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Ojas provides physical and emotional healing services such as Prana chikitsa and yoga-medication to people as well as teaches this technique to new students.

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!*गायत्री साधना की व...
03/04/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*योग साधना के दो मार्ग*

योग साधना के दो मार्ग हैं एक दक्षिण मार्ग, दूसरा वाम मार्ग। दक्षिण मार्ग का आधार यह है कि—‘‘विश्वव्यापी ईश्वरीय शक्तियों को आत्मिक चुम्बकत्व से खींच कर अपने में धारण किया जाय। सतोगुण को बढ़ाया जाय और अन्तर्जगत में अवस्थित पंच कोष, सप्त प्राण, चेतना चतुष्टय, षटचक्र एवं अनेक उपचक्रों, मात्रिकाओं, ग्रंथियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जागृत करके आनन्ददायनी अलौकिक शक्तियों का आविर्भाव किया जाय।’’वाम मार्ग का आधार यह है कि—‘‘दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को इधर से उधर हस्तान्तरित करके एक जगह विशेष मात्रा में शक्ति संचित कर ली जाय और उस शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाय।’’

तांत्रिक साधनाओं की कार्य पद्धति इसी आधार पर चलती है। किन्हीं पशुओं का वध करके उनके पांच प्राणों का उपयोगी भाग खींच लिया जाता है। जैसे शिकारी लोग सुअर के शरीर में निकलने वाली चर्बी को अलग से निकाल लेते हैं वैसे ही तंत्र साधक उन बघ होते हुए पशु के सप्त प्राणों में से पांच प्राणों को चूस जाते हैं और उससे अपनी शक्ति बढ़ा लेते हैं। बकरे, भैंसे, मुर्गे आदि के बलिदानों का आधार यही है। मृत मनुष्यों के शरीरों में एक सप्ताह तक कुछ उपचक्र एवं ग्रंथियों में चैतन्यता बनी रहती है। श्मशान भूमि में रह कर मुर्दों द्वारा शव साधना करने वाले अघोरी उन मृतकों से भी शक्ति चूसते हैं। देखा जाता है कि कई अघोरी मृत बालकों की लाशों को जमीन में से खोद ले जाते हैं, मृतकों की खोपड़ी लिये फिरते हैं, चिताओं पर भोजन पकाते हैं। यह सब इसी प्रयोजन के लिए किया जाता है।

*क्रमशः* *........*
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02/04/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*नौ धागे का यज्ञोपवीत नव रत्नों का हार*

जो लोग मल मूत्र आदि के समय कान पर यज्ञोपवीत चढ़ाने के नियम को ठीक प्रकार पालन नहीं कर पाते उनके लिए एक तिहाई लम्बाई का छोटा यज्ञोपवीत बना दिया जाता है जो कंठ में पड़ा रहता है। जो लोग यज्ञोपवीत बनाना नहीं जानते वे गायत्री की शिक्षाओं को एक डोरे में गांठ लगा कर बांध लेते हैं। 9 लड़ें 3 गांठें 1 ब्रह्म गांठ तथा 1 पूर्ण यज्ञोपवीत के अभाव को पूर्ण करना, इस प्रकार 14 गांठें लगे हुए डोरे को यज्ञोपवीत के स्थान पर धारण करते हैं। अनन्त चतुर्दशी को पहना जाने वाला 14 गांठ का अनन्त सूत्र, बालकों के गले में ओझा लोगों द्वारा बांधे गये 14 ग्रंथि वाले ‘‘गंडा सूत्र’’ स्त्रियों की सोने चांदी या कांच की कंठियां इस प्रकार के आंशिक यज्ञोपवीत के ही प्रतीक है।
गायत्री के प्रत्येक उपासक को यज्ञोपवीत पहनना अवश्य चाहिए क्योंकि यह उसकी विधिवत् ली हुई धर्म प्रतिज्ञा-दीक्षा का, न त्यागने योग्य उत्तरदायित्व है। यह धारणा उसके उद्देश्य को प्राप्त कराने में बड़ी सहायक होती हैं। नौ धागे का यज्ञोपवीत नव रत्नों का हार है इसका महत्व रत्न जटित आभूषण से अधिक ही है, कम नहीं।

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01/04/2026

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*धर्म प्रतिज्ञा लेना ही दीक्षा है*

स्मरण रखना चाहिए कि द्विज ही गायत्री के अधिकारी हैं। गुरू पिता और गायत्री-माता के अनुसरण की धर्म प्रतिज्ञा लेना ही दीक्षा है। आत्मिक उन्नति के लिए दूसरा जन्म होना आवश्यक है। यज्ञोपवीत उस जन्म का प्रमाण पत्र है यह मूर्तिमान प्रतिज्ञा हर समय कंधे और छाती पर अवस्थित रहनी चाहिए ताकि बार बार घड़ी घड़ी वह हमारी प्रतिज्ञा का स्मरण कराती रहे। स्त्री और बालक कंठी के रूप में या कंठ में पड़े रहने वाले तृतीयांश सूत्र का यज्ञोपवीत धारण कर सकते हैं।

