17/02/2022
भगवद चिन्तन
*" तृष्णा "*
यहाँ प्रत्येक वस्तु, पदार्थ और व्यक्ति एक ना एक दिन सबको जीर्ण-शीर्ण अवस्था को प्राप्त करना है। जरा ( जरा माने -नष्ट होना, बुढ़ापा या काल) किसी को भी नहीं छोड़ती।
" तृष्णैका तरुणायते "
लेकिन तृष्णा कभी वृद्धा नहीं होती सदैव जवान बनी रहती है और ना ही इसका कभी नाश होता है। घर बन जाये यह आवश्यकता है, अच्छा घर बने यह इच्छा है और एक से क्या होगा ? दो तीन घर होने चाहियें , बस इसी का नाम तृष्णा है।
तृष्णा कभी ख़तम नहीं होती। विवेकवान बनो, बिचारवान बनो, और सावधान होओ। खुद से ना मिटे तृष्णा तो कृष्णा से प्रार्थना करो। कृष्णा का आश्रय ही तृष्णा को ख़तम कर सकता है।
तृष्णा हमेशा माया की ओर ले जाती हे, जैसे एक बार दल दल में फस जाते है,जितने बाहर आने का प्रयास करते है उतना ही ज्यादा फस ते जाते है,आखिर उसमे ही डूब के मरना होगा।
कृष्णा याने तृष्णा से दूर हो जाना माया से पर होना अपने मूल रूप परमात्मा में लीन होना ।अपने आप में स्थित होना ।
इसी लिए एक बार तृष्णा को ठग ले, माया को ठग ले,फिर जन्म मरण के चक्कर मुक्त हो जाते है।
माया ऐसी ठगनी ठग सके ना कोई।
एक बार माया को ठग ले फिर मरना ना होय।।
*ख्वाव देखे इस कदर मैंने*
*पूरे होते तो कहाँ तक होते*
हरेकृष्ण-🙏हरिबोल