Vaidya Dr. Ajay Gupta

Vaidya Dr. Ajay Gupta Official Page of Dr Ajay Gupta. Best Ayurveda Doctor in Eastern UP
M.D. (AY) B.H.U. Varanasi
B.A.M.S. (Govt Ayu College, Varanasi) Gold Medalist
Dip. Former Asst.

Journalism(Online)
Ex.Consultant at Govt Ayu College, Varanasi. Prof. IMS, BHU

किडनी (गुर्दे) हमारे शरीर का प्राकृतिक फिल्टर हैं। जब किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है — जिसे मेडिकल भाषा में Chronic ...
03/03/2026

किडनी (गुर्दे) हमारे शरीर का प्राकृतिक फिल्टर हैं। जब किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है — जिसे मेडिकल भाषा में Chronic Kidney Disease या एंड स्टेज में Kidney Failure कहा जाता है — तब शरीर में यूरिया, क्रिएटिनिन, पोटैशियम और अतिरिक्त पानी जमा होने लगता है।
ऐसे में सही आहार (Renal Diet) दवा जितना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।

किडनी फेलियर यानी गुर्दों की कमजोरी एक ऐसी स्थिति है जिसमें हमारे शरीर का प्राकृतिक “फिल्टर सिस्टम” ठीक से काम नहीं कर पाता।
सामान्य व्यक्ति की किडनी रोज़ खून को साफ करके यूरिया, क्रिएटिनिन, अतिरिक्त नमक और पानी को पेशाब के माध्यम से बाहर निकाल देती है।
लेकिन जब यह क्षमता कम हो जाती है - तब शरीर में गंदे पदार्थ जमा होने लगते हैं। यही कारण है कि ऐसे मरीजों के लिए दवा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी सही भोजन भी है।
1️⃣ नमक:-
सबसे पहले समझिए कि किडनी के मरीजों को नमक क्यों कम करना चाहिए। जब किडनी कमजोर होती है, तो वह अतिरिक्त नमक और पानी को बाहर नहीं निकाल पाती।
परिणामस्वरूप शरीर में सूजन आ जाती है, पैरों में पानी भर जाता है, ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और सांस फूलने लगती है। यदि मरीज नमकीन, अचार, पापड़, चिप्स और पैकेट वाले खाद्य पदार्थ खाते रहते हैं, तो शरीर में पानी और नमक जमा होता रहेगा और किडनी पर और ज्यादा दबाव पड़ेगा। इसलिए नमक कम खाना किडनी को “आराम” देने जैसा है।

2️⃣ प्रोटीन:-
अब बात करते हैं प्रोटीन की। सामान्य व्यक्ति को प्रोटीन की बहुत जरूरत होती है क्योंकि शरीर की मरम्मत और मांसपेशियों के लिए यह आवश्यक है। लेकिन जब हम दाल, राजमा, छोले, पनीर या मांस खाते हैं तो उनके पाचन के बाद जो अपशिष्ट बनता है (यूरिया), उसे बाहर निकालने का काम किडनी करती है।
यदि किडनी पहले से कमजोर है और हम बहुत अधिक प्रोटीन खा लेते हैं, तो यूरिया तेजी से बढ़ने लगता है और मरीज को उल्टी, कमजोरी, भूख न लगना जैसी समस्याएँ होने लगती हैं।
इसलिए सीमित मात्रा में प्रोटीन देना जरूरी होता है ताकि शरीर को जरूरत भी मिले और किडनी पर बोझ भी न पड़े। हालांकि जो मरीज Hemodialysis या Peritoneal Dialysis पर होते हैं, उनकी जरूरत अलग हो सकती है।

3️⃣ पोटैशियम:-
किडनी के मरीजो के लिए पोटैशियम भी एक महत्वपूर्ण तत्व है। यह हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने में मदद करता है, लेकिन जब इसका स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो यह खतरनाक हो सकता है। सामान्यतः किडनी अतिरिक्त पोटैशियम को बाहर निकाल देती है, पर किडनी फेलियर में यह जमा हो जाता है।
केला, संतरा, नारियल पानी, आलू और टमाटर जैसे खाद्य पदार्थों में पोटैशियम अधिक होता है।
यदि मरीज इन्हें अधिक मात्रा में खाता है, तो खून में पोटैशियम अचानक बढ़ सकता है और हृदय गति अनियमित हो सकती है।
यही कारण है कि सब्जियों को काटकर पानी में भिगोकर उबालने और उसका पानी फेंकने की सलाह दी जाती है — इससे पोटैशियम कुछ हद तक कम हो जाता है।

4️⃣ लिक्विड डाइट :-
किडनी के मरीजों में तरल पदार्थ (पानी, दूध, छाछ, सूप) भी सोच-समझकर लेने चाहिए। जब पेशाब कम बनता है तो शरीर में अतिरिक्त पानी जमा हो जाता है। इससे सूजन और फेफड़ों में पानी भरने का खतरा होता है।
इसलिए डॉक्टर मरीज की स्थिति देखकर तय करते हैं कि दिनभर में कितना पानी लेना सुरक्षित है। यहाँ “ज्यादा पानी पीना हमेशा अच्छा है” वाला नियम लागू नहीं होता।

5️⃣ भोजन:-
अब प्रश्न आता है कि किडनी के मरीजो को क्या खाना चाहिए?
किडनी के मरीजों को ऐसा भोजन देना चाहिए जिससे शरीर को ऊर्जा मिले लेकिन किडनी पर अधिक बोझ न पड़े।
सफेद चावल, गेहूं की रोटी, सूजी, पोहा जैसे अनाज ऊर्जा देते हैं और अपेक्षाकृत सुरक्षित होते हैं।
लौकी, तोरी, परवल जैसी हल्की सब्जियाँ कम पोटैशियम वाली होती हैं, इसलिए नियंत्रित मात्रा में दी जा सकती हैं। सेब, नाशपाती और पपीता जैसे फल सीमित मात्रा में सुरक्षित माने जाते हैं।
भोजन हल्का, कम नमक वाला और ताज़ा बना हुआ होना चाहिए।

