Health with Ayurveda

Health with Ayurveda सर्वे भवन्तु: सुखिना
सर्वे सन्तु निरामया:
जीवन का विज्ञान है आयुर्वेद... इसे अपनाएं और निरोगी रहें �

02/12/2025
28/11/2025
 #विज्ञान कहता है कि एक वयस्क स्वस्थ पुरुष एक बार संभोग के बाद जो वीर्य स्खलित करता है, उसमें 400  #मिलियन शुक्राणु होते...
20/11/2025

#विज्ञान कहता है कि एक वयस्क स्वस्थ पुरुष एक बार संभोग के बाद जो वीर्य स्खलित करता है, उसमें 400 #मिलियन शुक्राणु होते हैं......

ये 40 करोड़ शुक्राणु #मां के गर्भाशय की ओर पागलों की तरह दौड़ते हैं, केवल 300-500 शुक्राणु ही जीवित बचते हैं। और बाकी? वे रास्ते में थक जाते हैं या मर जाते हैं। इन 300-500 शुक्राणुओं में से जो #अंडे तक पहुँचने में कामयाब हो जाते हैं, केवल एक अत्यंत शक्तिशाली शुक्राणु ही #अंडे को निषेचित करता है या अंडे में बस जाता है। वह भाग्यशाली #शुक्राणु आप हैं, मैं हूँ या हम सभी हैं। क्या आपने कभी इस #महायुद्ध के बारे में सोचा है?

❒ आप भागे थे - जब आपकी आँखें, #हाथ, पैर, सिर नहीं थे, फिर भी आप जीत गए...

❒ आप भागे थे - आपके पास कोई #प्रमाणपत्र नहीं था, कोई दिमाग नहीं था, फिर भी आप जीत गए....

❒ आप भागे थे - आपके पास कोई शिक्षा नहीं थी, किसी ने आपकी मदद नहीं की, फिर भी आप जीत गए....

❒ जब आप दौड़े थे - आपके पास एक मंज़िल थी और आपने उस मंज़िल की ओर अपना लक्ष्य निर्धारित किया और अंत तक दौड़े और आप जीत गए....

❒ कई बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही मर जाते हैं, लेकिन आप नहीं मरे, आप पूरे 9 महीने जीवित रहे ....

❒ कई बच्चे प्रसव के दौरान मर जाते हैं, लेकिन आप बच गए....

❒ कई बच्चे जन्म के पहले 5 सालों में ही मर जाते हैं, लेकिन आप फिर भी जीवित हैं...

❒ कई बच्चे कुपोषण से मर जाते हैं, लेकिन आपको कुछ नहीं हुआ....

❒ कई लोग वयस्कता की राह पर इस दुनिया को छोड़ गए, लेकिन आप अब भी यहां हैं....

और आज जब भी कुछ होता है, तो आप डर जाते हैं, निराश हो जाते हैं, लेकिन क्यों? आपको ऐसा क्यों लगता है कि आप हार गए हैं? आपका आत्मविश्वास क्यों खो जाता है?

हालांकि अब आपके पास #दोस्त हैं, #भाई- #बहन हैं, सर्टिफिकेट हैं, #शिक्षा है....सब कुछ है। आपके पास हाथ-पैर हैं, योजना बनाने के लिए दिमाग है, मदद करने वाले लोग हैं, फिर भी आप उम्मीद खो देते हैं। जब आपने अपने जीवन के पहले दिन हार नहीं मानी थी। आपने 40 करोड़ शुक्राणुओं के साथ मौत से जंग लड़ी और बिना किसी की मदद के अकेले ही प्रतियोगिता जीत ली। फिर निराशा क्यों?

आप शुरुआत में जीते, आप अंत में जीते, आप बीच में भी जीतेंगे। खुद को समय दें, अपने मन से पूछें - आपके पास जो स्किल ​​है, उसे सजाएं संवारे..इनोवेटिव पैदा करें? हुनर सीखें.. स्ट्रगल करें... लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें....रस्ते के बाधाओं से लड़ते रहें, आप खुद ही जीत जाएंगे...



