All Ayurvedic

All Ayurvedic A Natural Way to Healthy Life हज़ारो वर्षो से चली आ रही भारतीय परम्परा से जुड़े, आइये आयुर्वेद को जाने और निरोग रहे।
(1473)

14/02/2026

14 फरवरी 2019 का दिन कभी नहीं भूल पाएगा। इस काले दिन में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। (CRPF) के 40 वीर जवान आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। इन अमर शहीदों का साहस, त्याग और देशप्रेम हमेशा हमें प्रेरित करता रहेगा। हम सभी देशवासी उनके बलिदान को नमन करते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि शहीदों की आत्मा को शांति दे तथा उनके परिवारों को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे। 🇮🇳🙏
जय हिंदी 🙏🏻




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13/02/2026

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13/02/2026

अदरक खाने से भूख और पाचन पर प्रभाव (आयुर्वेद के अनुसार)
अदरक आयुर्वेद में एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि मानी गई है। आयुर्वेद के अनुसार अदरक पाचन शक्ति को मजबूत करने, भूख बढ़ाने और पेट से संबंधित अनेक समस्याओं को दूर करने में सहायक होती है।
1) अदरक से भूख क्यों बढ़ती है?
आयुर्वेद में पाचन शक्ति को अग्नि कहा जाता है। जब अग्नि कमजोर हो जाती है, तब व्यक्ति को भूख कम लगती है, भोजन का स्वाद अच्छा नहीं लगता और गैस, अपच जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
अदरक के गुण:-
* अग्नि को प्रज्वलित करती है।
* भोजन को जल्दी पचाने में मदद करती है।
* गैस और पेट फूलना कम करती है।
* भोजन में रुचि बढ़ाती है।
2) अदरक के आयुर्वेदिक गुण-
* आयुर्वेद के अनुसार अदरक में निम्न गुण पाए जाते हैं:-
* दीपन – पाचन अग्नि को बढ़ाता है।
* पाचन – भोजन को सही तरीके से पचाता है।
* वातशामक – गैस और पेट दर्द कम करता है।
* उष्ण प्रकृति – शरीर को गर्माहट प्रदान करता है।
3) आयुर्वेदिक ग्रंथों में अदरक का वर्णन
📖 चरक संहिता-
* इस ग्रंथ में अदरक को पाचन शक्ति बढ़ाने और भोजन को पचाने वाली औषधि बताया गया है। इसमें अदरक को दीपन और पाचन औषधि के रूप में वर्णित किया गया है।
सुश्रुत संहिता-
- इस ग्रंथ में अदरक को गैस, पेट दर्द और अपच को दूर करने वाली औषधि बताया गया है। इसमें इसे वात दोष को शांत करने वाला भी माना गया है।
* भावप्रकाश निघंटु-
* इस ग्रंथ में अदरक के गुण, उपयोग और शरीर पर इसके प्रभाव का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें अदरक को अमा (शरीर के विषैले तत्व) को नष्ट करने वाला बताया गया है।
4) अदरक लेने के आयुर्वेदिक तरीके
* भोजन से पहले-
* भोजन से 10–15 मिनट पहले
छोटा टुकड़ा अदरक लेकर थोड़ा सा नमक लगाकर खाने से भूख बढ़ती है।
* अदरक का काढ़ा या चाय
पानी में अदरक उबालकर पीने से
पाचन सुधरता है और गैस कम होती है।
* अदरक का रस
थोड़ी मात्रा में अदरक का रस गुनगुने पानी के साथ लेने से
अपच और भूख की कमी में लाभ होता है।
सावधानियां-
* अधिक मात्रा में अदरक लेने से जलन या एसिडिटी हो सकती है।
* अल्सर या अत्यधिक पित्त प्रकृति वाले लोगों को सीमित मात्रा में लेना चाहिए।
* छोटे बच्चों को कम मात्रा में देना चाहिए।
निष्कर्ष-
आयुर्वेद के अनुसार अदरक पाचन शक्ति को बढ़ाने, भूख सुधारने और पेट की समस्याओं को दूर करने में अत्यंत लाभकारी औषधि है। उचित मात्रा में सेवन करने से यह शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होती है।
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मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने के फायदे (आयुर्वेद के अनुसार)आयुर्वेद में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि शरीर, ...
13/02/2026

मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने के फायदे (आयुर्वेद के अनुसार)
आयुर्वेद में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि शरीर, मन और ऊर्जा को संतुलित करने वाला माना गया है। पुराने समय में मिट्टी के बर्तन में भोजन बनाना और खाना आयुर्वेदिक जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा था। आयुर्वेदिक ग्रंथ जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम् में प्राकृतिक बर्तनों और संतुलित भोजन के महत्व का वर्णन मिलता है।
1. भोजन को प्राकृतिक और पौष्टिक बनाता है।
* मिट्टी के बर्तन में खाना धीमी आंच पर पकता है, जिससे भोजन के पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार धीरे-धीरे पका भोजन पचने में आसान और शरीर के लिए ज्यादा लाभकारी होता है।
2. पाचन शक्ति (अग्नि) को मजबूत करता है।
* मिट्टी में प्राकृतिक क्षारीय (Alkaline) गुण होते हैं, जो भोजन की अम्लता को संतुलित करते हैं। इससे गैस, एसिडिटी और पित्त दोष कम होने में मदद मिल सकती है।
3. शरीर के तीनों दोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करता है।
* आयुर्वेद के अनुसार प्राकृतिक पदार्थों में बने बर्तन शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखते हैं। मिट्टी के बर्तन में बना भोजन विशेष रूप से पित्त को शांत करने और वात को संतुलित करने में सहायक माना जाता है।
4. भोजन में प्राकृतिक स्वाद बढ़ाता है
मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने से भोजन में हल्की मिट्टी की सुगंध और स्वाद आता है, जिससे खाने की गुणवत्ता और स्वाद बेहतर हो जाता है।
5. केमिकल और धातु के नुकसान से बचाता है।
* स्टील, एल्यूमीनियम या नॉन-स्टिक बर्तनों की तुलना में मिट्टी के बर्तन में कोई हानिकारक रसायन नहीं मिलते। इसलिए यह शरीर के लिए सुरक्षित माने जाते हैं।
6. शरीर को ठंडक और संतुलन देता है,
मिट्टी प्राकृतिक रूप से ठंडी होती है, इसलिए इसमें बना भोजन शरीर की गर्मी को संतुलित रखने में मदद कर सकता है।
आयुर्वेदिक ग्रंथों में उल्लेख-
👉 चरक संहिता – इसमें प्राकृतिक और शुद्ध भोजन तथा प्राकृतिक साधनों से बने भोजन के महत्व को बताया गया है।
👉 सुश्रुत संहिता – इसमें स्वस्थ जीवनशैली और प्राकृतिक वस्तुओं के उपयोग को लाभकारी बताया गया है।
👉 अष्टांग हृदयम् – इसमें सात्विक भोजन, प्राकृतिक पकाने के तरीके और संतुलित आहार का वर्णन मिलता है।
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12/02/2026
















डैंड्रफ क्या होता है?डैंड्रफ को आयुर्वेद में “दारुणक (Darunaka)” कहा गया है। यह एक स्कैल्प से जुड़ी समस्या है जिसमें सिर...
12/02/2026