सरल शब्दों में समझें तो किडनी फेलियर में आहार का सिद्धांत यह है — “जो चीज शरीर में जमा होकर किडनी को निकालनी पड़ती है, उसे कम करें; और जो चीज शरीर को ऊर्जा दे लेकिन किडनी पर कम बोझ डाले, उसे अपनाएँ।”

सही आहार से सूजन कम होती है, यूरिया नियंत्रित रहता है, हार्ट की जटिलताएँ घटती हैं और मरीज का जीवन अपेक्षाकृत बेहतर रहता है।
किडनी के मरीज के लिए भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
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होली पर स्वादिष्ट पकवानों की भरमार – गुजिया, दही-बड़े, पूड़ी, कचौरी, मिठाइयाँ और ठंडाई – अक्सर जरूरत से ज्यादा खिला देती...
03/03/2026

होली पर स्वादिष्ट पकवानों की भरमार – गुजिया, दही-बड़े, पूड़ी, कचौरी, मिठाइयाँ और ठंडाई – अक्सर जरूरत से ज्यादा खिला देती हैं। लेकिन अगले ही दिन कई लोग पेट से जुड़ी समस्याओं के साथ क्लिनिक पहुँचते हैं।
आइए समझते हैं कि पाचन संबंधी कौन-कौन सी परेशानियाँ हो सकती हैं और उनसे कैसे बचें।

🍽️ खाने के बाद होने वाली सामान्य समस्याएँ

1. अपच (Indigestion)
भारी, तला-भुना और मीठा भोजन अधिक मात्रा में लेने से पेट में भारीपन, डकार, गैस और बेचैनी होती है।

2. एसिडिटी और सीने में जलन
अत्यधिक मसालेदार और तैलीय भोजन पेट में अम्ल (acid) बढ़ाता है, जिससे सीने में जलन और खट्टे डकार आते हैं।

3. गैस और पेट फूलना
मिठाइयाँ, मैदा और तले खाद्य पदार्थ आँतों में किण्वन बढ़ाते हैं, जिससे पेट फूलता है।

4. दस्त या उल्टी
यदि खाना बासी या दूषित हो तो फूड पॉइज़निंग जैसे लक्षण हो सकते हैं।

5. ब्लड शुगर का बढ़ना
ज्यादा मिठाई खाने से डायबिटीज मरीजों में शुगर अचानक बढ़ सकती है।

⚠️ किन लोगों को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?
• डायबिटीज के मरीज
• हाई ब्लड प्रेशर वाले मरीज
• फैटी लिवर या गैस्ट्राइटिस से पीड़ित व्यक्ति
• बुजुर्ग और बच्चे

🏥 क्या करें अगर ज्यादा खा लिया हो?
✔ 1. तुरंत न लेटें
खाने के बाद 20–30 मिनट हल्की वॉक करें।
✔ 2. गुनगुना पानी पिएँ
यह पाचन में मदद करता है।
✔ 3. हल्का भोजन लें
अगले 1–2 समय खिचड़ी, दलिया या सूप लें।
✔ 4. घरेलू उपाय
• सौंफ चबाएँ
• अजवाइन + काला नमक
• अदरक का छोटा टुकड़ा
✔ 5. जरूरत पड़े तो डॉक्टर से संपर्क करें
यदि लगातार उल्टी, तेज पेट दर्द, बुखार या खून वाली दस्त हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलें।

🌿 आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
होली के समय अधिक गुरु (भारी), स्निग्ध (तैलीय) और मधुर (मीठा) आहार लेने से अग्नि मंद हो जाती है, जिससे “आम” बनता है।
ऐसे समय कुछ प्रसिद्ध पाचनवर्धक औषधियाँ उपयोगी मानी जाती हैं।

नीचे प्रमुख आयुर्वेदिक पाचन दवाएँ उनके उपयोग सहित दी जा रही हैं: (वैद्य की सलाह जरूरी)

1️⃣ हिंग्वाष्टक चूर्ण
उपयोग: गैस, पेट फूलना, अपच
कैसे लें: 1–2 ग्राम भोजन के बाद गुनगुने पानी के साथ
किसके लिए अच्छा: पेट दर्द, गैस

2️⃣ अविपत्तिकर चूर्ण
उपयोग: एसिडिटी, सीने में जलन, खट्टी डकार
कैसे लें: 3–5 ग्राम भोजन के बाद
विशेष: पित्तज अपच में लाभकारी

3️⃣ त्रिफला चूर्ण
उपयोग: कब्ज, पेट साफ न होना
कैसे लें: रात में सोते समय 3–5 ग्राम गुनगुने पानी से
विशेष: हल्का रेचक, आंतों की सफाई

4️⃣ चित्रकादि वटी
उपयोग: भूख न लगना, अग्निमांद्य
कैसे लें: 1–2 गोली दिन में 2 बार
विशेष: जठराग्नि को प्रज्वलित करती है

5️⃣ लवण भास्कर चूर्ण
उपयोग: गैस, डकार, भारीपन
कैसे लें: 2–3 ग्राम भोजन के बाद
विशेष: भोजन के बाद तुरंत आराम

🌿 घरेलू सरल उपाय
अजवाइन + काला नमक
सौंफ चबाना
अदरक + नींबू + नमक
जीरा उबालकर पानी पीना

⚠️ सावधानियाँ
गर्भवती महिला, बच्चे और बुजुर्ग डॉक्टर की सलाह से लें
लगातार पेट दर्द, उल्टी, बुखार या खून वाली दस्त हो तो तुरंत चिकित्सक से मिलें
डायबिटीज या हाई BP के मरीज बिना सलाह नियमित सेवन न करें

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
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सुबह का समय था। क्लिनिक खुलते ही लगभग 35 वर्ष के एक व्यक्ति अंदर आए और बैठते ही बोले — “डॉक्टर साहब, पता नहीं मुझे क्या ...
02/03/2026

सुबह का समय था। क्लिनिक खुलते ही लगभग 35 वर्ष के एक व्यक्ति अंदर आए और बैठते ही बोले —
“डॉक्टर साहब, पता नहीं मुझे क्या हो गया है। रोज सुबह 3–4 बार लैट्रिन जाना पड़ता है। एक बार जाने के बाद लगता है साफ हो गया, लेकिन थोड़ी देर में फिर प्रेशर बन जाता है। ऑफिस जाने में भी देर हो जाती है।”
उनकी आवाज़ में झुंझलाहट और चिंता दोनों थीं।

मैंने पूछा — “दर्द होता है क्या? मल ढीला आता है या सामान्य?”

