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*जीवनशैली में बदलाव जो 20 ,30 और 40 के उम्र के दौरान अपनाना चाहिए।*दिल की बीमारीया कभी किसी के साथ हो सकती है, यहाँ तक क...
16/03/2022

*जीवनशैली में बदलाव जो 20 ,30 और 40 के उम्र के दौरान अपनाना चाहिए।*

दिल की बीमारीया कभी किसी के साथ हो सकती है, यहाँ तक कि बच्चों में भी कोई भेदभाव नहीं करती हैं। दुनिया भर में स्वास्थ्य संस्थाओं द्वारा किए गए हाल के अध्ययनों के अनुसार, हृदयरोग (सीवीडी) से दुनिया में सबसे ज्यादा मृत्यु होती है, इनसे होने वाली वार्षिक घटना 17.5 मिलियन है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप इसे अपने तक़दीर के रूप में स्वीकार करते हैं। कोई भी व्यक्ति हृदय की समस्याओं का शिकार हो सकता है, लेकिन एक स्वस्थ जीवन शैली बनाए रखने से आपके स्वास्थ्य सहित हृदय की सेहत अधिक समय तक बिलकुल ठीक रहती है। हालांकि आनुवंशिक कारकों जैसे पारिवारिक इतिहास से हृदय रोग, लिंग या उम्र को बदला नहीं जा सकता है, लेकिन आवश्यक निवारक उपाय करने से ख़तरा कम हो सकता है और आपके हृदय की सेहत को बेहतरीन अवस्था में रखा जा सकता है। जीवन की शुरुआत में स्वस्थ जीवन शैली शुरू करने से आपको 60 और उसके आगे के उम्र में भी लाभ होगा। दैनिक दिनचर्या में हर छोटा-बड़ा बदलाव आपके संपूर्ण स्वास्थ्य, लंबे समय में, आपको एक लंबा और स्वस्थ जीवन जीने में मदद करता है।

आइए हम 20,30 और 40 के दशक में स्वस्थ जीवन के लिए अपनाए जाने वाले जीवनशैली में बदलाव पर एक नज़र डालते हैं।

20 के दशक में में हृदय का स्वास्थ्य

20 का उम्र वह समय होता है जब आप युवा और ऊर्जावान होते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए, यह वह समय है जब वे दुनिया के सामने उजागर होते हैं और वे सभी पहलुओं से रूबरू होते हैं। इन वर्षों में आप जिस तरह की आदतें बनाते हैं, वही बाद में आपके जीवन के लिए आधार होगा। इस तथ्य का जिक्र कइयों ने किया है और उसे अमल में भी लाया है। जितनी जल्दी आप एक स्वस्थ जीवन शैली अपनाते हैं, उतना ही यह आपके हृदय को स्वस्थ रखेगा, आपको 60 और 70 के उम्र में सक्रिय जीवन जीने में सक्षम करेगा।

20 के उम्र में अपने हृदय को स्वस्थ रखने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए:

– ऐसे आहार को अपनाएं जो जंकफूड मुक्त हो। हमेशा यह सुनिश्चित करें कि आप फलों, सब्जियों और

कम प्रोटीन (भुनाहुआ चिकन) का भरपूर सेवन करें। सोडा पीने के बजाय कैलोरी-मुक्त ताजे फलों के रस और पानी को अपने पौष्टिक आहार में शामिल करें।

– सहस्त्राब्दी पीढ़ी काम कि जरूरतों के वजह से हम गतिहीन जीवन व्यतीत कर रहे हैं, इसलिए अपने दैनिक जीवन में व्यायाम को अपनाना महत्वपूर्ण है। कोशिश करें कि लंबे समय तक न बैठें, कभी-कभार काम करने के दौरान टहलने या शरीर को सीधा करने के लिए विराम लें।

– आने वाले वर्षों में आपके कामकाजी जीवन में व्यस्तता आ सकती है, लेकिन कोशिश करें कि अस्वास्थ्यकर आदतों में लिप्त न हों जो आपके स्वास्थ्य को खराब कर देगा। अधिकांश लोग अपने जीवन से तनाव कम करने के लिए धूम्रपान, मदिरा या दवाओं का सेवन करते हैं। इनका सेवन आपको तनाव से अस्थायी राहत देता है लेकिन लंबे समय में, ये आपके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हुए आपको इन पर निर्भर रखता हैं। यदि आप स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो इन आदतों में शामिल न हों और साथ ही साथ धूम्रपान, शराब, ड्रग्स आदि के सेवन को ना कहे।

– ज़्यादातर लोगों को अपने काम के लिए अपना अधिकांश समय स्क्रीन के सामने बिताना पड़ता है। चूँकि आप इस बारे में कुछ नहीं कर सकते, तो अनावश्यक स्क्रीनके सामने समय बिताने से रोकने के उपाय तलाश सकते हैं। अपनी आंखों को आराम देने के लिए बीच-बीच में विराम लें, बचाव वाले चश्मे का उपयोग करें और स्क्रीन के सामने जितना हो कम से कम समय व्यतीत करें।

30 और 40 के दशक में हृदय स्वास्थ्य

30 और 40 का समय वह समय होता है जब आप में से अधिकांश को नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारी हो सकता है। अक्सर, इस समय के दौरान, लोग अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देते हैं साथ ही साथ खुद के बारे में आखिरी में सोचने लगते हैं। स्वस्थ हृदय और स्वस्थ जीवन बनाए रखने के लिए इन कुछ युक्तियों का पालन करें:

– अच्छी सेहत रहने के वाबजूद भी अपना सालाना स्वास्थ्य परीक्षण उचित समय से करवाएं। अपने आप की रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, रक्त में चीनी की मात्रा, बीएमआई आदि जाँच करवाने से स्वास्थ्य सामान्य-सीमा में हैं या नहीं को निर्धारित करने में मदद मिलेगी।

– तनाव को सामान्य रखने के लिए योग और साँस लेने के व्यायाम अच्छे उपाय हैं। अपने जीवन में रोजाना इन व्यायाम का अभ्यास करें ताकि तनाव को कम किया जा सके और अपने हृदय को स्वस्थ रखा जा सके।

– पर्याप्त नींद स्वस्थ हृदय के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। इस उम्र में 6-8 घंटे की नींद आपके लिए जरूरी है।

– स्वस्थ रहने से सभी बीमारियों से लड़ने में मदद मिलती है। अपने व्यस्तता के दिनों में भी हर दिन 30-40 मिनट की तेज चाल न केवल हृदय रोग, मधुमेह के खतरे को कम करने में मदद करेगी बल्कि आपको वजन को नियंत्रित करने में भी मदद करेगी।

– डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) कहता है कि 18-64 आयु वर्ग के स्वस्थ वयस्कों को स्वस्थ रहने के लिए एक सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम-तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि (जैसे चलना या तैरना) करना चाहिए।

– अधिक फल और सब्जियों का सेवन करें साथ ही साथ सोडा और मीठे पेय पदार्थ से बचें।

– खुद को वसायुक्त लाल मांस का सेवन करने से रोकें।

– स्वस्थ हृदय के लिए धूम्रपान और शराब सबसे बड़ी समस्या है। यदि आप धूम्रपान करते हैं तो छोड़ देना चाहिए।- रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, और मधुमेह आदि जैसे रोगों पर हमेशा ध्यान रखें।29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस पर आइए हम हृदय स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाएं। साथ ही साथ हम लोगों से आग्रह करते हैं कि वे अधिक स्वास्थ्यवर्धक खाने का वादा करें, अधिक सक्रिय होने के लिए और धूम्रपान न करे.