डैंड्रफ क्या होता है?
डैंड्रफ को आयुर्वेद में “दारुणक (Darunaka)” कहा गया है। यह एक स्कैल्प से जुड़ी समस्या है जिसमें सिर की त्वचा सूखकर या चिपचिपी होकर सफेद या पीले रंग की परत के रूप में झड़ने लगती है।
* डैंड्रफ क्यों होता है?
आयुर्वेद में डैंड्रफ मुख्य रूप से वात और कफ दोष के असंतुलन से होता है।
👉 मुख्य कारण:
* वात दोष बढ़ना-
* स्कैल्प का ज्यादा सूखना
* रूसी बनना
* खुजली होना
* कफ दोष बढ़ना-
* स्कैल्प पर चिपचिपाहट
* मोटी परत बनना
* गलत खान-पान
* ज्यादा तला-भुना और जंक फूड
* ज्यादा मीठा और ठंडा भोजन
* गलत लाइफस्टाइल
* तनाव और चिंता
* नींद की कमी
*.बालों की सही सफाई न करना
* केमिकल वाले हेयर प्रोडक्ट का ज्यादा इस्तेमाल।
डैंड्रफ कितने प्रकार का होता है?
👉 आयुर्वेद और सामान्य रूप से दो प्रकार माना जाता है:
1️⃣ सूखा डैंड्रफ (Dry Dandruff)
बालों से सफेद पाउडर जैसा झड़ता है
खुजली ज्यादा होती है।
स्कैल्प रूखी रहती है।
2️⃣ चिपचिपा डैंड्रफ (Oily Dandruff)
पीले रंग की परत बनती है।
बाल चिपचिपे रहते हैं।
बदबू और खुजली हो सकती है।
डैंड्रफ के लक्षण
* सिर में खुजली
* बालों में सफेद या पीले कण गिरना
* स्कैल्प का सूखना या चिपचिपा होना
* बाल झड़ना
* सिर में जलन या खिंचाव
आयुर्वेद के अनुसार डैंड्रफ ठीक करने के उपाय
1. तेल से मालिश (Head Massage)
* नारियल तेल
* तिल का तेल
* नीम तेल
यह स्कैल्प को पोषण देता है और वात दोष को शांत करता है।
2. आयुर्वेदिक हेयर पैक।
* नीम पत्ते का पेस्ट।
* आंवला पाउडर।
* मेथी दाना पेस्ट।
👉 यह फंगस और बैक्टीरिया को कम करता है।
3. आहार सुधार।
* हरी सब्जियां
* फल
* पर्याप्त पानी।
❌ ज्यादा तला-भुना और मसालेदार भोजन से बचें।
4. लाइफस्टाइल सुधार।
* तनाव कम करें।
* पर्याप्त नींद लें।
* बालों को साफ रखें।
आयुर्वेद की कौन-सी किताब में डैंड्रफ का वर्णन है?
डैंड्रफ (दारुणक) का उल्लेख आयुर्वेद की प्रमुख ग्रंथों में मिलता है:-
👉 सुश्रुत संहिता
इसमें दारुणक को क्षुद्र रोग में बताया गया है।
👉 अष्टांग हृदयम
इसमें वात-कफ दोष के कारण स्कैल्प रोगों का वर्णन है।
👉 चरक संहिता
इसमें दोष असंतुलन और त्वचा रोगों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
अगर आयुर्वेदिक नजरिए से देखें तो डैंड्रफ सिर्फ बालों की समस्या नहीं है बल्कि शरीर के दोष असंतुलन का संकेत भी हो सकता है। इसलिए बाहरी इलाज के साथ-साथ खान-पान और लाइफस्टाइल सुधारना भी जरूरी होता है।
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12/02/2026