उन्होंने बताया कि कभी पूरी तरह पतला नहीं होता, लेकिन ढीला और अधपका सा रहता है। पेट में हल्की मरोड़ भी होती है, खासकर सुबह के समय। दिन चढ़ने के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
हिस्ट्री लेने पर पता चला कि उन्हें कई महीनों से यह समस्या है। वजन नहीं घटा है, खून नहीं आता, बुखार नहीं होता, लेकिन गैस और पेट फूलना रहता है।
काम का तनाव काफी है, नींद भी पूरी नहीं हो पाती।
सुबह उठते ही चाय पीने की आदत है, और कई बार खाली पेट दो कप चाय हो जाती है।

यह सुनकर मुझे सबसे पहले आंतों के उस प्राकृतिक रिफ्लेक्स का ध्यान आया, जिसे गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स कहते हैं — यानी जैसे ही पेट में कुछ जाता है, आंतें सक्रिय होकर मल त्याग की प्रक्रिया शुरू कर देती हैं।
जिन लोगों में यह रिफ्लेक्स अधिक संवेदनशील होता है, उनमें सुबह बार-बार शौच जाने की प्रवृत्ति दिख सकती है।
जांच की दृष्टि से मैंने उन्हें समझाया कि घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कुछ बेसिक टेस्ट कर लेना चाहिए —
• जैसे CBC,
• स्टूल रूटीन,
• थायरॉइड प्रोफाइल और
• ब्लड शुगर।

अधिकतर मामलों में रिपोर्ट सामान्य आती है और तब यह स्थिति प्रायः Irritable Bowel Syndrome (IBS) से जुड़ी पाई जाती है, जिसमें आंतें संरचनात्मक रूप से ठीक होती हैं, पर उनकी कार्यप्रणाली संवेदनशील हो जाती है।

तनाव, अनियमित भोजन, अधिक चाय-कॉफी, देर रात जागना — ये सभी इसे बढ़ा सकते हैं।
फिर उनको खान पान के बारे में बताया और कुछ आयुर्वेद की दवाएं दी।
दो सप्ताह बाद जब वे फॉलो-अप में आए तो मुस्कुराते हुए बोले — “अब सुबह केवल एक या दो बार जाना पड़ता है, और मन भी शांत है।”

अगर मल में खून नहीं है, तेज वजन कम नहीं हो रहा, रात में नींद से उठकर शौच नहीं जाना पड़ता और तेज दर्द नहीं है, तो यह गंभीर बीमारी की संभावना कम करता है।
परंतु यदि भविष्य में खून दिखे, तेज कमजोरी आए, या उम्र 40 के बाद नई समस्या शुरू हो, तो आगे की जांच जैसे कोलोनोस्कोपी की आवश्यकता हो सकती है।

सुबह उठते ही केवल गुनगुना पानी लें, तुरंत चाय न पिएं। नाश्ता समय पर करें।
अत्यधिक मसालेदार, तला-भुना और बार-बार चाय कम करें।
रात में पर्याप्त नींद लें।
तनाव प्रबंधन के लिए प्राणायाम और हल्का योग

आयुर्वेदिक दृष्टि से यह स्थिति ग्रहणी दोष या पाचन अग्नि की अस्थिरता से मिलती-जुलती है, इसलिए छाछ में भुना जीरा, इसबगोल की उचित मात्रा, और अग्नि को संतुलित करने वाले हल्के उपाय लाभकारी हो सकते हैं।

कई बार समस्या गंभीर बीमारी नहीं होती, बल्कि शरीर की संवेदनशीलता और जीवनशैली का परिणाम होती है। सही मार्गदर्शन, धैर्य और नियमित दिनचर्या से ऐसी परेशानियाँ काफी हद तक नियंत्रित की जा सकती हैं।

Dr Ajay Gupta
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01/03/2026

फैटी लिवर की आयुर्वेदिक औषधि जो काफी बढिया कारगर है ......

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#आरोग्यवर्धिनी

"डॉक्टर साहब… ये कंधा बिल्कुल साथ नहीं दे रहा…"ओपीडी में कुर्सी पर बैठते ही लगभग 50 वर्ष के एक मरीज ने अपना दाहिना हाथ ब...
01/03/2026

"डॉक्टर साहब… ये कंधा बिल्कुल साथ नहीं दे रहा…"
ओपीडी में कुर्सी पर बैठते ही लगभग 50 वर्ष के एक मरीज ने अपना दाहिना हाथ बाएँ हाथ से पकड़कर धीरे से कहा। चेहरे पर दर्द साफ झलक रहा था।
उन्होंने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—
"लगभग 3–4 महीने पहले हल्का-हल्का दर्द शुरू हुआ था। पहले लगा कि शायद सोते समय गलत पोजीशन में हाथ आ गया होगा… या फिर कोई नस चढ़ गई होगी। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।"
कुछ सेकंड रुककर वे फिर बोले—
"लेकिन डॉक्टर साहब, धीरे-धीरे ये दर्द बढ़ता गया। अब हालत ये है कि मैं हाथ ऊपर नहीं उठा पा रहा। पहले जहाँ मैं आराम से शर्ट पहन लेता था, अब वो भी मुश्किल हो गया है। पीछे हाथ ले जाना तो बिल्कुल नामुमकिन सा लगता है।"

