03/04/2026
*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*योग साधना के दो मार्ग*
योग साधना के दो मार्ग हैं एक दक्षिण मार्ग, दूसरा वाम मार्ग। दक्षिण मार्ग का आधार यह है कि—‘‘विश्वव्यापी ईश्वरीय शक्तियों को आत्मिक चुम्बकत्व से खींच कर अपने में धारण किया जाय। सतोगुण को बढ़ाया जाय और अन्तर्जगत में अवस्थित पंच कोष, सप्त प्राण, चेतना चतुष्टय, षटचक्र एवं अनेक उपचक्रों, मात्रिकाओं, ग्रंथियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जागृत करके आनन्ददायनी अलौकिक शक्तियों का आविर्भाव किया जाय।’’वाम मार्ग का आधार यह है कि—‘‘दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को इधर से उधर हस्तान्तरित करके एक जगह विशेष मात्रा में शक्ति संचित कर ली जाय और उस शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाय।’’
तांत्रिक साधनाओं की कार्य पद्धति इसी आधार पर चलती है। किन्हीं पशुओं का वध करके उनके पांच प्राणों का उपयोगी भाग खींच लिया जाता है। जैसे शिकारी लोग सुअर के शरीर में निकलने वाली चर्बी को अलग से निकाल लेते हैं वैसे ही तंत्र साधक उन बघ होते हुए पशु के सप्त प्राणों में से पांच प्राणों को चूस जाते हैं और उससे अपनी शक्ति बढ़ा लेते हैं। बकरे, भैंसे, मुर्गे आदि के बलिदानों का आधार यही है। मृत मनुष्यों के शरीरों में एक सप्ताह तक कुछ उपचक्र एवं ग्रंथियों में चैतन्यता बनी रहती है। श्मशान भूमि में रह कर मुर्दों द्वारा शव साधना करने वाले अघोरी उन मृतकों से भी शक्ति चूसते हैं। देखा जाता है कि कई अघोरी मृत बालकों की लाशों को जमीन में से खोद ले जाते हैं, मृतकों की खोपड़ी लिये फिरते हैं, चिताओं पर भोजन पकाते हैं। यह सब इसी प्रयोजन के लिए किया जाता है।
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