शीघ्रपतन, तनाव न बनना, लिंग में ढीलापन रहना, सहवास का मन नहीं करना... यह सब रिश्तों में खटास पैदा करने वाले विशेष कारण ह...
18/11/2025

शीघ्रपतन, तनाव न बनना, लिंग में ढीलापन रहना, सहवास का मन नहीं करना... यह सब रिश्तों में खटास पैदा करने वाले विशेष कारण हैं... ऐसी किसी समस्या से परेशान हैं और प्रभावी उपचार चाहते हैं तो बिना किसी झिझक के संपर्क करें..
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"65 साल के मेरे ससुर जी नई जैकेट पहने, सिर पर हल्का-सा इत्र लगाए, दरवाजा खोलकर... किसी का इंतज़ार करते खड़े थे।" उनके हा...
18/11/2025

"65 साल के मेरे ससुर जी नई जैकेट पहने, सिर पर हल्का-सा इत्र लगाए, दरवाजा खोलकर... किसी का इंतज़ार करते खड़े थे।" उनके हाथ में एक छोटा-सा गिफ्ट का लाल डिब्बा चमक रहा था—कुछ ऐसा, जिसे उन्होंने हमसे छुपाकर खरीदा था।,
मेरे पति की आवाज़ काँप गई
“पापा… ये किसके लिए है?”
उन्होंने धीरे से कहा, “आज उसे प्रपोज़ करने का इरादा है…”
हमारी साँसें रुक गईं। “किसे?”
उन्होंने मुस्कुराकर उत्तर दिया
“मेरी ट्यूटर… आर्या को।”

ये घटना, किसी लालच या किसी मजबूरी की वजह से नहीं हुई थी… बल्कि अकेलेपन की एक ऐसी चीख थी जिसे हम, उनके अपने बच्चे, सुन ही नहीं पाए।

मेरे ससुर, दिनेश प्रसाद, उम्र 65। कई साल पहले सासु माँ गुजर गई थीं। ऊपर से डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर और घुटनों के दर्द की वजह से वे घर में ही रहते थे। टीवी देखते, खिड़की से बाहर सड़क को निहारते और कभी-कभी पड़ोस के बच्चों के साथ बातें करते।

पर असलियत यह थी
वे अकेले थे। बेहद अकेले।

उनका पढ़ाई का शौक
उन्हें अंग्रेज़ी सीखने का शौक था। हमेशा कहते—
“मुझे अपने पोते-पोतियों से अंग्रेज़ी में बात करनी है। उम्र हो गई है, मगर सीखने में क्या जाता है?”

हमने उनके लिए एक ऑनलाइन ट्यूटर ढूँढी
आर्या, उम्र लगभग 28।
बहुत सभ्य, नरम स्वभाव की और बेहद धैर्यवान।

दोपहर के समय वे फोन पर क्लास लेते थे। आर्या उन्हें बड़ी शांति से समझाती
“गुड जॉब, अंकल! आप तो बहुत जल्दी सीख जाते हैं।”
और ससुर जी बच्चे की तरह खिल उठते।

हमने कभी सोचा ही नहीं कि यही मासूम-सी तारीफें, यही दो मिनट की देखभाल, उनका दिल धीरे-धीरे बाँधती जा रही थीं।

हम एक दिन अचानक घर लौटे तो देखा
ससुर जी नई शर्ट पहनकर बैठे हैं।
बाल कंघी किए हुए।
डायबिटीज़ की दवाई लेने भी भूल गए थे।

मेरे पति ने पूछा
“पापा, कोई खास बात?”

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा
“आज आर्या घर आएगी… उसे अंग्रेज़ी का एक प्रैक्टिकल सेशन करवाना है।”

हमें थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन हमने सोचा शायद ऑनलाइन क्लास का कोई हिस्सा होगा।

एक घंटे बाद आर्या आई
सादगी भरी लड़की, मधुर मुस्कान।
वह बिल्कुल सम्मान से बोली
“नमस्ते अंकल, नमस्ते भैया-भाभी। आज थोड़ा एक्स्ट्रा पढ़ा दूँ, आप निश्चिंत रहें।”

सबकुछ ठीक लग रहा था…
जब तक हमने वह लाल डिब्बा नहीं देखा।

हमने धीरे से डिब्बा खोला
अंदर एक छोटा सा गोल्ड प्लेटेड रिंग थी।
और एक मुड़ा हुआ कागज़
उस पर लिखा था:

"आर्या, क्या तुम मेरी जीवन साथी बनोगी?"

