01/11/2022
महफ़िल
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महफ़िल सजी थी
खुशनुमा शाम थी
शायरों का जमावड़ा था।
इश्क और जज़्बातों के
एक से एक कशीदे पढ़े जा रहे थे।
शब्दों से सपनों और खाबों के
हसीन महल गढ़े जा रहे थे।
मेरी बारी में मैं मायूस लौट आया
सुनाता भी क्या???
मैं जिनकी लिखता और सुनता हूँ
वहाँ इश्क -मोह्बत,खाब
हसीन सपने रोज़ ढहते हैं।
वहाँ गरीबी, बीमारी, भुखमरी
बलात्कार, अपमान, ईर्ष्या
नफरत, झूठ, लूट.....बहुत कुछ
अभी कोई शक है??
ऐसी शायरी भला कौन सुनना चाहेगा??
न आप और न सत्तासीन साहेब।
मेरी शायरी को महफ़िल नहीं
इन्हें समझने वाले चाहिए।
इन पर तालियाँ नहीं
इन पर करवाई करने वाले चाहिए।
मेरी शायरी पर पुरस्कार नहीं साहब
जरूरतमंदों की मुश्किलों का समाधान चाहिए।
अभ भी पढ़नी और सुननी है
मेरी कविताएं और शायरी??
चले आना मेरे आँगन, खेत
गल्ली, मुहल्ले और अंधेरी बस्तियों में
वहां महफ़िल ही अलग जमती है।
सुनने वालों की जम जाती है।
समझने वाले थम जाते हैं
देंखने वालों की आंखें नम जाती हैं।
डॉ जन्मेजय
सामाजिक कार्यकर्ता
पठकथाकार, गीतकार
शल्य चिकित्सक।