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24/11/2025
16/11/2025

" #एकंम्_ब्रह्म_द्वितीयं_नास्ति_न_किञ्चन"।।

ए श्लोक #वेद_उपनिषद् की अद्वैत भावना पर आधारित है। मूल विचार है — “ब्रह्म केवल एक है, द्वितीय कोई नहीं।”
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✅ श्लोक का अर्थ (भावार्थ)

“ब्रह्म एक है – उसका दूसरा कोई नहीं है।
इस एक ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।”

इसका अर्थ है कि

सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण एक ही सत्ता है।

उस परम सत्य के समकक्ष, उसके समान या उसके बाहर कोई दूसरी सत्ता स्वतंत्र रूप से अस्तित्व नहीं रखती।

जो कुछ दिखाई देता है वह उसी एक ब्रह्म का विस्तार, ऊर्जा, शक्ति या उपाधि मात्र है।

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✅ शास्त्रों में इसका आधार कहाँ मिलता है?

1. बृहदारण्यक उपनिषद् (६.४.२०)

“नेह नानास्ति किंचन।”
अर्थ — यहाँ (परम सत्य में) तनिक भी नानात्व (द्वैत/भेद) नहीं है।

2. छांदोग्य उपनिषद् (६.२.१)

“एकमेव अद्वितीयम्।”
अर्थ — “वह (ब्रह्म) एक ही है, दूसरा नहीं।”

3. यजुर्वेद (४०.८ – ईशावास्य उपनिषद्)

“स परिख़ात् स्वयंभूः…”
यह बताता है कि ब्रह्म असीम, अजन्मा और निराकार है।

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✅ विस्तार से व्याख्या

1. ब्रह्म का एकत्व

पुरे विश्व में विविधता दिखाई देती है—पेड़, नदी, मनुष्य, देवता, ऊर्जा…
लेकिन उपनिषद् कहते हैं कि इन सबका मूल एक ही चेतन सत्ता है।
जैसे—

अनेक तरंगें हैं, पर महासागर एक है

अनेक दीपक, पर प्रकाश की प्रकृति एक है
उसी प्रकार सभी रूप उसी एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति हैं।

2. “द्वितीय नास्ति” – कोई दूसरा नहीं

यदि दूसरा होता, तो

ब्रह्म सीमित हो जाता

दो सत्य हो जाते
यह वेद स्वीकार नहीं करते।
इसलिए अद्वैत कहता है —
“दिखने वाला भेद भी ब्रह्म की Maya/Upadhi का परिणाम है, वास्तविकता में एकत्व ही सत्य है।”

3. “न किञ्चन” – कुछ भी नहीं

इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया मिथ्या है,
बल्कि यह कि
जो कुछ भी है, वह अपने स्वयं के अस्तित्व से अलग नहीं है— वह ब्रह्म ही है।

दृष्टांत—
मिट्टी से बने सभी घड़े, बर्तन, प्याले — रूप अलग हैं,
परंतु सबका अस्तित्व केवल मिट्टी है।

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✅ संक्षेप में सार

यह श्लोक अद्वैत वेदांत का महामूल है —
👉 ब्रह्म एक है
👉 द्वितीय सत्ता का अस्तित्व नहीं
👉 जो कुछ दिखाई देता है वह उसी एक सत्य का रूप है

#नीचे_वेद_उपनिषदों_के_मूल_वैदिक_उद्धरण दिए जा रहे हैं, जो स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से “ब्रह्म केवल एक है – द्वितीय नहीं” की बात कहते हैं। ये सभी अद्वैत / एकत्व का आधार हैं।

✅ 1. छान्दोग्य उपनिषद् (६.२.१)

“एकमेवाद्वितीयम्।”

** अर्थ:**
वह (ब्रह्म) केवल एक है, उसका दूसरा कोई नहीं।

✅ 2. बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.१९–२०)

“नेह नानास्ति किंचन।”

** अर्थ:**
यहाँ (परम सत्य में) तनिक भी नानात्व (द्वैत, भेद) नहीं है।

✅ 3. यजुर्वेद – ईशोपनिषद (मन्त्र 1)

“ईशावास्यमिदं सर्वं…”

** अर्थ:**
यह संपूर्ण जगत उसी एक परमेश्वर से व्याप्त है।

✅ 4. ऋग्वेद (१.१६४.४६)

“एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति।”

** अर्थ:**
सत्य एक ही है, पर विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

✅ 5. ऋग्वेद (१०.१२९.२ – नासदीय सूक्त)

“तदेकं…”

** अर्थ:**
आरम्भ में वह एक ही था, दूसरा कुछ नहीं था।

✅ 6. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.११)

“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।”

** अर्थ:**
वह एक ही देव सब प्राणियों में छिपा हुआ है।

✅ 7. कठ उपनिषद् (२.२.१२)

“एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा।”

** अर्थ:**
वह एक ही परमात्मा सब प्राणियों के भीतर का स्वामी है।

✅ 8. मुण्डक उपनिषद् (२.२.११)

“ब्रह्मैवेदं सर्वम्।”

** अर्थ:**
यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है।

✅ 9. यजुर्वेद (४०.८)

“स पर्यगात्… स्वयंभूः…”

** अर्थ:**
वह एक, सर्वव्यापक, अजन्मा, अद्वितीय परम ब्रह्म है।

✅ 10. ऐतरेय उपनिषद् (१.१.१)

“आत्मा वा इदमेवाग्र आसीत्।”

** अर्थ:**
सृष्टि के आरम्भ में केवल आत्मा (ब्रह्म) ही था, अन्य कुछ नहीं।

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🔶 सार (Vaedic Summary)

वेद और उपनिषद् अनेक बार एक ही बात कहते हैं —
✔ ब्रह्म एक है
✔ दूसरा कोई नहीं
✔ जो कुछ भी है, वह उसी एक ब्रह्म का विस्तार है।

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