हम सन्न।

मेरे पति ने गुस्से से कहा
“पापा ये सब क्या है?”
ससुर जी बोल पड़े
“अकेला रहता हूँ… कोई नहीं है मेरे पास…
वो मुझे समझती है, बात करती है, पूछती है अंकल ने खाना खाया या नहीं?
क्या बेटे, क्या बहू… तुम लोगों के पास समय कहाँ है मेरे लिए?”

उनकी आँखें भर आईं।

साथ में। मेरी भी।

क्योंकि वे गलत नहीं थे।

हम सचमुच व्यस्त रहते थे। नौकरी, बच्चे, घर, दौड़-भाग…
और उन्होंने कभी समय माँगा ही नहीं कि हम उनके साथ बैठें।

हम समझ ही नहीं पाए कि उनकी चुप्पी में कितनी खालीपन था।

प्रपोज़ल का दिन
आर्या को कुछ पता नहीं था।
ससुर जी ने उसे लिविंग रूम में चाय के साथ बैठाया।

फिर धीरे-धीरे, कांपते हाथों से लैटर निकाला।
हाथ भी काँप रहे थे… आवाज़ भी…

“आर्या बेटा… नहीं, आर्या…
मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

हम दूर से देख रहे थे, दिल धड़क रहा था।

आर्या चौंककर सिमट गई
“जी अंकल?”

उन्होंने रिंग बढ़ाई
“क्या तुम… मेरे साथ जीवन बिता…”

वह वहीं रुक गई।
हमारी साँसें भी।

आर्या की आँखें चौड़ी।
चेहरा सफेद।

उसने तुरंत दोनों हाथ जोड़ दिए
“अंकल, नहीं! आप मेरे पिता जैसे हैं।
मैं आपका इतना सम्मान करती हूँ…
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि आप…
मैं माफी चाहती हूँ, प्लीज़ ऐसा मत कहिए।
आप बहुत अच्छे इंसान हैं, बहुत प्यारे…
लेकिन यह बिल्कुल गलत है।”

ससुर जी की उँगलियाँ काँपते हुए झूल गईं।
रिंग उनके हाथ से गिर गई।
और उसके साथ…
हमारा सारा घर।

उनका टूटना
आर्या रोते हुए चली गई।
ससुर जी खड़े भी नहीं रह पाए।
कुर्सी पर बैठकर रोने लगे
वो भी ऐसे जैसे कोई बच्चा फूटकर रोता है।

उन्होंने सिर्फ यही कहा

"मैं बस थोड़ा-सा प्यार चाहता था…
थोड़ा-सा साथ…
बस इतना ही।
क्या माँग लिया मैंने?"

हम शर्म से जमीन में गड़ गए।

हम जिसे "बड़े" समझते थे,
जिसे "मजबूत" मानते थे,
वो इतना टूटा हुआ भी हो सकता है
ये पहली बार महसूस हुआ।

घर के भीतर की खामोशी
उस दिन के बाद ससुर जी ने पढ़ाई छोड़ दी।
फोन उठाना बंद कर दिया।
कमरे से बाहर आना बंद।
आँखों में खालीपन…
जैसे उनसे जीवन की आखिरी इच्छा भी छीन ली गई।

हम उन्हें खाना देने जाते, तो कहते
“रहने दो, भूख नहीं।”

कभी खिड़की के पास जाकर बैठ जाते,
कभी पुरानी तस्वीरें निकालते।
पर हमने उन्हें पहले कभी इतना चुप नहीं देखा था।

एक दिन वह गिर पड़े
सुबह की चाय लेकर मैं उनके कमरे में गई।
पर देखा—
वे फर्श पर बैठे हैं, आँसू आँखों से बह रहे हैं और सीने पर हाथ रखे हैं।

हमने उन्हें अस्पताल पहुँचाया।

डॉक्टर ने कहा
“दिल कमजोर है… लेकिन उससे भी ज्यादा मन टूटा हुआ है।
इन्हें प्यार, साथ और बातचीत की जरूरत है।
वरना दवाइयों से भी फर्क नहीं पड़ेगा।”

मेरे पति की आँखें लाल थीं।
उन्होंने डॉक्टर से पूछा
“हम क्या करें?”