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वजन का वाढते ?वजन वाढणे हा आपल्या शरीराचा गुण आहे. या शरीरात जेवढे जास्त अन्न टाकले जाईल आणि त्यातले जेवढे कमी अन्न पचवल...
15/03/2022

वजन का वाढते ?
वजन वाढणे हा आपल्या शरीराचा गुण आहे. या शरीरात जेवढे जास्त अन्न टाकले जाईल आणि त्यातले जेवढे कमी अन्न पचवले जाईल तेवढे आपले वजन वाढत जाईल हा अगदी सरळ सरळ हिशेब आहे. त्यामुळे या विषयातले तज्ञ वजन कमी करण्यासाठी कमी खाण्याचा आणि हलके अन्न खाण्याचा सल्ला देतात. म्हणजेच वजनावर खाण्याचा परिणाम होतो असे मानले जाते.यात काही चूक नाही पण काही वेळा खाण्याची अनेक पथ्ये पाळूनही जाडी व वजन वाढत जाते. म्हणजे वजन वाढण्याची इतरही काही कारणे आहेत. ती कारणे आता शोधली गेली आहेत. तज्ञांना असे आढळले आहे की, झोप कमी असणे हेही वजन वाढण्याचे एक कारण होऊ शकते.

रात्री उशीरापर्यंत जागणे आणि तणावाखाली काम करीत राहण्याने शरीरातल्या काही यंत्रणांवर दबाव येतो. हा दबाव आपले वजन वाढण्यास कारणीभूत ठरतो. रात्रीच्या जागरणाचा हा परिणाम कमी करण्यासाठी कितीही व्यायाम केला तरीही काही उपयोग होत नाही. कारण जागरण करणे हा निसर्गाशी विसंगत असा व्यवहार असतोे. निसर्गाने आपल्याला रात्र झाली की झोपायला सांगितले आहे. पण आपण रात्री झोपण्याऐवजी काम करीत बसतो त्यामुळे शरीरातल्या चयापचय क्रिया बाधित होतात आणि त्याचा परिणाम शरीराच्या वजनावर होतो. तेव्हा वजन कमी करण्याच्या उपायात रात्री लवकर झोपणे, रात्री काम न करणे आणि पुरेशी झोप घेणे याही गोष्टींचा समावेश केला गेला पाहिजे.

आरोग्याचे सल्ले देणारे लोक आपल्याला अधिक पाणी पिण्याचा सल्ला देतात. पण किती पाणी प्यावे हे प्रत्येकाच्या प्रकृतीवर अवलंबून असते. सल्ला ऐकून काही लोक फारच पाणी प्यायला लागतात. या जादा पाण्यानेही वजन वाढत असते. तणावाखाली जगणे हेही वजन वाढण्याचे कारण आहे असे दिसून आले आहे. पण तणावाचा आपल्या वजनावर कसा परिणाम होतो हेही समजून घेतले पाहिजे. तणाव वाढायला लागला की, तणावावर मात करणारी औषधे घेतली जातात. या औषधामध्ये शरीरात पाणी धरून ठेवण्याची क्षमता असते म्हणजे पिलेले पाणी शरीरात मिसळून जात नाही आणि या साठलेल्या पाण्याचा परिणाम वजनावर होतो. एकंदरीत असे म्हणता येईल की वजन वाढणे हे केवळ आहारावरच अवलंबून नसून विहारावरही अवलंबून आहे. आपले वर्तनही चांगले आणि नियमानुसार हवे तरच वजन नियंत्रणात राहते

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इन लोगों के शरीर में पाई जाती है Vitamin D की कमी, जानें कारण और आज से ही बदल दें ये चीजेंvitamin d deficiency : वैसे तो...
14/03/2022

इन लोगों के शरीर में पाई जाती है Vitamin D की कमी, जानें कारण और आज से ही बदल दें ये चीजें

vitamin d deficiency : वैसे तो सभी लोगों को विटामिन डी की जरूरत होती है लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें विटामिन डी की ज्यादा जरूरत होती है. ऐसे लोगों को धूप सेंकने के अलावा विटामिन डी की टैबलेट (vitamin d tablets) भी खानी चाहिए.

vitamin d deficiency : चलिए सबसे पहले ये जान लेते हैं कि किन लोगों में विटामिन डी की कमी (vitamin d deficiency)होती है.

Benefits of Vitamin D : भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास इतना समय भी नहीं है कि वह अपने लिए भी कुछ समय निकाल सके. यही वजह है कि वह अपने शरीर के प्रति लापरवाह होता जा रहा है. अगर आप भी उनमें से हैं तो हम आज आपको एक गंभीर बीमारी या यूं कहे आपकी स्थिति से रूबरू करवाना चाहते हैं. दरअसल, इम्यूनिटी बूस्ट करने के लिए हमारी बॉडी में हर तरह के विटामिन का मौजूद होना अति आवश्यक है. उन्हीं में से एक स्पेशल विटामिन है, विटामिन डी. और विटामिन डी की डिफिशिएंसी (vitamin d deficiency) हो जाए तो आप की हड्डियां बढ़ती उम्र के साथ कमजोर होने लगती हैं. यही नहीं ज्यादा कमी होने पर यह चटकने भी लगती हैं, जोकि अच्छा संकेत नहीं है. दरअस, सभी लोगों को विटामिन डी की जरूरत होती है लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें विटामिन डी (vitamin D) की ज्यादा जरूरत होती है. ऐसे लोगों को धूप सेंकने के अलावा विटामिन डी की टैबलेट (vitamin d tablets) भी खानी चाहिए. तो चलिए सबसे पहले ये जान लेते हैं कि किन लोगों में विटामिन डी की कमी (vitamin d deficiency) होती है.

