AYUSH Health Wellness Centre

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Latest “Diabetes Treatment Guidelines” 20261️⃣ When should treatment be started?👉 At the time of diagnosis (Dx) without ...
26/01/2026

Latest “Diabetes Treatment Guidelines” 2026

1️⃣ When should treatment be started?

👉 At the time of diagnosis (Dx) without delay!!

2️⃣ Initial combination therapy – in which patients?

👉 HbA1C above goal by 1.5–2%
👉 High risk for CVD or established CVD irrespective of HbA1C levels
→ GLP-1 RA + SGLT2i

3️⃣ Heart Failure (HF)

👉 Symptomatic HF
What medications should be given?
🖍 EF ≤40 → HFrEF GDMT
✔️ SGLT2i (if eGFR ≥20) or SGLT1/2i (can be used instead of SGLT2i if eGFR ≥30)
✔️ ARNI or ACEi/ARB if ARNI not tolerated
✔️ β-Blocker
✔️ MRA (if eGFR ≥30, K 40 → HFmrEF/HFpEF GDMT
✔️ SGLT2i or SGLT1/2i
✔️ If obesity: dual GIP/GLP-1 RA or GLP-1 RA
✔️ ACEi or ARB if HT, prior MI, or CKD
✔️ nonsteroidal MRA (nsMRA) (finerenone)
(if eGFR ≥25, K 30)
👉 “Metformin should be avoided” ❌
in unstable HF or hospitalized HF!!
👉 TZD is contraindicated in HF ❌
👉 Saxagliptin is contraindicated in HF ❌

4️⃣ “ASCVD” or “indicators of high CVD risk”

ASCVD = established CVD (MI, stroke, arterial revascularization procedure),
TIA, unstable angina, amputation, symptomatic or asymptomatic CAD
Indicators of high CVD risk =
Age ≥55 + ≥2 additional risk factors (HT, smoking, dyslipidemia, obesity, albuminuria)
or end-organ damage such as LVH, retinopathy
👉 First-line drug → GLP-1 RA or SGLT2i
May consider GLP-1 RA + SGLT2i combination for additive reduction in
risk of adverse CV & kidney events
👉 Second-line drug → TZD
(Low-dose TZD is better tolerated than high-dose with similar efficacy)

5️⃣ Chronic Kidney Disease (CKD)

(eGFR

आयुर्वेद में डायबिटीज को 'प्रमेह' कहा गया है। आयुर्वेद का मानना है कि यदि हम शरीर की शुरुआती चेतावनियों को पहचान लें, तो...
21/01/2026

आयुर्वेद में डायबिटीज को 'प्रमेह' कहा गया है। आयुर्वेद का मानना है कि यदि हम शरीर की शुरुआती चेतावनियों को पहचान लें, तो इस बीमारी को न केवल रोका जा सकता है, बल्कि इसे उलटा (Reverse) भी किया जा सकता है।

डायबिटीज के 'अर्ली वार्निंग' लक्षण: क्या आपका शरीर ये संकेत दे रहा है?
डायबिटीज अचानक नहीं होती; शरीर महीनों पहले संकेत देना शुरू कर देता है। आयुर्वेद के अनुसार, इन्हें 'पूर्वरूप' कहा जाता है:

अत्यधिक प्यास और बार-बार पेशाब (Polydipsia & Polyuria): यदि आपको रात में बार-बार टॉयलेट जाने के लिए उठना पड़ रहा है और पानी पीने के बावजूद गला सूख रहा है, तो यह ब्लड शुगर बढ़ने का प्राथमिक लक्षण है।

अकारण थकान (Unexplained Fatigue): पर्याप्त नींद और भोजन के बाद भी अगर आप ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं, तो समझ लें कि आपकी कोशिकाएं ग्लूकोज को ऊर्जा में नहीं बदल पा रही हैं।

हाथों-पैरों में झुनझुनी (Neuropathy): उंगलियों या तलवों में सुई जैसी चुभन या सुन्नपन महसूस होना नसों पर शुगर के प्रभाव का संकेत है।

घाव भरने में देरी: छोटी सी खरोंच या चोट अगर हफ्तों तक ठीक नहीं हो रही है, तो यह हाई शुगर लेवल की चेतावनी है।

त्वचा का काला पड़ना (Acanthosis Nigricans): गर्दन, बगल या कोहनियों के पास की त्वचा का गहरा और मखमली काला होना 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' का बड़ा संकेत है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण: "प्रमेह" और दोषों का खेल
आयुर्वेद के अनुसार, डायबिटीज मुख्य रूप से कफ दोष के बिगड़ने और मंदाग्नि (धीमी पाचन शक्ति) के कारण होती है। आचार्य चरक ने स्पष्ट कहा है:

"आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि। नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम्॥"

अर्थ: आरामकुर्सी वाली जीवनशैली (आस्यासुखं), अधिक सोना (स्वप्नसुखं), दही, मांसाहार, दूध के बने पदार्थ, नए अनाज और गुड़/चीनी से बनी चीजों का अत्यधिक सेवन 'प्रमेह' का मुख्य कारण है।

बचाव के 5 अचूक आयुर्वेदिक मंत्र (Prevention Tips)
यदि आपके लक्षण शुरुआती हैं, तो इन बदलावों से आप शुगर को जड़ से रोक सकते हैं:

कटु और तिक्त रस का सेवन: अपनी डाइट में कड़वी और तीखी चीजें बढ़ाएं। मेथी दाना, नीम, करेला और हल्दी इंसुलिन की संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। रोज सुबह खाली पेट एक चम्मच मेथी चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें।

तांबे के बर्तन का जल: रात भर तांबे के बर्तन में रखा पानी सुबह खाली पेट पिएं। यह कफ दोष को संतुलित करता है और मेटाबॉलिज्म तेज करता है।

त्रिफला और आंवला: आंवला विटामिन-C और क्रोमियम का बेहतरीन स्रोत है, जो कार्बोहाइड्रेट मेटाबॉलिज्म को ठीक रखता है। रोज रात को एक चम्मच त्रिफला चूर्ण का सेवन शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकालता है।

