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07/01/2026

*पितृदोष : एक परिवार की कहानी*

🔆 संवाद के माध्यम से विस्तृत और रोचक केस स्टडी

🔆स्थान: शांत, धूप-दीप से सुगंधित परामर्श कक्ष

पात्र:

🔆Client (परिवार के मुखिया)

🔆Guide (ज्योतिष मार्गदर्शक)

*Client (गहरी सांस लेते हुए):

गुरुजी, समझ नहीं आता—हमारा परिवार मेहनती है, ईमानदार है,
फिर भी हर काम आधे रास्ते में अटक जाता है।
लगता है जैसे कोई अदृश्य दीवार हमारे सामने खड़ी है।

Guide (मुस्कान के साथ):

अदृश्य दीवार—बहुत सही शब्द चुना आपने।
जब बाधा दिखाई न दे,
तो अक्सर उसका कारण भी सूक्ष्म और वंशानुगत होता है।

Client:

आपका संकेत… पितरों की ओर है?

Guide:

हाँ।
जब किसी परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी

आर्थिक अस्थिरता

विवाह में विलंब

स्वास्थ्य का अचानक बिगड़ना

और घर में कारणहीन तनाव

दिखे,
तो ज्योतिष इसे पितृदोष के संकेत मानता है।

*ज्योतिषीय विश्लेषण* (Astrological Insight)

Guide:

आपकी कुंडली में तीन बातें बहुत स्पष्ट हैं:

1. सूर्य पीड़ित है — वंश, पिता और आत्मबल कमजोर पड़ता है

2. नवम भाव बाधित है — पितृ ऋण और भाग्य में अवरोध

3. पंचम भाव पर प्रभाव — संतान, भविष्य और वंश-प्रवाह में रुकावट

इसका अर्थ है—
👉 पितृ ऊर्जा आगे प्रवाहित नहीं हो पा रही।

Client (भावुक होकर):

पर हमने तो किसी का अपमान नहीं किया,
फिर यह ऋण क्यों?

Guide (गंभीर लेकिन शांत):

पितृदोष अपराध का दंड नहीं,
कर्तव्य की स्मृति है।

कभी:

श्राद्ध और स्मरण में लापरवाही

कभी असमय या पीड़ादायक देहांत

कभी पूर्वजों के अधूरे दान-पुण्य

ये सब कर्मिक स्मृति बनकर वंश में चलती रहती है।

समाधान की दिशा — तीन स्तरों पर उपाय

Client:

तो गुरुजी, ऐसा क्या करें
कि यह चक्र टूटे—सिर्फ पूजा तक सीमित न रहे?

Guide (आश्वस्त स्वर में):

समाधान तब प्रभावी होता है
जब वह तीन स्तरों पर किया जाए

ज्योतिषीय, आध्यात्मिक और ऊर्जा स्तर।

1️⃣ पितृदोष निवारण कवच (Spiritual Anchor)

Guide:

सबसे पहले आवश्यक है
एक ऐसा साधन जो पितरों और परिवार के बीच
ऊर्जा-संवाद का माध्यम बने।

पितृदोष निवारण कवच
मंत्र-संस्कार से सक्रिय किया गया कवच है।

यह पितरों को स्मरण का संकेत देता है

पितृ ऋण शमन की प्रक्रिया आरंभ करता है

परिवार के चारों ओर एक सूक्ष्म सुरक्षा घेरा बनाता है

यह केवल धारण नहीं,
संकल्प का प्रतीक है।

2️⃣ पितृदोष निवारण अरोमा ऑयल (Subtle Healing Layer)

Guide:

लेकिन वर्षों से घर में जमा
सूक्ष्म असंतुलन को शांत करना भी उतना ही ज़रूरी है।

इसीलिए
पितृदोष निवारण अरोमा ऑयल का उपयोग किया जाता है।

यह घर की ऊर्जा को शांत और स्वीकार्य बनाता है

ध्यान और दीपक के साथ प्रयोग करने पर
वातावरण में गहरा सुकून आता है

मन, स्थान और स्मृति—तीनों स्तरों पर कार्य करता है

3️⃣ ज्योतिषीय उपाय (Astrological Remedies)

Guide:

अब आते हैं कुछ व्यावहारिक ज्योतिषीय उपायों पर—
जो इस प्रक्रिया को गति देते हैं:

🔹 उपाय 1: सूर्य को पितृ अर्घ्य

अमावस्या या रविवार को

जल में काले तिल मिलाकर

सूर्य को अर्घ्य देते समय
पितरों के प्रति कृतज्ञता भाव रखें

👉 यह सूर्य और पितृ दोनों को बल देता है।

🔹 उपाय 2: नवम भाव शांति दान

गुरुवार को

भोजन या आवश्यक वस्तुओं का दान

दान करते समय मन में पितृ स्मरण

👉 यह भाग्य और पितृ ऋण—दोनों को संतुलित करता है।

🔹 उपाय 3: अमावस्या पितृ संकल्प

अमावस्या की संध्या

शांत बैठकर

केवल इतना भाव रखें:
“यदि कोई पितृ कर्तव्य अधूरा रहा हो, तो हम उसे पूर्ण करने का संकल्प लेते हैं।”

👉 यही संकल्प सबसे शक्तिशाली होता है।

परिणाम (3–6 महीनों में अनुभव)

Client (हल्के मन से):

गुरुजी, अब घर में वह भारीपन नहीं है।
निर्णय स्पष्ट हो रहे हैं।
काम रुक नहीं रहा—धीरे सही, पर आगे बढ़ रहा है।

Guide (मुस्कुराते हुए):

यही पितृ कृपा का संकेत है।

> “जब वंश की जड़ें संतुष्ट होती हैं,
तो जीवन की शाखाएँ स्वतः फल देने लगती हैं।”

निष्कर्ष

पितृदोष भय का विषय नहीं,
बल्कि वंश की पुकार है।

जो परिवार इसे
समझ, श्रद्धा और सही उपायों के साथ स्वीकार करता है—
उसका भविष्य हल्का, स्थिर और सुरक्षित हो जाता है।

