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~ OSHO

अब महाशिविर आयोजित करने की ज़रूरत हैजितनी "बड़ी संख्या" है उतना बड़ा वायुमंडल।अब अभी बहुत से प्रश्न होते हैं जिनको मैं छोड़ ...
08/11/2025

अब महाशिविर आयोजित करने की ज़रूरत है

जितनी "बड़ी संख्या" है उतना बड़ा वायुमंडल।

अब अभी बहुत से प्रश्न होते हैं जिनको मैं छोड़ देता हूं, सिर्फ इसीलिए कि वह जिन लोगों के सामने बात की जानी चाहिए वे लोग तो नहीं हैं, तो उनकी क्या बात करें ???

अब जैसे कि निरंतर ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन कि शिक्षा पर कोई प्रश्न न पूछ लेता हो।
लेकिन शिक्षा पर बात करने से क्या प्रयोजन है ???

जब तक कि "शिक्षाशास्त्री" के सामने वह बात न की जाए। आप क्या करेंगे बहुत उसके लिए ???

अब कल दो-एक प्रश्न हैं राजनीति पर,लेकिन क्या मतलब है उनकी बात करने से ???

जब तक कि हमारे पास एक राजनैतिक पूरी योजना, जहां से हम पूरी बात कह सकें पूरी दृष्टि को ध्यान में रख कर। और किनके सामने कहें ???

मुल्क की, जीवन के बहुत पहलू हैं, सभी पहलुओं पर संयुक्त क्रांति का काम हो सकता है।

पर इसके लिए हमारी तैयारी बढ़नी चाहिए। अब जैसे यही कैंप है, चार सौ लोग आए हैं; इस कैंप में दो हजार लोग भी हो सकते थे।

हमें थोड़ी फिकर करनी चाहिए
और आप हैरान होंगे कि चार सौ लोग, यही चार सौ लोगों को ज्यादा फायदा होता अगर दो हजार लोग यहां होते तो।

क्योंकि जितनी "बड़ी संख्या" हो ,उतना बड़ा वायुमंडल,
उतना बड़ा एटमास्फियर खड़ा होता है।

और हमारा चूंकि जीवन हमेशा से विस्तार को अनुभव करता है, जितना विस्तीर्ण हो। आप ध्यान करने बैठे हैं, अगर आपके आस-पास दस हजार लोग ध्यान कर रहे हैं,आपके ध्यान में फर्क पड़ता है। और आप अकेले कर रहे हैं तो फर्क पड़ता है।

क्योंकि आपको लगता है,
कुछ समझ में आना शुरू हुआ,
फिर एक साइकिक, एक मनो-वातावरण बनता है। इतने लोगों का चिंतन,इतने लोगों के मन की हवाएं, इतने लोगों के मन की तरंगें एक हवा बनाती हैं।

बुद्ध जिस गांव में भी जाते, दस हजार भिक्षु साथ जाते।
हम कहेंगे, इतनी भीड़ लेकर चलने का क्या मतलब था ???
लेकिन पूरे गांव की हवा बदल देते।
क्योंकि दस हजार भिक्षु एक खास ढंग से निर्मित, एक खास तरह के चित्त को लिए हुए,
खास तरह की आंखें,
खास तरह के पैर--चलने का ढंग,
उठने का ढंग,
बात करने का ढंग,
दस हजार शांत लोग, जिस गांव में खड़े हो जाते दस हजार लोग शांत, वह गांव एकदम देखता रह जाता कि क्या ।

एक गांव में ठहरे हैं, उस गांव का राजा मिलने गया। दस हजार लोग ठहरे हैं गांव के बाहर। तो उसने अपने मंत्रियों से कहा,कितनी दूर है ???

उन्होंने कहा, बस ये जो वृक्ष दिखाई पड़ रहे हैं, उसके पास है।

उसने कहा, मुझे शक होता है। अपनी तलवार बाहर निकाल ली।
तुम मुझे धोखा देना चाहते हो ???
तुम कहते हो दस हजार लोग ठहरे हैं, लेकिन यहां तो ऐसा पता नहीं चलता कि एक आदमी भी ठहरा हुआ है!

इतना सन्नाटा,
दस हजार लोग थोड़े ही फासले पर ठहरे हैं दरख्तों के पास, इतना सन्नाटा है रात में! मुझे शक होता है।
उसने तलवार बाहर निकाल ली। कोई षडयंत्र तो नहीं है!

