01/01/2026
अपामार्ग (Achyranthes aspera Linn)
अपामार्ग शिखरी ह्यध: शल्यो मयूरक:।
मर्कटी दुग्रहा चापि किणिहीखर मंजरी।।
अपामार्ग सरस्तीक्ष्णो दीपनस्तिक: कटु:।
पाचनो रोनश्छर्दिकफमेदोऽनिलापह:।।
(भा.प्र. २१९-२२०)
अपामार्ग को चिरचिरा, शिखरी, अध: शल्य, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमञ्जरी आदि नामों से जाता है। अपामार्ग तिक्त तथा कटु रसयुक्त सारक, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, पाचक, रोचक एवं वमन, कफ, मेद, वायु, हृद्रोग, आध्मान, अर्श, कण्डू, शूल, उदररोग और अपची को दूर करता है।
अपामार्ग (चिरचिरा) बहूपयोगी, भारत के सभी प्रान्तों के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्रों में स्वत: उत्पन्न होने वाला पौधा है। यह पौधा विशेष रूप से वर्षा ऋतु में पाया जाता है किन्तु कहीं-कहीं वर्षपर्यन्त भी मिलता है। वर्षा की पहली फुहार पड़ते ही यह अंकुरित होने लगता है। यह सर्दियों में फलता-फूलता है तथा गर्मियों में परिपक्व होकर फलों के साथ पौधा भी सूख जाता है। इसके पुष्प हरी, गुलाबी कलियों से युक्त तथा बीज चावल जैसे होते हैं। जिन्हें अपामार्ग तंडुल कहते हैं।
अपामार्ग को लैटिन भाषा में एकायरेन्थिस् एस्पेरा (Achyranthes aspera) कहते हैं। यह एमारेन्थेसी (Amaranthaceae) कुल का पौधा है।
संस्कृत भाषा में नाम- अपामार्ग को संस्कृत भाषा में शिखरी, अध:शूल, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमंजरी, प्रत्याकपुष्पी आदि नामों से जाना जाता है।
प्रादेशिक भाषा में नाम- अपामार्ग को विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में निम्नांकित नामों से जाना जाता है-
हिन्दी- चिरचिरा, अपामार्ग, लटजीरा
उर्दू- चिरचिटा
असमिया- अपंग
कन्नड़- उत्तरणी
कोकणी- कान्टमोग्रो
गुजराती- अघेड़ो
तमिल- नायुरुवि
तेलगू- अपामार्गमु
बंगला- अपांग, चिरचिटी
नेपाली- दतिवन
पंजाबी- कुत्री, पुठखण्डा
मराठी- अघाड़ा
मलयालम् - वनकटलटी, कटलटी
अंग्रेजी- Washerman's plant
अरबी- अत्कुमह
फारसी- खरेवाजहुन
गणवर्गीकरण-
स्वरूप- अपामार्ग का पौधा ३०-९० से.मी. ऊँचा, वर्षायु अथवा बहुवर्षायु प्राय: काष्ठीय आधार युक्त, शाकीय होता है। इसका काण्ड रक्ताभ, बैंगनी वर्ण का होता है। इसकी शाखायें मोटी, धारीदार तथा चतुष्कोणीय होती हैं। इसके पत्र विपरीत, २.५-१२.५ से.मी. लम्बे होते हैं। पत्रों के आकार अलग-अलग होते हैं। इसके फल कपड़ों में चिपक या हाथ में चुभ जाते हैं। इसके बीज रक्ताभ, भूरे रंग के, उपबेलनाकार, शीर्ष पर शुण्डित तथा आधार पर गोल होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से नवम्बर तक होता है।
रासायनिक संघटन- अपामार्ग की जड़ में ट्राईटर्पीनोयड, सैपोनिन, एकायरेन्थिन, बीटेन, हेन्ट्रीएकोन्टेन, ग्लाइकोसाईड तथा ओलिएनोलिक अम्ल पाया जाता है। इसके बीज के तैल में लिनोलिईक, ओलीक, पामिरिक, स्टेयरिक, बेहैनिक, एराकिडिक, मिरिस्टिक तथा लारिक अम्ल पाया जाता है। इसके पौधे में प्रचुर मात्रा में पोटाश पाया जाता है।
उत्पत्ति स्थान- अपामार्ग का पौधा पूरे भारत के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्र में स्वत: उत्पन्न होता है।
जाति भेद- जाति भेद से अपामार्ग श्वेत, रक्त अपामार्ग, गिरी अपामार्ग, रक्तपुष्पामार्ग, पक्ष पत्रापामार्ग प्रकार का पाया जाता है।
रस पंचक-
रस- तिक्त, कटु
गुण- लघु
वीर्य- शीत वीर्य
विपाक- कटु
प्रभाव- रेचक, दीपन
प्रयोज्यांग- पत्र, मूल तथा पंचांग
मात्रा- स्वरस १०-२० मि.ली.