Presented by-
*🔯 Shri Rang Astro Vastu*

Welcome Welcome to Shri Rang Astro Vastu, a trusted centre of Vedic guidance where ancient wisdom is applied with clarity, responsibility, and practicality for today’s life challenges. Our work integrates Astrology, Vastu Shastra, Aura Aroma Vastu, Aroma Oils, Crystal Bracelets, Gemstone Guidance,

07/01/2026

*✡️गीता ज्ञान लेखमाला 9 ✡️*

“स्थितप्रज्ञ के लक्षण”

भाग 9 — श्लोक 64 (विस्तृत विवेचन)

🕉️ श्लोक 64

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

🔹 शब्दार्थ (धीरे–धीरे समझें)

राग — आकर्षण, खिंचाव

द्वेष — नफरत, विरोध

वियुक्तैः — रहित होकर

विषयान् चरन् — विषयों के बीच रहते हुए

इन्द्रियैः — इन्द्रियों द्वारा

आत्मवश्यैः — आत्मा के वश में आई हुई

विधेयात्मा — अनुशासित चित्त वाला

प्रसादम् — आंतरिक शांति

अधिगच्छति — प्राप्त करता है

🌿 सरल भावार्थ

जो व्यक्ति
राग और द्वेष से मुक्त होकर,
अपने नियंत्रण में आई हुई इन्द्रियों के माध्यम से
संसार के विषयों में रहता है —
वह आंतरिक शांति (प्रसाद) को प्राप्त करता है।

🔍 गहन विवेचन (यहाँ से असली गीता शुरू होती है)

यह श्लोक एक बहुत बड़ा भ्रम तोड़ता है।

❌ भ्रम:

> “स्थितप्रज्ञ बनने के लिए विषयों को छोड़ना पड़ेगा”

✅ श्रीकृष्ण का सत्य:

> विषय नहीं, राग-द्वेष छोड़ो।

1️⃣ स्थितप्रज्ञ विषयों में रहता है

श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं —
“विषयान् चरन्”
अर्थात् विषयों में चलते हुए।

स्थितप्रज्ञ:

घर छोड़ता नहीं

कर्म छोड़ता नहीं

समाज से भागता नहीं

➡️ वह संसार में पूरा उपस्थित रहता है।

2️⃣ असली बंधन — राग और द्वेष

दो ही चीज़ें मनुष्य को बाँधती हैं:

राग — “यह मुझे ही चाहिए”

द्वेष — “यह मुझे नहीं चाहिए”

स्थितप्रज्ञ:

पसंद होने पर भी चिपकता नहीं

नापसंद होने पर भी टूटता नहीं

➡️ यही मानसिक स्वतंत्रता है।

3️⃣ आत्मवश्य इन्द्रियाँ — अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द

यहाँ श्रीकृष्ण इन्द्रियों को नकारते नहीं।

वे कहते हैं —

> इन्द्रियाँ रहें,
पर आत्मा के वश में रहें।

आँख देखे, पर भटके नहीं

जीभ चखे, पर वश में रहे

वाणी बोले, पर घायल न करे

➡️ यही वास्तविक योग है।

4️⃣ विधेयात्मा — भीतर का अनुशासन

विधेयात्मा का अर्थ है —

> जिसका मन स्वयं की सुनता है।

मन इन्द्रियों का गुलाम नहीं

बुद्धि मन के पीछे नहीं

विवेक चालक बनता है

➡️ यही स्थितप्रज्ञ का आंतरिक शासन है।

5️⃣ फल क्या है? — प्रसाद

श्रीकृष्ण अंतिम शब्द रखते हैं —
प्रसाद

यह खुशी नहीं

यह उत्साह नहीं

यह उत्तेजना नहीं

➡️ यह है गहरी, शांत, स्थिर शांति
जो परिस्थितियों से हिलती नहीं।

🌼 आज के जीवन में सीधा अर्थ

स्थितप्रज्ञ वह है जो:

सफलता में बहकता नहीं

असफलता में टूटता नहीं

संबंधों में अधिकार नहीं जमाता

और जीवन को शांति के साथ जीता है

✨ आज का चिंतन सूत्र

“संसार छोड़े बिना भी जो मुक्त है,
वही वास्तव में स्थितप्रज्ञ है।”





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04/01/2026

*ज्योतिषीय उपायों की प्रभावशीलता: कब और कैसे?*

*✓ १. भूमिका*
भारतीय ज्योतिष परंपरा में उपाय केवल ग्रहदोष-निवारण की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि वे कर्म-संशोधन, चित्त-शुद्धि तथा दैव–पुरुषार्थ के समन्वय का सूक्ष्म साधन माने गए हैं।
आधुनिक समय में जब उपायों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं, तब वस्तुतः दोष उपायों में नहीं, बल्कि उनके काल, पात्रता और विधि के अनुपालन में होता है।

शास्त्र स्पष्ट रूप से कहते हैं कि सभी कुंडलियों में सभी उपाय समान रूप से प्रभावी नहीं होते।
*उपाय तभी फलित होते हैं जब वे*
देश–काल–पात्र के अनुरूप हों
दशा–गोचर से संगत हों
तथा साधक के कर्म-स्तर के अनुकूल हों

*✓ २. उपायों का शास्त्रीय आधार*
*वैदिक मूल*
ऋग्वेद, अथर्ववेद एवं ब्राह्मण ग्रंथों में ग्रहों को दैवी शक्तियों के रूप में स्वीकार किया गया है।
अथर्ववेद में शांति, आयु, आरोग्य तथा ग्रह-शमन हेतु मंत्रात्मक विधान वर्णित हैं।

“ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
(तैत्तिरीयोपनिषद् – शिक्षा वल्ली, प्रथम अनुवाक)

यह मंत्र स्पष्ट करता है कि ग्रह-शांति का मूल आधार बाह्य कर्मकांड नहीं, बल्कि मंत्र-साधना और चेतना-शुद्धि है।

*होरा-ग्रंथों में उपाय*
बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ग्रह-शांति के लिए दान, जप, तप और उपासना को प्रमुख उपाय मानते हैं—

“दानैर्जपैस्तपोभिश्च ग्रहाः शान्तिमवाप्नुयुः।”
(बृहत् पराशर होरा – ग्रहशांति अध्याय)