वे मंत्री हंसे, उन्होंने कहा कि आप तलवार बाहर ही रखिए, कोई षडयंत्र नहीं है, लेकिन आप चलिए, वे दस हजार लोग और ही तरह के लोग हैं।

वह गया, वह देख कर वहां दंग रह गया कि वृक्षों के नीचे दस हजार लोग बैठे हैं,चुपचाप! कोई एक बात नहीं कर रहा है।

अब यह राजा एक साइकिक वातावरण में प्रवेश कर रहा है।

जहां यह बोलना भी चाहे तो नहीं बोल सकता। दस हजार लोग मौजूद हैं चुपचाप। कोई बात नहीं कर रहे हैं, बैठे हैं चुप। तो यह आदमी इनमें रुकता है, यह आदमी बदल जाता है। यह इसने देखा ही नहीं है, इसकी कल्पना में नहीं है कि ऐसी भी एक हवा हो सकती है।

ओशो
अनंत की पुकार—

05/11/2025

पूंजीवाद वास्तव में है क्या समझिए_

एक बस्ती थी जिसमें करीब सौ लोग रहते थे.
कुछ अनाज उगाते, कुछ गाय-भेड पालते, कुछ मछलियाँ पकड़ते, कुछ कपडे बुनते-सीते, कुछ लकड़ी और लोहे का काम करके तरह-तरह की चीजें बनाते.
अपनी जरूरत की चीजें आपस में अदल-बदल कर काम चलाते. लेकिन कभी कभी कुछ दिक्कत आ जाती थी, जब किसी को जरूरत है कपडे की और उसके पास बदले में देने के लिए अनाज है लेकिन जिसके पास कपडा है उसे अंडे चाहिए.
अब इससे भी लोग जैसे तैसे निपट लेते थे जैसे कि पहले कपडे वाला अंडे वाले से अदला बदली करे फिर अनाज वाला अंडे वाले के पास जाकर कपडा ले आये.
चूंकि सब अदला-बदली ही करते थे इसलिए सबके पास कुछ न कुछ हर चीज पहुँच ही जाती थी और थोडा बहुत लोग जरूरत के हिसाब दे भण्डारण भी कर लेते थे. लेकिन इच्छित वस्तुओं को खोजने में उन्हें मशक्कत तो करनी ही पड़ती थी.
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एक दिन उस बस्ती में एक घुड़सवार आया.
उसने बस्ती के लोगों को समझाया-- "ये जो चीजों की अदला बदली में तुम्हें थोड़ी दिक्कत होती है उसका उपाय मेरे पास है." यह कहकर उसने हर बस्तीवाले को दस-दस सिक्कों जैसे पत्थर के टुकड़े दिए जिस पर एक ख़ास चिन्ह बना हुआ था और कहा कि जब भी तुम्हे कुछ चाहिये हो, चीजों से नहीं इन टुकड़ों से बदलो.
मगर एक शर्त है. मैं एक साल बाद लौटूंगा. और जब मैं लौटूंगा तो मुझे हर व्यक्ति दे दस के बदले ग्यारह पत्थर चाहिए.... पुराने पत्थर वापस लेकर दुबारा सबको एक साल के लिए दस-दस नए टुकड़े दे दिए जायेंगे और जो ग्यारह पत्थर नहीं दे सकेगा उसे अपनी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा मुझे देना पड़ेगा.
अपनी रोजमर्रा की परेशानी का फौरी हल निकलते पाकर लोग उसकी शर्त मान गये और घुडसवार चला गया. लोग अपने काम में लग गए.
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लोग अपने काम में लगे रहे, खाते-पीते, गाते, बजाते, नाचते उत्सव मनाते--जीवन सामान्य ढंग से चल रहा था. इसी तरह से साल पूरा होने को आ गया और घुड़सवार के वापस आने का भी और दस की जगह ग्यारह टुकड़े वापस करने का भी.
लेकिन लोगों पाया कि उनमे से सभी के पास ग्यारह टुकड़े तो है नहीं. अदला बदली में कुछ के पास ज्यादा पहुँच गये हैं कुछ के पास कम रह गए हैं.
अब जिनके पास कम रह गए थे चुकाना तो उन्होंने भी था इसलिए उन्होंने अपनी चीजों के बदले में ग्राहक से अधिक टुकड़े मांगने शुरू कर दिए. यानि वस्तुओं के दाम बढा दिए.
फिर भी साल के अंत में,
किसी भी गणित से
हर बस्ती वाले के पास ग्यारह टुकड़े तो आ नहीं सकते थे,
क्योंकि वे तो कुल उतने ही थे
जितने कि घुड़सवार ने उन सब में बांटे थे .
नतीजा यह हुआ कि वायदे के मुताबिक जो सिक्के वापस नहीं कर सका उसे अपनी संपत्ति में से कुछ न कुछ उस घुडसवार को देना पड़ा.
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इस तरह, जो घुड़सवार पहले पत्थर के कुछ चिन्हित टुकड़ों का मालिक था
धीरे धीरे बस्ती की सम्पत्तियों का मालिक बनाने लगा
और लोगों के पास से उनकी सम्पत्तियाँ जाती रहीं.
यही नहीं जिनके पास अधिक टुकड़े संग्रहीत होते वे अमीर और जिनके पास कम
हो पाते वे गरीब कहलाये जाने लगे.
यही नहीं साल भर लोगों में पत्थर के उन टुकड़ों को संग्रह करने की होड़ भी लगने लग गयी .
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यही है चिन्हों यानि मुद्रा के संपत्ति में आसानी से बदल जानी की कहानी .
मुद्रा धन नहीं है लेकिन उसे धन समझ लिया गया है......
हमारे उपयोग की वस्तुएं और प्राकृतिक संसाधन ही वास्तव में धन है..
जरा इसी पैटर्न पर अपने चारों तरफ हो रही व्यापारिक गतिविधियों और संसाधनों की लूट और बैंकिंग व्यवस्था को देखिये और सोचिये .... क्या समझ में आता है ?
आदिकिसान