डॉक्टर ने शांत स्वर में पूछा—
"कोई चोट लगी थी? गिरना, वजन उठाना, या कोई झटका?"
मरीज ने सिर हिलाया—
"नहीं डॉक्टर साहब, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बस धीरे-धीरे ही शुरू हुआ और बढ़ता गया।"
उन्होंने आगे कहा—
"सबसे ज्यादा दिक्कत रात में होती है। जैसे ही करवट बदलता हूँ, कंधे में तेज दर्द होता है और नींद खुल जाती है। कई बार तो पूरी रात ठीक से सो भी नहीं पाता। अब तो ऐसा लगने लगा है कि कंधा जाम हो गया है।"

डॉक्टर ने फिर पूछा—
"आपको शुगर (डायबिटीज) तो नहीं है?"
मरीज ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"जी डॉक्टर साहब, पिछले कई साल से डायबिटीज है। दवा चल रही है, लेकिन कभी-कभी कंट्रोल ठीक नहीं रहता।"
अब डॉक्टर को तस्वीर साफ होने लगी थी।
उन्होंने मरीज से कहा—
"आप हाथ ऊपर उठाने की कोशिश कीजिए।"
मरीज ने कोशिश की, लेकिन हाथ कंधे से थोड़ा ऊपर जाते ही रुक गया। चेहरे पर दर्द की लकीरें गहरी हो गईं।
"बस डॉक्टर साहब… इससे ज्यादा नहीं उठता। जबरदस्ती करता हूँ तो बहुत दर्द होता है।"

डॉक्टर ने खुद मरीज का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर उठाने की कोशिश की, लेकिन वहाँ भी movement सीमित था। उन्होंने समझाते हुए कहा—
"देखिए, आपको Adhesive Capsulitis है, जिसे आम भाषा में फ्रोजेन शोल्डर कहते हैं। इसमें कंधे का जोड़ धीरे-धीरे सख्त हो जाता है।"

मरीज थोड़ा चिंतित होकर बोला—
"डॉक्टर साहब, ये ठीक हो जाएगा ना? कहीं ऑपरेशन तो नहीं करना पड़ेगा?"
डॉक्टर ने आश्वस्त करते हुए कहा—
"घबराइए नहीं। सही इलाज और एक्सरसाइज से आप जल्दी ठीक हो सकते हैं। ऑपरेशन बहुत कम केस में ही लगता है।"

"डॉक्टर साहब, ये हुआ क्यों? मैंने तो कोई भारी काम भी नहीं किया।"
डॉक्टर ने समझाया—
"इसका कोई एक कारण नहीं होता। डायबिटीज वाले मरीजों में यह ज्यादा देखा जाता है। कभी-कभी बिना किसी चोट के भी शुरू हो जाता है और धीरे-धीरे बढ़ता है।"

"आपको नियमित physiotherapy करनी होगी। कुछ एक्सरसाइज मैं लिख रहा हूँ, इन्हें रोज करना है। दवा से दर्द कम होगा, लेकिन असली सुधार एक्सरसाइज से ही आएगा।"
मरीज ने पूछा—
"कितने दिन में ठीक हो जाऊँगा?"
डॉक्टर ने ईमानदारी से जवाब दिया—
"यह जल्दी ठीक होने वाली बीमारी नहीं है। 6 महीने से 1 साल भी लग सकता है, लेकिन अगर आप नियमित एक्सरसाइज करते रहेंगे तो सुधार जल्दी होगा।"

मरीज ने थोड़ा झिझकते हुए पूछा—
"डॉक्टर साहब… अगर इसका आयुर्वेद से इलाज कराऊँ तो क्या फायदा होगा?"
डॉक्टर मुस्कुराए, कुर्सी के थोड़ा आगे झुककर बोले—
"बहुत अच्छा सवाल है।

आयुर्वेद में इसे केवल कंधे का दर्द नहीं माना जाता, बल्कि यह वात दोष की विकृति का परिणाम होता है। जब शरीर में वात बढ़ जाता है, तो जोड़ों में सूखापन (dryness), जकड़न (stiffness) और दर्द होने लगता है।"

मरीज ध्यान से सुनने लगा…
"आयुर्वेद में इस स्थिति को आमतौर पर Avabahuka कहा जाता है," डॉक्टर ने समझाया।
"इसमें कंधे की गति कम हो जाती है और धीरे-धीरे हाथ उठाना मुश्किल हो जाता है—ठीक वही जो आपको हो रहा है।"
मरीज ने तुरंत कहा—
"हाँ डॉक्टर साहब, बिल्कुल वही हो रहा है मेरे साथ।"
डॉक्टर ने आगे बताया—
"आयुर्वेद में इसका इलाज सिर्फ दर्द कम करने के लिए नहीं होता, बल्कि जकड़न को खोलने और जोड़ को फिर से चलाने पर ध्यान दिया जाता है।"

🍁 आयुर्वेदिक उपचार की शुरुआत :-
"सबसे पहले हम स्नेहन (oil therapy) और स्वेदन (fomentation) से शुरुआत करेंगे।"
मरीज ने पूछा—
"ये कैसे होता है?"
डॉक्टर बोले—
"आपके कंधे पर विशेष औषधीय तेल से मालिश की जाएगी—इसे अभ्यंग कहते हैं। इससे सूखापन कम होता है और जकड़न ढीली होने लगती है।"
"इसके बाद स्वेदन यानी गर्म सिकाई दी जाती है, जिससे मांसपेशियाँ और लिगामेंट्स रिलैक्स होते हैं और movement बढ़ती है।"
केवल बाहरी उपचार से नहीं—अंदर की दवा भी जरूरी होती है।"

🔶 आयुर्वेदिक औषधियाँ:-
डॉक्टर ने आगे बताया—
"कुछ औषधियाँ दी जाती हैं जो वात को संतुलित करती हैं और जोड़ों में lubrication बढ़ाती हैं, जैसे:"
योगराज गुग्गुल
महायोगराज गुग्गुल
दशमूल क्वाथ
अश्वगंधा आधारित औषधियाँ
"ये दवाएं दर्द कम करने के साथ-साथ जकड़न को धीरे-धीरे खोलती हैं," डॉक्टर ने समझाया। ये सिर्फ सामान्य औषधियां है। इससे भी ज्यादा प्रभावी औषधियां है आयुर्वेद में जो वैद्य की सलाह से लेने पर शीघ्र फायदा पहुचाती है।