अर्थात्—
ग्रह दान, जप और तप के द्वारा शांत होते हैं।

*✓ ३. उपायों के प्रकार एवं उनकी प्रभावशीलता*
*मंत्र उपाय*
मंत्र उपाय सर्वाधिक सूक्ष्म और प्रभावी माने गए हैं, क्योंकि वे सीधे ग्रह-तत्त्व की चेतना से जुड़े होते हैं।

प्रकार:
• बीज मंत्र → शीघ्र प्रभाव, पर उच्च पात्रता आवश्यक
• वैदिक मंत्र → स्थायी एवं सात्त्विक फल
• तांत्रिक मंत्र → तीव्र प्रभाव, पर कठोर अनुशासन अपेक्षित

“मन्त्रमूलं बलं देवानाम्।”
(तंत्रशास्त्र)

*कब प्रभावी होते हैं?*
• जब ग्रह जाग्रत अवस्था में हो
• जब उसकी दशा या अंतरदशा चल रही हो
• जब साधक का चित्त सात्त्विक हो
*दान उपाय*
दान का संबंध कर्म-क्षय से है। शास्त्रों में इसे ऋण-शोधन का माध्यम कहा गया है।

“दानं तु पापकर्मणां क्षयकारणम्।”
(फलदीपिका)

*दान निष्फल कब होता है?*
• जब अहंकार से किया जाए
• जब ग्रह-तत्त्व के विपरीत हो
• जब श्रद्धा का अभाव हो
*रत्न उपाय*
रत्न उपाय सबसे अधिक विवादित माने जाते हैं। शास्त्रों में रत्न को ग्रह-ऊर्जा का संवाहक कहा गया है, किंतु,
“बलहीने ग्रहें रत्नं न धारयेत्।”
अर्थात् निर्बल या पापग्रह के लिए रत्न धारण वर्जित है।
रत्न तभी प्रभावी होते हैं जब—
• ग्रह शुभ या योगकारक हो
• ग्रह शड्बलयुक्त हो
• कुंडली में पापकर्तरी दोष न हो

*✓ ४. दशा–गोचर और उपाय*
*दशा की भूमिका*
यदि किसी ग्रह की महादशा या अंतरदशा नहीं चल रही हो, तो उसके उपाय सीमित फल देते हैं

“दशायां फलदं सर्वं…”
(ज्योतिष सूत्र)
अर्थात—
• दशा में → तीव्र फल
• गोचर में → सहायक फल
• निष्क्रिय ग्रह → न्यून प्रभाव

*✓ ५. कर्म-सिद्धांत और उपाय*
*कर्म के तीन प्रकार*
• संचित कर्म → उपायों से परिवर्तनीय
• प्रारब्ध कर्म → केवल तीव्रता में कमी संभव
• क्रियमाण कर्म → पूर्णतः परिवर्तनीय
“प्रारब्धं भुज्यते एव।”
*अतः उपाय भाग्य को मिटाते नहीं, बल्कि दुःख की तीव्रता को कम करते हैं।*
*✓ ६. उपायों की असफलता के प्रमुख कारण*
1. अशुद्ध कुंडली विश्लेषण
2. ग्रह-बल की उपेक्षा
3. दशा-काल का अज्ञान
4. साधक की अपात्रता
5. श्रद्धा का अभाव
6. उपायों का व्यवसायीकरण
*✓ ७. शास्त्रसम्मत उपाय-पद्धति (Ideal Framework)*
1. ग्रह-बल का परीक्षण
2. दशा–अंतरदशा निर्धारण
3. कर्म-स्तर का विश्लेषण
4. न्यूनतम उपाय से आरंभ
5. मंत्र को प्राथमिकता
6. आचार–विचार की शुद्धता
*✓ ८. दार्शनिक निष्कर्ष*
ज्योतिषीय उपाय कोई चमत्कार नहीं, बल्कि चेतना-संशोधन की वैज्ञानिक प्रक्रिया हैं।
वे तभी फलदायक होते हैं जब—

• उपाय शास्त्रसम्मत हों
• साधक पात्र हो
• काल अनुकूल हो
• कर्म परिवर्तनीय हो
“दैवं च पुरुषकारं च यः पश्यति स पण्डितः।”

*✓ ९. उपसंहार*
ज्योतिषीय उपायों की प्रभावशीलता पर संदेह नहीं, बल्कि उनके विवेकपूर्ण प्रयोग की आवश्यकता है।
उपाय भाग्य के विरुद्ध नहीं, बल्कि भाग्य के भीतर परिवर्तन का माध्यम हैं।
शास्त्र स्पष्ट करते हैं—
• उपाय अंधविश्वास नहीं
• उपाय कर्म-शोधन की वैज्ञानिक पद्धति हैं
• उपाय तभी फलित होते हैं जब कब और कैसे का ज्ञान हो

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01/01/2026

*यह रही शेष अक्षरों (T, U, V, W, X, Y, Z) से शुरू होने वाले नामों की विस्तृत जानकारी:*

T अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: चंद्रमा (Moon) - अंक 2 (20वां अक्षर, 2+0=2)
* व्यक्तित्व: ये लोग शांतिप्रिय (Peace Loving) और कूटनीतिक (Diplomatic) होते हैं। ये स्थितियों को संभालना जानते हैं और झगड़ों को सुलझाने में माहिर होते हैं। ये स्वभाव से संवेदनशील होते हैं और दूसरों की भावनाओं का खयाल रखते हैं।
* करियर: वकालत, मीडिया, पब्लिक रिलेशन या ऐसे क्षेत्र जहाँ बातचीत से मसले हल करने हों, वहां ये सफल होते हैं।
* प्रेम: ये बहुत ही रोमानी (Romantic) और भावुक होते हैं। रिश्तों में इन्हें सामंजस्य और शांति चाहिए होती है।
* कमी: ये छोटी-छोटी बातों पर तनाव (Tension) ले लेते हैं और कभी-कभी निर्णय लेने में दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं।

U अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: गुरु (Jupiter) - अंक 3 (21वां अक्षर, 2+1=3)
* व्यक्तित्व: ये लोग बहुत ही खुशमिजाज (Joyful) और रचनात्मक होते हैं। ये जीवन का भरपूर आनंद लेना जानते हैं। इनका भाग्य अक्सर इनका साथ देता है। ये बुद्धिमान होते हैं और हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करते हैं।
* करियर: मनोरंजन, फैशन, लेखन, या विज्ञापन की दुनिया में ये अच्छा नाम कमाते हैं।
* प्रेम: ये प्यार में दिल खोलकर खर्च करते हैं और अपने साथी को खुश रखने के लिए उपहार देना पसंद करते हैं। ये थोड़े चुलबुले स्वभाव के होते हैं।
* कमी: ये कभी-कभी बहुत लापरवाह हो जाते हैं और सही समय पर निर्णय नहीं ले पाते।

V अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: राहु (Rahu) - अंक 4 (22वां अक्षर, 2+2=4)
* व्यक्तित्व: V का मतलब है विजय (Victory)। ये लोग हार नहीं मानते। ये बहुत ही व्यावहारिक (Practical), मेहनती और भरोसेमंद होते हैं। इनकी याददाश्त बहुत तेज होती है। ये जो ठान लेते हैं, उसे पूरा करके ही दम लेते हैं।
* करियर: इंजीनियरिंग, तकनीकी क्षेत्र, बैंकिंग, या रेलवे जैसे व्यवस्थित क्षेत्रों में ये सफल होते हैं।
* प्रेम: ये प्यार में थोड़े पजेसिव (Possessive) हो सकते हैं, लेकिन ये बेहद वफादार होते हैं। ये एक बार किसी का हाथ थाम लें तो छोड़ते नहीं।
* कमी: ये काफी जिद्दी होते हैं और अपनी बात मनवाने के लिए अड़ जाते हैं।

W अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: बुध (Mercury) - अंक 5 (23वां अक्षर, 2+3=5)
* व्यक्तित्व: ये लोग बहुमुखी (Versatile) और थोड़े अशांत स्वभाव के होते हैं। इन्हें जीवन में रोमांच और बदलाव पसंद है। ये एक जगह टिक कर नहीं बैठ सकते। ये बहुत अच्छे बातचीत करने वाले होते हैं और लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।
* करियर: सेल्स, टूरिज्म, मीडिया, या ऐसा कोई भी काम जिसमें घूमना-फिरना या नए लोगों से मिलना हो।
* प्रेम: ये बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं, इसलिए इन्हें एक ऐसे साथी की जरूरत होती है जो इनके जीवन में रोमांच बनाए रखे।
* कमी: ये बहुत ही आवेगी (Impulsive) होते हैं और बिना सोचे-समझे जोखिम उठा लेते हैं।

X अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: शुक्र (Venus) - अंक 6 (24वां अक्षर, 2+4=6)
* व्यक्तित्व: (यह नाम बहुत कम होता है) ये लोग कलात्मक (Artistic) और संतुलित दिमाग वाले होते हैं। ये जीवन में ऐशो-आराम पसंद करते हैं। ये दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और जिम्मेदार होते हैं।
* करियर: कला, फैशन या शिक्षा के क्षेत्र।
* प्रेम: ये बहुत ही आकर्षक होते हैं और विपरीत लिंग को जल्दी प्रभावित कर लेते हैं। ये प्रेम में चंचल हो सकते हैं।
* कमी: ये कभी-कभी अपने वादों को पूरा करने में लापरवाह हो सकते हैं।

Y अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: केतु/नेपच्यून (Neptune) - अंक 7 (25वां अक्षर, 2+5=7)
* व्यक्तित्व: ये लोग स्वतंत्र विचारों (Independent) वाले होते हैं। इन्हें किसी के अधीन रहना पसंद नहीं होता। ये स्वभाव से थोड़े अंतर्मुखी और दार्शनिक होते हैं। ये भीड़ से अलग चलना पसंद करते हैं।
* करियर: रिसर्च, विज्ञान, ज्योतिष, या जासूसी।
* प्रेम: ये अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में संकोच करते हैं। इन्हें ऐसा साथी चाहिए जो इन्हें स्पेस (Space) दे।
* कमी: ये कभी-कभी बहुत अकेले रहना पसंद करते हैं जिससे लोग इन्हें घमंडी समझ लेते हैं।

Z अक्षर वाले जातक
* ग्रह स्वामी: शनि (Saturn) - अंक 8 (26वां अक्षर, 2+6=8)
* व्यक्तित्व: ये लोग बहुत शक्तिशाली (Powerful) और उच्च विचार वाले होते हैं। इनमें नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता होती है। ये बहुत ही व्यावहारिक होते हैं और कूटनीति से अपना काम निकलवा लेते हैं।
* करियर: राजनीति, बड़े व्यवसाय, या उच्च प्रशासनिक पद।
* प्रेम: ये अपने साथी की सुरक्षा (Protection) को लेकर बहुत गंभीर होते हैं। ये प्यार में दिखावा पसंद नहीं करते।
* कमी: इनका गुस्सा बहुत खराब होता है और ये जिद्दी हो सकते हैं।

