहीं, बल्कि पूरे शरीर और मन के संतुलन की है।
रवि की हालत तब सुधरनी शुरू हुई जब उनसे साफ कहा—“आप मेंटल नहीं हैं। आपकी समस्या असली है, बस इसका इलाज सिर्फ दवा से नहीं होगा।”
उनके खान-पान का समय ठीक किया गया, भारी और अनियमित भोजन कम किया गया, नींद सुधारी गई और रोज़ थोड़ा योग-प्राणायाम जोड़ा गया।
कुछ महीनों में बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं हुई, लेकिन अब वह उनके काबू में थी।
आख़िर में हर IBS मरीज को यह समझना ज़रूरी है कि IBS कमजोरी नहीं है और न ही पागलपन।
यह एक संवेदनशील पाचन तंत्र की बीमारी है, जिसमें शरीर और मन दोनों का ध्यान रखना पड़ता है।
मरीज को आयुर्वेद की दवा जिसमे पेट के साथ साथ चिंता और तनाव की भी शामिल होती है, देनी पड़ती हैं। नियमित योग और प्राणायाम का भी अभ्यास करना होता है।

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शुगर के मरीजों के बीच एक बात बहुत आम है। जैसे ही रिपोर्ट में डायबिटीज़ लिखी आती है, घर में सबसे पहले चीनी की डिब्बी हटती...
31/01/2026

शुगर के मरीजों के बीच एक बात बहुत आम है। जैसे ही रिपोर्ट में डायबिटीज़ लिखी आती है, घर में सबसे पहले चीनी की डिब्बी हटती है और आलू की सब्ज़ी बंद हो जाती है। मन में एक तसल्ली बैठ जाती है कि “अब तो शुगर कंट्रोल में आ जाएगी।” लेकिन असलियत इससे काफी अलग है। डायबिटीज़ सिर्फ मिठास की बीमारी नहीं है, यह पूरे खाने के पैटर्न से जुड़ी बीमारी है।
👉 पिछले पोस्ट में जिसमे मैंने डाइट चार्ट बताई है उसके बाद बहुत से लोगो के मैसेज आये की डायबिटीज के मरीज चावल कैसे खा सकते है, इसलिए आज की पोस्ट लिख रहा हूँ। यह पोस्ट ठीक लगे तो लाइक जरूर कीजिए और अधिक से अधिक शेयर कीजिए।

रमेश जी, उम्र 48 वर्ष, जब पहली बार दिखाने आये तो उन्होंने बड़े भरोसे से कहा—
“डॉक्टर साहब, मैंने चीनी पूरी तरह छोड़ दी है, आलू भी नहीं खाता। अब बस दवा से शुगर ठीक हो जाएगी ना?”
मैंने उनसे एक ही सवाल पूछा—
“आप दिन में क्या-क्या खाते हैं?”

उन्होंने बताया -
सुबह चाय बिना चीनी के पीते थे, लेकिन साथ में बिस्किट जरूर होते थे। दोपहर में पेट भरकर चावल, ऊपर से थोड़ा सा दाल। शाम को भूख लगी तो नमकीन। उन्हें लगता था कि क्योंकि इनमें मीठा स्वाद नहीं है, इसलिए शुगर नहीं बढ़ेगी। यही सोच सबसे बड़ी भूल है।

हकीकत यह है कि डायबिटीज़ में सिर्फ चीनी और आलू ही नहीं, बल्कि सफेद चावल, मैदा, बिस्किट, नमकीन, पैकेट वाला जूस और ज्यादा मात्रा में रोटी भी शुगर तेजी से बढ़ाते हैं।
कारण यह है कि ये सभी शरीर में जाकर ग्लूकोज में बदलते हैं, भले ही इनका स्वाद मीठा न लगे।

अब सवाल उठता है—
🤔 क्या शुगर का मरीज चावल खा सकता है?
इस सवाल से हर भारतीय जुड़ा है, क्योंकि हमारे भोजन की थाली चावल के बिना अधूरी लगती है। इसका जवाब है— हाँ, लेकिन सही तरीके से।
👉 समस्या चावल नहीं है, समस्या है सफेद चावल और उसकी मात्रा। जब कोई मरीज बड़ी प्लेट में सफेद चावल खाता है, बिना पर्याप्त सब्ज़ी या प्रोटीन के, तो शुगर का बढ़ना लगभग तय है। लेकिन अगर वही चावल समझदारी से खाया जाए, तो नुकसान नहीं करता।

