05/05/2026
*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
मन का स्वभाव बालक जैसा होता है, उमंग से भरकर वह कुछ न कुछ करना-बोलना चाहता है। यदि दिशा न दी जाय तो उसकी क्रिया-शीलता तोड़ फोड़ एवं गाली-गलौज के रूप में भी सामने आ सकती है। बालक को उसकी क्रियाशीलता के अनुसार कार्य मिलता रहे तो वह स्वयं भी सन्तोष पाता है तथा दूसरों को भी सुख देता है। मन के लिए उसकी कल्पना शक्ति के अनुसार सद्विचारों एवं सद्भावनाओं का क्षेत्र खोल दिया जाय तो वह सन्तुष्ट भी रहता है तथा हितकारी भी सिद्ध होता है। स्नेह, कृतज्ञता, सौहार्द्र, सहयोग, करुणा, उदारता जैसे भावों को उभारते रहा जाय- नीति निष्ठा, सक्रियता, श्रम, ईमानदारी, सेवा, सहायता आदि के विचारों को बार-बार दुहराया जाय तो मन में कुविचारों और दुर्भावनाओं को जगह ही न मिलेगी।
परिस्थिति एवं वातावरण के प्रभाव से बहुत बार मन पर उनका अवसर होने लगता है। उस स्थिति में कुविचारों के विपरीत, सशक्त, सद्विचारों से उन्हें काटना चाहिए। जैसे स्वार्थपरता, धोखेबाजी, कामचोरी के विचार आयें तो— श्रमशीलता तथा प्रामाणिकता से लोगों की अद्भुत प्रगति के तथ्यपूर्ण चिन्तन से उन्हें हटाया जा सकता है। यदि किसी के विपरीत आचरण से क्रोध आये या द्वेष उभरे तो उसकी मजबूरी समझकर उसके प्रति करुणा, आत्मीयभाव से उसे धोया जा सकता है। यदि विद्या सत् साहित्य के स्वाध्याय, सत्पुरुषों की संगति एवं ईमानदारी से किये गये आत्म चिन्तन से ही पायी जा सकती है।
हमारे मन में शुद्ध और सकारात्मक विचार होने चाहिए। इसके लिए हमें अच्छे पुस्तकों का अध्ययन (स्वाध्याय) और संतों के साथ समय बिताना (सत्संग) चाहिए।
प्रतिदिन कम से कम 10-15 मिनट सकारात्मक पुस्तकें पढ़ें या ध्यान करें।
सत्संग में भाग लें और अच्छे विचारों से अपने मन को पोषित करें।
कुविचारों को दूर रखने के लिए नकारात्मकता से बचें।
दिन में कम से कम कुछ समय शांति में बिताएँ, ताकि आपका मन संतुलित और सकारात्मक रहे।
*क्रमशः* *........*
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