पित्त दोष, गुस्सा, तनाव और चिंता - आयुर्वेद के अनुसार कारण, लक्षण और निवारण जानिए -
🔥 पित्त दोष क्या है?
आयुर्वेद के अनुसार शरीर तीन दोषों- वात, पित्त और कफ – से बना होता है।
पित्त दोष शरीर में अग्नि और जल तत्व से बना होता है और यह पाचन, शरीर की गर्मी, बुद्धि, समझ और भावनाओं को नियंत्रित करता है।
* आयुर्वेद में बताया गया है कि जब पित्त संतुलित रहता है, तो व्यक्ति बुद्धिमान, तेज और निर्णय लेने में सक्षम रहता है। लेकिन जब पित्त बढ़ जाता है तो यह मानसिक और शारीरिक समस्याएं पैदा करता है।
👉 चरक संहिता (Charaka Samhita, सूत्र स्थान 12) और
👉 अष्टांग हृदयम (Ashtanga Hridayam, सूत्र स्थान 1)
में पित्त के गुण और उसके बढ़ने से होने वाले प्रभावों का वर्णन किया गया है।
* पित्त बढ़ने पर गुस्सा, तनाव और चिंता क्यों बढ़ती है?
आयुर्वेद के अनुसार पित्त का स्वभाव होता है –
* गर्म (उष्ण), तीखा, तेज, चिड़चिड़ा
* जब शरीर में पित्त बढ़ जाता है तो यह मन और भावनाओं को भी प्रभावित करता है।
मानसिक प्रभाव-
* जल्दी गुस्सा आना।
* चिड़चिड़ापन रहना।
* तनाव और बेचैनी रहना।
* ज्यादा सोचने की आदत।
* अधीरता
* परफेक्शन की ज्यादा चाह रखना ।
👉 चरक संहिता में बताया गया है कि पित्त बढ़ने से मन में क्रोध (गुस्सा) और असंतुलन बढ़ सकता है।
पित्त बढ़ने के मुख्य कारण-
* खान-पान से
* ज्यादा तीखा, खट्टा और नमकीन खाना।
* ज्यादा तेल वाला और तला हुआ खाना।
* ज्यादा चाय, कॉफी और जंक फूड खाना ।
* शराब और ज्यादा गरम भोजन करने से।
जीवनशैली से-
* धूप और गर्मी में ज्यादा रहना।
*.देर रात जागना।
* बहुत ज्यादा काम या मानसिक दबाव।
* गुस्सा और तनाव।
👉 अष्टांग हृदयम में बताया गया है कि गलत दिनचर्या और आहार पित्त को बढ़ाते हैं।
पित्त बढ़ने के लक्षण-
* शारीरिक लक्षण
* शरीर में जलन, एसिडिटी, खट्टी डकार
* .ज्यादा पसीना, त्वचा में लालिमा
*.मानसिक लक्षण, गुस्सा जल्दी आना
*.तनाव और चिंता, अधीरता
* नींद में कमी
पित्त दोष का निवारण (आयुर्वेद के अनुसार)
1. सही आहार (Diet)-
✔ क्या खाना चाहिए?
* मीठा, ठंडा और हल्का भोजन
* नारियल पानी, सौंफ, धनिया
* खीरा, तरबूज, दूध, घी
* किशमिश पानी।
👉 चरक संहिता में मीठे और ठंडे गुण वाले भोजन को पित्त शांत करने वाला बताया गया है।
क्या नहीं खाना चाहिए?
*.ज्यादा मिर्च मसाला, खट्टा और तला भोजन।
* ज्यादा चाय और कॉफी, फास्ट फूड
2. जीवनशैली सुधार-
* सुबह जल्दी उठना।
* योग और प्राणायाम करना।
* ठंडी जगह पर रहना।
* गुस्से को कंट्रोल करना।
पर्याप्त नींद लेना।
3. मानसिक शांति के उपाय-
ध्यान (Meditation)-
* शीतली और शीतकारी प्राणायाम
* प्रकृति में समय बिताना
* शांत संगीत सुनना
👉 अष्टांग हृदयम में मानसिक संतुलन को दोष संतुलन के लिए जरूरी बताया गया है।
4. आयुर्वेदिक उपचार
विरेचन कर्म-
* यह पंचकर्म की प्रक्रिया है जो शरीर से अतिरिक्त पित्त को बाहर निकालने में मदद करती है।
👉 चरक संहिता (सिद्धि स्थान) में विरेचन को पित्त रोगों के लिए मुख्य उपचार बताया गया है।
निष्कर्ष-
* आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष बढ़ने से गुस्सा, तनाव और चिंता बढ़ सकती है। सही खान-पान, संतुलित जीवनशैली, योग और आयुर्वेदिक उपचार से पित्त को संतुलित किया जा सकता है।
* अगर समय पर पित्त को संतुलित कर लिया जाए तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों बेहतर रह सकते हैं।
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मुलैठी, सौंफ और जीरा तीनों ही आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष को शांत करने में मदद करते हैं। ये शरीर की गर्मी कम करने, पाचन...
11/02/2026