नियमित व्यायाम (विहार): आयुर्वेद में 'कफ' को हराने का एकमात्र तरीका गति है। रोजाना 30-45 मिनट तेज चलना या मंडूकासन और सूर्यनमस्कार जैसे योग करना पैंक्रियाज को सक्रिय करता है।

रात्रि भोजन और नींद: सूरज ढलने के बाद हल्का भोजन करें और रात 10 बजे तक सो जाएं। देर रात का भोजन और जागरण इंसुलिन के स्तर को बिगाड़ देता है।

दुर्लभ सत्य तथ्य (Rare Facts)
तनाव और शुगर: क्या आप जानते हैं कि आयुर्वेद 'चिंता' को प्रमेह का प्रमुख कारण मानता है? अत्यधिक मानसिक तनाव 'कोर्टिसोल' बढ़ाता है, जो सीधे आपके ब्लड शुगर को स्पाइक करता है।

पुराना अनाज: आयुर्वेद के अनुसार, नया गेहूं या चावल कफ बढ़ाता है। डायबिटीज से बचने के लिए कम से कम एक साल पुराना अनाज या जौ (Barley) और बाजरा खाना चाहिए।

निष्कर्ष: डायबिटीज कोई सजा नहीं, बल्कि शरीर द्वारा जीवनशैली सुधारने का एक आग्रह है। यदि आप ऊपर दिए गए लक्षणों को समय पर पहचान लेते हैं और आयुर्वेद के नियमों का पालन करते हैं, तो आप बिना दवाओं के एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

पैरों के तलवों पर  #कांसे (Kansa) धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे  #कांसा वाट...
12/01/2026

पैरों के तलवों पर #कांसे (Kansa) धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे #कांसा वाटी मसाज कहा जाता है।
यह मालिश सिर्फ आराम ही नहीं देती, बल्कि इसके कई गहरे शारीरिक और मानसिक फायदे भी हैं,,,,,,

कांसे की धातु, जो तांबे और टिन का मिश्रण होती है, आयुर्वेद में इसके औषधीय गुणों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह मालिश शरीर के ऊर्जा बिंदुओं (मर्म) को उत्तेजित करती है, जिससे कई लाभ होते हैं।

कांसे की कटोरी से मालिश के फायदे ,,,,,,,,,:

शरीर की गंदगी (टॉक्सिन) बाहर निकालना:
कांसे की धातु में शरीर की गर्मी और विषाक्त पदार्थों (toxins) को खींचने का गुण होता है।
जब तलवों पर तेल या घी लगाकर कांसे की कटोरी से मालिश की जाती है, तो कटोरी का निचला हिस्सा धीरे-धीरे काला या भूरा हो जाता है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि कटोरी शरीर से जमी हुई गंदगी को बाहर निकाल रही है।

तनाव और थकान दूर करना:

पैरों के तलवों में हजारों तंत्रिकाएं (nerves) होती हैं। मालिश करने से ये तंत्रिकाएं शांत होती हैं, जिससे पूरे शरीर को गहरा आराम मिलता है।
यह दिन भर की थकान, तनाव और चिंता को दूर करने का एक बेहतरीन तरीका है।

बेहतर नींद में सहायक:

तनाव और थकान दूर होने से मन शांत होता है।
यह मस्तिष्क को आराम देता है, जिससे रात में गहरी और आरामदायक नींद आने में मदद मिलती है।

रक्त संचार बढ़ाना:

तलवों पर मालिश से रक्त वाहिकाओं (blood vessels) में रक्त का प्रवाह बढ़ता है।
बेहतर रक्त संचार से पैरों में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे पैरों की सूजन और दर्द में कमी आती है।

आंखों की रोशनी के लिए:

आयुर्वेद और रिफ्लेक्सोलॉजी (Reflexology) के अनुसार, पैरों के तलवे में कुछ खास बिंदु आंखों से जुड़े होते हैं।
कांसे की कटोरी से इन बिंदुओं पर दबाव पड़ने से आंखों की रोशनी बेहतर होती है और आंखों का तनाव कम होता है।

वात और पित्त दोष को शांत करना:

कांसे की तासीर ठंडी मानी जाती है, जो शरीर की अतिरिक्त गर्मी (पित्त दोष) को शांत करती है।
मालिश की क्रिया से वात दोष (जो दर्द और सूखापन का कारण बनता है) संतुलित होता है। इस तरह, यह शरीर में तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने में मदद करती है।
पैरों की त्वचा और मांसपेशियों को स्वस्थ रखना:
यह मसाज पैरों की मांसपेशियों को आराम देती है और उनकी कठोरता को कम करती है।
यह तलवों की सूखी और फटी हुई त्वचा को नरम बनाने में भी मदद करती है।

इस मालिश को करने के लिए आप घी या कोई भी प्राकृतिक तेल (जैसे नारियल तेल) का उपयोग कर सकते हैं। यह बहुत ही सरल और प्रभावी तरीका है अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का।
जानकारी अच्छी लगी हो तो कृपया पेज को फॉलो करें,,,,

🌿🌿पुरुषों (Male) में होने वाली आम समस्याओं के लिए प्रचलित होम्योपैथिक दवाओं के नाम दिए जा रहे हैं।👉 ध्यान रखें: सही दवा ...
01/01/2026

🌿🌿पुरुषों (Male) में होने वाली आम समस्याओं के लिए प्रचलित होम्योपैथिक दवाओं के नाम दिए जा रहे हैं।
👉 ध्यान रखें: सही दवा का चयन लक्षणों के अनुसार होता है, इसलिए किसी योग्य होम्योपैथिक डॉक्टर से सलाह ज़रूरी है।

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🌿 1. यौन कमजोरी / शीघ्रपतन (Sexual Weakness / Premature Ej*******on)

प्रचलित दवाएँ:

Selenium 30

Agnus Castus 30

Caladium 30

Conium 200

Lycopodium 200

Nux Vomica 200

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🌿 2. नाइटफॉल / स्वप्नदोष (Nightfall)

Selenium 30

Phosphoric Acid 200

Kali Phos 6x

China 30

Staphysagria 30

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🌿 3. इरेक्शन की समस्या (Erectile Dysfunction)

Agnus Castus Q

Sabal Serrulata Q

Caladium 30

Lycopodium 200

Conium 200

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🌿 4. प्रोस्टेट बढ़ना / पेशाब की दिक्कत (Prostate Problems)

