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AWGP- LITERATURE GURUDEVॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*गायत्री की दैनिक साध...
30/12/2025

AWGP- LITERATURE GURUDEV
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री की दैनिक साधना एवं यज्ञ पद्धति*
*दैनिक साधनाक्रम*
*दैनिक हवन*
॥ शुभकामना॥

यह शुभकामना मन्त्र भी सबके कल्याण की अभिव्यक्ति के लिए है। हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष न हो, अशुभ चिन्तन किसी के लिए भी न करें। जिनसे सम्बन्ध कटु हो गये हों, उनके लिए भी हमें मङ्गल कामना ही करनी चाहिए। द्वेष- दुर्भाव किसी के प्रति भी नहीं रखना चाहिए। सबके कल्याण में अपना कल्याण समाया हुआ है। परमार्थ में स्वार्थ जुड़ा हुआ है- यह मान्यता रखते हुए हमें सर्वमङ्गल की- लोककल्याण की आकांक्षा रखनी चाहिए। शुभ कामनाएँ इसी की अभिव्यक्ति के लिए हैं।
सब लोग दोनों हाथ पसारें। इन्हें याचना मुद्रा में मिला हुआ रखें। मन्त्रोच्चार के साथ- साथ इन्हीं भावनाओं से मन को भरे रहें।

ॐ स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्ताम्, न्याय्येन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं, लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥ १॥
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात्॥ २॥
श्रद्धां मेधां यशः प्रज्ञां, विद्यां पुष्टिं श्रियं बलम्।
तेज आयुष्यमारोग्यं, देहि मे हव्यवाहन॥ ३॥ - लौगा० स्मृ०

*क्रमशः* *........*
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A step-by-step guide on how to perform daily gayatri mantra j*p, sadhana and havan, including the preliminary disciplines of pavitrikaran (purification),...

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29/12/2025

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री की दैनिक साधना एवं यज्ञ पद्धति*
*दैनिक साधनाक्रम*
*दैनिक हवन*

॥ साष्टाङ्गनमस्कारः॥

सर्वव्यापी विराट् ब्रह्म को- विश्व ब्रह्माण्ड को भगवान् का दृश्य रूप मानकर ‘सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥’ की भावना से घुटने टेककर भूमि में मस्तक लगाकर देव शक्तियों को, महामानवों को भाव- विभोर होकर अभिवन्दन- नमस्कार किया जाता है। उनके चरणों में अपने को समर्पित करने अर्थात् अनुगमन करने का सङ्कल्प, आश्वासन व्यक्त किया जाता है। यही भूमि- प्रणिपात साष्टांग नमस्कार है।

ॐ नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये, सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते, सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः॥

*क्रमशः* *........*
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28/12/2025

What if I told you that the greatest god of modern times is not found in temples—but in your daily work? What if your effort itself has the power to change your destiny? What if your body itself is a temple? Do you know how intelligent action defeats superstition?
How you see effort, work, and your own hidden potential. If you believe success depends only on intelligence or luck, this message will change your thinking forever.

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*Ojas- vedic bites- Who Really Wins**Live---Sunday--8am.(IST)**Live----Saturday--6.30pm.(PST)*🔔Please subscribe, like an...
27/12/2025

*Ojas- vedic bites- Who Really Wins*

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AWGP- LITERATURE GURUDEVॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*गायत्री की दैनिक साध...
27/12/2025

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
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॥ भस्मधारणम्॥

जीवन का अन्त भस्म की ढेरी के रूप में होता है। मुट्ठी भर भस्म बनकर हवा में उड़ जाने वाले अकिंचन मनुष्य का लोभ, मोह, अहंकार में निरत रहना मूर्खतापूर्ण है। इस दूरगामी किन्तु नितान्त सत्य स्थिति को यदि वह समझ सका होता, तो उसने अपनी गतिविधियों का निर्धारण ऐसे आधारों पर किया होता, जिसे सुरदुर्लभ मानव जीवन व्यर्थ और अनर्थ जैसे कार्यों में गँवा देने का पश्चात्ताप न करना पड़ता। मृत्यु कभी भी आ सकती है और इस सुन्दर कलेवर को देखते- देखते भस्म की ढेरी बना सकती है। यह बात मस्तिष्क में भली प्रकार बिठा लेने के लिए यज्ञ भस्म मस्तक पर लगाई जाती है। इस भस्म को मस्तक, कण्ठ, भुजा तथा हृदय पर भी लगाते हैं, मस्तक अर्थात् ज्ञान, कण्ठ अर्थात् वचन, भुजा अर्थात् कर्म। मन, वचन, कर्म से हम ऐसे विवेकयुक्त कर्म करें, जो जीवन को सार्थक कृतकृत्य बनाने वाले सिद्ध हों।
स्फ्य की पीठ पर भस्म लगा ली जाती है और सभी लोग अनामिका अँगुली में लेकर मन्त्र में बताये हुए स्थानों पर क्रमशः लगाते हैं।

ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः, इति ललाटे।
ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषम्, इति ग्रीवायाम्।
ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषम्, इति दक्षिणबाहुमूले।
ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्, इति हृदि। - ३.६२

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26/12/2025

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
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॥ घृतावघ्राणम्॥

घृत आहुतियों से बचने पर टपकाया हुआ घृत, जल भरे प्रणीता पात्र में जमा रहता है। इसे थाली में रखकर सभी उपस्थित लोगों को दिया जाए। इस जल मिश्रित घृत में दाहिने हाथ की अँगुलियों के अग्रभाग को डुबोते जाएँ और दोनों हथेलियों पर मल लिया जाए। मन्त्र बोलते समय दोनों हाथ यज्ञ कुण्ड की ओर इस तरह रखें, मानो उन्हें तपाया जा रहा हो। यज्ञीय वातावरण एवं सन्देश को मस्तिष्क में भर लेने, आँखों में समा लेने, कानों में गुँजाते रहने, मुख से चर्चा करते रहने और उसी दिव्य गन्ध को सूँघते रहने, वैसे ही भावभरा वातावरण बनाये रखने की सामर्थ्य पाने की इच्छा रखने वालों को यज्ञ भगवान् का प्रसाद घृत अवघ्राण से प्राप्त होता है।
ॐ तनूपा अग्नेऽसि, तन्वं मे पाहि।
ॐ आयुर्दा अग्नेऽसि, आयुर्मे देहि॥
ॐ वर्चोदा अग्नेऽसि, वर्चो मे देहि।
ॐ अग्ने यन्मे तन्वाऽ, ऊनन्तन्मऽआपृण॥
ॐ मेधां मे देवः, सविता आदधातु।
ॐ मेधां मे देवी, सरस्वती आदधातु॥
ॐ मेधां मे अश्विनौ, देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ। - पा० गृ० सू० २.४.७- ८

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॥ आरती गायत्री माता की ।॥।
जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। आदि-शक्ति तुम अलख निरंजन जग पालन कर्त्री | दुःख, शोक, भय, क्लेश, कलह, दारिद्रय दैन्य हर्त्री॥ ब्रह्मरूपिणी, प्रणतपपालिनी, जगतधात्‌ृ अंबे। भवभयहारी जनहितकारी, सुखदा जगदंबे॥ भयहारिण भव तारिणि अनघे, अज आनंद राशी। अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले अविनाशी॥ कामधेनु सतूचित्‌ू आनंदा, जय गंगा गीता। सविता की शाश्वती शक्ति तुम सावित्री सीता॥ ऋक, यजु, साम, अथर्व प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे। कुंडलिनी सहस्रार, सुषुम्ना शोभा गुण गरिमे॥ स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी। जय सतरूपा वाणी, विद्या, कमला, कल्याणी॥ जननी हम हैं दीन-हीन, दुःख-दारिद्ध के घेरे। यदपि कुटिल-कपटी, कपूत, तऊ बालक हैं तेरे॥ स्नेह सनी करुणामयी माता ! चरण शरण दीजे। बिलख रहे हम शिशु, सुत तेरे दया दृष्टि कीजै॥ काम क्रोध, मद, लोभ, दंभ, दुर्भाव, द्वेष हरिए। शुद्ध बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिए॥ तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि-पुष्टि त्राता। सत मारग पर हमें चलाओ, जो हे सुख दाता॥ जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता॥

*क्रमशः* *........*
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