मुलैठी, सौंफ और जीरा तीनों ही आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष को शांत करने में मदद करते हैं। ये शरीर की गर्मी कम करने, पाचन सुधारने और एसिडिटी जैसी दिक्कतों में आराम देने के लिए जाने जाते हैं।
* मुलैठी (Licorice)
शरीर में ठंडक देने वाली (शीतल) मानी जाती है।
* एसिडिटी, जलन और खट्टी डकार में आराम देती है।
* गले और पेट की सूजन कम करने में भी मदद करती है।
* सौंफ (Fennel)-
* पाचन को सुधारती है और पेट की गर्मी व गैस कम करती है।
* मुंह की जलन, एसिडिटी और ज्यादा प्यास लगने में फायदेमंद।
* सौंफ का पानी या सौंफ चबाना पित्त संतुलन में मदद करता है।
* जीरा (Cumin)
* पाचन अग्नि को संतुलित करता है (बहुत ज्यादा बढ़ाता भी नहीं)।
* गैस, अपच और पेट फूलने में आराम देता है।
* शरीर के टॉक्सिन निकालने में मदद करता है।
* चरक संहिता-
* चरक संहिता के सूत्र स्थान और चिकित्सा स्थान में
* यष्टिमधु (मुलैठी) को शीतल, मधुर रस वाला और पित्त व रक्त दोष को शांत करने वाला बताया गया है।
* यह शरीर की जलन, एसिडिटी और सूजन कम करने में सहायक मानी जाती है।
* जीरक (जीरा) को दीपनीय और पाचन सुधारने वाला बताया गया है। यह गैस, अपच और पेट संबंधी समस्याओं में लाभकारी माना गया है।
* सुश्रुत संहिता-
सुश्रुत संहिता में
* मुलैठी को शीतल, सूजन कम करने वाला और शरीर को संतुलित रखने वाला बताया गया है।
* जीरा को पाचन तंत्र को मजबूत करने और दोष संतुलन में सहायक बताया गया है।
* भावप्रकाश निघंटु
यह ग्रंथ औषधीय द्रव्यों का विस्तार से वर्णन करता है। इसमें-
* मुलैठी को पित्त और शरीर की जलन कम करने वाली बताया गया है।
* सौंफ को शीतल, पाचन में सहायक और पित्त शांत करने वाली माना गया है।
* जीरा को भूख बढ़ाने वाला, पाचन सुधारने वाला और गैस कम करने वाला बताया गया है।
* धन्वंतरि निघंटु-
* इस ग्रंथ में सौंफ और जीरा को पाचन सुधारने तथा शरीर की गर्मी संतुलित करने वाला बताया गया है।
कैसे लेना चाहिए?
* सबसे आसान और सुरक्षित तरीका – हर्बल पानी बनाकर
बनाने का तरीका-
सौंफ – ½ चम्मच
जीरा – ½ चम्मच
मुलैठी – छोटा टुकड़ा या ¼ चम्मच पाउडर
1 गिलास पानी
* पानी में तीनों डालकर 5–7 मिनट हल्का उबाल लें।
* फिर छानकर गुनगुना या ठंडा करके पी सकते हैं।
कब लेना चाहिए?
* सुबह खाली पेट (पित्त शांत करने में अच्छा माना जाता है)।
* खाना खाने के बाद (पाचन और गैस में मदद करता है)।
* गर्मी, जलन या एसिडिटी होने पर
* दिन में 1–2 बार लेना काफी होता है।
किसे लेना चाहिए?
* जिनको एसिडिटी, खट्टी डकार या पेट में जलन होती है।
* जिनको ज्यादा शरीर में गर्मी महसूस होती है।
* जिनको पाचन कमजोर रहता है।
* जिनको ज्यादा प्यास या मुंह में जलन होती है।
किसे नहीं लेना चाहिए?
* जिनका BP (ब्लड प्रेशर) बहुत ज्यादा रहता है।
* मुलैठी ज्यादा मात्रा में BP बढ़ा सकती है।
* गर्भवती महिलाओं को बिना डॉक्टर सलाह के नहीं लेना चाहिए।
* जिनको बहुत ज्यादा कफ या बार-बार खांसी में बलगम बनता है।
* मुलैठी कुछ लोगों में कफ बढ़ा सकती है।
* बहुत छोटे बच्चों को बिना आयुर्वेदिक डॉक्टर सलाह के नहीं देना चाहिए।
जरूरी सावधानी-
* ज्यादा मात्रा में या लगातार लंबे समय तक नहीं लेना चाहिए।
* अगर कोई बीमारी या दवाई चल रही हो तो पहले डॉक्टर से पूछना अच्छा रहता है।
*



















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अपनी राय जरूर बताएं और पोस्ट को शेयर करें ताकि ज्यादा लोग जागरूक हो सके ।
10/02/2026

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* आयुर्वेद के अनुसार खट्टी डकार आना और बार-बार गैस होना सीधे तौर पर “लिवर कमजोर” होने का अकेला संकेत नहीं माना जाता, लेक...
10/02/2026

