Ayurvedacharya Vaidya Komal Patel

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Worked with Sri Sri Ayurveda panchakarma ( The art of living foundation Bangalore)
treating various health issues across all ages, especially preventive health care, children and women care,diet and lifestyle counseling, corona, chikengunya etc.

राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर शुभकामनाएं।
23/09/2025

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14/09/2025

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        as per ayurved #दही वर्षा ऋतु चर्या और सावन भादों में खानपान वाले पहले आर्टिकल्स पढ़ने के बाद कुछ प्रश्न आए हैं ...
10/09/2025




as per ayurved
#दही

वर्षा ऋतु चर्या और सावन भादों में खानपान वाले पहले आर्टिकल्स पढ़ने के बाद कुछ प्रश्न आए हैं दही के विषय में। आज उसी के बारे में बात करेंगे।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ चरक संहिता में अन्नपान विधि नामक 27 वें अध्याय में दुग्ध वर्ग में आठ प्रकार के दूध दही तथा घी मक्खन आदि के गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है। परंतु हमारी रोज़ ब रोज़ के रूटीन में जो हमारे लिए जानना जरूरी है ,उस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए मुख्य मुख्य जानकारी लेंगे।
ज़्यादातर दही जठराग्नि को बढ़ाने वाले, भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाले, बल देने वाले, थोड़ा खट्टा मीठा और गरम, पुष्टि करने वाला और मंगलकारी है। यहां मंगलकारी यानी शुभ कार्यों की शुरुआत में मीठा दही खाने से सब मंगल होता है और शुभ कार्य निर्विघ्न होता है। यह रिवाज हमारे यहां परंपरागत रूप से देखने को मिलता है।दही यानी भारत में शास्त्रोक्त पद्धति से दूध को उबालकर जामन डालकर कुदरती प्रक्रिया से जमाया गया मीठा दही, आर्टिफिशियल प्रोसेस से बनाया गया योगर्ट नहीं। प्लास्टिक के या अन्य रेडीमेड पैकेट में मिलने वाले पेस्चूराइझ्ड दूध से बने दही भी नहीं। फ्रिज में रखा हुआ ठंडा दही भी नहीं। अगर खाना पड़े तो 1 घंटे पहले फ्रिज से बाहर निकाल कर रखें।
इसके गुण के हिसाब से शरद, ग्रीष्म और वसंत ऋतु में दही नहीं खाना चाहिए। बाकी की ऋतु में ले सकते हैं। त्वचा रोग , रक्तपित्त रोग, मोटापा ,मधुमेह(डायबिटीज), कब्ज़, कफ दोष से होने वाले विकारों में,गर्मियों में और रात को दही का निषेध है। आगे के आर्टिकल में हमने देखा था वर्षा ऋतु में दही खा सकते हैं परंतु अभी भादों मास या शरद ऋतु में यह नहीं खाना चाहिए।
मिश्री, शहद, घी, आंवला ,मूंग, सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा आदि व्यक्ति की प्रकृति, अवस्था और ऋतु के अनुसार इसमें से कुछ मिलाकर ही दही खाना चाहिए। उड़द दाल के साथ दही नहीं खाना चाहिए। यह विरुद्ध आहार है। तो अगर दही भल्ले खाने का मन करे तो मुंग दाल के बनाइए।
ग्रीष्म ऋतु में जो श्रीखंड का सेवन किया जाता है आयुर्वेद में उसे रसाला कहते हैं। शास्त्रोक्त विधि अनुसार मलाई वाले दूध से बने दही को कपड़े से छानकर उसमें दालचीनी इलायची तेजपत्ता नागकेसर सोंठ गुड़ मिश्री डालकर तैयार किया हुआ श्रीखंड पौष्टिक रुचि कारक स्निग्ध ,बल को बढ़ाने वाला वायु को कम करने वाला और ह्रदय को प्रिय है। वैसे तो आठ प्रकार के दूध से बने दही के भी अलग-अलग गुण है, परंतु उन सब में देसी गाय के दूध से बना हुआ मीठा दही उत्तम है।
दही को कभी भी गरम नहीं करना चाहिए। जब हम कढ़ी बनाते हैं, तो दही या छाछ में बेसन को मिलाकर अच्छे से मथते हैं, उसके बाद तड़का लगाते हैं। तो उसके गुण बदल जाते हैं। रात को कढ़ी ना खाएं।
दही खाने के नियमों का ख्याल रखते हुए अगर अधिक मात्रा में इसका सेवन किया जाए या उपर बताए गए नियमों का पालन न किया जाए तो बुखार, पीलिया, एनीमिया, चक्कर आना, खून के बिगड़ने से त्वचा रोग, कफ से होने वाली तकलीफें, बालों का गिरना या सफेद होना, आदि समस्याएं होती हैं।
तो अगर उत्तम स्वास्थ्य की चाह रखते हैं तो आयुर्वेद को अपनाइए और स्वस्थ रहिए।
🙏सर्वे संतु निरामया 🙏