डायबिटिक मरीज अगर ब्राउन राइस या हाफ पॉलिश्ड चावल चुने, मात्रा आधी कटोरी तक सीमित रखे और उसके साथ भरपूर सब्ज़ी, दाल या दही ले, तो शुगर पर उसका असर बहुत कम हो जाता है।
इसके साथ अगर खाने के बाद 10–15 मिनट हल्की वॉक जोड़ दी जाए, तो शरीर उस शुगर को बेहतर तरीके से उपयोग कर लेता है।

🍁 आयुर्वेद भी यही बात हजारों साल पहले कह चुका है। मधुमेह को आयुर्वेद में प्रमेह कहा गया है, जो सिर्फ मिठास से नहीं, बल्कि अधिक, भारी और गलत समय पर भोजन से होता है। इसलिए आयुर्वेद में जौ, कोदो, सांवा जैसे मोटे अनाज, मेथी दाना, हल्का और नियमित भोजन विशेष रूप से बताया गया है।

आख़िर में यही कहना सही होगा कि
डायबिटीज़ में सवाल “क्या खाएँ” नहीं है,
सवाल है “कितना, कब और कैसे खाएँ।”

👉 डायबिटीज़ में सिर्फ आलू और चीनी ही दुश्मन नहीं होते।
👉 असली दुश्मन है कार्बोहाइड्रेट का गलत चयन और मात्रा।
ये चीज़ें भी शुगर बढ़ाती हैं:
सफेद चावल
मैदा, पराठा, पूरी
बिस्किट, नमकीन
पैकेट वाले जूस
ज्यादा मात्रा में फल भी

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इलाज संबंधित सलाह के लिए व्हाट्सएप कर सकते है। रोज हजारों मेसेज आते है, इसलिए कृपया धैर्य बनाये रखें।

30/01/2026

मधुमेह सिर्फ “शुगर बढ़ना” नहीं है, यह एक साइलेंट बीमारी है जो नसों, आँखों, किडनी और दिल को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाती है। सही समय पर जाँच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और तनाव नियंत्रण से मधुमेह को काबू में रखा जा सकता है। याद रखें—फास्टिंग, PP और HbA1c तीनों जाँच ज़रूरी हैं, सिर्फ एक पर भरोसा करना सही नहीं।

#मधुमेह









डायबिटीज के मरीजो की बहुत ज्यादा डिमांड थी डाइट चार्ट की। हर दिन कम से कम 100 लोगो का व्हाट्सएप मेसेज आ रहा था। इसलिए एक...
30/01/2026

डायबिटीज के मरीजो की बहुत ज्यादा डिमांड थी डाइट चार्ट की। हर दिन कम से कम 100 लोगो का व्हाट्सएप मेसेज आ रहा था। इसलिए एक सामान्य डाइट चार्ट यहां दे रहा हूं, जरूरत के अनुसार इसमे थोड़ा बहुत चेंज कर सकते है। यह एक सामान्य व्यक्ति के लिए है जो ना बहुत मोटे हो और ना बहुत पतले हो। प्रेस्क्रिप्शन के लिए भी बहुत ज्यादा मेसेज आते है। इसलिए जवाब देने में कई बार देरी हो जाती है। कृपया धैर्य बनाये रखें। अपॉइंटमेंट जरूर बुक कर लें जिससे समस्या ना हो।

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

1800 कैलोरी डायबिटिक डाइट चार्ट
(डायबिटीज रोगियों के लिए | प्रोटीन ~58 ग्राम)

🌅 सुबह (Early Morning)
• गुनगुना पानी – 1 गिलास
(यदि डॉक्टर ने पानी कम लेने को कहा हो तो मात्रा घटाएँ)
• चाय / कॉफी – 1 कप
👉 बिना चीनी
👉 गाय का दूध 25–30 ml

🍳 नाश्ता (Breakfast)
• दूध / दही – 200 ml
(गाय का दूध या टोंड मिल्क)
निम्न में से कोई एक विकल्प चुनें (तेल और आलू बिना):
• पोहा – 2 कटोरी
• रवा उपमा – 2 कटोरी
• दलिया उपमा – 2 कटोरी
• सादा दलिया – 1 कटोरी
• स्टफ रोटी – 1 (बिना तेल)
• इडली-सांभर – 3 इडली + सांभर
• डोसा-सांभर – 3 छोटे डोसे + सांभर
• पेसरट्टू-सांभर – 3 छोटे
• ढोकला (बिना वघार) – 6–7 पीस
• मुठिया (बिना वघार) – 7–8 पीस
• अंडे का सफेद भाग – 2 (बिना तेल) +
👉 2 छोटी स्लाइस होल व्हीट ब्रेड
• ओट्स पोरीज (चोकर सहित) – 1 कटोरी
• व्हीट फ्लेक्स – 1 कटोरी
• व्हीट फ्लेक्स + फल – 1 कटोरी