कहीं आप तो इन लोगों में नहीं जिन्हें है विटामिन डी की कमी |

दफ्तर जाने वाले लोग

अब आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि ऑफिस जाने वाले लोगों में विटामिन डी की कमी आखिर क्यों होती है. दरअसल ऑफिस जाने वाले लोगों को धूप सेकने का टाइम नहीं मिल पाता और वो ज्यादातर अंदर या फिर कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करते हैं. ज्यादातर डेस्क जॉब करने वाले लोगों में विटामिन डी की डेफिशिएंसी पाई जाती है.

55 साल के उम्र के लोग

विटामिन डी की कमी का उम्र से भी गहरा नाता है. 55 साल के बाद वैसे तो शरीर में कई विटामिंस की कमी (vitamin d deficiency) होने लगती है लेकिन विटामिन D की डिफिशिएंसी ज्यादा देखने को मिलती है. विटामिन डी की कमी से अकेलापन, नींद ना आने की समस्या, चिड़चिड़ापन, तनाव और जॉइंट पेन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

ज्यादा नॉनवेज खाने वाले लोग

वो लोग जो हमेशा नॉनवेज खाते हैं और नॉन वेज खाना पसंद करते हैं उनमें भी विटामिन डी की कमी (vitamin d deficiency) पाई जाती है. दरअसल नॉन वेज प्रोटीन का हाई सोर्स होते हैं लेकिन उनसे विटामिन डी की पूर्ति नहीं हो पाती. विटामिन डी की पूर्ति के लिए सब्जी, फल और धूप सेकना बहुत जरूरी होता है.

हाई फैट वाले लोग

एनआईएच की रिपोर्ट बताती है कि अगर आपके पास 30 से ज्यादा बॉडी मास इंडेक्स या हाई बॉडी फैट परसेंटेज है तो ऐसे में आपके शरीर में विटामिन डी की कमी (vitamin d deficiency) हो सकती है

अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.

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मधुमेहजगातील मधुमेहाची राजधानी अशी आज भारताची ओळख निर्माण होत आहे   जगातील जवळपास 50 दशलक्ष लोक  टाइप -2 मधुमेहाने ग्रस्...
02/03/2022

मधुमेह
जगातील मधुमेहाची राजधानी अशी आज भारताची ओळख निर्माण होत आहे जगातील जवळपास 50 दशलक्ष लोक टाइप -2 मधुमेहाने ग्रस्त आहेत. भारतासमोर हे एक आव्हान आहे. तथापि, वैद्यकीय तज्ञांचे मत आहे की वेळेवर शोध घेणे आणि योग्य व्यवस्थापन रुग्णांना सामान्य जीवन जगण्यात खुप मदत करु शकते .. मधुमेह जगभरात आणि विशेषत: भारतात बहुतेक सर्व आजारांबद्दल चर्चेचा विषय असू शकतो, परंतु या विषयी जागरूकता कमी आहे यावरून असे लक्षात येते की भारतात आज टाईप -2 मधुमेह (इतर लोकांपेक्षा 5 दशलक्षाहूनही अधिक) लोक आहेत.
जगात मधुमेहाचे रुग्ण सर्वाधिक आहेत आणि साखरेचा आजार आपल्या देशात एक मोठी आरोग्याची समस्या बनत आहे. जगातील मधुमेहाची राजधानी म्हणून अनेकदा ओळखल्या जाणाऱ्या भारतात आंतरराष्ट्रीय विकसनशील देशांमधील मधुमेहाच्या मधुमेहाच्या प्रमाणानुसार चिंताजनक वाढ झाली आहे. मधुमेहावरील जागतिक आरोग्य संघटनेच्या (डब्ल्यूएचओ) फॅक्टशीटच्या मते, अंदाजे 4.4 दशलक्ष मृत्यू उच्च रक्तातील साखरेमुळे होतो. फक्त सांगायचे तर, ही वैद्यकीय स्थिती आहे जी अपुरी उत्पादन आणि इन्सुलिनच्या स्रावमुळे उद्भवली आहे. टाइप -१ मधुमेहाच्या बाबतीत स्वादुपिंड आणि मधुमेहावरील रामबाण उपाय टाइप -२ मधुमेहाचा सदोष प्रतिसाद. शरीराच्या सामान्य परिस्थितीत, रक्तातील ग्लूकोजची पातळी इंसुलिनद्वारे कडकपणे नियंत्रित केली जाते, हे स्वादुपिंडाद्वारे तयार केलेले हार्मोन असते. इन्सुलिन रक्तातील ग्लुकोजची पातळी कमी करते. जेव्हा रक्तातील ग्लुकोज वाढते (उदाहरणार्थ, खाल्ल्यानंतर), ग्लूकोजची पातळी सामान्य करण्यासाठी स्वादुपिंडातून इन्सुलिन सोडले जाते. मधुमेह असलेल्या रुग्णांमध्ये, मधुमेहावरील रामबाण उपाय च्या अभाव किंवा अपुर्‍या उत्पादनामुळे हायपरग्लाइसीमिया होतो. मधुमेह एक दीर्घकाळापर्यंत चालणारी वैद्यकीय स्थिती आहे, म्हणजेच सुरुवातीच्या काळात औषधांच्या माध्यमातून जीवनशैलीतील बदलांचा परिचय देऊन आणि त्याच्या घटनेनंतर नियंत्रित केले जाऊ शकते. प्रगत अवस्थेत बाह्य इन्सुलिन. परंतु हे पूर्णपणे बरे होऊ शकत नाही आणि आयुष्यभर टिकू शकते असे म्हणणे चुकीचे ठरणार नाही. मधुमेह हा आजमितीस जगातील सर्वात मोठा आजार आहे. हे सध्या जगभरातील अंदाजे 143 दशलक्ष लोकांना प्रभावित करते आणि ही संख्या वेगाने वाढत आहे. या समस्येचे निराकरण निरोगी सक्रिय जीवनशैली आहे. मधुमेह ग्रस्त असलेल्या व्यक्तीस निरोगी पौष्टिक आहार, योग्य व्यायामाची योजना आणि सक्रिय जीवनशैली पाळल्यास ते नियंत्रित होऊ शकते. निरोगीपणा म्हणून आम्ही निरोगी सक्रिय जीवनशैली अवलंबण्यासाठी लोकांना मार्गदर्शन करू शकतो.