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01/01/2026

*🔆मूलांक 1 का वार्षिक भविष्यफल 2026🔆*

🌻 श्री गुरुदेव दत्त 🌻

✡️ अंक ज्योतिष वार्षिक राशिफल 2026 ✡️

🔯 श्री रंग एस्ट्रो वास्तु 🔯

मूलांक 1 (Sun/सूर्य)
(उन सभी के लिए जिनका जन्म किसी भी महीने की 1, 10, 19 या 28 तारीख को हुआ है)
वर्ष 2026 का कुल योग भी 1 (2+0+2+6=10=1) है। जब मूलांक और वर्ष का अंक समान होता है, तो वह वर्ष उस व्यक्ति के जीवन में 'स्वर्ण काल' (Golden Period) की तरह कार्य करता है। यह वर्ष पूरी तरह से आपकी शक्ति, पद और प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाला है।
📊 परिणाम (Overview)
यह वर्ष आपके आत्मविश्वास (Confidence) और नेतृत्व क्षमता (Leadership) के शिखर पर होने का वर्ष है। चूँकि वर्ष का स्वामी भी सूर्य है और आपका स्वामी भी सूर्य है, आप इस वर्ष ऊर्जा से भरे रहेंगे। समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा। यदि आप किसी निर्णय को लेने में पिछले साल हिचकिचा रहे थे, तो 2026 में आप उसे दृढ़ता से लागू करेंगे। यह वर्ष 'नयी शुरुआत' का है।
💼 कार्य और वित्त (Work and Finance)
* करियर: नौकरीपेशा लोगों के लिए पदोन्नति (Promotion) के प्रबल योग हैं। उच्च अधिकारियों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। यदि आप सरकारी नौकरी या टेंडर के लिए प्रयास कर रहे हैं, तो 2026 सफलता लेकर आएगा।
* व्यापार: स्टार्टअप शुरू करने या अपने मौजूदा बिजनेस को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए यह सर्वोत्तम समय है। आप मार्केट में एक 'लीडर' बनकर उभरेंगे।
* वित्त: आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। निवेश से अच्छा लाभ मिलेगा, लेकिन सलाह है कि अति-आत्मविश्वास (Overconfidence) में आकर बिना जांचे-परखे बड़े निवेश से बचें।
❤️ संबंध (Relationships)
* प्रेम और विवाह: संबंधों में ऊर्जा बनी रहेगी, लेकिन यहाँ आपको सावधान रहने की आवश्यकता है। सूर्य का दोहरा प्रभाव आपके भीतर 'अहंकार' (Ego) बढ़ा सकता है। छोटी-छोटी बातों पर जीवनसाथी पर हावी होने की कोशिश न करें।
* परिवार: पिता के साथ संबंधों में सुधार होगा और उनका सहयोग मिलेगा। यदि आप अपनी वाणी में विनम्रता रखेंगे, तो यह वर्ष पारिवारिक सुख के लिए उत्तम है।
💡 सलाह (Advice)
यह वर्ष आपके लिए शक्ति का है, लेकिन "शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है।"
* उपाय: प्रतिदिन सुबह सूर्य को जल (अर्घ्य) दें और उसमें थोड़ा कुमकुम मिलाएं।
* मंत्र: 'ॐ घृणि: सूर्याय नमः' का जाप करें।
* सावधानी: क्रोध और अहंकार (Ego) को अपना दुश्मन मानें। आंखों और हड्डियों से जुड़ी समस्याओं के प्रति सचेत रहें।
* रंग: आपके लिए नारंगी (Orange), सुनहरा (Golden) और लाल रंग शुभ रहेंगे।

🔯 Shri Rang Astro Vastu
☀️ Astrology/Vastu/Numerology- Name correction/ Personalized Sigil/Aroma Oils/Crystals/Genuine Certified Gem Stones/Rudraksh/Vastu Products ☀️
📞 9825038089/9825098589

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29/12/2025

*✡️गीता ज्ञान लेखमाला✡️*

“स्थितप्रज्ञ के लक्षण”

भाग 8 — श्लोक 62 एवं 63

🕉️ श्लोक 62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

शब्दार्थ

ध्यायतः — बार-बार चिंतन करने से

विषयान् — विषयों का

सङ्गः — आसक्ति

कामः — इच्छा

क्रोधः — क्रोध

भावार्थ

विषयों का बार-बार चिंतन करने से
उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है।
आसक्ति से इच्छा जन्म लेती है
और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।

🕉️ श्लोक 63

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

शब्दार्थ

सम्मोहः — मोह, भ्रम

स्मृतिविभ्रमः — स्मृति का नाश

बुद्धिनाशः — विवेक का पतन

प्रणश्यति — पूर्ण पतन

भावार्थ

क्रोध से मोह उत्पन्न होता है,
मोह से स्मृति का नाश होता है,
स्मृति नष्ट होने पर बुद्धि नष्ट होती है
और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

🔍 गहन विवेचन

यह भाग गीता का सबसे मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक भाग है।
श्रीकृष्ण यहाँ पतन की पूरी श्रृंखला (Chain Reaction) बताते हैं।

🔗 पतन की पूरी श्रृंखला (एक दृष्टि में)

चिंतन → आसक्ति → इच्छा → क्रोध → मोह → स्मृति-भ्रंश → बुद्धि-नाश → पतन

➡️ ध्यान दीजिए —
पतन कर्म से नहीं,
चिंतन से शुरू होता है।

1️⃣ ध्यायतो विषयान् — सबसे पहला खतरा

गलती यह नहीं कि विषय सामने आए,
गलती यह है कि हम उन्हें मन में बैठा लें।

बार-बार वही सोचना

उसी की कल्पना करना

उसी में मन रमाना

➡️ यही बीज है।

2️⃣ आसक्ति से क्रोध तक

जब इच्छा पूरी नहीं होती —

व्यक्ति पर क्रोध

परिस्थिति पर क्रोध

स्वयं पर क्रोध

➡️ और यहीं से विवेक ढीला पड़ने लगता है।

3️⃣ स्मृति का नाश — सबसे खतरनाक मोड़

स्मृति का अर्थ है —

सीखा हुआ ज्ञान

अनुभव

संस्कार

गुरु-उपदेश

क्रोध में व्यक्ति —

> सब जानते हुए भी गलत करता है।

➡️ यही स्मृतिभ्रंश है।

4️⃣ बुद्धिनाश = आत्मघात

बुद्धि नष्ट होने का अर्थ —

सही-गलत का भेद समाप्त

दीर्घकालिक सोच समाप्त

परिणाम का भय समाप्त

➡️ यही वास्तविक पतन है।

🌼 स्थितप्रज्ञ यहाँ कहाँ जीतता है?