🍎 मध्य-सुबह (Mid Morning)
• फल – 1 नग
(सेब, पपीता, अमरूद जैसे लो GI फल)

🍛 दोपहर का भोजन (Lunch)
• सलाद / वेज रायता / कोशिंबीर – भरपूर
• रोटी – 3 छोटी
• चावल – 1 कटोरी या 1 रोटी अतिरिक्त
• सब्जी – 1 कटोरी (आलू से परहेज करें)
• दाल / अंकुरित दाल / उसल / कढ़ी (बिना पकोड़े) – 2 कटोरी
या
• मछली / चिकन / अंडा – 2 मध्यम पीस
• दही – 200 ml

☕ दोपहर बाद (Mid Afternoon)
• चाय / कॉफी – 1 कप
👉 बिना चीनी
👉 25–30 ml दूध
• साथ में (कोई एक): चना कुरमुरा/ छोटा खाखरा /सूखा भेल (सेव बिना) – 2 कटोरी

🍊 शाम (Mid Evening)
• फल – 1 नग
❌ इन फलों से बचें:
केला, चीकू, अंगूर, आम, कस्टर्ड एप्पल

🌙 रात का खाना (Dinner)
• सूप – 1 कटोरी
(साफ सूप, बिना मक्खन/व्हाइट सॉस, छाना हुआ नहीं)
• सलाद / वेज रायता / कोशिंबीर – भरपूर
• रोटी – 2
• सब्जी – 1 कटोरी
(आलू से परहेज)
• दाल / अंकुरित दाल / उसल / कढ़ी (बिना पकोड़े) – 1 कटोरी
या
• मछली / चिकन / अंडा – 1 मध्यम पीस

🥛 सोते समय (Bed Time)
• दूध – 150 ml

⚠️ जरूरी निर्देश (NOTE)
• रोटी:
👉 नींबू के आकार के आटे से
👉 बिना तेल / घी
• तेल की मात्रा:
👉 कुल 15 ग्राम/दिन
👉 (3 छोटी चम्मच या 1 बड़ा चम्मच)
👉 ऑलिव ऑयल / राइस ब्रान ऑयल / मूंगफली का तेल
• खाना बनाते समय
❌ नारियल (सूखा/ताजा),
❌ मूंगफली,
❌ अन्य ड्राई फ्रूट्स,
❌ क्रीम,
❌ मक्खन से बचें
• नमक:
👉 1 छोटी चम्मच/दिन/व्यक्ति

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
Whatsapp No 8299302319
YouTube - Arogya Street

मधुमेह सिर्फ “शुगर बढ़ना” नहीं है, यह एक साइलेंट बीमारी है जो नसों, आँखों, किडनी और दिल को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाती है।...
30/01/2026

मधुमेह सिर्फ “शुगर बढ़ना” नहीं है, यह एक साइलेंट बीमारी है जो नसों, आँखों, किडनी और दिल को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाती है। सही समय पर जाँच, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और तनाव नियंत्रण से मधुमेह को काबू में रखा जा सकता है। याद रखें—फास्टिंग, PP और HbA1c तीनों जाँच ज़रूरी हैं, सिर्फ एक पर भरोसा करना सही नहीं।
पढ़िए पूरी खबर....

#मधुमेह

जब लिवर में ज़रूरत से ज़्यादा चर्बी जमा हो जाती है तो उसे फैटी लिवर कहते हैं। शुरुआती दौर में कोई खास लक्षण नहीं दिखते, ...
30/01/2026

जब लिवर में ज़रूरत से ज़्यादा चर्बी जमा हो जाती है तो उसे फैटी लिवर कहते हैं। शुरुआती दौर में कोई खास लक्षण नहीं दिखते, लेकिन समय पर ध्यान न दिया जाए तो थकान, पेट के दाहिने हिस्से में भारीपन, गैस, वजन बढ़ना, शुगर-BP और आगे चलकर लिवर डैमेज तक हो सकता है। सही डाइट, वजन नियंत्रण, शराब से दूरी और नियमित जांच से फैटी लिवर को रोका और पलटा जा सकता है।
पढ़िये पूरी खबर....

#फैटी_लिवर

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Varanasi
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