मूल चूर्ण- ३-६ ग्राम, क्षार १/२-२ ग्राम।
दोषघ्नता- कफवात शामक, कफपित्त संशोधक।
कर्मघ्नता- शोथहर, वेदना स्थापक, लेखन, विषघ्न, त्वकदोषहर, व्रणशोधक, शिरोविरेचक, रेचन, दीपन, पाचन, पित्तसारक, कृमिघ्न, रक्तशोधक, रक्तवर्धक, शोथहर, मूत्रल, अश्मरीहर, स्वेदजनन, कुष्ठघ्न।
रोगघ्नता- अश्मरी, शर्करा, वातविकार, मूत्रकृच्छ्र, कृमिकुष्ठ, यकृत प्लीहा, विसूचिका, भस्मक, अर्श, वृक्कशूल, योनिशूल।
रोगानुसार प्रयोग
माइग्रेन में- अपामार्ग के बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से आधा सीसी दर्द में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अन्दर जमा हुआ कफ पतला होकर नाक के जरिये निकल जाता है।
नेत्र विकार में- २ ग्राम अपामार्ग चूर्ण में २ चम्मच शहद मिलाकर २-२ बूँद आँख में डालने से नेत्र विकारों में लाभ होता है।
नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, नेत्रकण्डू, नेत्रस्राव, नेत्रों की लालिमा, फूली, रतौंधी आदि विकारों में अपामार्ग की स्वच्छ मूल को साफ तांबे के बर्तन में थोड़ा सा सेंधा नमक मिले हुये दही के पानी के साथ घिसकर अंजन के रूप में लगाने से लाभ होता है।
बहरेपन में- अपामार्ग की साफ, धोई हुई जड़ का रस निकालकर उसमें बराबर मात्रा में तिल का तैल मिलाकर आग में पका लें। जब केवल तैल शेष रहे तब उतार लें, छानकर शीशी में रख लें। इस तैल को गर्म करके हर रोज २-३ बूँद कान में डालने से कान का बहरापन व कर्णपूय दूर हो जाता है।
¬ अपामार्ग क्षार का घोल तथा अपामार्ग पत्र कल्क में चार गुना तैल मिलाकर तैल पाक कर प्राप्त तैल से कर्णपूरण करने से कर्णनाद एवं बहरापन दूर होता है।
दाँत के दर्द में- अपामार्ग के २-३ पत्तों के स्वरस को रूई के फाहे में डालकर दाँत में लगाने से दाँत का दर्द दूर हो जाता है। अपामार्ग की ताजी जड़ से प्रतिदिन दातून करने से दाँत मोती की तरह चमकने लगते हैं। दन्तशूल, दाँतों का हिलना, मसूढ़ों की कमजोरी तथा मुँह की दुर्गन्ध भी दूर हो जाती है।
श्वास-कास में- अपामार्ग की जड़ में बलगम युक्त खाँसी और दमे को नष्ट करने का चमत्कारिक गुण होता है। इसके ८-१० सूखे पत्ते को हुक्के में रखकर पीने से श्वास रोग में आराम मिलता है।
¬ लगभग १०-२५ मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार में शहद मिलाकर प्रात:-सायं चटाने से बच्चों की श्वास नली तथा वक्ष:स्थल में संचित कफ दूर होकर बाल कास दूर होता है।
¬ खाँसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लसलसा हो गया हो या न्यूमोनिया हो तो १२५-२५० मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार व सममात्रा में चीनी मिलाकर ३० मि.ली. गर्म जल से सुबह-शाम सेवन करने से ७ दिन में लाभ होता है।
६ मि.ली. अपामार्ग की जड़ का चूर्ण व ७ नग कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम ताजे जल से सेवन करने पर खाँसी दूर हो जाती है।
¬ अपामार्ग के पंचांग की भस्म बनाकर ५०० मि.ग्रा. भस्म में शहद मिलाकर चाटने से कुक्कुर खाँसी में राहत मिलती है।