* आयुर्वेद के अनुसार खट्टी डकार आना और बार-बार गैस होना सीधे तौर पर “लिवर कमजोर” होने का अकेला संकेत नहीं माना जाता, लेकिन यह पित्त दोष और पाचन अग्नि (Digestive Fire) की गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है। जब पाचन और यकृत (लिवर) का काम संतुलित नहीं रहता, तब ऐसे लक्षण दिख सकते हैं।
* आयुर्वेद के अनुसार खट्टी डकार और गैस क्यों होती है?
1. पित्त दोष बढ़ना-
पित्त शरीर में अग्नि और पाचन शक्ति को नियंत्रित करता है।
जब पित्त बढ़ जाता है तो:-
* ज्यादा एसिड बनता है।
* खट्टी डकार आती है।
* सीने में जलन होती है।
* पेट में गर्मी महसूस होती है।
चरक संहिता – सूत्र स्थान अध्याय 12
* इसमें बताया गया है कि पित्त बढ़ने से अम्लता (Acidity) और पाचन विकार होते हैं।
2. वात दोष बढ़ना-
अगर वात दोष बढ़े तो:-
* बार-बार गैस बनती है।
* पेट फूलता है।
* डकार ज्यादा आती है।
अष्टांग हृदय – सूत्र स्थान अध्याय 11
* यहाँ वात दोष बढ़ने पर गैस और अपचन का वर्णन किया गया है।
क्या इससे लिवर कमजोर होता है?
आयुर्वेद के अनुसार लिवर को “यकृत” कहा जाता है और यह पित्त का मुख्य स्थान माना जाता है।
अगर लंबे समय तक:
* एसिडिटी, गलत खान-पान
* पित्त असंतुलन रहता है तो यकृत की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
चरक संहिता – चिकित्सा स्थान (यकृत और पित्त विकार वर्णन)
* इसमें बताया गया है कि पित्त विकार यकृत से जुड़े हो सकते हैं।
क्या किशमिश का पानी फायदेमंद होता है?
आयुर्वेद के अनुसार किशमिश के गुण
किशमिश को आयुर्वेद में मधुर (मीठा), शीतल और पित्त शांत करने वाला बताया गया है।
भावप्रकाश निघंटु – फल वर्ग
* यहाँ किशमिश (द्राक्षा) को:
* पित्त शांत करने वाली होती है।
* पाचन सुधारने वाली है।
* शरीर को ठंडक देने वाली है बताया गया है।
किशमिश पानी के फायदे
* पित्त को शांत करता है।
* एसिडिटी कम करने में मदद करता है।
* पेट की जलन कम करता है।
* लिवर को पोषण देता है।
* पाचन शक्ति को संतुलित करता है।
किशमिश पानी कैसे पीना चाहिए?
* रात में 7-10 किशमिश पानी में भिगो दीजिए।
* सुबह खाली पेट पानी पीएं।
* भीगी किशमिश खा लीजिए ।
* यह तरीका आयुर्वेद में पित्त और पाचन सुधारने के लिए उपयोगी माना जाता है।
किन चीजों से समस्या बढ़ सकती है?
* ज्यादा मिर्च मसाला खाना ।
* तला-भुना खाना।
* ज्यादा चाय-कॉफी पीना ।
* देर रात खाना।
* तनाव और जल्दी-जल्दी खाना।
आयुर्वेदिक लाइफस्टाइल टिप्स
* समय पर भोजन करें।
* ज्यादा गर्म और खट्टा खाना कम करें।
* सौंफ या धनिया पानी पी सकते हैं।
* हल्का योग और प्राणायाम करें।
गुस्सा और तनाव कम रखें।
निष्कर्ष:-
* आयुर्वेद के अनुसार खट्टी डकार और गैस पित्त और वात दोष असंतुलन के कारण हो सकती है।
* किशमिश का पानी पित्त शांत करने और पाचन सुधारने में सहायक माना गया है।
* लेकिन अगर समस्या लंबे समय तक रहे तो वैद्य या डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी होता है।

* आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष बढ़ने पर गुस्सा, चिड़चिड़ापन और तनाव - आयुर्वेद में पित्त दोष शरीर और मन में अग्नि (Fire)...
10/02/2026

* आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष बढ़ने पर गुस्सा, चिड़चिड़ापन और तनाव -
आयुर्वेद में पित्त दोष शरीर और मन में अग्नि (Fire) और जल तत्व से बना होता है। जब पित्त संतुलित रहता है तो व्यक्ति बुद्धिमान, तेज़ निर्णय लेने वाला और ऊर्जावान होता है। लेकिन जब पित्त बढ़ जाता है तो बहुत जल्दी गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, अधीरता, तनाव और मन में जलन जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
* आयुर्वेदिक तरीके – गुस्सा और तनाव कम करने के उपाय-
1. जीवनशैली (Lifestyle)
* ठंडक देने वाली दिनचर्या अपनाएं।
* सुबह जल्दी उठान चाहिए ।
* ठंडी या सामान्य पानी से स्नान कीजिए।
* तेज धूप से बचना चाहिए।
* प्रकृति में समय बिताना चाहिए।
गुस्सा कंट्रोल करने के लिए-
* गहरी सांस लीजिए (प्राणायाम)
* ध्यान (Meditation) कीजिए।
* शांत संगीत सुनना चाहिए।
* योग करना चाहिए ।
अष्टांग हृदय – सूत्र स्थान अध्याय 2 (दिनचर्या)-
* यहाँ सही दिनचर्या को दोष संतुलन का मुख्य आधार बताया गया है।
2. योग और प्राणायाम-
* पित्त शांत करने के लिए यह योग बहुत अच्छे माने गए हैं।
* शीतली प्राणायाम – शरीर और मन को ठंडक देता है।
* शीतकारी प्राणायाम – गुस्सा और तनाव कम करता है।
* अनुलोम-विलोम – मन को शांत करता है।
* चंद्र नमस्कार – पित्त शांत करता है।
हठ योग प्रदीपिका में प्राणायाम से मानसिक शांति का उल्लेख है।
3. पित्त शांत करने वाला भोजन-
✔ क्या खाना चाहिए-
* मीठा, कड़वा और ठंडा भोजन
* नारियल पानी, खीरा, लौकी, तोरई
* अनार, सेब, अंगूर, घी
* सौंफ और धनिया पानी पीना चाहिए।
क्या नहीं खाना चाहिए?
* मिर्च मसाला, तला-भुना खाना
* ज्यादा चाय-कॉफी, फास्ट फूड अवॉइड कीजिए।
* ज्यादा खट्टा और नमकीन।
चरक संहिता – सूत्र स्थान अध्याय 26
यहाँ दोषों के अनुसार भोजन का वर्णन किया गया है।
4. आयुर्वेदिक घरेलू उपाय-
ब्राह्मी-
* दिमाग शांत करती है।
* तनाव और गुस्सा कम करती है।
शतावरी-
* शरीर को ठंडक देती है।
* पित्त संतुलित करती है।
गुलकंद-
* शरीर और मन को ठंडा करता है।
* चिड़चिड़ापन कम करता है।
नारियल तेल से सिर की मालिश-
* दिमाग को ठंडक देता है।
* तनाव कम करता है।
भावप्रकाश निघंटु में ब्राह्मी और शतावरी के मानसिक शांति देने वाले गुण बताए गए हैं।
5. मानसिक शांति के आयुर्वेदिक तरीके-
* ज्यादा गुस्सा आने पर ठंडा पानी पीना चाहिए ।
* खुशबूदार फूलों या चंदन की खुशबू लेना चाहिए ।
* प्रकृति में घूमना चाहिए ।
* सकारात्मक सोच रखना चाहिए।
आयुर्वेद में मन को शांत रखने के लिए सत्त्विक जीवनशैली अपनाने की सलाह दी गई है।
निष्कर्ष-
* पित्त दोष बढ़ने से गुस्सा, तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ता है। इसे संतुलित करने के लिए -
* ठंडी प्रकृति का भोजन करना चाहिए।
* सही दिनचर्या
* योग और ध्यान
* ठंडक देने वाली जड़ी-बूटियां
* बहुत प्रभावी मानी जाती हैं।
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* पित्त दोष क्या होता है?* आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर तीन दोषों से बना है-* वात, पित्त कफ* इनमें पित्त दोष शरीर की अग...
09/02/2026