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चरबीचे प्रकार १. पोटाच्या पोकळीत साठलेली चरबी२. त्वचेखाली साठलेली चरबी व्हिसरल चरबी ही शरीरातील चरबी आहे जी ओटीपोटात पोक...
26/02/2022

चरबीचे प्रकार

१. पोटाच्या पोकळीत साठलेली चरबी

२. त्वचेखाली साठलेली चरबी

व्हिसरल चरबी
ही शरीरातील चरबी आहे जी ओटीपोटात पोकळीमध्ये साठविली जाते आणि म्हणूनच यकृत, स्वादुपिंड आणि आतड्यांसारख्या असंख्य महत्त्वपूर्ण अंतर्गत अवयवांच्या आसपास साठत जाणारी चरबी

टाईप २ मधुमेह आणि हृदयरोग यासारख्या विशिष्ट आरोग्याच्या गुंतागुंतंसाठी एखाद्या व्यक्तीने व्हिस्ट्रल फॅटचे प्रमाण जितके जास्त ठेवले तितके जास्त असते. जास्त व्हिस्ट्रल फॅटमुळे आरोग्यास गंभीर समस्या उद्भवू शकतात.
सुदैवाने, व्हिसरल चरबी व्यायाम, आहार आणि जीवनशैली बदलांसाठी अत्यंत ग्रहणक्षम आहे. आपण हरवलेल्या पौंडसह, आपण थोडासा चरबी गमावाल. शक्य असल्यास, आपण दररोज किमान 30 मिनिटे व्यायाम केला पाहिजे. दोन्ही कार्डिओ व्यायाम आणि सामर्थ्य प्रशिक्षण यांचा समावेश असल्याची खात्री करा. कार्डिओमध्ये सर्किट प्रशिक्षण, दुचाकी चालविणे किंवा धावणे यासारखे एरोबिक व्यायाम समाविष्ट आहे आणि चरबी जलद बर्न करेल. सामर्थ्य प्रशिक्षण हळूहळू वेळोवेळी अधिक कॅलरी जळेल कारण आपले स्नायू मजबूत होतात आणि अधिक ऊर्जा वापरतात. आदर्शपणे, आपण आठवड्यातून 5 दिवस 30 मिनिटे कार्डिओ आणि आठवड्यातून किमान 3 वेळा सामर्थ्य प्रशिक्षण कराल.

तणाव संप्रेरक कोर्टिसोल प्रत्यक्षात आपल्या शरीरात किती नेत्रदीपक चरबी साठवते हे वाढवू शकते, म्हणून आपल्या आयुष्यातील तणाव कमी केल्याने ते गमावणे सोपे होईल. ध्यान, दीर्घ श्वासोच्छ्वास आणि तणाव व्यवस्थापनाच्या युक्त्यांचा सराव करा.

निरोगी, संतुलित आहाराचे पालन करणे देखील आवश्यक आहे. आपल्या आहारातून प्रक्रिया केलेले, उच्च-साखर, उच्च चरबीयुक्त पदार्थ काढून टाका आणि अधिक पातळ प्रथिने, भाज्या आणि गोड बटाटे, बीन्स आणि मसूर सारख्या जटिल कार्बचा समावेश करा.

अत्यंत चरबी
पोटाच्या भागात चरबीचा बराच भाग थेट त्वचेखाली असतो. याला त्वचेखालील चरबी म्हणतात आणि ते आपल्या आरोग्यासाठी घातक नसते. हानिकारक चरबी म्हणजे आपल्या अवयवाभोवती न दिसणारी चरबी, अन्यथा ज्ञात त्वचेखालील ओटीपोटात चरबी असते. आपल्याला त्वचेखालील चरबी असू शकते परंतु अद्याप लठ्ठपणा असू शकत नाही.

त्वचेखालील चरबी

ही त्वचेच्या थरांवर थेट पडलेली फॅटी किंवा ipडिझोज टिशू असते. त्वचेखालील "त्वचेखाली" मध्ये अनुवादित करते. त्यात केवळ चरबी उती नसून रक्तवाहिन्या देखील असतात ज्या त्वचेला ऑक्सिजन आणि मज्जातंतू पुरवतात. त्वचेखालील चरबी हा एक शॉक शोषक आहे, जो आपल्या त्वचेवर आघात होण्यास उशीर करण्यास मदत करतो आणि उर्जा देखील साठवतो, ज्याचा उपयोग शरीर उच्च क्रियाकलापांच्या काळात करतो.
जास्त चरबीमुळे त्वचा कडक किंवा ताणलेली बनू शकते आणि परिणामी त्वचेचा पेच किंवा सेल्युलाईट खराब होतो. त्वचेखालील चरबी तुलनेने कमी प्रमाणात असते तेव्हा ते त्वचेच्या थराखाली हळूवारपणे पडून राहते आणि त्यामुळे ते कमी दिसत नाही.

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अशी असावी आरोग्यदायी जीवनशैलीआरोग्यसंपन्न राहण्यासाठी जीवनशैली योग्य असणे आवश्यक आहे. योग्य जीवनशैली कशी असावी याविषयी प...
25/02/2022

अशी असावी आरोग्यदायी जीवनशैली

आरोग्यसंपन्न राहण्यासाठी जीवनशैली योग्य असणे आवश्यक आहे. योग्य जीवनशैली कशी असावी याविषयी पुढील सल्ला उपयोगी ठरेल. सध्याच्या काळात लोकांनी आपली लाइफस्टाइल अशी बनविली आहे की, दिवसेंदिवस ते नवनवीन अडचणी आणि आजार यांनी घेरले जात आहेत. मग तो आहार असो किंवा आरामदायक जीवनशैल.

तसेच शहरी वातावरणसुद्धा अशा प्रकारची दिनचर्या बनविण्यास खूप मदत करते. सर्व ऐशआरामाच्या वस्तू त्यांना घरीच उपलब्ध होतात. त्यासाठी उठून कोठे जाण्याची गरज नाही. त्याचा परिणाम? जीवनशैलीशी निगडित समस्या. म्हणून आपली जीवनशैली बदलण्यासाठी काही संकल्प करा. दररोज चाला. जर शक्य झाले तर फुटबॉल खेळा. कार्यालयात किंवा कुठेही गेलात तरी लिफ्टच्या ऐवजी जिन्यांचा वापर करा. आपल्या कुत्र्याला फिरविण्यासाठी स्वत: घेऊन जा. मुलांबरोबर खेळा. हिरवळीवर अनवाणी पायांनी चाला. घराच्या आसपास झाडे लावा. म्हणजे असे सर्व काही करा की ज्यामुळे तुम्ही स्वत:ला अ‍ॅक्टिव्ह ठेवू शकाल. अशा ठिकाणी व्यायाम करू नका जेथे जास्त गर्दी असेल.

