01/05/2024
बहुत प्रयास किए थे कि लोग वैक्सीन लगवाने से बचें। लेकिन जन सामान्य को जितना भयभीत किया गया उसके कारण ज्यादातर लोग वैक्सीन की शरण जाने से स्वयं को रोक नहीं सके।
इस भय के आगे लोग इतने अंधे थे कि सीरम इन्टीट्यूट में प्रयोग के दौरान अपना जीवन खराब करवा चुके स्वयंसेवक की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया। इसके उलट उस बेचारे स्वयंसेवक पर ही सौ करोड़ का मानहानि का दावा कर दिया गया। और हर तरफ शांति छा गई।
फिर दौर चला इन जल्लादों और सत्ताधारियों की मिली जुली लूट और हत्या का। मात्र 52 करोड़ में देश के नागरिकों की जान का सौदा कर दिया गया। परिणाम यह रहा कि लोग अच्छे खासे चलते फिरते अचानक ही मौत का शिकार होने लगे।
यहाँ सवाल यह नहीं है कि और भला क्या करते, सवाल यह है कि और विद्याओं को आप छद्मविज्ञान कहकर नकारने का काम क्या केवल इसलिए ही कर रहे हो कि आपका अरबों खरबों का कारोबार फलता फूलता रहे? फिर जनहित की परवाह कौन करे?
यह स्थापित तथ्य है कि 1918 में स्पेनिश फ्लू के दौरान होम्योपैथी की शरण में आने वालों में से केवल 1 से 2 प्रतिशत मौतें ही हुई थी जबकि दुनिया की एक तिहाई आबादी साफ हो गई थी। फिर होम्योपैथी को वह स्थान नहीं मिल पा रहा क्योंकि इसमें अरबों का व्यापार डूबने का खतरा है जो इन पूंजीपतियों व सत्ताधारियों की नजर में आप सबकी जान से ज्यादा कीमती है।