Sabal Serrulata Q

Conium 200

Thuja 200

Hydrangea Q

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🌿 5. धातु गिरना / वीर्य पतलापन

Phosphoric Acid 200

China 30

Selenium 30

Calcarea Phos 200

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🌿 6. तनाव, कमजोरी, थकान

Kali Phos 6x

Ginseng (Q)

Avena Sativa (Q)

Acid Phos 200

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31/12/2025

आयुर्वेदीय वनस्पति से निर्मित एक चमत्कारी कल्प चतु:षष्टि प्रहरी पिप्पला

पिप्पली जिसे लैटिन भाषा में पाइपर लौंगन (Pipur Longum Linn) कहा जाता है, यह पिप्पली (Piperaceai-पाइपरेसी) कुल का पादप है। इसकी लता गन्धयुक्त होती है जो भूमि पर फैलती है या दूसरे वृक्षों के सहारे ऊपर उठ जाती है।
आयुर्वेद ग्रन्थों में तो- १. पिप्पली २. गजपिप्पली ३. सैंहली ४. वनपिप्पली भेद से ४ प्रकार की पिप्पली वर्णित है पर व्यवहार में दो ही प्रकार की पिप्पली- बड़ी एवं छोटी ही प्रयोग की जाती है।

बड़ी पिप्पली आजकल मलेशिया, इण्डोनेशिया और सिंगापुर से आयातित होती है और छोटी पिप्पली ‘वन पिप्पली’ है इस देश में अधिक प्राप्त होती है। यह भारत के उष्ण प्रदेशों में तथा मलेशिया, इण्डोनेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका तथा निकोबार द्वीप में उत्पन्न होती है। व्यापारिक प्रयोग के लिए इसकी खेती भी की जाती है। इसका गीला फल गुरु, मधुर रस और शीतवीर्य होता है इसीलिए भाव प्रकाश में इसे पित्त प्रशमनी कहा गया है यही फल जब सूख जाता है तो ‘शुष्क तु प्रकोपिनी’ के अनुसार पित्त प्रकुपित करने वाला हो जाता है।

पिप्पली के गुण- पिप्पली लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, रस-कटु विपाक-मधुर, वीर्य-अनुष्णशीत है। यद्यपि पिप्पली का प्रयोग अनेकों आयुर्वेदिक औषधि निर्माण में होता है पर इससे एक ऐसे विशिष्ट योग का निर्माण भी होता है जो वास्तव में अनेक रोगों में त्वरित और चामत्कारिक परिणाम देता है उसका नाम है- ‘चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली।’

यह इतना शक्तिशाली कल्प है कि क्षयरोग तक के कीटाणुओं का नाश कर देता है। यह एक श्रेष्ठ ‘एण्टीबायोटिक’ (जन्तुघ्न) गुण सम्पन्न है और वात कफ जनित विकारों में उत्तम लाभ देता है अत: प्रसूत ज्वर, शीत ज्वर, कफ ज्वर, जीर्ण शूल (Pain) के साथ कोरोना से बचाव में भी श्रेष्ठ लाभ पहुँचाता है। यह हृदय की शिथिलता में त्वरित लाभ पहुँचाता है।
निर्माण विधि-बड़ी पिप्पली का फाण्ट १०० मि.ली. लेकर छोटी पिप्पली के कपड़छन चूर्ण में मिलाकर ६४ बार (लगातार ८ दिन) तक घुटाई कर छाया में सुखाकर अच्छी तरह चूर्ण कर सुरक्षित रख लें।

मात्रा एवं अनुपान- २५० से ५०० मि.ग्रा. तक दिन में २ बार शहद से या रोगानुसार उचित अनुपान के साथ सेवनीय है।

कुछ रोगों में अनुभूत प्रयोग

१. मूत्रकृच्छ्र- पेशाब में अचानक कड़क या जलन होने पर चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली ५०० मि.ग्रा., यवक्षार ५०० मि.ग्रा. मिलाकर १ कप मीठे दूध के साथ सेवन करने से तुरन्त लाभ मिलता है।

२. शीतज्वर/मलेरिया में- ठण्ड देकर आने वाले शीतज्वर में यदि रक्त परीक्षण में मलेरिया पॉजिटिव की रिपोर्ट आये तो पुटपक्व विषमज्वरान्तक लौह २५० मि.ग्रा., सेंधा नमक २५० मि.ग्रा., शु. हिंगु १२५ मि.ग्रा. अच्छी तरह घोंटकर दिन में ३ बार शहद से चटाने से ३ दिन में मलेरिया ज्वर समाप्त हो जाता है। रक्ताणु (हेमोग्लोबिन) की वृद्धि होती है, दुर्बलता का नाश होता है, भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। यह सैकड़ों बार का हमारा अनुभूत प्रयोग है। इसके विपरीत मलेरिया ज्वर में एलोपैथिक चिकित्सा से क्या-क्या दुष्परिणाम होते हैं यह सर्व विदित है। विषम ज्वर के बाद भी रक्त के लाल कणों का पुनर्निर्माण करने, थकी हुयी प्लीहा को आराम देने और यकृत् क्रिया को उद्दीप्त करने का कार्य यदि कोई योग कर सकता है तो वह है उपर्युक्त योग।

३. फायलेरिया ज्वर में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५०-२५० मि.ग्रा., नित्यानन्द रस २५० मि.ग्रा., आरोग्यवर्द्धिनी वटी २५० मि.ग्रा., प्रवालपिष्टी २५० मि.ग्रा., चन्द्रप्रभा वटी २५० मि.ग्रा. घोंटकर दिन में ३ मात्रा दशमूल क्वाथ और अभयादि क्वाथ के अनुपान से एक वर्ष तक सेवन करने से फायलेरिया ज्वर से तो मुक्ति मिलती ही है साथ ही फायलेरिया से भी मुक्ति मिलती है। यह योग वात-कफ प्रधान श्लीपद में वात-कफ प्रकृति के रोगियों में विशेष उपयोगी है।