सौ अचोरों में निन्यानबे सिर्फ भय के कारण अचोर हैं, इसलिए दुख पाएंगे। वे सोचेगे कि हम चोरी नहीं कर रहे और दुख क्यों पा रह...
05/11/2025

सौ अचोरों में निन्यानबे सिर्फ भय के कारण अचोर हैं, इसलिए दुख पाएंगे। वे सोचेगे कि हम चोरी नहीं कर रहे और दुख क्यों पा रहे हैं? चोर तो हो ही तुम, चोरी की या नहीं, इससे थोड़ी ही कोई चोर होता है! चोर होना तुम्हारी चेतना की दशा है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक ट्रेन में सफर करता था। उस डिब्बे में दो ही थे, वह था और एक सुंदर स्त्री थी। उसने सुंदर स्त्री को कहा कि अगर मैं हजार रुपए दूं तो रात मेरे साथ सोओगी? उस स्त्री ने कहा, तुमने मुझे समझा क्या है? चेन खींच दूंगी, पुलिस को बुलाऊंगी। उसने कहा, नाराज न होओ, मैं तो सिर्फ एक निवेदन किया। अगर दस हजार दूं तो? स्त्री शांत हो गयी, फिर उाने नहीं चिल्लाया। उसने कहा कि पुलिस को बुलाऊंगी और चेन खींच दूंगी, मुल्ला ने कहा, दस हजार? तो उसने कहा, दस हजार के लिए मैं राजी हो सकती हूं; मुल्ला ने कहा, ठीक, और अगर दस रुपया दूं? तब तो वह स्त्री एकदम खड़ी हो गयी, उसने कहा, अभी चेन खींचती हूं;अभी पुलिस को बुलाती हूं। पर मुल्ला ने कहा, यह क्या बात हुई? उस स्त्री ने कहा, आप जानते नहीं मैं कौन हूं? मुल्ला ने कहा, मैं समझ गया तुम कौन हो, अब तो हम मोल— भाव कर रहे हैं। दस हजार में जब तुम सोने को राजी हो तो यह तो मैं जान ही गया कि तुम कौन हो, अब तो सिर्फ मोल— भाव की बात है —तो मैं व्यापारी आदमी हूं! वह तो मैंने दस हजार इसीलिए कहे थे कि पहचान लूं कि तुम हो कौन। वह बात खतम हो गयी, वह निर्णय हो चुका, अब नाहक चेन वगैरह न खींचो, बैठो;अब तो मोल— भाव कर लें बैठकर, जो भी तय हो जाए, ठीक है।

तुम भी सोच लेना, तुम्हारी जीवन—दशा तुम्हारी चोरी करने से चोर की नहीं होती, चोरी की वृत्ति! उस वृत्ति के कारण तुम दुख पाते हो। और हो सकता है चोर अगर सुख पा रहा है तो जरूर उसमें कुछ होगा, कुछ होगा जिससे सुख आता है—साहस होगा, बल होगा, दाव पर लगाने की हिम्मत होगी, निश्चित मन होगा कि हो जो हो। दुनिया क्या कहती है, इसकी फिकर न करता होगा। थोड़ी बगावती दशा होगी। कुछ होगा उसके भीतर, कुछ गुण होगा जिसके कारण सुख मिलता है।....ओशो

02/11/2025
31/10/2025
*ओशो_गहरे पानी पैठ:03**तिलक—टीके: तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना*(अंतरंग चर्चा वुडलैण्‍ड) बम्‍बई, 12 जून 1971तिलक—टीके के संब...
26/10/2025

*ओशो_गहरे पानी पैठ:03*
*तिलक—टीके: तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना*
(अंतरंग चर्चा वुडलैण्‍ड) बम्‍बई, 12 जून 1971
तिलक—टीके के संबंध में समझने के पहले दो छोटी—सी घटनाएं आपसे कहूं फिर आसान हो सकेगी बात। दो ऐतिहासिक तथ्य हैं।
अट्ठारह सौ अट्ठासी में दक्षिण के एक छोटे—से परिवार में एक व्यक्ति पैदा हुआ। पीछे तो वह विश्वविख्यात हुआ। उसका नाम था रामानुजम, जो बहुत गरीब ब्राह्मण घर का था और बहुत थोड़ी उसे शिक्षा मिली थी।

लेकिन उस छोटे से गांव में भी बिना किसी विशेष शिक्षा के रामानुजम की प्रतिभा गणित के साथ अनूठी थी। जो लोग गणित जानते है, उनका कहना है कि मनुष्य जाति के इतिहास में रामानुजम से बड़ा और विशिष्ट गणितज्ञ नहीं हुआ। बहुत बड़े—बड़े गणितज्ञ हुए हैं, पर वे सब सुशिक्षित थे, उन्हें गणित का प्रशिक्षण मिला था। बड़े गणितज्ञो का साथ—सत्संग उन्हें मिला था, वर्षों की उनकी तैयारी रही थी।