विसूचिका में- २-३ ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को दिन में २-३ बार शीतल जल के साथ सेवन करने से विसूचिका तुरन्त नष्ट हो जाती है। अपामार्ग के ४-५ पत्तों का रस निकालकर थोड़ा सा मिश्री मिलाकर सेवन करने से भी विसूचिका में लाभ मिलता है।
उदर विकार में- २० ग्राम अपामार्ग पंचांग को लेकर ४०० मि.ली. पानी में पकाने और काली मिर्च मिलाकर दिन में ३ बार सेवन करने से उदरशूल मिट जाता है।
भस्मक रोगों में- भस्मक रोग में अपामार्ग का चूर्ण ३ ग्राम दिन में दो बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करने से निश्चित् रूप से लाभ होता है। अपामार्ग के ५-१० ग्राम बीजों को पीसकर खीर बनाकर खाने से भस्मक रोग मिट जाता है। यह प्रयोग अधिकतम ३ बार करने से ही रोग ठीक होता है। इसके ५-१० ग्राम बीजों का सेवन करने से भी भस्मक रोग में आराम मिलता है और अर्श में लाभ होता है।
अर्श में- अपामार्ग की ६ पत्तियाँ तथा ५ नग कालीमिर्च को पानी के साथ पीसकर छानकर प्रात: सायं सेवन करने से अर्श में लाभ होता है और उससे निकलने वाला रक्तार्श बन्द हो जाता है। १०-२० ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीस-छानकर दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से पित्तज या कफज रक्तार्श में लाभ होता है।
यकृत प्लीहा में- ५०-६० मि.ली. अपामार्ग पंचांग क्वाथ को भोजन से पूर्व सेवन करने से पाचक रस में वृद्धि होकर शूल कम होता है। भोजन के २-३ घण्टे पश्चात् अपामार्ग पंचांग पीने से अम्लता कम होती है तथा स्राव उचित मात्रा में होता है जिससे पित्ताश्मरी का शमन हो जाता है।
वृक्कशूल में- अपामार्ग की ५-१० ग्राम जड़ को पानी में पीसकर, घोलकर पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह औषधि बस्ति की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्कशूल के लिए यह प्रधान औषधि है।
योनिशूल में- अपामार्ग की जड़ को पीसकर, रस निकालकर रुई को भिगोकर योनि में रखने से योनिशूल और मासिक धर्म की रुकावट मिट जाती है।
गर्भधारण में- अनियमित मासिक धर्म या अधिक रक्तस्राव के कारण जो स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर पातीं, उन्हें ऋतु स्नान के दिन उत्तम भूमि में उत्पन्न इस दिव्य औषधि के १० पत्ते या इसकी १० ग्राम जड़ को गाय के १२५ मि.ली. दूध के साथ पीसकर, छानकर ४ दिन तक दिन में ३ बार पिलाने से स्त्री गर्भ धारण कर लेती है। यह प्रयोग यदि एक बार में सफल न हो तो अधिक से अधिक तीन बार करें।
रक्तप्रदर में- अपामार्ग के लगभग १० ग्राम ताजे पत्ते एवं ५ ग्राम हरी दूब, दोनों को पीसकर, ६० मि.ली. जल में मिलाकर छान लें तथा गाय के दूध में २० मि.ली. या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर प्रात:काल ७ दिन तक पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित करें। इससे रक्त प्रदर निश्चित् रूप से ठीक हो जाता है। यदि गर्भाशय में गाँठ के कारण रक्तस्राव होता है तो इस प्रयोग से गाँठ भी घुल जाती है।