स्थितप्रज्ञ —

चिंतन के स्तर पर ही रोक देता है

विषय को मन में टिकने नहीं देता

इसलिए पूरी श्रृंखला टूट जाती है

➡️ यही कारण है कि
गीता में बार-बार मन और इन्द्रिय-संयम पर ज़ोर है।

✨ चिंतन सूत्र

“जिसने विचार को जीत लिया,
उसने पतन की पूरी श्रृंखला तोड़ दी।




28/12/2025

*✡️गीता ज्ञान लेखमाला 7✡️*

“स्थितप्रज्ञ के लक्षण”

भाग 7 — श्लोक 60 एवं 61

🕉️ श्लोक 60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

शब्दार्थ

यततः अपि — प्रयास करने पर भी

विपश्चितः पुरुषस्य — विवेकशील मनुष्य का

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि — चंचल और बलवती इन्द्रियाँ

मनः हरन्ति — मन को खींच लेती हैं

प्रसभम् — बलपूर्वक

🌿 भावार्थ

हे अर्जुन!
विवेकशील और साधनारत पुरुष का भी
मन —
ये चंचल इन्द्रियाँ
बलपूर्वक खींच ले जाती हैं।

🔍 गहन विवेचन (श्लोक 60)

यह श्लोक अत्यंत ईमानदार चेतावनी है।
श्रीकृष्ण यहाँ किसी को आदर्श नहीं बेचते।

वे स्पष्ट कहते हैं —

> ज्ञान होने मात्र से खतरा समाप्त नहीं होता।

🔹 महत्वपूर्ण संकेत

साधक गिर सकता है

ज्ञानी भी विचलित हो सकता है

वर्षों की तपस्या भी क्षण में डगमगा सकती है

➡️ कारण — इन्द्रियाँ अत्यंत बलवान हैं।

यह श्लोक साधक को —

अहंकार से बचाता है

सतर्क बनाता है

आत्म-सजगता सिखाता है

🕉️ श्लोक 61

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

शब्दार्थ

तानि सर्वाणि संयम्य — उन सभी इन्द्रियों को संयमित करके

युक्तः आसीत — योग में स्थित होकर

मत्परः — मुझे ही परम लक्ष्य मानकर

वशे यस्य इन्द्रियाणि — जिसकी इन्द्रियाँ नियंत्रण में हों

तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता — उसी की बुद्धि स्थिर है

🌿 भावार्थ

जो व्यक्ति
अपनी सभी इन्द्रियों को संयम में रखकर,
मुझ परम तत्व में स्थित होकर रहता है —
जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हैं,
उसी की बुद्धि वास्तव में स्थिर है।

🔍 गहन विवेचन (श्लोक 61)

यह श्लोक समाधान देता है।

1️⃣ केवल संयम नहीं, दिशा भी आवश्यक

श्रीकृष्ण कहते हैं —
केवल इन्द्रियों को रोकना पर्याप्त नहीं,
मन को उच्च लक्ष्य में लगाना होगा।

> खाली मन — इन्द्रियों का शिकार बनता है।

2️⃣ “मत्परः” — अत्यंत गूढ़ शब्द

यह केवल भक्ति नहीं,
यह केंद्र परिवर्तन है।

विषय से हटकर सत्य की ओर

भोग से हटकर बोध की ओर

अस्थिर से हटकर शाश्वत की ओर

➡️ जब लक्ष्य ऊँचा होता है,
तो इन्द्रियाँ स्वतः शांत होती हैं।

3️⃣ स्थितप्रज्ञ की निर्णायक पहचान

स्थितप्रज्ञ वह नहीं —

जिसे इन्द्रियाँ खींचती ही नहीं

स्थितप्रज्ञ वह है —

जिसे खींचने की शक्ति इन्द्रियों में नहीं बचती।

🌼 आज के जीवन में संकेत

यदि कोई व्यक्ति —

सावधान रहते हुए जीवन जीता है

सफलता के बाद भी सजग है

साधना में भी विनम्र है

तो वह श्लोक 60–61 के मार्ग पर है।

✨ चिंतन सूत्र

“सतर्कता ही साधक की वास्तविक सुरक्षा है।”




27/12/2025

*गीता ज्ञान लेखमाला*

“स्थितप्रज्ञ के लक्षण”

भाग 6 — श्लोक 59

🕉️ श्लोक 59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥

शब्दार्थ

विषयाः — विषय-वस्तुएँ (भोग)

विनिवर्तन्ते — दूर हो जाते हैं

निराहारस्य — उपवास करने वाले के

देहिनः — देहधारी मनुष्य के

रस-वर्जम् — रस (आकर्षण) को छोड़कर

परम् दृष्ट्वा — परम सत्य को देखकर

रसः अपि निवर्तते — रस भी समाप्त हो जाता है।

🌿 भावार्थ

उपवास या संयम से
मनुष्य के लिए विषय तो दूर हो जाते हैं,
पर उनका रस (आकर्षण) बना रहता है।
लेकिन जिसने परम सत्य का अनुभव कर लिया,
उसके लिए विषय ही नहीं,
उनका रस भी स्वतः समाप्त हो जाता है।

🔍 गहन विवेचन

यह श्लोक स्थितप्रज्ञ साधना का अत्यंत सूक्ष्म रहस्य खोलता है।
यह बताता है कि
सच्चा संयम बाहर से नहीं, भीतर से होता है।

1️⃣ केवल बाहरी त्याग पर्याप्त नहीं

श्रीकृष्ण यहाँ तपस्या या उपवास का खंडन नहीं करते,
पर उसकी सीमा दिखाते हैं।

भोजन छोड़ा, पर स्वाद की स्मृति रह गई

विषय छोड़े, पर कल्पना चलती रही

मौन रखा, पर मन बोलता रहा

➡️ यह निराहार है,
पर स्थितप्रज्ञता नहीं।

2️⃣ “रस” — असली बंधन

विषय नहीं बाँधते,
उनका रस बाँधता है।

धन नहीं, धन का आकर्षण

व्यक्ति नहीं, उससे जुड़ी अपेक्षा

सुख नहीं, सुख की लालसा

जब रस जीवित है,
विषय लौटने में देर नहीं लगती।

3️⃣ परं दृष्ट्वा — निर्णायक वाक्य

यह श्लोक का हृदय है।

“परं दृष्ट्वा” —
जब मनुष्य ने उससे श्रेष्ठ का स्वाद चख लिया—

गहरी शांति

आत्मतृप्ति

भीतर का आनंद

तब पुराने रस स्वयं फीके पड़ जाते हैं।

➡️ इसलिए स्थितप्रज्ञ का त्याग
संघर्ष से नहीं,
अनुभव से होता है।

4️⃣ स्थितप्रज्ञ का संयम कैसा होता है?