डॉक्टर ने बस इतना कहा
“इनके पास बैठिए।
इनकी बातें सुनिए।
इन्हें एहसास दीजिए कि ये अकेले नहीं हैं।”

बस।

ये ही वो बात थी जिसे हम सालों से समझ नहीं पाए थे।

अस्पताल से घर आने के बाद सबकुछ बदल गया।

1. अब हम रोज़ उनके साथ बैठते
मेरे पति और मैं, शाम को एक घंटा सिर्फ उनके कमरे में बिताते।
लूडो, ताश, पुराने किस्से…
उनका चेहरा खिलने लगा।

2. बच्चों ने उन्हें “नाना व्हाइटबोर्ड टाइम” देना शुरू किया
वे अब बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाते।
जो सपना वो खुद पूरा नहीं कर पाए, बच्चे पूरा करवाते थे।

3. हमने आर्या से माफी माँगी
वह बोली “अंकल बुरे इंसान नहीं, बस अकेले हैं। मेरी दुआ है वो खुश रहें।”
उसके बाद उसने खुद मैसेज भेजकर उनकी खुशहाली पूछी।
लेकिन क्लास नहीं रखी वह ठीक भी था।

पर सबसे ज्यादा दिल तोड़ा जिस बात ने…
एक शाम मैंने उन्हें अकेला बैठा देखा।
गले में पुराने फोटो की माला पकड़े।
फोटो में सासु माँ हंस रही थीं।

वे धीमे से बोले

“मेरी गलती क्या थी बहू?
मैं बस फिर से किसी के साथ हँसना चाहता था।
किसी के इंतज़ार की वजह बनना चाहता था।
एक बार किसी के लिए ज़रूरी बनना चाहता था…
इतना भी हक़ नहीं है क्या बूढ़े इंसान को?”

मैं फूट-फूट कर रो पड़ी।

क्योंकि सच यह था
हमने अपने ही पिता को अकेलेपन की उम्र दी थी।

कुछ महीनों बाद डॉक्टर ने कहा
“अब बेटा, इनके दिल को सिर्फ एक चीज़ चाहिए
अपनों का साथ।
अगर यह मिला, तो ये सालों तक खुश रहेंगे।
अगर नहीं मिला, तो दवाइयाँ भी हार जाएंगी।”

हम दिल से बदल गए थे।
अब ससुर जी हमारे घर के “बोझ” नहीं,
हमारा सबसे नाज़ुक रिश्ता बन गए थे।

लेकिन जिस दिन उन्होंने फिर से मुस्कुराकर हँसना शुरू किया…
उसी दिन उन्होंने धीरे से मुझसे कहा

“बहू, मुझे उस लड़की से प्यार नहीं था…
मुझे उससे बस वो एहसास मिला जो अपने ही नहीं दे पाए थे।
लेकिन अब… तुम लोग मुझे वो दे रहे हो।
बस इतना काफी है।”

उनकी आँखों में एक चमक थी
किसी की ज़रूरत बनने की चमक।

कुछ महीनों बाद उनकी तबीयत पूरी तरह संभल चुकी थी।
घुटने का दर्द भी कम, दिल की आंच भी कम…
और सबसे बड़ी बात
उनकी आँखों में चमक।

रात को हम सब साथ बैठे थे।
बच्चों को कहानियाँ सुना रहे थे।
अचानक वे रुककर बोले

“बस एक बात याद रखना…
बूढ़े लोग प्यार नहीं माँगते…
बस थोड़ा-सा ध्यान, थोड़ा-सा साथ…
यही उनका पूरा जीवन बन जाता है।”

हम सब उस रात रो पड़े।
और मैंने मन में ठान लिया

कभी भी किसी को इतना अकेला नहीं छोड़ेंगे
कि उसे प्यार की भीख कहीं और माँगनी पड़े।!(NA)!

दोस्तों:-
ये कहानी सिर्फ हमारे घर की नहीं…
यह उन सभी घरों की कहानी है
जहाँ माता-पिता चुपचाप जीते हैं,
बिना शिकायत, बिना किसी इच्छा के,
बस इस इंतज़ार में
कभी हमारे बच्चे भी हमारे पास बैठेंगे।
इसीलिए घर के बुजुर्गों को कभी बोझ ना समझे, उनको अपना वक्त दे समय दें उनके साथ समय बिताए उनके साथ स्नेह और प्यार से पेश आए... ताकि उनको कहीं और भटकना न पड़े...
🙏🙏🌹
आपको कहानी कैसी लगी अपनी प्रतिक्रिया अपने अनमोल विचार जरुर व्यक्त करें.... अच्छी लगी तो फॉलो कर शेयर जरूर करें....🙏

10/11/2025
09/11/2025

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