* पित्त दोष क्या होता है?
* आयुर्वेद के अनुसार हमारा शरीर तीन दोषों से बना है-
* वात, पित्त कफ
* इनमें पित्त दोष शरीर की अग्नि शक्ति है, यानी यह शरीर के अंदर होने वाली सभी केमिकल और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं को कंट्रोल करता है।
* पित्त दोष बना होता है - अग्नि तत्व (Fire) और
* जल तत्व (Water)
इसका मतलब पित्त शरीर में गर्मी, पाचन, हार्मोन, बुद्धि और ऊर्जा को नियंत्रित करता है।
* चरक संहिता सूत्र स्थान 12
* अष्टांग हृदय सूत्र स्थान 1
* पित्त दोष शरीर में क्या काम करता है?
1. पाचन शक्ति-
पित्त भोजन को पचाने में सबसे बड़ा रोल निभाता है।
2. रक्त निर्माण-
पित्त रक्त को शुद्ध और संतुलित रखता है।
3. बुद्धि और निर्णय शक्ति-
सोचने, समझने और निर्णय लेने में मदद करता है।
4. आंखों की रोशनी-
दृष्टि को नियंत्रित करता है।
5. त्वचा की चमक-
त्वचा का रंग और चमक बनाए रखता है।
* किन लोगों में पित्त प्रकृति ज्यादा होती है?
ऐसे लोगों में ये गुण दिखते हैं-
* शरीर गर्म रहता है, भूख तेज लगती है
* पसीना ज्यादा आता है, त्वचा संवेदनशील होती है।
* स्वभाव तेज और लीडरशिप वाला होता है, गुस्सा जल्दी आता है।
पित्त दोष बढ़ने के कारण-
* खान-पान से, ज्यादा मसालेदार भोजन।
* खट्टा और नमकीन ज्यादा, जंक फूड।
* चाय-कॉफी ज्यादा।
* वातावरण से-
* ज्यादा धूप, गर्म मौसम
* गर्म जगह में रहना
🧠 मानसिक कारण-
* गुस्सा, ईर्ष्या, तनाव
* परफेक्शन की आदत।
Lifestyle कारण-
* देर रात तक जागना ।
* भोजन समय पर न करना।
* * भूखे रहना।
संदर्भ – चरक संहिता
पित्त दोष बढ़ने के लक्षण-
* शारीरिक लक्षण
* एसिडिटी, पेट में जलन
* * ज्यादा पसीना, त्वचा लाल होना
* बाल जल्दी सफेद होना, मुंह में कड़वाहट।
* ज्यादा प्यास, ढीले दस्त
मानसिक और Emotional लक्षण-
* जल्दी गुस्सा, चिड़चिड़ापन
* अधीरता, ज्यादा सोच
* कंट्रोल में रहने की इच्छा, आलोचना करना।
आयुर्वेद में इसे साधक पित्त से जोड़ा जाता है।
संदर्भ – अष्टांग हृदय
* पित्त दोष के 5 प्रकार-
1️⃣ पाचक पित्त
* पेट में रहता है।
* भोजन पचाता है।
2. रंजक पित्त
* लीवर और रक्त में रहता है।
* खून बनाता है।
3️⃣ साधक पित्त-
* हृदय और दिमाग में।
* भावनाओं और बुद्धि को नियंत्रित करता है।
4️⃣ अलोचक पित्त
* आंखों में
* दृष्टि नियंत्रित करता है।
5️⃣ भ्राजक पित्त
* त्वचा में
* त्वचा की चमक और रंग संभालता है।
संदर्भ – सुश्रुत संहिता
पित्त दोष में क्या खाना चाहिए?
* ठंडी और शांत करने वाली चीजें
Dairy
* दूध, घी, सब्जियां, लौकी
* खीरा, तोरई, करेला
* फल, अनार, सेब
* केला, तरबूज, अनाज
*.चावल, जौ
मसाले-
* धनिया, सौंफ, इलायची
❌ पित्त में क्या नहीं खाना चाहिए?
* मिर्च मसाला, खट्टा खाना
* ज्यादा नमक, तला हुआ खाना
* चाय-कॉफी ज्यादा, शराब
* फास्ट फूड
पित्त संतुलित रखने की Lifestyle
Morning Routine
* सुबह जल्दी उठना
* ठंडा या हल्का गुनगुना पानी पीना
* ध्यान करना
Day रूटीन -
*.धूप से बचना।
* समय पर खाना।
* * गुस्सा कंट्रोल करना।
Night Routine
* हल्का भोजन
* जल्दी सोना
* मोबाइल कम इस्तेमाल
पित्त कम करने वाले योग-
* शीतली प्राणायाम
* चंद्र भेदन
* शवासन
* * बालासन
आयुर्वेदिक घरेलू उपाय
* गुलकंद, एलोवेरा जूस
* धनिया पानी, नारियल पानी, घी
Emotional Balance में पित्त का रोल-
* पित्त बढ़ने पर इंसान जल्दी गुस्सा करता है।
* परफेक्शन चाहता है।
* ज्यादा स्ट्रेस लेता है।
इसलिए आयुर्वेद में कहा गया है मेडिटेशन करो।
* प्रकृति में समय बिताना चाहिए।
* शांत रहना चाहिए ।
पित्त संतुलित होने पर फायदे-
* मजबूत पाचन
* चमकदार त्वचा
* तेज दिमाग
* अच्छी ऊर्जा
*

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