23/01/2026
स्त्री का त्याग...
वह चुपचाप अपने सपनों को
दुपट्टे की तहों में मोड़ देती है,
किसी के घर की नींव बनते-बनते
खुद की पहचान छोड़ देती है।
माँ बनकर नींद को कुरबान करती है,
पत्नी बनकर उम्मीदों का बोझ उठाती है,
बेटी बनकर समझौते सीखती है,
और हर रूप में खुद को पीछे रख जाती है।
वह रोती है तो भी आवाज़ नहीं करती,
टूटती है तो भी मुस्कुराती है,
उसका त्याग पूजा नहीं माँगता—
बस थोड़ा सम्मान चाहता है।
क्योंकि जो सबका सहारा बनती है,
वह भी किसी दिन
अपने लिए जीने का हक़ चाहती है।