४. क्षयरोग में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली ५०० मि.ग्रा., स्वर्णमालती वसंत १२५-२५० मि.ग्रा., वंशलोचन चूर्ण २५० मि.ग्रा., गिलोयघन ५०० मि.ग्रा., प्रवालपिष्टी २५० मि.ग्रा., रुदन्ती चूर्ण २ ग्राम मिलाकर दिन में २-३ बार सेवन करने से क्षयरोग में सत्वर लाभ होता है।

५. हृदय की शिथिलता में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५० मि.ग्रा., अभ्रक भस्म सहस्रपुटी १२५ मि.ग्रा., मोतीपिष्टी १२५ मि.ग्रा., अर्जुनघन २५० मि.ग्रा. मिश्रित कर दिन में २-३ बार सेवन करने से तत्काल सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है।

६. वातार्श में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५० मि.ग्रा., अर्शोघ्नी वटी ५०० मि.ग्रा., शु. भल्लातक १२५ मि.ग्रा. मिलाकर जल के साथ दिन में दो बार ४० दिन तक सेवन करने से बादी बवासीर (वातार्श) समूल नष्ट हो जाता है।

भोजनोपरान्त अभयारिष्ट और द्राक्षासव २०-२० मि.ली. बराबर जल के साथ मिलाकर देने से विशेष लाभ होता है।

✨ तुतलाहट और अस्पष्ट बोली अब मजबूरी नहीं!हमदर्द दवा-ए-लुक़्नत – ज़बान और दिमाग़ की नसों को मजबूती देकर बोलने में साफ़ी औ...
29/12/2025

✨ तुतलाहट और अस्पष्ट बोली अब मजबूरी नहीं!

हमदर्द दवा-ए-लुक़्नत – ज़बान और दिमाग़ की नसों को मजबूती देकर बोलने में साफ़ी और आत्मविश्वास लौटाने में सहायक 🌸

👉 अस्पष्ट बोली और ज़बान की कमजोरी के लिए खास यूनानी दवा

🔹 तुतलाहट / हकलाहट
👉 बोलते समय अटकना, रुक-रुक कर बोलना कम करने में सहायक

🔹 अस्पष्ट आवाज़
👉 आवाज़ को साफ, स्पष्ट और प्रभावशाली बनाने में मदद करती है

🔹 ज़बान की कमजोरी
👉 ज़बान की नसों को ताकत देती है, बोलने की क्षमता बढ़ाती है

🔹 बच्चों और बड़ों दोनों के लिए उपयोगी
👉 जन्मजात या बाद में हुई बोलने की परेशानी में लाभकारी

🔹 दिमाग़ और नसों को मजबूती
👉 नर्वस सिस्टम को सपोर्ट करती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है

🔬 Research + Unani आधार

यूनानी चिकित्सा के अनुसार लुक़्नत का संबंध ज़बान और दिमाग़ की नसों (Nervous control of speech) से होता है।

दवा-ए-लुक़्नत में मौजूद जड़ी-बूटियाँ नर्व टॉनिक की तरह काम करती हैं, जिससे बोलने की नसों की कमजोरी में सुधार देखा जाता है।

पारंपरिक यूनानी ग्रंथों (जैसे क़राबादीन और मख़ज़न-उल-मुफ़रदात) में इसका उपयोग अस्पष्ट बोली, हकलाहट और ज़बान की जकड़न में बताया गया है।

आधुनिक दृष्टि से देखें तो यह दवा न्यूरो-मस्कुलर कोऑर्डिनेशन (दिमाग़ और ज़बान के तालमेल) को सपोर्ट करती है।

💊 दवा-ए-लुक़्नत – सेवन विधि (Dose)

👉 मात्रा:
✔️ 1 ग्राम सुबह
✔️ 1 ग्राम रात

👉 सेवन का तरीका:
✔️ सोते समय ज़बान (जीभ) पर मलें
✔️ या हकीम/डॉक्टर की सलाह अनुसार

👉 अवधि:

नियमित 6–8 हफ्ते तक सेवन करें

⚠️ परहेज़:
ठंडी चीज़ें, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक से बचें

📌 नियमित सेवन से बोलने में साफ़ी और बेहतर परिणाम मिलते हैं.

 #जिगर ( ) के सभी रोगों के लिए।। जिनको भी  #फैटी_लीवर की समस्या है  #फैटी_लिवर_ग्रेड_1  #ग्रेड_2  #ग्रेड_3  रिपोर्ट जितन...
16/12/2025

#जिगर ( ) के सभी रोगों के लिए।।
जिनको भी #फैटी_लीवर की समस्या है #फैटी_लिवर_ग्रेड_1 #ग्रेड_2 #ग्रेड_3

रिपोर्ट जितनी मर्जी खराब

सुबह आप लोगों से वादा किया था कि शाम तक एक लीवर के सभी रोगों के लिए फार्मूला शेयर करेंगे तो फार्मूला हाजिर है।।

इस फार्मूले में चार प्रकार के अर्क होते हैं लीवर के इस अर्क ने मुझे मजबूर किया,

कि यह चीज़ मुझे अपने से जुड़े लोगों को जरूर बताना चाहिए
लीवर के लिए इससे बेहतर फार्मूला मैंने नहीं देखा,
इसके इतने फायदे हैं कि पूरी किताब इस पर लिखी जा सकती है,
बहुत ही कमाल की चीज़ है और नुकसान की गुंजाइश नहीं है,

नुस्खा (सामग्री)
अर्क मकोय - 1 लीटर
अर्क कासनी - 1 लीटर
अर्क बादियान (सौंफ) - 1 लीटर

अर्क बिरंजआसफ - आधा लीटर
इन सबको मिला लें।

सेवन विधि (Dose)
सभी अर्क को बराबर मात्रा में किसी अलग शीशी में मिलाकर रख लीजिए

सभी के मिले हुए मै से 60 ml
subh खाली पेट

60 मिलीलीटर (ml)

शाम को सूरज छिपने के समय

बराबर मात्रा में पानी मिलाकर ले सकते हैं

फ़ायदे (Benefits)
एक सहायक के तौर पर हर बीमारी में इस्तेमाल कराया जा सकता है।
बच्चों में भूख की कमी के लिए बहुत बेहतरीन है।
पीलिया (Yellow Jaundice)
लीवर पर चर्बी (Fatty Liver)
ए एल टी (ALT - Elevated Liver Enzymes)
जहाँ पर भी आपको लीवर को मज़बूती (ताक़त) देनी हो, वहाँ पर यह इस्तेमाल कराएँ।
यह मेरे दिल का एक बहुत कीमती राज़ था।
लीवर की गर्मी के लिए