लेकिन रामानुजम की न कोई तैयारी थी, न कोई साथ मिला, न कोई शिक्षा मिली, मैट्रिक भी रामानुजम पास नहीं हुआ। और एक छोटे से दफ़र में मुश्किल से क्लर्की का काम मिला।

लेकिन अचानक लोगों में खबर फैलने लगी कि इसकी गणित के संबंध में कुशलता अदभुत है।

किसी ने उसको सुझाव दिया कि कैम्‍ब्रिज युनिवर्सिटी के उस समय विश्व के बड़े से बड़े गणितज्ञों में एक प्रोफेसर हार्डी थे, उनको लिखो। उसने पत्र तो नहीं लिखा, ज्यामिति की डेढ़ सौ थ्योरम बनाकर भेज दीं। हार्डी तो चकित रह गया। इतनी कम उम्र के व्यक्ति से, इस तरह के ज्यामिति के सिद्धांतों का कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता था।

उसने तत्काल रामानुजम को यूरोप बुलाया। जब रामानुजम कैम्ब्रिज पहुंचा तो हार्डी जो कि बड़े से बड़ा गणितज्ञ था उस समय के विश्व का, अपने को बिलकुल बच्चा समझने लगा रामानुजम के सामने। रामानुजम की क्षमता ऐसी थी, जिसका मस्तिष्क से संबंध नहीं मालूम पड़ता। अगर आपको कोई गणित करने को कहा जाए तो समय लगेगा। बुद्धि ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकती जिसमें समय न लगे। बुद्धि सोचेगी, हल करेगी, समय व्यतीत होगा,

लेकिन रामानुजम को समय ही नहीं लगता था। यहां आप तख्ते पर सवाल लिखेंगे वहां रामानुजम उत्तर देना शुरू कर देगा। आप बोल भी न पाएंगे पूरा, और उत्तर आ जाएगा। बीच में समय का कोई व्यवधान नहीं होगा।
बड़ी कठिनाई खड़ी हो गयी, क्योंकि जिस सवाल को हल करने में बड़े से बड़े गणितज्ञ को छह घण्टे लगेगें ही, फिर भी जरूरी नहीं है कि सही हो, उत्तर सही है या नहीं इसे जांचने में फिर छह घण्टे उसे गुजारने पड़ेंगे।

रामानुजम को सवाल दिया गया और वह उत्तर दे देंगे, जैसे सवाल में और उत्तर में कोई समय का क्षण भी व्यतीत नहीं होता।

इससे एक बात तो सिद्ध हो गयी कि रामानुजम बुद्धि के माध्यम से उत्तर नहीं दे रहा है। बुद्धि बहुत बड़ी नहीं है उसके पास, मैट्रिक में वह फेल हुआ था, कोई बुद्धिमत्ता का और लक्षण भी न था। सामान्य जीवन में किसी चीज में भी कोई ऐसी बुद्धिमत्ता नहीं मालूम पड़ती थी। लेकिन बस गणित के संबंध में वह एकदम अतिमानवीय था, मनुष्य से बहुत पार की घटना उसके जीवन में होती थी।

वैसे जल्दी मर गया रामानुजम। उसे क्षय रोग हो गया, वह छत्तीस साल की उम्र में मर गया। जब वह बीमार होकर अस्पताल में पड़ा था तो हार्डी अपने दो तीन गणितज्ञ मित्रों के साथ उसे देखने गया था। उसके दरवाजे पर ही हार्डी ने कार रोकी और भीतर गया।

कार का नम्बर रामानुजम को दिखायी पड़ा। उसने हार्डी से कहा, आश्रर्यजनक है, आपकी कार का जो नम्बर है, ऐसा कोई आंकड़ा ही नहीं है, मनुष्य की गणित की व्यवस्था में। यह आंकडा बड़ा खूबी का है। उसने चार विशेषताएं उस आंकड़े की बतायीं।

रामानुजम तो मर गया। हार्डी को छह महीने लगे वह पूरी विशेषता सिद्ध करने में। रामानुजम की तो आकस्मिक नजर पड़ गयी

हार्डी वसीयत छोड्कर मरा कि मेरे मरने के बाद उस चौथी की खोज जारी रखी जाए, क्योकि रामानुजम ने कहा है तो वह ठीक तो होगी ही। हार्डी के मर जाने के बाईस साल बाद वह चौथी घटना सही सिद्ध हो पायी कि उसने ठीक कहा था। उस आक्के में यह खूबी है!

रामानुजम को जब भी यह गणित की स्थिति घटती थी, तब उसकी दोनों आंखों के बीच में कुछ होना शुरू हो जाता था। उसकी दोनों आंखों की पुतलियां ऊपर चढ़ जाती थीं, योग जिस जगह रामानुजम की आंखें चढ़ जाती थीं, उसको तृतीय नेत्र कहता है। उसको तीसरी आंख कहता है। अगर वह तीसरी आंख आरम्भ हो जाए, तीसरी आंख सिर्फ उपमा की दृष्टि से कहता हूं सिर्फ इस खयाल से कि वहां से भी कुछ दिखायी पड़ना शुरू होता है, कोई दूसरा ही जगत शुरू हो जाता है।