तळलेले पदार्थ आणि असे जास्त पदार्थ असलेले भोजन यांच्यापासून दूर राहा. ते अनेक आजारांचे मूळ असतात. डेअरी उत्पादनांचे सेवन करा. जसे चीज आणि मोयोनीजचे कमी फॅट उत्पादन आहारात घ्या. तणाव आपल्या जीवनात खूपच नकारात्मक परिणाम करतो. तज्ज्ञांनुसार तणाव कमी करण्यासाठी सकारात्मक विचार खूपच फायदेशीर ठरू शकतात. तणाव कमी करण्यासाठी रोज कमीत कमी अर्धा तास अशी कामे करा ज्यांना करण्याची आवड तुमच्या मनाला वाटेल. तणाव कमी करण्यासाठी तुम्ही योगाचा आधार घेऊ शकता. राग तणाव वाढवण्यात महत्त्वाची भूमिका पार पाडतो. म्हणून राग आल्यानंतर स्वत:ला शांत ठेवण्यासाठी एकपासून दहापर्यंत आकडे म्हणा. अशा लोकांपासून दूर राहण्याचा प्रयत्न करा, जे तुमचा तणाव वाढवतात. धूम्रपानापासून लांब राहा. धूम्रपानामुळे शरीर आणि वय यावर परिणाम तर होतोच, पण त्याचबरोबर फुप्फुसांचा कॅन्सर यासारखे धोकादायक आजारही होऊ शकतात.

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आहार नियोजनआपण जरी म्हणत असलो की दररोज व्यायाम करून आपले शरीऱ कार्यक्षम ठेवावयास पाहिजे तरी आपल्याला हा विचार फार उशीरा ...
23/02/2022

आहार नियोजन
आपण जरी म्हणत असलो की दररोज व्यायाम करून आपले शरीऱ कार्यक्षम ठेवावयास पाहिजे तरी आपल्याला हा विचार फार उशीरा म्हणजे वयाच्या पन्नाशीत सुचतो. त्यावेळी आपले शरीर व्याधीग्रस्त झालेले असते. कुणाला गुढगेदुखीचा त्रास, कुणाला कंबरदुखीचा त्रास, कुणाला वजनवाढीचा त्रास, कुणाला उच्चरक्तदाबाचा त्रास तर कुणाला मधुमेहाचा त्रास असे अनेक प्रकारे व्याधींनी त्रस्त झाल्यावर आपण शरीराकडे ते चांगले राहावे म्हणून प्रयत्न चालू करतो. आपण हे विसरतो की हे त्रास आपल्याला का उद्भवत असावेत? याचे कारण शोधत नाही. मग डॉक्टरकडे गेल्यावर डॉक्टर आपल्याला व्यायाम करा व खाण्यावर नियंत्रण ठेवा असे सांगतात. म्हणून आपले शरीर कार्यक्षम राहण्यासाठी संतुलित आहाराचे फार महत्त्व आहे.

साधारण मध्यम वयात म्हणजे वयाच्या पन्नाशीनंतर आपल्या शरीरात व कार्यात अनेक बदल घडत असतात. त्या बदलानुसार आपल्या आहारात सुद्धा बदल घडावयास हवेत. आपले वय वाढत जाते तसतसे आपल्या शरीराला लागणाऱ्या उष्मांकाची गरज कमी होते. आपल्याला भूक लागते पण ती लवकर भागते. तरुण वयात जे खाणे पुरत नव्हते ते या वयात पुरते.

बुद्धिजीवी वर्गाच्या व्यवसायात शारिरिक श्रमाचा भाग कमी असतो. शारिरिक हालचालीच्या अभावामुळे पचनशक्ती कमकुवत होते. खाण्यापिण्याच्या, झोपेच्या वेळा अनियमित असतील तर पचनशक्ती नक्की बिघडते. तेंव्हा प्रत्येकाने आपल्याला नक्की कोणत्या वेळी भूक लागते? आपली खरी गरज काय आहे? याचा अभ्यास करून साधारणपणे दर अडीच तासाने थोडे थोडे खावे. सकाळचा नास्ता, जेवण, संध्याकाळचा नास्ता, रात्रीचे जेवण असे तीन चार तासाच्या अंतराने व्यवस्थित नियोजन करावे. रात्रीचा आहार नक्कीच हलका असावा म्हणजे अपचन होणार नाही व अंगात मेदही वाढणार नाही. जेवण झाल्यावर लगेच झोपू नये. बऱ्याच लोकांना ही सवय असते. जेवण झाल्यावर दहा मिनिटे शतपावली करावी म्हणजे अंगातील सुस्ती जाईल. झोपण्याचे अगोदर नेहमी आपले जेवण अडीच तास अगोदर झालेले असावे. उशीरा कामावरून येणाऱ्या लोकांनी संध्याकाळचा नास्ता न घेताच एकदम जेवण घ्यावे. कारण त्यावेळी भूक चांगली लागलेली असते. त्यामुळे पचनही व्यवस्थित होते. जर झोप येण्यापूर्वी आपल्याला भूक लागली आहे असे वाटल्यास बिनसाखरेचे गायीचे दूध पिण्यास हरकत नाही.

प्रौढ वयाच्या लोकांच्या आहाराच नियोजन करताना कांही नियम पाळावे लागतात. १) आहारात विविधता असावी. २) ठराविक किंवा मोजकेच जेवण जेवा. ३) माफक प्रमाणात स्निग्ध पदार्थ घ्यावेत. जसे तूप, लोणी कमी खावे. पुरेसा चघळचोथा असावा. साखर, मैदा, अतिरिक्त मीठ, मद्यपान, चहा, कॉफी पेये कमीच घ्यावीत.

आहारात मुख्य घटक कर्बोदकेच असली पाहिजेत.

अ) तृणधान्य - तांदूळ, गहू, ज्वारी इत्यादी. यात प्रथिने, लोह, कॅलशियम, जीवनसत्व व चघळचोथा मिळतो.

ब) डाळी व कडधान्ये - मुग, तूर, उडीद या डाळी व वाटाणा, चवळी, मटकी इत्यादी कडधान्ये शाकाहारी लोकांचा महत्त्वाचा जेवणातील भाग आहे. यातून चांगल्या प्रकारची प्रथिने मिळतात. शिवाय ब, क जीवनसत्वे व चघळचोथा मिळतो.

क) दूध व दुग्धजन्य पदार्थ- यातून प्रथिने, कॅलशियम, जीवनसत्व अ व ड मिळते. प्रौढावस्थेत शरीराला कॅलशियमची गरज भासतेच. त्यासाठी साय विरहीत स्निग्धांश असलेले दूध, दह्याचे ताक जे पचनास सुलभ असते व पिण्यासही सोयिस्कर असते.

ड) भाज्या - आपल्या आहारात भाज्यांचे प्रमाण जाणीवपूर्वक वाढवले पाहिजे. या भाज्यापासून आपल्याला ब जीवनसत्व, बीटा कॅरोटीन व चघळचोथा मिळतोच शिवाय अँटीऍक्सिडंट ही मिळतात.