Vaidya Komal Patel
Ex. Nadi consultant and panchkarma physician (Sri Sri ayurveda - The art of living foundation Bangalore



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        #शरदऋतुचर्या #भादों में खानपान भारतीय कैलेंडर अनुसार सावन महीना अभी  पूर्ण होकर भादों मास  शुरू हो चुका है।यह हम...
04/09/2025





#शरदऋतुचर्या
#भादों में खानपान

भारतीय कैलेंडर अनुसार सावन महीना अभी पूर्ण होकर भादों मास शुरू हो चुका है।यह हम सब जानते हैं। परंतु इसके अलावा अगर ऋतु अनुसार देखें तो वर्षा ऋतु का अंत और शरद ऋतु (autumn)का प्रारंभ होने जा रहा है। देव शयनी एकादशी से अलग-अलग त्योहारों का सिलसिला चल रहा है। गणेश चतुर्थी का त्यौहार अभी-अभी हमने मनाया है, गुड़ और घी के विभिन्न प्रकार के मोदक का भोग लगाया। और कुछ ही दिनों में पितृपक्ष प्रारंभ होगा। जिसमें परंपरा से खीर बनाकर खाई जाती है। जैसा कि हम सब जानते हैं हर त्यौहार को मनाने का तरीका खानपान वगैरह उस ऋतु में होने वाले बाहरी वातावरण के परिवर्तन के अनुसार ही रखा गया है। हमारे पूर्वज बहुत ही बुद्धिशाली और चतुर थे इसीलिए इन सब को धर्म के साथ जोड़ा गया। जिससे कि सभी लोग इसका पालन अच्छे से करें और हमेशा स्वस्थ बने रहें।
इससे आगे हमने वर्षा ऋतु के बारे में जानकारी ली थी। हर ऋतु का अंतिम सप्ताह और आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह यह जो लगभग 15 दिनों का समय है उसे ऋतु संधि कहा जाता है, जहां पर ज़्यादा से ज़्यादा स्वास्थ्य संबंधी तकलीफें हो सकती हैं। वर्षा ऋतु में बारिश के कारण वातावरण में ठंड रहती है जिससे कि वायु का प्रकोप होता है यानी कि वायु के बढ़ने से उससे होने वाली समस्याएं भी बढ़ती है। बारिश के बंद होने के बाद अचानक से तेज़ धूप निकलने से गर्मी भी बढ़ने लगती है ज़्यादातर दिन में, और रात को चंद्रमा की शीतल चांदनी से ठंडा रहता है। कहा गया है ,यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे।। बाहर के वातावरण में होने वाले परिवर्तन का सीधा असर हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर होता है। और इसीलिए आयुर्वेद में ऋतु चर्या को विशेष महत्व दिया गया है। इस ऋतु संधि के समय में धीरे धीरे आगे की ऋतु का खान पान बदल कर आने वाली ऋतु के खानपान का अभ्यास शुरू करना चाहिए। शरद ऋतु में वातावरण में बढ़ी हुई गर्मी के कारण शरीर में भी पित्त बढ़ता है और पित्त के बिगड़ने से रक्त या खून भी बिगड़ता है,जिससे कि बुखार, त्वचा पर फोड़े फुंसियां, लाल चकत्ते आना, शीतपित्त, आंखों में या शरीर में कहीं पर भी जलन होना वगैरा-वगैरा जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। इसीलिए शरद ऋतु को रोगों की माता कहा गया है।प्रिवेंशन इस बेटर देन क्योर, इस हिसाब से अगर पित्त को शांत करने वाले खानपान जैसे कि गाय का दूध ,घी,मक्खन, मिश्री, तुरई, गिया ,परवल, भिंडी ,करेला, खीरा, पुराने अनाज जैसे गेहूं, जौ, चावल, मूंग, धनिया जीरा इलायची, चीकू केला जैसे मीठे फल, सिंघाड़ा कमलगट्टा ,अनार खजूर नारियल वगैरह लेने हैं।
और पित्त को बढ़ाने वाले खानपान जैसे कि नया अनाज, बाजरा, कुलथी, चना राजमा टमाटर पालक बैंगन मेथी मिर्च,तिल ,अदरक ,लहसुन ,सरसों ,गाजर पपाया खट्टे फल, गुड, दही, अत्यधिक नमकीन , खट्टी चीजें,बासी खाना, अचार, तेज धूप में निकलना, ज़्यादा व्यायाम करना आदि का त्याग करें। अगर इन सब नियमों को ध्यान में रखा जाए तो इस ऋतु में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है।
रोगाणाम् शारदी माता। अर्थात शरद ऋतु में ज्यादातर स्वास्थ्य संबंधी तकलीफें ज़्यादा देखने को मिलती है। व्यवहार में किसी को आशीर्वाद या शुभकामनाएं देने के लिए कहा जाता है जीवेम शरद: शतम। सौ शरद तक जीने की शुभकामनाएं। आयुर्वेद में बताए गए सिद्धांतों का अनुसरण हो तो यह भी संभव है।
अगर किसी कारणवश कोई भी तकलीफ हो तो आयुर्वेद में इसकी चिकित्सा का भी वर्णन है। जरूरत पड़ने पर आयुर्वेद निष्णात से सलाह जरूर लें।
जीवेम शरद: शतम् ।
🙏सर्वे संतु निरामया 🙏

