22/01/2024
"प्रभु का पत्र भक्त के नाम"
आज इस संसार में मनुष्य इतना अधिक व्यस्त हो गया है कि सांसारिक कार्य के लिए तो समय है पर खुद अपने लिए थोडा सा भी समय नहीं है। जिस चीज की प्राप्ति के लिए यह अनमोल शरीर रत्न मिला है आज हम उसी को भूल बैठे हैं। अपने लिए समय का मतलब : आप जो धर्म-कर्म, सेवा-सत्संग, कीर्तन, हरिचर्चा करते हैं सिर्फ यही आपका है और बाकी सब संसार का है। आइये देखें एक प्रभु का पत्र अपने भक्त के लिए :-
ॐ श्री हरि
मेरे प्रिय,
सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास खडा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बातें करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी शुभ बात या घटना के लिए मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं ! फिर मैंने सोचा कि तुम स्नान करने के बाद मुझे याद करोगे पर तुम इस उधेडबुन में लग गए कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने हैं !
फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपनी ऑफिस के कागजात इकट्ठा करने के लिए इधर-उधर दौड रहे थे, तो उस समय भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हें मेरा ध्यान आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ ! फिर जब तुमने ऑफिस जाने के लिए ट्रेन पकडी तो मैं समझा कि इस खाली समय का सदुपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोडी देर पेपर पढ़ा और फिर अपने मोबाइल में खेलने लग गये, मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया ! मैं तुम्हें बताना चाहता था कि अपने दिनचर्या का कुछ समय मेरे साथ बिता कर तो देखो तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे लेकिन तुमने मुझसे बात तक भी नहीं की !
एक मौका ऐसा भी आया जब तुम बिल्कुल खाली थे और कुर्सी पर 15 मिनट यूँ ही बैठे रहे, लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आया ! दिन का अब भी काफी समय बचा था मुझे लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जाएगी, लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो गये।
जब सारे काम निपट गये तो तुमने टीवी खोल लिया और घंटों देखते रहे। देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे। तुमने अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़ कर सो गये।
मेरा मन था कि मैं भी तुम्हारे दिनचर्या का हिस्सा बनूँ, तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ, तुम्हारी कुछ सुनूँ, तुम्हें कुछ सुनाऊँ, कुछ मार्गदर्शक करूँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किसलिए धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो।
मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ, हर दिन मैं इस बात का इंतजार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे अपनी छोटी-छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे। पर तुम तब ही मुझे याद करते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है ? तुम जल्दी में आते हो और अपनी मांगें मेरे आगे रखकर चले जाते हो !
और मजे की बात तो यह है कि तुम मेरी तरफ देखते भी नहीं ; उस वक्त भी तुम्हारा ध्यान लोगों की तरफ ही लगा रहता है और मैं प्रतिक्षा करता ही रह जाता हूँ कि तुम मेरी आँखों में आँखें डाल कर बात करोगे।
खैर कोई बात नहीं हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये ! ऐसा मुझे विश्वास है और मुझे तुममें आस्था है। आखिरकार मेरा दूसरा नाम- आस्था और विश्वास ही तो है !
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"जय जय श्री राधे"