11/02/2026
“डॉक्टर होना आसान नहीं है…”
डॉक्टर होना सिर्फ दवाइयाँ लिख देना नहीं है,
यह धैर्य, समझ और मुस्कान की परीक्षा है।
हर दिन ओपीडी में कोई न कोई मरीज ऐसे सवाल लेकर आ जाता है,
जिन्हें सुनकर मन तो करता है माथा पकड़ लें…
पर चेहरे पर मुस्कान बनाए रखना ही असली प्रोफेशनलिज़्म है।
कोई पूछता है –
“डॉक्टर साहब, दवाई खाली पेट लेनी है तो पानी भी खाली पेट ही पीना है क्या?”
कोई कहता है –
“शुगर है तो क्या मैं सिर्फ आधी मिठाई खा सकता हूँ?”
किसी को चिंता होती है –
“दवा खाकर चाय पी लें तो दवा नाराज़ तो नहीं हो जाएगी?”
और कोई बड़े मासूमियत से पूछ लेता है –
“डॉक्टर साहब, परहेज़ में आलू नहीं खाना है… तो समोसे का सिर्फ ऊपर वाला हिस्सा खा लें?”
इन सवालों पर हँसी भी आती है,
पर डॉक्टर जानता है –
मरीज की जिज्ञासा उसके डर से पैदा होती है।
हर अटपटा सवाल दरअसल एक चिंता है,
हर मासूम सवाल के पीछे स्वास्थ्य की फिक्र छिपी है।
इसलिए डॉक्टर बिना झुंझलाए,
बार-बार वही बातें समझाते हैं —
क्या खाना है, क्या नहीं, कितना खाना है, क्यों परहेज़ ज़रूरी है।
कभी-कभी दिन भर में सौ बार समझाना पड़ता है,
फिर भी आवाज़ में नरमी रखनी पड़ती है।
क्योंकि डॉक्टर होना सिर्फ इलाज करना नहीं,
बल्कि भरोसा देना भी है।
और सच यही है —
डॉक्टर होना आसान नहीं है,
पर मरीज की मुस्कान ही इसकी सबसे बड़ी कमाई है। 🩺✨
मेरे एक मरीज़ की यह बातचीत इसका एक उदाहरण है।