आप इस अर्क के मिश्रण के साथ

जवारिश अनारेन सुबह शाम खाने के 30 मिनट आधा आधा चम्मच गुंगुने पानी से ले सकते हैं

और लीवर के बढ जाने के लिए

हब्बे कबिद नौशादरी

जवारिश अनारेन के साथ 2__2 गोली चला सकते हैं।

गण्डूष यानी तैल को मुख में धारण कर धीरे-धीरे घुमाना।यह केवल मुख-स्वच्छता नहीं यह शरीर-शुद्धि का प्रथम संस्कार है।आयुर्वे...
13/12/2025

गण्डूष यानी तैल को मुख में धारण कर धीरे-धीरे घुमाना।
यह केवल मुख-स्वच्छता नहीं यह शरीर-शुद्धि का प्रथम संस्कार है।
आयुर्वेद मानता है कि मुख “अग्नि” का द्वार है, और उसका संतुलन ही
पाचन, त्वचा, नेत्र, और मानसिक प्रसन्नता का आधार बनता है।
तैल गण्डूष की विधि (Morning Ritual)
1.प्रातः काल खाली पेट बैठें।
2.1 चम्मच तिल या नारियल तेल मुख में रखें।
3.धीरे-धीरे 5–10 मिनट तक घुमाएँ।
4.कभी निगलें नहीं।
5.तेल को बाहर थूकें।
6.गुनगुने जल से कुल्ला करें।
7.तत्पश्चात “कवला” करें अर्थात् मुख में जल लेकर कुछ क्षण हिलाएँ।

Note:
तेल को जब मुख में हल्का और पतला महसूस करें, तभी बाहर निकालें बनयह संकेत है कि अम्ल व विष बाहर आ चुके हैं।

🕉️ “नस्य”—नाक से दिया गया औषध ही सिर के रोगों का सर्वोत्तम उपचार #नस्यकर्म   #शिरोरोगउपचार    आयुर्वेद में पंचकर्म को शर...
12/12/2025

🕉️ “नस्य”—नाक से दिया गया औषध ही सिर के रोगों का सर्वोत्तम उपचार

#नस्यकर्म #शिरोरोगउपचार

आयुर्वेद में पंचकर्म को शरीर से रोग और विषैले द्रव्यों को निकालने वाली सर्वोच्च प्रक्रिया कहा गया है। इन पाँचों में से एक—नस्य कर्म (Nasya Therapy)—को शिरोरोगों का राजा माना गया है।
चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम्—तीनों शास्त्रों में नस्य को दैनिक दिनचर्या (दिनचर्या) का अनिवार्य अंग बताया गया है।

🔶 नस्य क्या है?

नाक, मानव शरीर का “शीर्ष द्वार” है। आयुर्वेद कहता है—
“नासा हि शिरसो द्वारम्।”
यानि नाक से दी गई औषध सीधा मस्तिष्क, सिर, गला, आँख, कान, नाक और स्नायु तंत्र पर कार्य करती है।
नस्य में विशेष औषधीय तेलों, घृत या काढ़े की कुछ बूँदें नाक के भीतर दी जाती हैं ताकि सिर, मस्तिष्क व नाक मार्ग की शुद्धि हो सके।

🔶 नस्य क्यों है इतना प्रभावी? (Rare but True Facts)

✔ नाक की नसें सीधे ब्रेन तक पहुँचती हैं—जो औषध को कुछ ही मिनटों में प्रभावी बनाती हैं।
✔ यह एकमात्र उपचार है जो साइनस, माइग्रेन, तनाव, नींद की समस्या तक में गहराई से असर करता है।
✔ नस्य से पिटक (कफ) पिघल कर बाहर निकलता है, जिससे नाक और माथे का भारीपन तुरंत कम होता है।
✔ यह शरीर के प्राण वायु को संतुलित करता है—जो मानसिक शांति, एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाता है।
✔ नस्य करने से चेहरे के ग्लो तक बढ़ जाता है—इसलिए इसे “यूथ थेरेपी” भी कहा गया है।

🔶 नस्य करने के मुख्य लाभ (Proved Benefits)
1️⃣ सिरदर्द, माइग्रेन से राहत

औषधीय तेल ब्रेन व नसों को शांत करता है और तनाव हार्मोन कम करता है।

2️⃣ साइनस, नाक बंद, एलर्जी का समाधान

यह कफ को पिघलाकर नाक मार्ग साफ करता है, जिससे सांस लेना आसान होता है।

3️⃣ मानसिक तनाव, चिंता, अनिद्रा में राहत

नस्य से मस्तिष्क की नसें रिलैक्स होती हैं। यह प्रसन्नता व शांत मन देता है।

4️⃣ बालों का झड़ना कम व जड़ें मजबूत

नस्य शिरो-धातु को मजबूत करके बालों को पोषण देता है।

5️⃣ आँखों की रोशनी, चेहरा और आवाज़ सुधरना

सिर और चेहरे के सभी अंगों की कार्यक्षमता बेहतर होती है।

6️⃣ याददाश्त व एकाग्रता बढ़ना

यह ब्रेन में ऑक्सीजन सप्लाई और न्यूरोनल एक्टिविटी बढ़ाता है।

🔶 नस्य के लिए कौन सा तेल इस्तेमाल करें? (Ayurvedic Selection)

शास्त्रों के अनुसार—

अणु तेल – मस्तिष्क, साइनस, माइग्रेन, तनाव

शदबिंदु तेल – नाक बंद, बाल झड़ना, सिर भारी रहना

घृत (जैसे ब्राह्मी घृत) – मानसिक शांति, स्मृति वृद्धि

तिल तेल (गर्म करके) – दैनिक नस्य, त्वचा व बालों के लिए श्रेष्ठ

लहसुन सिद्ध तेल – अत्यधिक कफ व जमाव में प्रभावी

Note: तीव्र रोगों में चिकित्सक की सलाह आवश्यक है।

🔶 नस्य कब करना चाहिए? (काल का महत्व)