मरीज ने तुरंत पूछा—
"घर पर मुझे क्या करना होगा?"
डॉक्टर ने सरल भाषा में समझाया—
"सबसे जरूरी है—नियमित हल्की एक्सरसाइज।"
सुबह हल्की स्ट्रेचिंग
गुनगुने तेल (जैसे तिल तेल) से मालिश
गर्म पानी से सिकाई
ठंडी चीजों से परहेज
"और याद रखिए—कंधे को बिल्कुल स्थिर मत रखिए, वरना जकड़न और बढ़ेगी।"

Dr Ajay Gupta
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कुरकुरे स्वाद के पीछे छुपा ज़हर: क्या आपका रोज़ का खाना धीरे-धीरे बीमारी बना रहा है?शाम को क्लिनिक में बैठे एक मरीज ने म...
28/02/2026

कुरकुरे स्वाद के पीछे छुपा ज़हर: क्या आपका रोज़ का खाना धीरे-धीरे बीमारी बना रहा है?

शाम को क्लिनिक में बैठे एक मरीज ने मुझसे कहा —
“डॉक्टर साहब, मैं तो बाहर का ज्यादा नहीं खाता… बस चाय के साथ बिस्कुट, कभी-कभी फ्राइज़, और सुबह ब्राउन टोस्ट… फिर भी शरीर में कमजोरी, थकान और पेट की दिक्कत क्यों रहती है?”
यह “बस थोड़ा-थोड़ा” ही आज की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है।
हम सोचते हैं कि बीमारी अचानक आती है,
लेकिन सच्चाई यह है — बीमारी रोज़ की छोटी-छोटी आदतों से बनती है।
और उन्हीं आदतों में छुपा है एक खतरनाक नाम —
👉 Acrylamide (एक्रिलामाइड)

🧪 एक्रिलामाइड: जो दिखता नहीं, पर असर करता है
एक्रिलामाइड कोई ऐसा रसायन नहीं है जो बाहर से मिलाया जाता हो।
यह तो आपकी रसोई में ही बनता है, जब आप खाना बनाते हैं।
जब आप आलू, ब्रेड या अनाज जैसी चीज़ों को 120°C से ज्यादा तापमान पर तलते, सेंकते या बेक करते हैं, तब एक केमिकल रिएक्शन होता है —
जिसे हम Maillard reaction कहते हैं।
👉 यही रिएक्शन खाने को स्वादिष्ट, सुगंधित और भूरा बनाता है
👉 और इसी के साथ पैदा होता है — एक्रिलामाइड
यानी जो रंग आपको आकर्षित करता है, वही अंदर खतरा भी छुपाए होता है।

🍟 आपके रोज़ के खाने में कहाँ छुपा है ये खतरा?
आप शायद हैरान होंगे कि यह सिर्फ “जंक फूड” की समस्या नहीं है, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के खाने में भी शामिल है:

🍟 1. फ्रेंच फ्राइज़ और चिप्स
जितने ज्यादा कुरकुरे, उतना ज्यादा एक्रिलामाइड

🍞 2. ब्रेड और टोस्ट
हल्का टोस्ट ठीक है, लेकिन जला हुआ ब्राउन टोस्ट जोखिम बढ़ाता है

🍪 3. बिस्कुट और कुकीज़
चाय के साथ रोज़ खाने की आदत धीरे-धीरे नुकसान कर सकती है

☕ 4. कॉफी
कॉफी बीन्स को हाई टेम्परेचर पर रोस्ट करने से भी यह बनता है

🍗 5. तले हुए स्नैक्स
पकोड़े, नमकीन, फ्राइड चिकन — सबमें संभावना
👉 ध्यान रखें:
“जितना ज्यादा भूरा, जला या कुरकुरा — उतना ज्यादा खतरा”

⚠️ शरीर पर इसका असर – धीरे-धीरे बढ़ता हुआ खतरा

🔴 1. कैंसर का संभावित जोखिम
वैज्ञानिक संस्थानों के अनुसार, एक्रिलामाइड को “संभावित कैंसरकारी” माना गया है। यह शरीर में जाकर DNA को नुकसान पहुंचा सकता है।

🧠 2. दिमाग और नसों पर असर
लंबे समय तक संपर्क रहने पर यह नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकता है
👉 जैसे: झुनझुनी, कमजोरी, ध्यान में कमी

🧬 3. कोशिकाओं की उम्र कम करना
यह शरीर में “ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस” बढ़ाता है, जिससे कोशिकाएं जल्दी खराब होती हैं

⚖️ 4. जीवनशैली रोगों को बढ़ावा
जब यह खराब खानपान के साथ जुड़ता है, तो
👉 मोटापा
👉 डायबिटीज
👉 हाई ब्लड प्रेशर
जैसी समस्याओं को और तेज़ कर सकता है

सबसे खतरनाक बात क्या है? यह ज़हर तुरंत असर नहीं दिखाता।
👉 कोई दर्द नहीं
👉 कोई तुरंत लक्षण नहीं
बस धीरे-धीरे… सालों में…
शरीर के अंदर नुकसान जमा होता रहता है।

और जब बीमारी सामने आती है, तब हम कहते हैं —
“अचानक कैसे हो गया?”