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       #दैव व्यपाश्रयी चिकित्सा #मंत्र चिकित्सा #गणपतीअथवॅशीर्ष श्री गणेशाय नमः।। आज का विषय देखकर सबको हैरानी होना स्वा...
02/09/2025




#दैव व्यपाश्रयी चिकित्सा
#मंत्र चिकित्सा
#गणपतीअथवॅशीर्ष

श्री गणेशाय नमः।। आज का विषय देखकर सबको हैरानी होना स्वाभाविक है। आयुर्वेद में मुख्यतया तीन प्रकार से चिकित्सा की जाती है युक्तिव्यपाश्रय, दैव व्यपाश्रयी और सत्वावजय चिकित्सा। सामान्य रूप से इसे समझें तो पहले प्रकार की युक्ति व्यपाश्रयी चिकित्सा में वैद्य शास्त्र के ज्ञान के अनुसार रोगी को उसकी अवस्था, प्रकृति, काल,बल आदि देखकर युक्ति पूर्वक औषधि या पंचकर्म चिकित्सा देते हैं। परंतु कुछ बीमारियां या तकलीफें ऐसी होती है जिसमें दवा के साथ दुआ भी अत्यंत आवश्यक है। आयुर्वेद में वर्णित बाकी की दो चिकित्सा पद्धति को अत्यंत आवश्यक बता कर उसका भी यथा योग्य प्रयोजन किया जाना जरूरी है। जिसमें दैव व्यपाश्रयी चिकित्सा में मंत्र जाप होम हवन आदि का भी समावेश है। सत्वावजय- काउंसलिंग थेरेपी चिकित्सा यानी रोगी के मन को सकारात्मक बनाना और उसके सत्व को बढ़ाना। कहा जाता है कि एक बीमार मन स्वस्थ शरीर को नहीं चला सकता किंतु एक स्वस्थ व मजबूत मन बीमार शरीर को भी ठीक कर सकता है। यह दोनों चिकित्साऐं लगभग साथ में की जाती है। आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से शरीर आत्मा और मन इन तीनों के संयोग को ही व्यक्ति मानकर उसकी संपूर्ण चिकित्सा की जाती है। मात्र शरीर या मात्र मन की नहीं।
आज उसी के भाग रूप अगर मंत्र जाप आदि के बारे में बात करें तो भारतवर्ष में हजारों सालों से यह सब हमारी परंपराओं में रहा है। परंतु चिकित्सा में विशेष रुप से इन सब का क्या प्रयोजन है यह जानना अत्यंत आवश्यक है। जो सिद्ध मंत्र होते हैं जैसे कि गायत्री मंत्र, शिव पंचाक्षर मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, देवी कवचम, गणपति अथर्वशीर्ष,हनुमान चालीसा आदि। इन सबके उच्चारण से एक विशिष्ट प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती है, पॉजिटिव वाइब्रेशंस, जिसका हमारे शरीर,मन और हमारी चेतना पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वैसे ही अगर गणपति अथर्व शिर्ष की बात करें तो हर शुभ कार्य की शुरुआत हमेशा से गणपतिजी के आह्वान से वंदना से शुरू होती है। गणपति जी बुद्धि के देवता है। वास्तव में वह सिर्फ मूर्ति में विराजमान नहीं है या कोई एक धर्म के लोगों के लिए नहीं है। सही दृष्टिकोण में देखा जाए तो हम किसी भी कार्य की शुरूआत में गणपति वंदना