आयुर्वेद कहता है—सही समय पर नस्य = दोगुना लाभ

⏰ सुबह 6–9 बजे – सर्वश्रेष्ठ समय; कफ ढीला होता है
⏰ शाम 4–6 बजे – मानसिक तनाव व नाक बंद में लाभ
❌ भोजन के तुरंत बाद नहीं
❌ स्नान से पहले भी नहीं
❌ तेज सर्दी-जुकाम, बुखार, गर्भावस्था में चिकित्सक की सलाह अनिवार्य

🔶 नस्य कैसे करें? (Simple Home Method)

नाक व चेहरे पर हल्का गुनगुना तिल तेल लगाकर मालिश करें।

गर्म पानी की भाप 1–2 मिनट लें।

सिर पीछे झुकाएँ और हर नथुने में 2–3 बूँद तेल डालें।

मुँह से हल्की साँस लें और अतिरिक्त कफ बाहर निकालें।

10 मिनट आराम करें।

🔶 निष्कर्ष

नस्य एक ऐसा उपचार है जो ना सिर्फ नाक, बल्कि पूरे मस्तिष्क, भावनाओं, साँसों, बालों और चेहरे तक का संतुलन बनाए रखता है।
यह योग, आयुर्वेद और आधुनिक न्यूरो-रिसर्च—तीनों में उत्कृष्ट, सुरक्षित और प्रभावी सिद्ध है।

नाभि में तेल लगाने का आयुर्वेदिक रहस्य:      🌙 नाभि: शरीर का “केंद्रीय हब” — आयुर्वेद का अनोखा दृष्टिकोणआयुर्वेद में नाभ...
11/12/2025

नाभि में तेल लगाने का आयुर्वेदिक रहस्य:



🌙 नाभि: शरीर का “केंद्रीय हब” — आयुर्वेद का अनोखा दृष्टिकोण

आयुर्वेद में नाभि को “नाडी मूल” कहा गया है—यानी 72,000 नाड़ियों का केंद्र। यह वह स्थान है जहाँ से गर्भावस्था में पूरा पोषण मिलता है। यही कारण है कि नाभि की देखभाल सीधे पाचन, हार्मोन, त्वचा और मनोदशा पर असर डालती है।
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि नाभि के आसपास का क्षेत्र अत्यंत vascular होता है, जहाँ से तेल प्राकृतिक रूप से absorb होकर therapeutic प्रभाव देता है।

💡 नाभि में तेल लगाने से आखिर होता क्या है?

✔ त्वचा की dryness कम होती है
✔ Digestion एवं metabolism में subtle सुधार
✔ Reproductive system, Hormonal balance पर gentle असर
✔ Nervous system को शांत करने वाला प्रभाव
✔ उसकी warmth से Vata शांत होता है—ठंड के मौसम में बेहद लाभकारी

नाभि में तेल लगाने को “Marma Therapy” का आसान घरेलू रूप भी माना जाता है।

🔥 वैज्ञानिक दृष्टिकोण: कैसे करता है काम?

नाभि क्षेत्र में मौजूद capillaries तेल के active compounds को हल्के-हल्के absorb करती हैं।
➡ इससे skin barrier मजबूत होता है
➡ गर्माहट internal circulation को activate करती है
➡ Sesame oil में मौजूद sesamol, linoleic acid त्वचा व कोषों की मरम्मत करते हैं
➡ Coconut oil के MCTs anti-inflammatory होते हैं
➡ Mustard oil की गर्म तासीर winter में congestion व stiffness कम करती है

🌿 कब, कैसे और कौन सा तेल? — फायदे डबल करने वाली गाइड
1️⃣ रात को सोने से पहले — सबसे प्रभावी समय

क्यों?
रात को शरीर repair mode में होता है, तेल की absorption सबसे बेहतर होती है।

👉 कैसे लगाएँ:
2–3 बूंद तेल नाभि में डालें और clockwise direction में 1 मिनट मालिश करें।

2️⃣ कौन सा तेल किस समस्या में? — चुनें बिल्कुल सही तेल
🟡 1. सरसों का तेल — Winter Warrior (Vata pacifying)

✔ अत्यधिक ठंड, dryness, cracked lips
✔ Indigestion व gas tendency
✔ Muscle stiffness
Mustard oil की गर्म तासीर सर्दियों में double असर दिखाती है।

⚪ 2. नारियल तेल — Skin & Hormone Balancer

✔ Skin dryness
✔ Hormonal acne
✔ Constipation में subtle relief
इसमें मौजूद lauric acid anti-bacterial और soothing होता है।

🟤 3. तिल का तेल — सर्वश्रेष्ठ आयुर्वेदिक विकल्प

✔ Joint pain
✔ Anxiety / तनाव
✔ Deep nourishment
तिल के तेल को “त्वचा बल्य” कहा गया है—skin & nerves दोनों का पोषण।

🔵 4. घी — Ultimate Cooling & Healing

✔ Dehydration
✔ Body heat imbalance
✔ Chronic constipation
घी का snehan मन और शरीर—दोनों को शांत करता है।

3️⃣ इन गलतियों से बचें

✘ गंदे हाथों से तेल न लगाएँ
✘ तुरंत बाद पानी न पिएँ
✘ पेट फूला हो, infection हो तो ज्यादा नहीं लगाएँ
✘ एक-बार में बहुत अधिक तेल न डालें

💎 नाभि में तेल लगाने के 10 सिद्ध लाभ — बेहद असरदार

1️⃣ त्वचा में तुंरत नमी और glow बढ़ता है
2️⃣ पेट की गैस और bloating कम
3️⃣ Period pain और pelvic stiffness में राहत
4️⃣ ठंड में cracking skin व lips का बचाव
5️⃣ नींद की गुणवत्ता बेहतर
6️⃣ Anxiety व irritability कम
7️⃣ Circulation में subtle सुधार
8️⃣ Hormonal balance को support
9️⃣ Constipation में gentle relief
🔟 शरीर का overall Vata संतुलित — जिससे सर्दियों के कई रोग दूर रहते हैं

