27/11/2025
एक मुर्ख जाहिल IAS संतोष वर्मा भरे मंच से खड़ा होकर कहता है की आरक्षण खत्म तब होगा, ज़ब ब्राम्हण अपनी बेटियों को दलितों के यहां दान करेंगे. क्या किसी इतना पढ़े-लिखे ब्राम्हण ने कभी कोई ऐसी अपमानजनक बाते कही? कभी नही! समाज में यह आपको कभी देखने को नही मिलेगा. सत्ता के नशे में चूर मतांद आईएएस ज़ब अपनी सीमा लांघ जाए, ज़ब-ज़ब उसको लगे की वही सबके आका हो गए हैँ. तब-तब ऐसे लोगों को समाज से ऐसा करारा तमाचा मिलना चाहिए जिससे इनके घर की बहन-बेटीयों को इन्हे अपना कहने में संकोच हो.
विगत कुछ वर्षो में ब्राम्हणो के खिलाफ जो आवाजे उठ रही है, अब उसकी समझ आने लगी है की ऐसा क्यों है की हमेशा दलित विमर्श ब्राम्हणों से घृणा करते-करते द्वेष से भर जाता है और दिशाहीन विमर्श में तब्दील हो जाता है.
क्या किसी ias जैसे शख्स से ऐसी उम्मीद की जा सकती थी? क्या यह नीचता नही है? क्या यह लिंग भेद नही है? क्या यह महिलाओं का अपमान नही है? क्या यह दलित विमर्श का घृणित पितृसत्तात्मक स्वरूप नही है?
इस प्रकार के मूढ़ता व ऐसी जड़ता का अंत कब होगा- क्या महिलाएं दान देने वाली वस्तु मात्र है? इतनी घृणा कहाँ से लाते हैँ ये तथाकथित अम्बेडकरवादी. क्या यही अम्बेडकरवाद है? क्या बाबा साहब यही चाहते थे? कभी नही, उनकी आड़ लेकर अपनी राजनितिक रोटी सेंकने वाले इन गिद्धों से समाज में नफ़रत,द्वेष, वैमनश्यता का बीज अंकुरित हो रहा है. अपने आप को बौद्ध कहना किसी पाखंड व ढोंग के बराबर ही है, ज़ब आप ऐसा घृणित व्यक्तव्य देते हैँ। तो क्या यही आपको बौद्ध धर्म के केंद्रीय सिद्धांत की ओर ले जायेगा?
आजकल समाज में होड़ मची है की अम्बेडकरवादी कौन? लेफ्ट-लीबरल कौन? और आप इन दो कैटेगरी में तभी आएंगे ज़ब आप ब्राम्हणों को गाली देंगे. यह आपको समाज में आम्बेडकरवादी के रूप में स्थापित करता है और बहुत कम समय में आपको यह दलित विमर्श के ढोंग से भरे नायक की ख्याती दिलाती है. यही इन मुर्ख ढोंगियों की पहचान है.