जैसे कि किसी आदमी के मकान में एक छोटा—सा छेद हो, वह खुल जाए, और आकाश दिखायी पड़ने लगे। जब तक वह छेद न खुला था तो आकाश दिखायी न पड़ रहा था। करीब—करीब हमारी दोनों आंखों के बीच जो भ्रू—मध्य जगह है, वहा वह छेद है जहां से हम इस लोक के बाहर देखना शुरू कर देते हैं।

एक बात तय थी कि जब भी रामानुजम को कुछ ऐसा होता था, उसकी दोनों पुतलियां चढ़ जाती थीं। हार्डी नहीं समझ पाया, पश्‍चिम के गणितज्ञ नहीं समझ पाए, और अभी गणितज्ञ आगे भी नहीं समझ पाएंगे।

मंदिर का एक वर्तुल है, उसके अपने आविष्ट क्षेत्र का—जो जीवन्त है, उस जीवत्त वर्तुल का पूरे गांव के लिए उपयोग था। और उससे ...
25/10/2025

मंदिर का एक वर्तुल है, उसके अपने आविष्ट क्षेत्र का—जो जीवन्त है, उस जीवत्त वर्तुल का पूरे गांव के लिए उपयोग था। और उससे परिणाम आये थे।

हजारों हजारों साल तक भारत के गांव की जो निर्दोषता और पवित्रता थी, उसमें गांव कम जिम्मेवार था, उस गांव का मंदिर आविष्ठ था, वही ज्यादा जिम्मेवार था। तो जिस गांव में मंदिर नहीं था, उससे दीन गांव नहीं था। कितना ही गरीब गांव हो, मंदिर तो उसका होना ही था।

मंदिर के बिना सब अस्त—व्यस्त था। हजारों वर्ष तक गांव ने एक तरह की पवित्रता कायम रखी। उस पवित्रता के बड़े अदृश्य स्रोत हैं।

पूरब की संस्कृति को तोड्ने के लिए जो सबसे बड़ा काम हो सकता था वह मंदिर के आविष्ट रूप को तोड़ देना था। मंदिर का आविष्ट रूप टूट जाए तो पूरब की पूरी संस्कृति का जो आत्‍मस्रोत है वह बिखर जाता है।
इसलिए आज मंदिर पर भारी संदेह है। और जो भी थोड़ा पढ़ा—लिखा हुआ, जिसे मंदिर के जीवन्त रूप का ‘कोई अनुभव नहीं रहा, उसने केवल शब्द और तर्क सीखे स्कूल और कालेज में।

जिसके पास सिर्फ बुद्धि रही और हृदयगत कोई द्वार न रहा, उसे मंदिर के पास जाकर कुछ दिखाई नहीं पड़ा। उसने कहा, कुछ भी नहीं है मंदिर में। धीरे— धीरे मंदिर का अर्थ टूटता चला गया।

भारत पुन: कभी भारत नहीं हो सकता जब तक उसका मंदिर जीवन्त न हो जाए। उसकी सारी कीमिया, सारी अल्केमी ही मंदिर में थी, जहां से उसने सब कुछ लिया था। चाहे बीमार हुआ हो तो मंदिर भागकर गया था, चाहे दुखी हुआ तो मंदिर भागकर गया, चाहे सुखी हुआ तो मंदिर धन्यवाद देने गया था। घर में खुशी आई हो तो मंदिर में प्रसाद चढ़ा आया। घर में तकलीफ आयी हो तो मंदिर में निवेदन कर आया।

सब कुछ उसका मंदिर था। सारी आशाएं सारी आकांक्षाऐं सारी अभीप्साएं उसकी मंदिर के आस—पास थीं। खुद कितना ही दीन रहा हो, मंदिर को उसने सोने और हीरे—जवाहरातों से सजा रखा था।

आज जब हम सोचने बैठते हैं तो यह बिलकुल पागलपन मालूम पड़ता है कि आदमी भूखों मर रहा है और मंदिर की प्रतिष्ठा हो रही है। मंदिर को हटाओ, एक अस्पताल बना लो। एक स्कूल खोल दो। इसमें शरणार्थी ही ठहरा दो। इस मंदिर का कुछ उपयोग कर लो। क्योंकि मंदिर का वास्तविक उपयोग हमें पता नहीं है, इसलिए वह बिलकुल निरुपयोगी मालूम हो रहा है। लगता है उसमें कुछ भी तो नहीं है। फिर मंदिर में क्या जरूरत है सोने की, क्या जरूरत है चांदी की, और मंदिर में क्या जरूरत है हीरों की, जब कि लोग भूखों मर रहे हैं!