ई) फळे - आपल्या आहारात ऋतुमानाप्रमाणे फळांचा समावेश करणे आवश्यक आहे. कांही लोक जेवल्यानंतर लगेच फळे खातात. ते चुकीचे आहे. जेवणानंतर साधारणपणे दोन तासांनी फळे खावीत. मग दोन तासांनी नास्ता करावा. अशा रितीने वरील सर्व घटकांचा आपल्या आहारात समावेश झाला तर तो आहार संतुलित आहार म्हणावा लागेल.

फ) ड्रायफ्रूटस - खारिक, बदाम, आक्रोड या ड्रायफ्रूटचे प्रमाणात (१, २) सेवन आहारात आवश्यक आहे. त्यातून चयापचयनासाठी आवश्यक असणारे सिलेनियम, झिंक हे क्षार मिळतात. ग) पाणी - शरीराला आवश्यक असणारा घटक म्हणजे पाणी. आपल्या शरीरात पाण्याचे प्रमाण कायम व्यवस्थित राहण्यासाठी आपले पाणी पिण्याचे प्रमाण दिवसाला ८-१० ग्लास असावयास पाहिजे. जेवताना पाणी अगदी थोडे प्यावे. मात्र जेवण झाल्यावर कांही वेळाने म्हणजे साधारण अर्ध्या तासानंतर पाणी प्यावे. त्यामुळे अन्नपचनासाठी निर्माण झालेले पाचकरस कमजोर होणार नाहीत.

खाण्याच्या सवयीबरोबरच अन्न शिजवण्याच्या शास्त्रीय पद्धतीची माहिती करून घेतली पाहिजे. त्यानुसार आपल्या स्वयंपाक करण्याच्या पद्धतीत बदल केले पाहिजेत. स्वयंपाकात तेल कोणते वापरावे याबद्दल अनेक गैरसमजुती, उलटसुलट विचार आपल्या मनांत असतात. सध्या सगळीकडे चर्चेत हा तेलाचा मुद्दा हमखास अढळून येतो. आपण ज्या प्रदेशात राहतो तेथे जे उपलब्ध तेल असेल ते वापरण्यास हरकत नाही. फक्त त्याचे प्रमाण माणशी अर्धा किलो महिन्याला याप्रमाणे तो वापर असावा. (वनस्पतीजन्य तेलाचा) शाकाहारी लोकांच्या आहारात प्रथिनांची उपलब्धता पुरेशी नसते. सोयाबीनचा वापर सगळ्यानाच मानवणारा नसतो. तेंव्हा गरज पडलीच तर बाजारात उपलब्ध असणारे प्रोटीन टॅबलेटसचे पूरक घटक म्हणून सेवन करावयाची तयारी आहारतज्ञाच्या मदतीने ठेवली पाहिजे. बाजारात मिळणाऱ्या विद्युत उपकरणांचाही स्वयंपाक करताना विचार करावा. उदाहरणार्थ माक्रोव्हेव, स्टिमर, स्प्राऊटमेकर जेणे करून थोडक्या वेळात उत्कृष्ट पोषणमुल्ये असणारे पदार्थ आपण घरातच उपलब्ध करू शकतो.

कांही कांही वेळा लोक एकदाच भरपूर जेवण करतात. मग रात्री जेवत नाहीत. असे एकादे वेळी घडले तर ठीक पण सातत्याने अशी सवय नको. आपल्याला असलेल्या व्याधी लक्षात घेऊन आपला आहार काय असावा हे एकदा आहार तज्ञाकडून माहिती करून घ्यावा व तोच कायम ठेवावा.

बरेच लोक सकाळी टेकडीवर किंवा लांब रस्त्यावर फिरावयास जात असतात., मग फिरून आल्यावर त्यांचा ग्रुप एकाद्या हॉटेलमध्ये एकत्र जमतो. मग सर्वजण नास्ता म्हणून डोसा, भजी, वडा, इडली सांबार याची ऑर्डर देतात व ते खाऊन घरी जातात. पण हे चुकीचे आहे. कारण तुम्ही फिरून आल्यावर जेवढ्या कॅलरीज खर्च केलेल्या असतात तेवढ्याच या खाण्याने परत मिळवता व सर्व फिरण्याची मेहनत तशी वाया जाते. खाण्याऐवजी जर ग्रुपने एकाद्या विषयावर चर्चा, पुस्तकाबद्दल माहिती, नवीन वाचलेली गोष्ट यावर चर्चा केली तर निश्चितच उपयोगी पडेल. आपण निवृत्तीनंतरच्या उपजिवीकेसाठी फक्त पैसा, गुंतवणूक असा विचार न करता, निरोगी शरीरासाठी व्यायाम, समतोल आहार ही पण गुंतवणूक आहे असे समजून त्याचा नियमित हप्ता देण्यास शिकले पाहिजे. जसे आपण विम्याचा हप्ता देण्यास विसरत नाही तसेच याबाबतीत घडले पाहिजे.

साधारण तुम्ही आपल्या आहाराच व व्यायामाच व्यवस्थित नियोजन केले तर एका वर्षात आपल्या शरीराचा फिटनेस व्यवस्थित साधू शकाल. यासाठी जर तुम्ही दररोज झोपण्याच्या आधी दिवसभरात आपण काय काय खाल्ले याचा आढावा घेतल्यास, आपण काय खायला नको होते याची जाणीव होईल. बऱ्याच चुका लक्षात येऊन दुसऱ्या दिवशी त्या सुधारता येतील व आपण आपल्या नजरेसमोर ठेवलेले कार्यक्षम शरीराचे जे ध्येय आहे ते गाठता येईल. वैद्यकीय उपचारामध्ये आहारयोजना (न्युट्रिशन) हा उपाय वैकल्पिक औषध (आल्टरनेटिव्ह मेडिसीन) म्हणून उपचार मानला जातो. त्याचे शिक्षण, अभ्यास, अनुभव असणाऱ्या आहारतज्ञाच्या मदतीने आहारतक्ता बनवून त्याप्रमाणे वागण्याचा संकल्पही करण्यास हरकत नाही. प्रत्येकाने चाळीशी नंतरच खरं तर जसे दरवर्षी वैद्यकीय तपासण्या करावयास सांगितल्या जातात तसे त्या वैद्यकीय तपासणी बरोबरच आहारतज्ञा बरोबर विचार विनिमय करून आपली जीवन शैली बनवली पाहिजे.