करके हमारी बुद्धि को शुद्ध करने के लिए प्रार्थना या संकल्प करते हैं। किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए मनका स्वस्थ और शुद्ध होना अत्यंत आवश्यक है। गणपति का बड़ा सिर बहुत सा ज्ञान अत्यंत मात्रा में होने का द्योतक है ,साथ ही में उनके हाथ में अंकुश भी है, जो शुद्ध बुद्धि और बढ़ी हुई ऊर्जा को सही नियंत्रण में रखने का सूचक है। थवॅ यानी अस्थिर, अथर्व यानी जो स्थिर है, अथर्व शीर्ष का पाठ करने या सुनने से व्यक्ति की बुद्धि स्थिर और शुद्ध होती है। विचार अच्छे और सही दिशा में होने से सभी कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है। ध्यान के साथ तन्मय हो कर अगर इसका नियमित रूप से श्रवण या पाठ किया जाए तो एपिलेप्सी, स्ट्रेस, डिप्रेशन ,मन की चंचलता, निणॅय शक्ति का अभाव होना आदि मन से जुड़ी हुई समस्याओं में पूर्ण लाभ मिलता है ‌। यह अन्य मुख्य चिकित्सा के साथ पूरक चिकित्सा के रूप में किया जा सकता है। नियमित रूप से अगर सही तरीके से मंत्र जाप किया जाए तो यह एक कवच के रूप में व्यक्ति की सदैव रक्षा करता है। काल दोष हो या ग्रहों का प्रभाव, इस की शरण में आने से व्यक्ति सभी दुष्प्रभावों से मुक्त होते हैं।
🙏सह आभार---स्वामी पूर्ण चैतन्य आनंद जी और
प्रोफेसर डॉक्टर देशपांडे।

🙏 सर्वे संतु निरामया। 🙏


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21/08/2025

"एलोपैथी फ़ार्मास्यूटिकल कंपनियों को मरीज़ों को ठीक करने में दिलचस्पी नहीं है; वे पैसा कमाना चाहती हैं, और इसके लिए लोगों को बीमार बनाए रखना चाहती हैं।"
— डॉ. पीटर गोट्ज़शे

डॉ. पीटर गोट्ज़शे का यह कथन चिकित्सा जगत की एक गंभीर सच्चाई पर रोशनी डालता है। उनका कहना है कि आधुनिक दवा उद्योग का मक़सद पूरी तरह इलाज देने की बजाय, लक्षणों को नियंत्रित करके मरीज़ को लंबे समय तक दवाओं पर निर्भर बनाए रखना है।

कंपनियां शोध और निवेश उन्हीं बीमारियों पर अधिक करती हैं जिनसे निरंतर दवा बिक्री हो सके, न कि उन पर जो एक बार के इलाज से ठीक हो जाएं।

उपचार (Treatment) अक्सर सिर्फ़ लक्षण दबाता है, जबकि इलाज (Cure) बीमारी की जड़ खत्म करता है।

यह व्यवस्था बार-बार मरीज़ को दवा पर निर्भर रखकर अरबों डॉलर का मुनाफा कमाती है।

मुनाफे की होड़ में इंसानियत और रोगी की भलाई पीछे छूट जाती है।
यही कारण है कि प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद, योग और जीवनशैली सुधार को अपनाना ज़रूरी है, ताकि हम सिर्फ़ बीमारी का मैनेजमेंट न करें, बल्कि उसे जड़ से खत्म करने की दिशा में बढ़ें।

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