वह इच्छाओं को दबाता नहीं

वह उनसे लड़ता नहीं

वह उनसे ऊँचा उठ जाता है

जैसे — मोमबत्ती के सामने तारा फीका पड़ जाता है।

🌼 आज के जीवन में संकेत

यदि कोई व्यक्ति —

त्याग के बावजूद भीतर बेचैन है

संयम के बाद भी आकर्षण से जूझता है

तो समझिए — रस अभी शेष है।

और यदि —

बिना प्रयास इच्छाएँ गिरने लगी हैं

बिना संघर्ष शांति बनी रहती है

तो परं का स्पर्श हो चुका है।

✨ चिंतन सूत्र

“जो श्रेष्ठ का रस पा लेता है,
वह हीन को छोड़े बिना भी उससे मुक्त हो जाता है।”




26/12/2025

*Dollar v/s Rupees Game: An Outlook for 2026*

The year 2026 is astrologically distinct because of a major planetary shift:

Jupiter's exaltation (Guru Ucha) in the middle of the year. This suggests a year of two distinct halves—volatility followed by stabilization.

*Here is the detailed forecast for the Dollar (USD) against the Indian Rupee (INR) for 2026.*

💵 Economic Forecast for 2026:-

1. The "90" Threshold (First Half 2026)
Economic models suggest the continued pressure from late 2025 will spill into early 2026.

* Prediction: The Rupee is likely to trade in the ₹89.50 – ₹91.50 band during the first quarter.
* Reason: Global interest rate adjustments and potential trade tariffs (US policies) may keep the dollar strong initially.
2. Stabilization & Domestic Strength (Second Half 2026)
Unlike 2025, 2026 forecasts for India’s GDP are robust (6.5%–7% growth).
* Prediction: By mid-to-late 2026, the Rupee is expected to stabilize. While it may not drastically appreciate back to 85, it is likely to hold firm against further devaluation, potentially hovering around ₹90.00 – ₹92.00 without crashing to 100.

* Key Resistance: ₹94.00 is seen as the "worst-case" ceiling by most financial analysts for 2026.

🪐 Astrological Analysis 2026

The planetary council for 2026 brings significant changes for India’s financial chart (India's Independence chart is Ta**us Ascendant, Cancer Moon).
1. Saturn in Pisces (Shani in Meena) - All Year
* Effect: Saturn remains in the sign of Jupiter (Pisces) throughout 2026. Since Pisces is a water sign, this impacts oil prices, shipping, and import duties.
* Impact: Saturn imposes "financial discipline." It indicates that the RBI will maintain strict control. The Rupee will not "free fall" but will be heavily regulated. It is a slow, grinding energy—no sudden jackpots, but no sudden crashes either.
2. Jupiter Exalted in Cancer (Guru in Karka) - The Game Changer
* Event: On June 2, 2026, Jupiter moves from Gemini to Cancer.
* Significance: Cancer is Jupiter's Exalted Sign (Ucha Rashi). For India (ruled by Cancer Moon), this is a highly protective and auspicious transit.
* Impact: From June 2026 onwards, the Indian banking system and treasury will strengthen. This transit acts as a "divine shield" for the economy. Even if the Dollar gets strong globally, the Rupee will show surprising resilience and internal strength during the second half of the year.
3. Rahu in Aquarius (Rahu in Kumbha)
* Effect: Rahu will be in Saturn’s sign (Aquarius). This governs technology, crypto, and digital currency.
* Impact: 2026 will likely see a massive push for the Digital Rupee (e-Rupee). The "cash" economy may shrink further, and electronic transaction volumes will spike, changing how currency valuation is perceived.

💡 Strategic Advice:-

For Business Owners & Investors:
* Importers (Q1 & Q2 2026): The first half of the year (Jan–May) carries the highest risk of volatility while Jupiter is in Gemini. Hedge your payments early. Don't wait for the rate to drop.
* Gold Accumulation: With Jupiter becoming exalted in June 2026, Gold (Sona) is predicted to be the best asset class. The "Yellow Metal" will likely outperform the "Greenback" (Dollar) in 2026.
* Real Estate: Saturn in Pisces often slows down real estate price appreciation, making it a buyer's market rather than a seller's market.

** Summary Trend:**
* Jan - May 2026: Volatile / Rupee Weak (₹90.50+ levels possible)
* Jun - Dec 2026: Stable / Strong Recovery (Holding steady around ₹90)

*Disclaimer: This article is written with academic aspect. Not for any business or speculative purpose*






#9825038089
#9825098589

26/12/2025

*✡️गीता ज्ञान लेखमाला✡️*

“स्थितप्रज्ञ के लक्षण”

🕉️ श्लोक 58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

शब्दार्थ

यदा — जब

संहरते — समेट लेता है

कूर्मः — कछुआ

अङ्गानि — अपने अंग

इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः — इन्द्रियों को उनके विषयों से

तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता — उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है

🌿 भावार्थ

जिस प्रकार कछुआ आवश्यकता पड़ने पर
अपने सभी अंगों को भीतर समेट लेता है,
उसी प्रकार जो मनुष्य
अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से वापस खींच लेता है —
उसी की बुद्धि स्थितप्रज्ञ कहलाती है।

🔍 गहन विवेचन

यह श्लोक स्थितप्रज्ञ की व्यावहारिक कुंजी है।
श्रीकृष्ण यहाँ न तो इन्द्रियों के दमन की बात करते हैं
और न ही संसार-त्याग की।

वे सिखाते हैं — समय पर संयम।

1️⃣ कछुआ-दृष्टांत का रहस्य

कछुआ —

न तो अपने अंग काट देता है

न ही हमेशा छिपा रहता है

पर खतरा आते ही
वह स्वतः और सहज रूप से
अपने अंग भीतर ले लेता है।

➡️ स्थितप्रज्ञ का संयम भी ऐसा ही होता है —
स्वाभाविक, सजग और बिना संघर्ष के।

2️⃣ इन्द्रियों का सही उपयोग

इन्द्रियाँ शत्रु नहीं हैं।
वे जीवन का साधन हैं।

स्थितप्रज्ञ —

देखता है, पर भटकता नहीं

सुनता है, पर फँसता नहीं

बोलता है, पर चोट नहीं पहुँचाता

➡️ अंतर केवल इतना है कि
इन्द्रियाँ उसके नियंत्रण में होती हैं,
वह उनके नियंत्रण में नहीं।

3️⃣ समेटना, भागना नहीं

यह श्लोक हमें सिखाता है कि
संयम का अर्थ संसार से भागना नहीं।

फोन बंद करना संयम नहीं

मन को भीतर लाना संयम है

स्थितप्रज्ञ आकर्षण से लड़ता नहीं,
वह उससे दूरी बना लेता है।

4️⃣ कब समेटना है?