लेकिन ध्यान रहे भूखों मरनेवाले लोगों ने ही हीरा और सोना बहुत दिन से लगा रखा है। उसके कुछ कारण थे। जो भी उन लोगों के पास श्रेष्ठ था वह मंदिर में रख आए थे। क्योंकि जो भी उन्होंने श्रेष्ठ जाना था वह मंदिर से ही जाना था। इसके उत्तर में उनके पास कुछ देने को नहीं था। न सोना कोई उत्तर था, न हीरे कोई उत्तर थे।

लेकिन जो मिला था मंदिर से, उसके प्रति कृतज्ञता से भरकर हम सब कुछ वहां दे सकते थे। जो भी था हम वहां रख आए थे। अकारण नहीं था वह। क्योंकि लाखों साल तक अकारण कुछ नहीं चलता। ये मंदिर के बाहरी उसके आविष्ट रूप के अदृश्य परिणाम थे, जो चौबीस घण्टे तरंगायित होते रहते थे। उसके चेतन परिणाम भी थे। उसके चेतन परिणाम बहुत सीधे साफ थे।

तो मंदिर गांव के बीच में निर्मित करते थे ताकि दिन में दस बार आते—जाते रहें। वह हमारी आकांक्षा को भी निरत्तर जगाए रखे। और ध्यान रहे, हममें से बहुत कम ऐसे हैं जिनकी आकांक्षा सहज आंतरिक रूप से जगती है। हममें से बहुत आकांक्षाएं सिर्फ चीजों को देखकर ही जगती हैं।

मंदिर एक बिलकुल अलग डायमेंशन है जहां लेने—देने की दुनिया नहीं है। इसलिए जिन्होंने मंदिर को लेन—देन की दुनिया बनाया उन्होंने मंदिर को गिराया। जिन्होंने मंदिर को बाजार बनाया, उन्होंने मंदिर को नष्ट किया। जिन्होंने मंदिर को भी दुकान बना लिया, उन्होंने मंदिर को नष्ट कर दिया।

मंदिर लेन—देन की दुनिया नहीं है। सिर्फ एक विश्राम है। एक विराम है, जहां आप सब तरफ के थके—मांदे चुपचाप सिर छिपाते हैं। वहां की कोई शर्त नहीं है कि आप इस शर्त से आओ। इतना धन हो तो आओ, इतना शान हो तो आओ, कि इतनी प्रतिष्ठा हो तो आओ, कि ऐसे कपड़े पहनकर आओ, कि मत आओ। वहां की कोई शर्त नहीं है।

आप जैसे हो, मंदिर आपको स्वीकार कर लेगा। कहीं कोई जगह है जहां जैसे आप हो वैसे ही आप स्वीकृत हो जाओगे, ऐसा भी सरल स्थल है।
आपकी जिन्दगी में हर वक्त ऐसे मौके आये होंगे जब कि जो जिन्दगी है तथाकथित, उससे आप ऊबे होंगे, उस क्षण प्रार्थना का दरवाजा खुला होगा!

और एक दफा भी वह दरवाजा आपके भीतर भी खुल जाए तो फिर दुकान में भी खुला रहेगा, मकान में भी खुला रहेगा।

वह द्वार निरंत्तर पास होना चाहिए, जब आप चाहो वहां पहुंच सको। क्योंकि आपके बीच जिसको हम विराट का क्षण कहें वह बहुत अल्प है। कभी क्षणभर को होता है। जरूरी नहीं कि आप तीर्थ जा सको, जरूरी नहीं कि महावीर को खोज सको, कि बुद्ध को खोज सको।

वह क्षण अल्प है, उस क्षण बिलकुल निकटतम आपके कोई जगह होनी चाहिए जहां आप प्रवेश कर सकें। इस स्मृति के अदभुत परिणाम हैं। जैसे छोटे बच्चे हैं—हम सभी छोटे बच्चे थे, और जो भी होगा वह छोटा बच्चा ही होगा पहले तो।
ओशो
गहरे पानी पैठ01

*विराट ध्यान आंदोलन की आवश्यकता:*मनुष्य—जाति के इतिहास में आनेवाले कुछ वर्ष बहुत महत्वपूर्ण हैं। और अगर एक बहुत बड़ी स्‍प...
24/10/2025

*विराट ध्यान आंदोलन की आवश्यकता:*
मनुष्य—जाति के इतिहास में आनेवाले कुछ वर्ष बहुत महत्वपूर्ण हैं। और अगर एक बहुत बड़ी स्‍प्रिचुएलिटी का जन्म नहीं हो सकता— अब आध्यात्मिक लोगों से काम नहीं चलेगा— अगर आध्यात्मिक आंदोलन नहीं हो सकता, कि लाखों—करोड़ों लोग उससे प्रभावित हो जाएं, तो दुनिया को भौतिकवाद के गर्त से बचाना असंभव है।

और बहुत मोमेंटस क्षण हैं कि पचास साल में भाग्य का निपटारा होगा—या तो धर्म बचेगा, या निपट अधर्म बचेगा। इन पचास साल में बुद्ध, महावीर, कृष्ण, मोहम्मद, राम, जीसस, सबका निपटारा होने को है।

इन पचास सालों में एक तराजू पर ये सारे लोग हैं और दूसरे तराजू पर सारी दुनिया के विक्षिप्त राजनीतिज्ञ, सारी दुनिया के विक्षिप्त भौतिकवादी, सारी दुनिया के भ्रांत और अज्ञान में स्वयं और दूसरों को भी धक्का देनेवाले लोगों की बड़ी भीड़ है। और एक तरफ तराजू पर बहुत थोड़े से लोग हैं। पचास सालों में निपटारा होगा।