✅ कैसे करें बचाव?
1. “Golden Rule” अपनाएं
👉 खाना हल्का सुनहरा (Golden Yellow) रखें
👉 गहरा भूरा या जला हुआ नहीं

2. आलू को पहले भिगोएं
तलने से पहले 15–30 मिनट पानी में रखने से एक्रिलामाइड कम बनता है

3. हाई तापमान से बचें
धीरे पकाना बेहतर है बनिस्बत तेज़ जलाने के

4. कुकिंग मेथड बदलें
👉 उबालना
👉 स्टीम करना
👉 प्रेशर कुकिंग
इनमें एक्रिलामाइड नहीं बनता

5. प्रोसेस्ड फूड कम करें
रोज़-रोज़ पैकेट वाले स्नैक्स शरीर को धीरे-धीरे नुकसान देते हैं

6. बच्चों की आदत सुधारें
आज की आदत, कल की बीमारी बन सकती है

डरिए मत, जागरूक बनिए।
स्वाद का आनंद लीजिए, लेकिन समझदारी के साथ।
👉 कभी-कभार खाना ठीक है
👉 लेकिन रोज़ की आदत नहीं
अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी, तो इसे जरूर शेयर करें —
क्योंकि हो सकता है आपकी एक शेयर किसी की बीमारी रोक दे।

Dr Ajay Gupta
BAMS, MD(Kayachikitsa),
Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
Assistant Professor
Government Ayurveda Medical College
Former Assistant Professor, IMS, BHU
Senior Ayurveda Consultant
More than 20+ Years of Experience
YouTube - "Arogya Street" & "Vaidya Ajay Gupta"
Whatsapp No 082993 02319
(परामर्श लेने के लिए केवल व्हाट्सएप करें, कॉल नही)


28/02/2026

जाँच का उद्देश्य सिर्फ diagnosis नहीं है, बल्कि यह जानना है:
✔ बीमारी किस stage में है
✔ कितना नुकसान हुआ है
✔ आगे का risk कितना है

🧪 सबसे पहली और आम जाँच — Ultrasound
अधिकतर लोगों में fatty liver का पता
से चलता है। यह एक सरल, painless और widely available test है।
👉 इसमें डॉक्टर देखते हैं:
• liver में fat deposition
• liver का size
• echogenicity (brightness)

Dr Ajay Gupta
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28/02/2026

दोपहर का समय था। एक महिला लगभग 35 वर्षीया धीरे-धीरे कुर्सी पर बैठीं।
रोगिणी: “डॉक्टर साहब, मुझे कोई बड़ी बीमारी तो नहीं है… पर दिन भर गैस बनती है, बार-बार डकार आती है। कभी-कभी तो लगता है सीने में अटक गई हो। घर वाले कहते हैं मैं ज़्यादा सोचती हूँ, पर सच में बहुत परेशान हूँ।”
डॉक्टर: “डकार खट्टी आती है या सिर्फ हवा जैसी?”
रोगिणी: “ज्यादातर हवा जैसी… पर कई बार खट्टी भी। खाना खाने के बाद ज्यादा होती है। सुबह खाली पेट भी पेट फूला रहता है।”
डॉक्टर: “कब से है ये समस्या?”
रोगिणी: “लगभग 6–7 महीने से। कभी ठीक हो जाती है, फिर शुरू। मासिक धर्म के पहले तो और ज्यादा गैस बनती है। कभी-कभी कब्ज भी रहती है।”
डॉक्टर: “जल्दी-जल्दी खाना, चाय ज्यादा, तनाव… इनमें से कुछ है?”
रोगिणी (हल्की मुस्कान के साथ): “चाय 3–4 कप… और तनाव तो घर-बच्चे-ऑफिस सबका है।”

जांच करने पर कोई गंभीर बीमारी नहीं दिखी। यह एक आम लेकिन अनदेखी की जाने वाली समस्या थी —
👉 अत्यधिक गैस व डकार (Flatulence with Belching)

🌿 महिलाओं में गैस व बार-बार डकार के प्रमुख कारण

1️⃣ पाचन तंत्र से जुड़े कारण
• अजीर्ण (Indigestion)
• अम्लपित्त (Acidity)
• गैस्ट्राइटिस
• GERD (Acid reflux)
• IBS (Irritable Bowel Syndrome)

2️⃣ हार्मोनल कारण
• मासिक धर्म से पहले (PMS)
• PCOD/थायरॉयड असंतुलन
• गर्भावस्था

3️⃣ जीवनशैली कारण
• जल्दी-जल्दी खाना
• खाना खाते समय ज्यादा बात करना (हवा निगलना – Aerophagia)
• चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक
• ज्यादा तला-भुना, मैदा, पैकेज्ड फूड
• देर रात खाना

4️⃣ मानसिक कारण
• तनाव, चिंता
• ज्यादा सोचने की आदत
• भावनात्मक दबाव

5️⃣ कब्ज
जब मल रुकता है तो गैस ऊपर की ओर निकलती है — डकार के रूप में।

6️⃣ अन्य कारण
• H. pylori संक्रमण
• लैक्टोज असहिष्णुता
• पित्ताशय की समस्या
• कुछ दवाइयाँ (Painkillers, Antibiotics)

🌿 आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेद में इसे मुख्यतः वात-प्रकोप, अग्निमांद्य और अम्लपित्त कहते है।
जब जठराग्नि कमजोर होती है, तो भोजन पूर्णतः पचता नहीं।
अर्धपचित अन्न से आम बनता है → गैस → डकार → सीने में भारीपन।

🌿 उपचार (इलाज)

1️⃣ आहार सुधार (सबसे जरूरी)
✔ सुबह गुनगुना पानी लें
✔ खाना समय पर खाएं
✔ रात का खाना हल्का लें
✔ तला-भुना कम करें
✔ दही रात में न लें
✔ ज्यादा चाय पीना कम करें

2️⃣ घरेलू उपाय
• अजवाइन + काला नमक (½ चम्मच भोजन बाद)
• सौंफ चबाना
• जीरा पानी

3️⃣ आयुर्वेदिक औषधि (डॉक्टर की सलाह से)
• अविपत्तिकर चूर्ण
• हिंग्वाष्टक चूर्ण
• त्रिफला (यदि कब्ज हो)
• लवण भास्कर चूर्ण

4️⃣ योग व दिनचर्या
• वज्रासन (खाने के बाद 5–10 मिनट)
• पवनमुक्तासन
• प्राणायाम (अनुलोम-विलोम)
• सुबह हल्की वॉक

⚠️ कब सावधान हों?
यदि ये लक्षण हों तो तुरंत जांच कराएँ:
• वजन तेजी से घटना
• लगातार उल्टी
• काला मल
• खून की उल्टी
• बहुत तेज सीने में दर्द