जब मन अशांत होने लगे

जब वासना उभरने लगे

जब क्रोध जन्म लेने लगे

जब निर्णय धुंधले हों

➡️ वही क्षण है
जब कछुए जैसा विवेक चाहिए।

🌼 आज के जीवन में प्रयोग

प्रतिक्रिया से पहले ठहरना

देखने से पहले विचार करना

बोलने से पहले मौन को चुनना

यही स्थितप्रज्ञ की साधना है।

✨ चिंतन सूत्र

“संयम वह नहीं जो हर समय कठोर रहे,
संयम वह है जो समय पर स्वयं को समेट ले।”




23/12/2025

*💎यहाँ 'लॅपिस लाजुली' (लाजवर्त)💎*

लॅपिस लाजुली (Lapis Lazuli) - लाजवर्त: गुण, लाभ और रहस्य
लॅपिस लाजुली, जिसे हिंदी में 'लाजवर्त' या 'राजावर्त' के नाम से जाना जाता है, एक अत्यंत प्राचीन और रहस्यमयी रत्न है। इसका गहरा नीला रंग और उस पर सुनहरे पाइराइट (Pyrite) के कण इसे तारों भरे आकाश जैसा सुंदर बनाते हैं। हजारों वर्षों से इसका उपयोग आभूषणों, चिकित्सा और ज्योतिषीय उपायों में किया जाता रहा है।
1. ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
लाजवर्त का इतिहास 6000 साल से भी पुराना है। सिन्धु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं में इसका बहुत महत्व था। मिस्र (Egypt) के फराओ इसे मृत्यु के बाद के जीवन में मार्गदर्शन के लिए अपने साथ दफनाते थे। बौद्ध धर्म में भी इसे शांति और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है।
2. ज्योतिषीय महत्व (Astrological Significance)
वैदिक ज्योतिष में लाजवर्त का विशेष स्थान है:
* संबद्ध ग्रह: यह मुख्य रूप से शनि (Saturn) का उपरत्न है, लेकिन यह राहु और केतु के दुष्प्रभावों को कम करने में भी सक्षम है।
* नीलम का विकल्प: जो लोग महंगा 'नीलम' (Blue Sapphire) नहीं खरीद सकते, वे इसके विकल्प के रूप में लाजवर्त धारण कर सकते हैं।
* राशि: यह धनु (Sagittarius), मकर (Capricorn), कुंभ (Aquarius) और मीन (Pisces) राशि के जातकों के लिए विशेष लाभकारी माना जाता है। पश्चिमी ज्योतिष में इसे सितंबर और दिसंबर माह का बर्थस्टोन माना जाता है।
3. लाजवर्त पहनने के लाभ (Benefits)
क. मानसिक और आध्यात्मिक लाभ:
* एकाग्रता (Focus): यह छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए बेहतरीन है क्योंकि यह याददाश्त और एकाग्रता को बढ़ाता है।
* तनाव मुक्ति: यह मन को गहरी शांति प्रदान करता है और डिप्रेशन (अवसाद), चिंता और अनिद्रा (Insomnia) को दूर करने में मदद करता है।
* अंतर्ज्ञान (Intuition): यह 'आज्ञा चक्र' (Third Eye Chakra) को सक्रिय करता है, जिससे व्यक्ति की छठी इंद्री और निर्णय लेने की क्षमता तेज होती है।
ख. स्वास्थ्य लाभ (Healing Properties):
* गले और थायराइड (Thyroid) से संबंधित समस्याओं में लाभकारी।
* माइग्रेन और सिरदर्द में राहत देता है।
* रक्तचाप (Blood Pressure) को नियंत्रित करने और प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) को मजबूत करने में सहायक है।
ग. करियर और जीवन में लाभ:
* यह संचार कौशल (Communication Skills) को बेहतर बनाता है, इसलिए पत्रकारों, वकीलों और लेखकों के लिए शुभ है।
* कार्यक्षेत्र में प्रमोशन और सफलता दिलाने में सहायक माना जाता है।
4. धारण करने की विधि (How to Wear)
लाजवर्त का पूरा लाभ उठाने के लिए इसे सही विधि से पहनना आवश्यक है:
* धातु (Metal): इसे चांदी (Silver) या पंचधातु में पहनना सबसे अच्छा होता है। कुछ मामलों में इसे सोने में भी पहना जा सकता है।
* दिन (Day): शनिवार (Saturday) की शाम (सूर्यास्त के समय)।
* उंगली (Finger): दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली (Middle Finger)।
* शुद्धिकरण: अंगूठी को पहनने से पहले गंगाजल और कच्चे दूध में धोकर शुद्ध करें।
* मंत्र: धारण करते समय शनि मंत्र का 108 बार जाप करें:
> "ॐ शं शनैश्चराय नमः"
>
5. असली लाजवर्त की पहचान
असली लाजवर्त में गहरे नीले रंग के साथ सुनहरे या भूरे रंग के छोटे-छोटे छींटे (पाइराइट के कण) दिखाई देते हैं। यदि पत्थर पूरी तरह से एक ही नीले रंग का हो और बहुत सस्ता हो, तो वह सिंथेटिक या रंगा हुआ हो सकता है।

6. सावधानियां
हालांकि लाजवर्त एक सुरक्षित रत्न है, लेकिन इसे पहनने के बाद यदि आपको बुरे सपने आएं या बेचैनी महसूस हो, तो इसे उतार दें। इसे पहनने से पहले किसी विद्वान ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण अवश्य करवाएं।

निष्कर्ष
लाजवर्त सिर्फ एक पत्थर नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक शक्तिशाली स्रोत है। यह आपको सत्य बोलने, खुद को पहचानने और जीवन में सही मार्ग चुनने की शक्ति देता है।

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