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एक स्वस्थ जीवन शैली में संतुलित आहार का महत्व एक संतुलित आहार बनाए रखते हुए और शरीर द्वारा आवश्यक सभी पोषक तत्वों को प...
22/02/2022

एक स्वस्थ जीवन शैली में संतुलित आहार का महत्व





एक संतुलित आहार बनाए रखते हुए और शरीर द्वारा आवश्यक सभी पोषक तत्वों को पूरा करने को ध्यान में रखते हुए एक स्वस्थ जीवन शैली प्राप्त की जा सकती है। एक उचित आहार योजना शरीर के आदर्श वजन को प्राप्त करने और मधुमेह, हृदय और अन्य प्रकार के कैंसर जैसी पुरानी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करती है।

एक स्वस्थ आहार खाना बहुत अच्छा महसूस करना है, अधिक ऊर्जावान होना, अपने स्वास्थ्य में सुधार होना और मनोदशा को प्रोत्साहित करना है। अच्छा पोषण, शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ शरीर का वजन व्यक्ति के संपूर्ण स्वास्थ्य और कल्याण के लिए आवश्यक अंग है।

शारीरिक रूप से सक्रिय रहने से कई स्वास्थ्य समस्याएं प्रबंधित होती है और तनाव, अवसाद और दर्द को कम करके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। नियमित व्यायाम चयापचय सिंड्रोम, आघात, उच्च रक्तचाप, गठिया और व्याकुलता को रोकने में मदद करता है।

आहार के विकल्पों के चयन के लिए एक विस्तृत विविधता प्रत्येक पाँच खाद्य समूहों में बताए गए मात्रा में से होना चाहिए। प्रत्येक खाद्य समूह के ये खाद्य स्रोत शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रमुख मिक्रो और मैक्रो-पोषक तत्वों की एक समान मात्रा प्रदान करते हैं।

एक संतुलित आहार में आमतौर पर 50 से 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 12 से 20 प्रतिशत प्रोटीन और 30 प्रतिशत वसा होता है। सभी अंगों और ऊतकों को एक आदर्श वजन बनाए रखने के लिए पोषक तत्वों और कैलोरी की सही मात्रा का सेवन करके प्रभावी ढंग से काम करने के लिए उचित पोषण की आवश्यकता होती है। किसी व्यक्ति का संपूर्ण स्वास्थ्य और कल्याण अच्छे पोषण, शारीरिक व्यायाम और स्वस्थ शरीर के वजन पर निर्भर करता है।

एक उचित आहार का प्रारूप प्रत्येक विशिष्ट आयु वर्ग के लिए भोजन सामग्री, खाद्य पदार्थों और नाश्ते, दोपहर के भोजन, नाश्ते और रात के खाने के लिए आवश्यक मात्रा का एक पूरा सम्मिश्रण है। आपको अपनी मांसपेशियों और रक्त कोशिकाओं के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है जो आपके मांसपेशियों में ऑक्सीजन और पोषक तत्व लाता है।

शारीरिक स्वास्थ्य और सेहत को बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम के साथ शरीर को गुणवत्ता वाले कार्बोहाइड्रेट, बिना चर्बी वाला प्रोटीन, आवश्यक वसा और तरल पदार्थों की आवश्यकता होती है।

ये अतिरिक्त वजन बढ़ाने या वजन घटाने को बनाए रखने में प्रभावी होते है लेकिन ज्यादा स्वस्थ जीवनशैली भी बेहतर नींद और मनःस्थिति से जुड़ी हैं। शारीरिक गतिविधि विशेष रूप कर मस्तिष्क से संबंधित कार्यों और परिणामों में सुधार करती है।

शारीरिक गतिविधि के साथ अपने आहार में छोटे बदलाव करने से शरीर उचित वजन को प्राप्त करने में अच्छा समय लग सकता है। सही प्रकार के कार्बोहाइड्रेट का सेवन महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग मिठाई और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाले साधारण कार्बोहाइड्रेट पर भरोसा करते हैं।

फल और सब्जियां प्राकृतिक रेशे, विटामिन, खनिज और अन्य यौगिकों के समृद्ध स्रोत हैं जो आपके शरीर को ठीक से काम करने के लिए आवश्यकता होती है। उनमें कैलोरी और वसा भी कम होती है। असंतृप्त वसा सूजन को कम करने और कैलोरी प्रदान करने में मदद कर सकती है।

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योग्य आहार आणि रोग प्रतिकारशक्तीमाणसाच्या आयुष्यात महत्त्वाच्या तीन गोष्टी आहेत सर्वप्रथम देश मग त्याचे आरोग्य तर तिसरे ...
17/02/2022

योग्य आहार आणि रोग प्रतिकारशक्ती

माणसाच्या आयुष्यात महत्त्वाच्या तीन गोष्टी आहेत सर्वप्रथम देश मग त्याचे आरोग्य तर तिसरे चरित्र...

माणसाच्या आयुष्यात महत्त्वाच्या तीन गोष्टी आहेत. सर्वप्रथम देश मग त्याचे आरोग्य तर तिसरे चरित्र. या तीनही गोष्टी सांभाळायला कष्ट करावे लागतात. आरोग्य म्हणजे मनुष्याच्या शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आणि आध्यात्मिक स्वास्थाची परिसीमा केवळ रोगांचा अभाव नव्हे. शारीरिक आणि मानसिक स्वास्थासाठी केवळ योग्य आहार, योग्य विहार, योग्य आचार आणि उत्तम विचार आवश्यक आहे.

अन्न आणि आहार तसे जुनेच पण अत्यंत महत्त्वाचे विषय आहेत. म्हणूनच सुदृढ, निरोगी राहण्यासाठी काय खावे, किती खावे, केव्हा खावे, कोणी किती खावे, असे असंख्य प्रश्न आपल्यापुढे उभे राहतात. अन्न हे फार प्रभावशाली अस्त्र निसर्गाने आपल्या हाती दिले आहे. आपल्या शरीराचे संवर्धन आणि संरक्षण करण्यासाठी या पूर्णब्रह्माचा उपयोग होतो, तसेच शरीरावर आक्रमण करणाऱ्या जीव-जंतूंचा संहारही याच्याच सहाय्याने करता येतो. म्हणजेच रोगप्रतिकारशक्ती कार्यरत रहाते.

अन्नामुळे जीवन घडते तर पोषक अन्नामुळे उत्तम आणि सर्वार्थाने स्वस्थ असे मानवी जीवन घडते. तुम्ही खाता त्याप्रमाणे तुमचे व्यक्तित्व घडते. तुम्ही काय खाता, यापेक्षा तुम्ही काय खात नाही, हे महत्त्वाचे ठरते.

आईच्या शरीरात आईच्या अन्नातून शोषून घेतलेल्या घटकांवर गर्भ पोसत असतो. आईच्या आहारातून अन्नघटकांची कमतरता निर्माण झाली तर अकाली प्रसूती, जन्मत: कमी वजनाचे अशक्त मूल, रोग प्रतिकारशक्तीचा अभाव आणि मूल दगावणे इत्यादी प्रकार संभवतात. कारण अन्न तारी अन्न मारी, अन्न नावाचा विकारी.

हे अन्न आपण का सेवन करतो? तर ऊर्जा मिळविण्यासाठी, वाढीसाठी, झालेली झीज भरून काढण्यासाठी, निर्माण होण्यासाठी तसेच अन्न सेवनाने मनाला आनंद मिळण्यासाठीही.