🔍 निष्कर्ष: छोटा उपाय, बड़े लाभ

नाभि में तेल लगाने की यह परंपरा सिर्फ घरेलू उपाय नहीं, बल्कि एक आसान Marma Therapy है। आधुनिक विज्ञान भी इसके moisturizing, anti-inflammatory और hormonal balance effects को मानता है।
सर्दियों में यह उपाय double प्रभाव दिखाता है—यह Skin, Digestion, Hormones और Mind—चारों को support करता है।

सोरायसिस एक ऑटोइम्यून (autoimmune) त्वचा रोग है जिसमें त्वचा पर लाल, खुजलीदार और पपड़ीदार धब्बे बन जाते हैं। होम्योपैथी ...
11/12/2025

सोरायसिस एक ऑटोइम्यून (autoimmune) त्वचा रोग है जिसमें त्वचा पर लाल, खुजलीदार और पपड़ीदार धब्बे बन जाते हैं। होम्योपैथी में सोरायसिस का उपचार व्यक्ति की विशिष्ट स्थिति और लक्षणों पर निर्भर करता है, और दवाएं एक योग्य चिकित्सक द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

**सोरायसिस के लक्षण
सोरायसिस के सामान्य लक्षणों में शामिल हैं:

*त्वचा पर लाल धब्बे: त्वचा पर उठे हुए, सूजन वाले लाल रंग के पैच (plaque) बनना।

*चांदी जैसी पपड़ी: इन लाल धब्बों पर मोटी, सफेद या चांदी के रंग की पपड़ी जमना, जो आमतौर पर कोहनी, घुटनों, पीठ के निचले हिस्से और खोपड़ी (scalp) पर दिखाई देते हैं।

*खुजली और जलन: प्रभावित क्षेत्रों में अक्सर तीव्र खुजली, जलन या दर्द महसूस होना।

*सूखी और फटी त्वचा: त्वचा का अत्यधिक सूखा होना, जिसमें दरारें पड़ सकती हैं और खून भी आ सकता है।

*नाखूनों में बदलाव: नाखूनों का मोटा होना, उनमें गड्ढे पड़ना, या रंग बदलना।

*जोड़ों में दर्द: कुछ मामलों में (सोरियाटिक गठिया), जोड़ों में सूजन, अकड़न और दर्द भी हो सकता है।

** #सोरायसिस के लिए होम्योपैथिक दवाएं

होम्योपैथिक उपचार रोगी के संपूर्ण स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और विशिष्ट लक्षणों के संयोजन पर आधारित होता है। कुछ सामान्य दवाएं जो अक्सर इस्तेमाल की जाती हैं, वे हैं:

# #लाइकोपोडियम (Lycopodium30): कुछ अध्ययनों ने प्लाक सोरायसिस के प्रबंधन में लाइकोपोडियम की प्रभावशीलता दिखाई है।
# #सल्फर (Sulphur30): यह अक्सर खुजली और जलन वाले त्वचा विकारों के लिए उपयोग की जाने वाली एक आम दवा है।
# #आर्सेनिक एल्बम (Arsenicum Album30): यह दवा आमतौर पर सूखी, पपड़ीदार त्वचा और जलन के लक्षणों के लिए दी जाती है।
# #एंटीमोनियम क्रूडम (Antimonium Crudum30): यह नाखूनों के सोरायसिस के मामलों में प्रभावी हो सकती है।

** लगाने के लिए Lebendar Hair oil (similia ) दिन में तीन से चार बार जहां-जहां है वहां वहां लगाना है

10/12/2025

•Sinusitis साइनोसाइटिस की आयुर्वेदिक चिकित्सा•
इस रोग से बहुत लोग दु:खी है । जानकारी के अभाव में लोग कैमीकल वाली दवाईयाँ खाते रहते है, लेकिन कोई सही इलाज नही मिल पाता ।
अआप घबराएं नही , आयुर्वेद में इसकी सफल चिकित्सा है । मैं आपके लिए अच्छी आयुर्वेदिक चिकित्सा लिखूंगा जो आपको कैमीकल वाली दवाओं से बचाएगी और जो साथ में गिफ्ट में रोग मिलते है उनसे भी बचाव होगा ।
आयुर्वेद अनुसार यह नजला-जुकाम है जो साइनस के affect होने से होता है। साइनस (Sinus) हवा से भरी खोखली छोटी-छोटी गुहा रूपी structures हैं, जो nose के आसपास चेहरे व सिर की bones के inside होते हैं तथा nose के inside खुलते है। जैसे both side face की bones में maxileri साइनस, nose के ऊपर head में frontal साइनस, eyes के पास ethmoid साइनस तथा
inside part में बीचोबीच mind से सटा sfenoid साइनस।
Sinusitis साइनस व आइटिस से मिलकर बना शब्द है, जिसका मतलब है साइनस के inside swelling आना। बहुत लोगों को इस problem में साइनस के साथ nose भी affect होती है इसलिए इसके लिए rainosities word का use भी किया जाता है। Related साइनस से nose के inside खुलने वाला austriyo छिद्र close हो जाता है। इसके अंदर बने mucus के मार्ग में बाधा start होने से कई समस्याएं पनपने लगती हैं। सब से ज्यादा maxileri साइनस (Sinus), फिर ethmoid साइनस, फिर frontal व सबसे कम sfenoid साइनस affect होते हैं। सभी साइनस एक साथ affect होने पर इस stage को pain sinusitis कहा जाता है। यह सभी उम्र के लोगों को प्रभावित करने वाली एक साधारण समस्या है। हर साल प्रत्येक दस में तीन लोग इस रोग से पीड़ित हो जाते हैं। लगभग 15% में साइनस की समस्या पुरानी रहती है। 4 हफ्तों से कम समस्या रहने पर नई व 3 माह से अधिक रहने पर chronic Sinusitis कहलाती है।

कारण: – इस रोग के मुख्य कारण में नाक व साइनस में सूजन तथा एलर्जी बने रहना है। नाक के अंदर कई समस्याएं इसका कारण बन सकती हैं। जैसे हड्डी का टेढ़ापन। deviated nasal septum, terminates का बढ़ना, adenoids tissue बढ़ना, pollips का बनना आदि। 20% में maxileri साइनसाइटिस का कारण दांतो की समस्या होती है। बढ़ता प्रदूषण, गंदे पानी में swimming करना भी इसका कारण बन सकता है। लम्बे समय तक allergy रहने पर साइनस के inside की mucosa झिल्ली फूलकर रसोली (गांठ) जैसा आकार ले लेती है। इनको pollips कहते हैं। virus, bacteria के अलावा fungus भी साइनस infection का कारण होते हैं।