वह जो संघर्ष चल रहा है सदा से, वह बहुत निपटारे के मौके पर आ गया है। और अभी तो जैसी स्थिति है उसे देखकर आशा नहीं बंधती। लेकिन मैं निराश नहीं हूं क्योंकि मुझे लगता है कि बहुत शीघ्र बहुत सरल—सहज मार्ग खोजा जा सकता है जो करोड़ों लोगों के जीवन में क्रांति की किरण बन जाए।

और अब इक्का—दुक्का आदमियों से नहीं चलेगा। जैसा पुराने जमाने में चल जाता था कि एक आदमी ज्ञान को उपलब्ध हो गया। अब ऐसा नहीं चलेगा। ऐसा नहीं हो सकता। अब एक आदमी इतना कमजोर है, क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ पैदा हुई है, इतना बड़ा एक्सप्लोजन हुआ है जनसंख्या का कि अब इक्का—दुक्का आदमियों से चलनेवाली बात नहीं है। अब तो उतने ही बड़े व्यापक पैमाने पर लाखों लोग अगर प्रभावित हों, तो ही कुछ किया जा सकता है।

लेकिन मुझे दिखाई पड़ता है कि लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं। और थोड़े से लोग अगर न्युक्लियस बनकर काम करना शुरू करें तो यह हिंदुस्तान उस मोमेंटस फाइट में, उस निर्णायक युद्ध में बहुत कीमती हिस्सा अदा कर सकता है। कितना ही दीन हो, कितना ही दरिद्र हो, कितना ही गुलाम रहा हो, कितना ही भटका हो, लेकिन इस भूमि के पास कुछ संरक्षित संपत्तियां हैं।

इस जमीन पर कुछ ऐसे लोग चले हैं, उनकी किरणें हैं, हवा में उनकी ज्योति, उनकी आकांक्षाएं सब पत्तों—पत्तों पर खुद गई हैं। आदमी गलत हो गया है, लेकिन अभी जमीन के कणों को बुद्ध के चरणों का स्मरण है। आदमी गलत हो गया है, लेकिन वृक्ष पहचानते हैं कि कभी महावीर उनके नीचे खड़े थे। आदमी गलत हो गया है, लेकिन सागर ने सुनी हैं और तरह की आवाजें भी। आदमी गलत हो गया है, लेकिन आकाश अभी भी आशा बांधे है। आदमी भर वापस लौटे तो बाकी सारा इंतजाम है।

तो इधर मैं इस आशा में निरंतर प्रार्थना करता रहता हूं कि कैसे लाखों लोगों कै जीवन में एक साथ विस्फोट हो सके। आप उसमें सहयोगी बन सकते हैं। आपका अपना विस्फोट बहुत कीमती हो सकता है— आपके लिए भी, पूरी मनुष्य—जाति के लिए भी। इस आशा और प्रार्थना से ही इस शिविर से आपको विदा देता हूं कि आप अपनी ज्योति तो जलाएंगे ही, आपकी ज्योति दूसरे बुझे दीयों के लिए भी ज्योति बन सकेगी।

ध्यान का प्रचार और प्रसार नहीं करना होता। प्रचार और प्रसार से ही तो सारी बातें झूठी हो गयी हैं। लोग तोते हो गये हैं। ध्य...
24/10/2025

ध्यान का प्रचार और प्रसार नहीं करना होता। प्रचार और प्रसार से ही तो सारी बातें झूठी हो गयी हैं। लोग तोते हो गये हैं। ध्यान का तो सिर्फ आचार करना होता है। प्रचार और प्रसार तो आचार के पीछे छाया की तरह चलते हैं।

*मैं तुमसे यह नहीं कहता हूँ कि तुम जाओ और ध्यान का प्रचार करो, मैं तुमसे कहता हूँ जाओ और ध्यान को जियो। जोर जीने पर है।* उस जीने में जो तुम्हें मिलेगा, जो गंध तुमसे उठेगी, वही अगर प्रचार बन जाए तो बन जाए, लेकिन चेष्टा से कोई प्रचार नहीं करना है। नहीं तो अक्सर यह हो जाता है कि लोग भूल ही जाते हैं कि ध्यान करना है, ध्यान का प्रचार करने में मजा लेने लगते हैं। असल में प्रचार करना इतना सस्ता और सरल है, ध्यान करना कठिन मालूम होता है। यह भूल ही जाते हैं कि अपना ध्यान हुआ या नहीं हुआ। दूसरे को ज्ञान देने का मजा ऐसा है! क्योंकि ज्ञान देने में तुम्हारे अहंकार की बड़ी तृप्ति होती है कि देखो, मैं ज्ञानी और तुम अज्ञानी। जब भी तुम किसी को ज्ञान देते हो, तुम ज्ञानी और वह अज्ञानी।

तो लोग ध्यान के प्रचार में लग जाते हैं, ध्यान के व्यवहार में नहीं। यह खतरा बहुत बार हो गया है। कितने ईसाई मिशनरी हैं दुनिया में! दस लाख ईसाई पादरी हैं सारी दुनिया में। ये भूल ही गये कि इनको क्राइस्ट होना है। ये क्राइस्ट के प्रचार में ही लगे हैं। ये भूल ही गये कि क्राइस्ट को भीतर बुलाना है। फुर्सत कहां? समय कहां? प्रचार से बचें तब! फिर प्रचार के बड़े- बड़े आयोजन किये जाते हैं। फिर प्रचार का शास्त्र निर्मित करना होता है।..