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31/03/2026
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31/03/2026

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*आत्म निर्माण के लिए गायत्री*

हमारी प्रेम भावना जितनी ही प्रगाढ़ होती जाती है उतना ही ईश्वर प्राप्ति की सफलता के निकट पहुंचते जाते हैं। गुरू भक्ति का दूसरा लाभ यह है कि उनके आदेशानुसार गायत्री शिक्षाओं को व्यवहार रूप में लाने के लिए उनका प्रभाव विशेष उपयोगी सिद्ध होने लगता है।यों सभी मनुष्य समान हैं, सभी ईश्वर के पुत्र होने से भाई भाई हैं, सभी में दोष हैं, कोई भी पूर्ण निर्दोष नहीं है, गुरू भी यदि पूर्ण निर्दोष होते तो उन्हें संसार में रहने की आवश्यकता ही क्यों होती, अपूर्णता के कारण ही तो हम सब इस स्कूल की विभिन्न कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। इतना होते हुए भी किसी अपेक्षा कृत सत्पुरुष को माध्यम बना कर गुरू भक्ति की जा सकती है। रबड़ की गेंद को जितने जोर से फेंक कर दीवार पर मारते हैं वह टकरा कर उतने ही जोर से वापिस लौट आती है। गुरू भक्ति रूपी साधना से हमारी आध्यात्मिक भक्ति भावना तेजी से समुन्नत होती है तदनुसार ईश्वर की गायत्री शक्ति को शीघ्रता एवं अधिक मात्रा में प्राप्त करना सुगम हो जाता है।
प्रत्येक गायत्री साधक को आदर्शवादी विचार धारा का अनुयायी होने की, द्विजत्व का अवलम्बन करने की, प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। तुच्छ, स्वार्थपूर्ण, भोगवादी, पाशविक दृष्टिकोण रख कर जो व्यक्ति गायत्री की उपासना करना चाहता है उस अनधिकारी के लिए द्वार बन्द है। साधक को अपने आत्म निर्माण के लिए गायत्री में सन्निहित नीति योजना और कार्य प्रणाली को अपनाना चाहिए। गायत्री माता है, माता ही जीवन निर्माता होती है। हमारा आध्यात्मिक जीवन गायत्री की शिक्षा के अनुरूप होना चाहिए। प्रत्येक साधक का एक सुयोग्य अनुभवी, सूक्ष्म बुद्धि, पथ प्रदर्शक होना चाहिए। जो मार्ग बताने, भूल सुधारने, सुप्त शक्तियों को जगाने एवं भक्ति भावना को बढ़ाने में सहायक हो सके।

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30/03/2026

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि*
*ईश्वरीय शक्तियों को पकड़ने आकर्षित करने का साधन*

ईश्वरीय शक्तियों को पकड़ने आकर्षित करने का एक मात्र अवलम्बन जो मनुष्य के पास है वह है- श्रद्धा युक्त प्रेम। इसी को भक्ति कहते हैं ‘‘भगवान भक्ति के वश में होते आये’’ की उक्ति इसी महा सत्य का समर्थन करती है। प्रगाढ़ प्रेम से परिपूर्ण मनोभावना में एक ऐसा दैवी चुम्बकत्व हो जाता है जिससे मनुष्यों और दैवी शक्तियों को अपने पक्ष में द्रवित एवं आकर्षित किया जा सकता है। कोई चतुराई, बुद्धिमत्ता, विधि व्यवस्था ऐसी नहीं है जिससे श्रद्धा युक्त प्रेम (भक्ति) के समान चुम्बकत्व, आकर्षण, पैदा होता हो और यह आकर्षण ही समस्त आत्मिक लाभों का उद्गम स्रोत है।
अपने में भक्ति भावना बढ़ाने का अभ्यास पहले पहल किसी मनुष्य को माध्यम बनाकर किया जाता है। ईश्वर भक्ति का प्रारंभिक अभ्यास गुरू भक्ति से होता है। आरंभ में छोटे तालाब में तैरना सीख कर तब समुद्र को तैर जाने में सफलता मिलती है। माता, पिता, मित्र, पति, पत्नी, पुत्र आदि को माध्यम बना कर भक्ति का अभ्यास करने में यह कठिनाई है कि इनके साथ सांसारिक व्यवहारिक संबंध रहने से कभी अनुकूल कभी प्रतिकूल भावनाएं आती रहती हैं। दूसरे इनमें ज्ञान, सदाचार, विद्या, दिव्यदृष्टि, सात्विकता एवं निस्वार्थता आदि विशेषताओं की उतनी मात्रा न होने से स्वाभाविक श्रद्धा भी अधिक मात्रा में उत्पन्न नहीं होती। सद्गुरु के संबंध में यह कठिनाइयां नहीं आतीं। इसलिए उनको माध्यम बना कर अपने अन्तःकरण में श्रद्धा, सात्विकता एवं पवित्रता से परिपूर्ण प्रेम का अभ्यास करना सरल होता है।

*क्रमशः* *........*
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