लक्षण: –सिर दर्द, भारीपन व संबंधित साइनस की जगह पर stress महसूस होता है। साइनस का दर्द आगे झुकने पर प्राय: बढ़ जाता है। बुखार, कमजोरी, सूंघने की शक्ति में कमी, सांस में बदबू आना। जैसे लक्षण हो सकते हैं। इंफेक्शन रिसाव के नाक के पीछे से throught में post nasal drip के रूप में टपकने से गला damage रहता है। खांसी बनी रह सकती है। nose से ear को जाने वाली Eustachian tube के प्रभावित होने पर ear में infection, भारीपन व hearing में problem हो सकती हैं। इलाज न होने पर आँखें और दिमाग की नजदीकी के कारण इन हिस्सों के प्रभावित होने की आशंका रहती है। इससे ओर vital cellulite, मेनिन्जाइटिस, cavernous साइनस thrombosis जैसी जटिल situation हो सकती है।

जांच व उपचार: Nasal endoscopy द्वारा nose व साइनस को दूरबीन की मदद से पर्दे पर देखा जाता है। C.T.scan से सभी साइनस की real situation व अन्य important structure के बारे में जानकारी मिल जाती है। antibiotics, anti allergic anti clock spray के प्रयोग से ज़्यादातर लोगों में इस समस्या को ठीक किया जा सकता है। Steam का परयोग भी लाभकारी होता है। बार-बार लंबे समय तक साइनस infection का कारण यदि हड्डी का टेढ़ापन, pollip या बढ़े हुए adenoids हैं तो इन्हे ठीक करना भी जरूरी होता है। Allopathic डाकटर जब रोग पकड़ में न आए तो surgery के लिए बोल देते है। इसे fuctional endoscopic साइनस surgery कहते हैं। इसमें बिना बाहरी चीर-फाड़ के दूरबीन की मदद से नाक के अन्दर साइनसेज के Austina को खोल दिया जाता है, जिससे mucus का रास्ता सुचारु हो जाता है अन्य technique balloon sinoplasty है, जिसमें पतले लचीले balloon को फूलकर साइनस के खोल को चौड़ा किया जाता है।

मेरे पास बहुत मरीज आप्रेशन करवा कर भी जब ठीक नही होते तो इलाज के लिए आते है । आयुर्वेद चिकित्सा करवाने के बाद उन्हे कभी किसी तरह की समस्या नही आती । अपना जीवन साधारण मनुष्य की तरह बिताते है ।

आपकी सेवा में कुछ उपाय बता रहा हुँ .... कुशल आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श करके प्रयोग करें ।

Sinusitis साइनोसाइटिस का मेरा आयुर्वेदिक अनुभूत इलाज:-

नुस्खा नं:1
100ग्राम देशी हल्दी को देशी घी में भूनकर ठंडा होने के बाद ,उसमें 200ग्राम त्रिफला , 50ग्राम सफेद मिर्च , दालचीनी 50ग्राम , छोटी इलाची बीज 5ग्राम कूट पीसकर,छानकर सबको मिलाकर रख लें ।
सुबह-शाम 1-1चम्मच चूर्ण गर्म पानी या दूध से लें ।

नुस्खा नं:2
महालक्षमी विलास रस 1गोली ,
पुनर्नवादि मंडूर 2गोली ,
अरोग्यावर्धनी वटी 1गोली
चयवनप्राश 20ग्राम
सुबह खाली पेट चाटकर, थोड़ा गर्म पानी या चाय पी लें ।

नुस्खा नं:3
नवजीवन रस 5ग्राम
टंकण भस्म 10ग्राम
महालक्षमी विलास रस 6ग्राम
पुनर्नवादि मंडूर 15ग्राम
गोदंती भस्म 10ग्राम
ताप्यादि लोह नं१ - 5ग्राम
मधुयष्ठी चूर्ण 20ग्राम

सबको मिलाकर 60पुडिया बना लें । सुबह-शाम शहद से एक-एक पुडियाँ चाटकर ऊपर से कनकासव 2-2चम्मच गर्म पानी में मिलाकर खाने के १ घंटे बाद लें ।

नुस्खा नं:4
मेरा बेसन वाला नुस्खा , जो पहले लिख चुका हुँ । रात का खाना छोड़कर , बनाकर खाएं । साथ में नाक में किसी भी कंपनी ( वैद्यनाथ,डाबर , पतंजली ) का Shadbindu oil रात को सोते समय सिर टेढ़ा करके नाक में चार-चार बूंद डालें । 10 मिनट तक पूरा सिर टेढ़ा करके रखें ।
1 घंटे तक पहले और बाद में कोई भी तरल ठंडी चीज न लें ।
आप यह दवाओ का प्रयोग करके सदा के लिए इस रोग के लिए छुटकारा पा सकते है ।

जरूरी सूचना :- नुस्खा नं:2 और नुस्खा नं:3 में से कोई एक ही इस्तेमाल करें । बाकी सारे इस्तेमाल करने है । यानि Total तीन नुस्खें इस्तेमाल करने है ।

आयुर्वेद के ऐसे और नुस्खों की जानकारी के लिए हमें follow जरूर करें, Post शेयर करें। स्वर्ण योगों की जानकारी के लिए स्वर्ण भस्म श्रृंखला पढ़ें और अनुभूत नुस्खों के लिए श्री अमनामृत सागर -अनुभूत नुस्खे श्रृंखला के सभी भाग पढ़ते रहिए। धन्यवाद 🙏🏻

★Disclaimer 👇🏻
👉🏾 आपसे एक जरुरी बात :- नशा किसी भी तरह का हो , चाहे सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू,गांजा,अफीम,शराब, स्मैक, हीरोइन आदि। जिन्होंने भूतकाल में सेवन किया हो , या दवा के साथ सेवन कर रहा हो , छोड़ न रहा हो , तो चाहे लाखों की दवा खा लें। कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

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