🌸 निष्कर्ष
महिलाओं में गैस और डकार की समस्या बहुत सामान्य है, पर इसे हल्के में लेना ठीक नहीं।
अधिकतर मामलों में यह जीवनशैली, पाचन कमजोरी और तनाव से जुड़ी होती है — और सही मार्गदर्शन से पूरी तरह नियंत्रित हो सकती है।

(परामर्श लेने के लिए व्हाट्सएप करें)

Dr Tina Singhal
BAMS, MD;(Ayurveda)- IMS (BHU)
Ph.D. (Ayurveda)
Assistant Professor
Government Ayurveda College & Hospital

28/02/2026

वाराणसी की गलियों में चलते हुए जब मुंह में बनारसी पान का स्वाद घुलता है, तो लगता है जैसे परंपरा, स्वाद और संस्कृति एक साथ जीवंत हो उठे हों। वाराणसी का पान सिर्फ एक मुखवास नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पहचान है।
यहाँ का पान खास तरीके से बनाया जाता है—ताज़े पान के पत्ते, कत्था, चूना, गुलकंद, सुपारी और कई सुगंधित मसालों के साथ। हर कौर में मिठास, ठंडक और एक अलग ही शाही एहसास मिलता है। शादी-ब्याह हो, मेहमाननवाज़ी हो या शाम की हल्की-फुल्की महफ़िल—बनारसी पान हर मौके को खास बना देता है।
आयुर्वेद की दृष्टि से भी पान का सेवन (सीमित मात्रा में) पाचन को बेहतर बनाने, मुंह की दुर्गंध दूर करने और मन को ताज़गी देने में सहायक माना गया है। लेकिन ध्यान रहे—तंबाकू युक्त पान से हमेशा बचना चाहिए।
तो अगली बार जब बनारस जाएँ, तो घाटों के दर्शन के साथ इस पारंपरिक स्वाद का आनंद लेना बिल्कुल न भूलें—क्योंकि यह सिर्फ पान नहीं, एक अनुभव है।

सुबह की OPD शुरू होते ही मरीजों की भीड़ के बीच एक  व्यक्ति धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए कमरे में प्रवेश करता है। उसके चेहरे पर...
28/02/2026

सुबह की OPD शुरू होते ही मरीजों की भीड़ के बीच एक व्यक्ति धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए कमरे में प्रवेश करता है। उसके चेहरे पर दर्द साफ झलक रहा होता है, एक हाथ कमर पर टिका होता है और वह कुर्सी पर सीधा बैठ भी नहीं पाता, बल्कि एक तरफ झुककर बैठने की कोशिश करता है।

बैठते ही वह धीरे से कहता है—
“डॉक्टर साहब, कमर से दर्द शुरू होता है और सीधा पैर तक बिजली की तरह जाता है, अब तो चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया है।”
इस प्रकार की शिकायत सुनते ही चिकित्सक के मन में सबसे पहले Sciatica का संदेह आता है, क्योंकि यह दर्द का वही विशिष्ट पैटर्न है जिसमें कमर से नितंब, जांघ और पैर के पीछे तक दर्द फैलता है।

मरीज बताता है कि दर्द “करंट जैसा” या “सुई चुभने जैसा” लगता है, जो खासकर एक ही पैर में ज्यादा होता है। वह यह भी बताता है कि लंबे समय तक बैठने, झुकने, या कोई भारी सामान उठाने पर दर्द अचानक बढ़ जाता है, जबकि लेटने पर थोड़ा आराम मिलता है।

पूछने पर कि क्या पैर में झनझनाहट या सुन्नपन भी है, तो मरीज सहमति में सिर हिलाता है और कहता है कि कभी-कभी पैर में कमजोरी भी महसूस होती है।

बातचीत के दौरान यह भी सामने आता है कि मरीज या तो लंबे समय तक बैठकर काम करता है या हाल ही में उसने भारी वजन उठाया था।
जब मैंने पूछा कि खांसी या छींक आने पर दर्द बढ़ता है या नहीं, तो मरीज तुरंत कहता है—
“जी डॉक्टर, बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।”

यह संकेत अक्सर रीढ़ की नस पर दबाव का होता है, जिसका एक सामान्य कारण होता है।

मरीज को बेड पर लिटाकर Straight Leg Raise Test किया जाता है, जिसमें जैसे ही पैर को सीधा उठाया जाता है, लगभग 30 से 70 डिग्री के बीच मरीज को तीव्र दर्द महसूस होता है और वह तुरंत पैर नीचे रखने को कहता है। यह परीक्षण Sciatica का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।

इसके साथ ही पैर की संवेदना (sensation), मांसपेशियों की शक्ति (muscle power) और रिफ्लेक्स (reflexes) की जांच करने पर पता चलता है कि नस पर दबाव किस स्तर पर है।
मरीज के चलने के तरीके (gait) को देखकर भी स्पष्ट होता है कि वह एक तरफ का भार कम करने की कोशिश कर रहा है।
जांच की बात करें तो हर मरीज में तुरंत MRI कराना आवश्यक नहीं होता, लेकिन यदि दर्द लगातार बना रहे, या कमजोरी और सुन्नपन बढ़ता जाए, तो MRI Spine सबसे महत्वपूर्ण जांच होती है, जिससे डिस्क के खिसकने और नस के दबने की स्पष्ट जानकारी मिलती है।

सामान्य मामलों में X-ray भी किया जा सकता है, जिससे रीढ़ की संरचना का सामान्य आकलन किया जाता है।

इलाज की शुरुआत प्रायः conservative तरीके से की जाती है, क्योंकि लगभग 90% मरीज बिना ऑपरेशन के ठीक हो जाते हैं।
मरीज को दर्द निवारक दवाएं (NSAIDs), मांसपेशी शिथिल करने वाली दवाएं (muscle relaxants) और विटामिन B कॉम्प्लेक्स दिए जाते हैं। इसके साथ ही फिजियोथेरेपी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसमें stretching exercises और core strengthening शामिल होते हैं।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से यह स्थिति “गृध्रसी” के अंतर्गत आती है, जिसमें वात दोष की वृद्धि होती है, और इसके उपचार में अभ्यंग (तेल मालिश), स्वेदन (स्टीम), बस्ती तथा योगासन जैसे भुजंगासन और मकरासन विशेष लाभकारी होते हैं।