याकरता शरीराच्या काही किमान अपेक्षा असतात. पेशींची भूक भागावी, पाण्याची गरज पूर्ण व्हावी, थोडी विश्रांतीही मिळावी, झीज भरून काढण्यासाठी वेळ आणि ऐवज मिळावा, जोडीला सतत प्राणवायूचा पुरवठा होत राहणे गरजेचे असते. म्हणजेच काही खास योजना करण्यासाठी याची गरज भासते. नुसते हेल्थी फुड्स, जिमने ही गरज भागत नाही यासाठी खास विशेष अशा अन्नघटकांची सोय करावी लागते.

आजच्या स्पर्धेच्या, ताणतणावांच्या आणि प्रदूषणाच्या जगात आत्मविश्वासाने, उत्साहाने आगेकूच करायची असेल तर शरीर निरोगी ठेवावे लागेल. आहार संतुलित हवा. किमान ४० अन्नघटक आहारात असावेत. धान्य, डाळी, भाज्या, फळे, दूध, दही, ताक, तेल तुपातून ते मिळतील. अन्न खाताना ते फक्त पोट भरणारे असू नये तर शरीर, मन, बुद्धी हे सर्व पोसणारे हवे. वैद्यकशास्त्रात नवी ऑपरेशन्स, नवी मशिन्स, नवी औषधे आलीत, अद्ययावत हॉस्पिटल्स बांधली गेलीत, पण या गराड्यात सामान्यांना रोग होऊच नये म्हणून काय खबरदारी घ्यावी, याचे योग्य ज्ञान दिले जाते अशी एकही जागा नाही. मुळात शरीराची रोग प्रतिकारशक्ती उत्तम असली आणि ती तशीच सतत ठेवली तरच आरोग्याचे अनेक प्रश्न सुटू शकतात. रोगप्रतिकारशक्ती वाढण्यासाठी मुख्यत्वे पोषकतत्वांची गरज असते. भरपूर भाज्या, फळे, अंकुरित द्विदल दूध, दही, ताक यातून ती पूर्ण होऊ शकते. प्रदूषणामुळे साथीचे तसेच पेशींचा ऱ्हास होणारे अनेक रोग उद्भवू शकतात. हे प्रदूषण हवा, पाणी आणि आवाजाने होते. याने होणाऱ्या रोगांमुळे पोषकतत्त्वांची जी कमतरता होते ती सुयोग्य संतुलित आहारानेच भरून काढायला हवी. म्हणजेच नंतर रोगप्रतिकारशक्ती पुन्हा वाढीस लागते. रोगाची सुरुवात होते त्याआधी बराच काळ लोटलेला असतो. रोग कधी एकाएकी किंवा एका रात्रीत होत नाही. या रोगांचे प्राथमिक कारण म्हणजे अन्नघटकांची कमतरता. सुयोग्य आहारात धान्ये, डाळी, भाज्या, फळे, दूध, दही, ताक, तेल, तूप या सर्व गोष्टी दर २४ तासाला घ्यायला हव्या. दिवसभरातून त्या विभागून घ्याव्यात. दुपारी व रात्री चौरस आहार तर सकाळी, संध्याकाळी हलका नाश्ता, दूध असणे महत्त्वाचे. हे सर्व घेऊनही अन्नघटकांची कमतरता होतेच. प्रत्येकाची रचना, मानसिक ताणतणाव, हवेतील प्रदूषण, आवाजाचे प्रदूषण, नोकरीमुळे होणारे त्रास, तसेच ताजे अन्न न मिळणे, ताजा भाजीपाला फळे, दूध न मिळणे, रिफाइण्ड वस्तूंचा जादा वापर या सर्वांमुळे अन्नघटकांची कमतरता होते.

शरीराचा व्यापार सुरळीत चालण्यासाठी ४०-४५ अन्नघटक रोज लागतात हे सिद्ध झाले आहे. दिवसभरात विभागूनच शरीराचे व्यापार सुरळीत चालण्यासाठी वेगवेगळ्या यंत्रणा काम करतात. रोग प्रतिकारशक्तीची यंत्रणा एका वेगळ्या पद्धतीने काम करते. हा प्रतिकार केवळ जीवजंतूंच्या संदर्भातच नसतो. शरीराच्या सुरळीत व्यापारांमध्ये अडथळे आणणाऱ्या ज्या काही घटना शरीरात घडतात अथवा जे-जे अनावश्यक घटक शरीरात तयार होतात त्यांचाही समाचार रोग प्रतिकारशक्ती यंत्रणा घेते. अशा पद्धतीने प्रतिकार करताना वास्तविक कर्करोगासारखी अनैसर्गिक वाढ थांबविण्याची नैसर्गिक क्षमताही या रोगप्रतिकारशक्तीमध्ये असते. यात बोनमॅरो,थायमस ग्रंथी, स्प्लीन, लिम्फ ग्रंथी यांचा समावेश असतो. याखेरीज लाळेत, डोळ्यांच्या अश्रूत आणि रक्तात असणारे रासायनिक स्राव यांचाही या यंत्रणेत समावेश होतो. तसेच त्वचा, अंत:त्वचा आणि पांढरे रक्तकण हे मुख्यत्वे कार्यरत असतात.

या प्रतिकारशक्तीसाठी काम करणाऱ्या पेशी स्वतंत्रपणे आपआपली कामे करत असतात. काही पेशी आक्रमक घटकांचा समाचार घेतात तर काही जीवाणू, विषाणूंना नष्ट करतात. काही रोगप्रसारक पेशींना दाबून ठेवतात तर जुन्या आणि निकामी झालेल्या पेशी शरीरातून काढून टाकण्याचे कामही काही पेशी करतात. निरोगी शरीरात या कामांमध्ये सुसूत्रता असते. नष्ट झालेल्या पेशींच्या जागी नव्या पेशींची नेमकी वाढही शरीरत होत असते.

या पेशींना विविष्ट अन्नघटकांची आवश्यकता असते. उत्तम दर्जाची प्रोटिन्स, कॅल्शियम, जीवनसत्व अ, जोडीला इतर क्षार आणि जीवनसत्वे महत्त्वाची आहेत. तसे पाहता संपूर्ण ४० अन्नघटकाचीच गरज असते. यामधील फॅटी अॅसिड त्याच्या नैसर्गिक सिस रूपात असणे महत्त्वाचे आहे. हे केवळ तेलबिया आणि घाणीच्या तेलातूनच मिळू शकते. प्रक्रिया केलेले रिफाइन्ड, कोंडा नसणारे पदार्थ इम्यून सिस्टीमला, रोगप्रतिकारशक्तीला मारक ठरू शकतात.

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