ध्यान का विश्वव्यापी प्रचार व प्रसार अत्यत जरूरी हो गया है। चिन्मय!तुम खतरनाक बात पूछ रहे हो। तुम कह रहे हो कि करना पड़ेगा! अत्यंत जरूरी हो गया है! लोगों को बदल कर रखना पड़ेगा! यही चलता रहा है इस दुनिया में। जब इस्लाम आया तो मुसलमानों ने कहा कि दुनिया को मुसलमान बना कर रखना पड़ेगा, इससे कम में काम नहीं चलेगा। ख्याल रखना, उनकी भी बड़ी अच्छी आकांक्षा। क्योंकि इस्लाम के बिना उद्धार कहां?अज्ञानी भटक रहे हैं—कोई हिंदू है, कोई ईसाई है, कोई यहूदी है, इन अज्ञानियों को सबको रास्ते पर लाना है। जरा उनकी करुणा तो देखो! फिर अगर ये रास्ते पर अज्ञानी अपने आप नहीं आते तो भी लाना तो है ही। तो फिर तलवार से भी लाना पड़े तो लाना है। उनकी दया तो देखो! तलवार तक उठायी अज्ञानियों को ज्ञान के रास्ते पर लाने के लिए! अगर जिंदा न आओ तो मुर्दा, मगर लाना तो है। जरा उनकी अनुकंपा का तो खयाल’ करो! पाकर ही रहना है! अच्छी-अच्छी बातों के पीछे बड़े खतरनाक इरादे छिप जाते हैं।

इस्लाम अच्छा, सुंदर भाव है। मगर तलवार उठा ली। इस्लाम का अर्थ होता है- शांति। शब्द का अर्थ होता है, शांति। और तलवार उठायी शांति में से। आदमी ऐसा अद्भुत है। ध्यान में से तलवार उठा सकता है, जब शांति में से उठा ली। करवा के ही रहना है ध्यान। जिंदा करो तो जिंदा, मुर्दा करो तो मुर्दा, लेकिन ध्यान तो करवा के ही रहेंगे! जिंदा कि मुर्दा, लेकिन बदलाहट तो करवानी है। ईसाई भी इस चिंता में लगे हैं कि सारी दुनिया को ईसाई बना देना है। क्योंकि जो ईसाई नहीं होगा वह नर्क जाएगा। उनका प्रेम तो देखो! जरा उनका प्रेम परखो! क्योंकि जो ईसाई नहीं, वह नर्क जाएगा। स्वर्ग भेजने का एक ही उपाय है—ईसाई! एक ही दरवाजा है। तो जबरदस्ती भी लेकिन भेजना तो पड़ेगा ही। तुम कितने ही चिल्लाओ कि मुझे नहीं जाना है स्वर्ग, वे कहते हैं——हम भेजेंगे। अनिवार्य हो गया है, सभी को जाना पड़ेगा। और जब स्वर्ग भी अनिवार्य हो जाता तो नर्क हो जाता है। अनिवार्यता में नर्क है। स्वतंत्रता में स्वर्ग है।

इस भाषा में मत सोचो कि अत्यंत जरूरी हो गया है, क्योंकि इससे खतरा पैदा होता है। जब भीतर तुम्हारे भाव उठता है कि अत्यंत जरूरी हो गया, तो अब सब दांव पर लगा दो कि अब आदमी को ध्यान करवा के रहेंगे।
नहीं!
प्रचार से नहीं! तुम्हारे जीवन की ज्योति जले। जो संन्यास तुम्हारे जीवन में आया है, इसकी मस्ती किसी को अगर मोह ले, तो ठीक!
बस!
कोई आयोजन नहीं करना है! बहुत आयोजन हो चुके मनुष्य जाति के इतिहास में,आदमी को अच्छा बनाने के, सब असफल हो गये हैं। अब कोई आयोजन अच्छा बनाने का मत करना। आदमी अच्छा है, जैसा है। तुम अगर और इससे बेहतर हो सकते हो तो हो जाओ। बस तुम्हारे बेहतर हो जाने से ही कोई क्रांति की प्रक्रिया शुरू होती है, श्रृखला शुरू होती है। एक दीये से दूसरा दीया जल जाता है, दूसरे से तीसरा दीया जल जाता है। और हम आशा कर सकते हैं कि अगर असली दीये जलते रहेंगे तो कभी यह पूरी पृथ्वी दीपमालिका बन सकती है। मगर जोर-जबरदस्ती नहीं!!

और प्रचार जोर-जबरदस्ती है। वह बड़ी सूक्ष्म प्रक्रिया है,लोगों के ऊपर थोपने की। नहीं,थोपना नहीं *न ध्यान, न संन्यास!* आविर्भाव होने दो!अपने-आप आने दो!

सहजस्फूर्त जो है, वही सुंदर है, वही सत्य है, वही शिव है!!

'उपासना' चेष्टारहित चेष्टा हैं!

*ओशो*

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