आयुर्वेदिक दवाएं इसमे बहुत बेहतर तरीके से काम करती है। योगराज गुगुल, त्रयोदशांग गुगुल, दशमूल जैसी सैकड़ों औषधिया इसमे बेहतर लाभ पहुचाती है। बिना देर किए वैद्य से संपर्क करके इसका इलाज लीजिये, जल्दी आराम मिलेगा।

Dr Ajay Gupta
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ओपीडी में एक दिन एक मरीज अपनी रिपोर्ट लेकर आया।चेहरे पर चिंता साफ दिख रही थी।“डॉक्टर साहब, अल्ट्रासाउंड में Fatty Liver ...
28/02/2026

ओपीडी में एक दिन एक मरीज अपनी रिपोर्ट लेकर आया।
चेहरे पर चिंता साफ दिख रही थी।
“डॉक्टर साहब, अल्ट्रासाउंड में Fatty Liver लिखा है…
क्या अब बहुत खतरा है?”
मैंने रिपोर्ट देखी और पूछा—
“आपको कोई तकलीफ थी?”
वह बोला—
“नहीं… बस routine checkup में पता चला।”
यही है fatty liver की सबसे बड़ी सच्चाई—

यह बीमारी अक्सर बिना लक्षण के पकड़ी जाती है।
और यहीं से शुरू होता है असली सवाल—
👉 अब आगे क्या करें?
👉 कौन-कौन सी जाँच जरूरी हैं?
👉 क्या हर fatty liver खतरनाक होता है?
चलिए, इसे एक-एक करके बहुत सरल और गहराई से समझते हैं।

🧠 Fatty Liver में जाँच क्यों जरूरी है?
Fatty liver सिर्फ “लिवर में चर्बी जमा होना” नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब—
• सूजन (inflammation) बढ़ती है
• लिवर कोशिकाएं damage होने लगती हैं
• और धीरे-धीरे fibrosis (कठोरता) बनने लगती है
कई मामलों में यह स्थिति आगे चलकर
(NASH) और फिर cirrhosis तक पहुंच सकती है।

इसलिए जाँच का उद्देश्य सिर्फ diagnosis नहीं है, बल्कि यह जानना है:
✔ बीमारी किस stage में है
✔ कितना नुकसान हुआ है
✔ आगे का risk कितना है

🧪 सबसे पहली और आम जाँच — Ultrasound
अधिकतर लोगों में fatty liver का पता
से चलता है। यह एक सरल, painless और widely available test है।
👉 इसमें डॉक्टर देखते हैं:
• liver में fat deposition
• liver का size
• echogenicity (brightness)

रिपोर्ट में अक्सर लिखा होता है:
• Grade 1 (mild)
• Grade 2 (moderate)
• Grade 3 (severe)
लेकिन एक बात समझना बहुत जरूरी है—
❗ Ultrasound सिर्फ fat दिखाता है
👉 यह यह नहीं बताता कि liver में damage या fibrosis कितना है

🧬 Blood Tests —
अब मैंने मरीज से कहा—
“अल्ट्रासाउंड तो शुरुआत है, असली जानकारी खून की जाँच से मिलती है।”
🔍 Liver Function Test (LFT)
सबसे जरूरी blood test है
👉 इसमें देखा जाता है:
• ALT (SGPT)
• AST (SGOT)
• ALP
• Bilirubin
👉 क्या समझ आता है?
• liver में सूजन है या नहीं
• कोशिकाएं damage हो रही हैं या नहीं
लेकिन ध्यान रखें—
❗ कई बार LFT normal होते हुए भी fatty liver मौजूद हो सकता है

🧪 Lipid Profile
Fatty liver अक्सर metabolic syndrome का हिस्सा होता है। इसलिए जरूरी है
👉 इसमें देखा जाता है:
• Cholesterol
• Triglycerides
• HDL / LDL
👉 high triglycerides = fatty liver का risk ज्यादा

🍬 Blood Sugar / HbA1c
मैंने मरीज से पूछा—
“शुगर की जांच करवाई?”
क्योंकि fatty liver और diabetes का गहरा संबंध है।
👉 जरूरी टेस्ट:
• Fasting sugar
👉 यह बताता है:
• पिछले 3 महीनों का average sugar level

🧠 Advanced Tests — जब और गहराई में जाना हो
अब सवाल आता है—
क्या हर मरीज को advanced tests कराने चाहिए?
👉 जवाब: नहीं
लेकिन कुछ मामलों में ये बहुत जरूरी हो जाते हैं।

🔬 FibroScan — stiffness मापने वाला टेस्ट
यह एक बहुत महत्वपूर्ण non-invasive test है:
👉 यह बताता है:
• liver कितना कठोर (fibrotic) हो चुका है
• fat कितना जमा है
👉 खासकर उपयोगी जब:
• LFT बार-बार बढ़ा हुआ हो
• ultrasound में high grade fatty liver हो
• diabetes / obesity मौजूद हो

🧫 Liver Biopsy — अंतिम और निर्णायक जाँच
कुछ जटिल मामलों में
की जरूरत पड़ती है
👉 इसमें:
• liver का छोटा sample लिया जाता है
• microscopic level पर जांच होती है
👉 यह बताता है:
• inflammation
• fibrosis
• NASH की severity
लेकिन—
❗ यह हर मरीज के लिए जरूरी नहीं है
👉 केवल selected cases में ही किया जाता है

📊 एक practical approach:-
मैं अपने मरीजों को simple roadmap देता हूँ:
👉 Step 1: Ultrasound
👉 Step 2: LFT + Lipid + Sugar
👉 Step 3: Risk हो तो FibroScan
👉 और फिर उसी के अनुसार treatment plan

Fatty liver एक reversible condition हो सकती है—
अगर सही समय पर सही कदम उठाए जाएं।

Dr Ajay Gupta
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Ph.D. (IMS-BHU, Varanasi)
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