16/11/2025
मेडिकल प्रोफेशन की वास्तविकता : बढ़ती बेरोजगारी का गंभीर संकेत
मेडिकल क्षेत्र में बढ़ती बेरोजगारी अब किसी भ्रम का विषय नहीं रही। विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में युवा डॉक्टर्स आज ऐसे काम करने के लिए मजबूर हैं, जिन्हें सामान्यतः 10वीं–12वीं पास युवक करते आए हैं।
काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, परंतु कठिन परिश्रम से प्राप्त योग्यता के अनुरूप रोजगार न मिलना स्वयं उस योग्यता के साथ अन्याय है।
साढ़े पाँच वर्ष की कठिन पढ़ाई, इंटर्नशिप, प्रतियोगी परीक्षाओं और अनगिनत संघर्षों के बाद यदि एक MBBS डॉक्टर को गिग वर्कर की तरह काम करना पड़े, तो उसकी हताशा और पीड़ा समझना कठिन नहीं।
स्थिति तब और मार्मिक हो जाती है जब परिवार ने उस शिक्षा के लिए जमीन बेची हो या भारी कर्ज लिया हो—एक करोड़ तक की फीस कोई सामान्य बोझ नहीं। ऐसे में पूरे परिवार का टूट जाना स्वाभाविक है।
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क्या मेडिकल शिक्षा पर कोई नियंत्रण नहीं?
देश में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि:
क्या कोई ऐसी स्वतंत्र एजेंसी नहीं जो निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस की तार्किकता की जांच कर सके?
क्या नीति आयोग में कोई ऐसा निष्पक्ष अधिकारी नहीं जो सरकार को यह स्पष्ट रूप से बता सके कि देश को अब नए मेडिकल कॉलेजों की नहीं, बल्कि मौजूदा संसाधनों के बेहतर उपयोग की आवश्यकता है?
मेडिकल कॉलेजों की अनियंत्रित बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव युवाओं के भविष्य पर पड़ रहा है। जिस अनुपात में सीटें बढ़ रही हैं, रोजगार के अवसर उतनी गति से नहीं बन रहे। आने वाले वर्षों में स्थिति यह भी हो सकती है कि बेरोजगारी चरम पर पहुँचे और मेडिकल कॉलेजों को ही प्रवेशार्थी न मिलें। पर तब तक हज़ारों युवाओं का भविष्य दांव पर लग चुका होगा।
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सरकारी स्वास्थ्य योजनाएँ और रोजगार की विडंबना
विरोधाभास यह है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रसार से रोजगार बढ़ना चाहिए था, परंतु हुआ इसके उलट।
आज छोटे क्लीनिक या कम निवेश वाले नर्सिंग होम चलाना लगभग असंभव हो गया है, क्योंकि मरीज अब केवल उन्हीं बड़े अस्पतालों में जाना चाहते हैं जो सभी सरकारी योजनाओं से संबद्ध हों।
छोटे, नए या व्यक्तिगत स्तर पर चलाए जाने वाले चिकित्सा प्रतिष्ठान धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।
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चुनौती कितनी बड़ी?
सच्चाई यह है कि मेडिकल एजुकेशन अब एक “उद्योग” बन चुका है—वार्षिक कारोबार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक।
और इस उद्योग को चलाने के लिए ईंधन के रूप में युवाओं के सपनों, संघर्षों और भविष्य को लगातार उपयोग में लाया जा रहा है।
यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि चिकित्सा पेशे के सामने खड़ी एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती है।
यदि समय रहते ठोस नीति नहीं बनी, तो भारत आने वाले वर्षों में योग्य लेकिन बेरोजगार डॉक्टर्स की अभूतपूर्व भीड़ देखेगा।
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– डॉ. राहुल सिंह गौर