Ayush Gram Chikitsalay - Chitrakoot Dham

Ayush Gram Chikitsalay - Chitrakoot Dham आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूटधाम

02/01/2026

इंसुलिन छूटती हैं ऐसे!

02/01/2026

संकल्प स्वस्थ जीवन के लिए।

सोरायसिस अभिशाप नहीं यह आयुष चिकित्सा से ठीक होता है!! लगभग ८ माह पहले की बात है, आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालय, चित्रक...
02/01/2026

सोरायसिस अभिशाप नहीं यह आयुष चिकित्सा से ठीक होता है!!

लगभग ८ माह पहले की बात है, आयुष ग्राम (ट्रस्ट) चिकित्सालय, चित्रकूट की ओपीडी का दिन था, रोगियों की भीड़ भी। डॉक्टर, नर्स, कम्पाउण्डर सभी सेवा में व्यस्त थे। तभी यकायक एक तेज झोंका आया और सभी जगह दुर्गन्ध पैâल गयी। हमारी ओपीडी में दरवाजे जैसे ही खुले वैसी ही बदबू वहाँ भी आ गयी। मैं जब तक समझता कि यह दुर्गन्ध कहाँ की आयी वैसे ही एक नर्स ने आकर बताया कि सर! सोरायसिस से भयंकर ग्रस्त जिसके शरीर से विचित्र बदबू आ रही है, लाया गया है। रोगी बहुत जीर्ण है, उसके साथ वाले उसे इमरजेन्सी में देखने का निवेदन कर रहे हैं। इमरजेन्सी होने के कारण हमने तत्काल उसे लाने की अनुमति दी, अन्यथा सभी रोगी क्रम से ही देखे जाते हैं। विश्वास करें कि सोरायसिस ने उस व्यक्ति को इतना विकृत कर दिया था कि मैं स्वयं विचलित हो गया, पर साहस और सावधानी जैसे चिकित्सक गुणों से मैंने परीक्षण किया। रोगी ने बताया कि वह मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के औता प्राथमिक पाठशाला में ‘शिक्षक’ हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनको शुगर की भी बीमारी है और सोरायसिस भी। अंग्रेजी डॉक्टरों से चिकित्सा कराता रहा और शरीर की यह दुर्गति होती गयी। अब मौत के दिन गिन रहा हूँ। नौकरी से छुट्टी लिये हूँ।

हमने रोगी और उसके परिजनों को समझाया कि आप परेशान न हों, यह ठीक भी हो जायेंगे और नौकरी भी करेंगे। पर संभव है कि चिकित्सा २४ से ३० माह तक भी करनी पड़ सकती है, उसने कहा सर! अंग्रेजी डॉक्टरों से तो ५ साल इलाज कराता गया, शुगर अलग से हो गयी। शरीर बेजान हो गया है, मैं २४ से ३० माह क्या ४ साल भी यहाँ से इलाज लूँगा। हमने समझाया कि इसे आयुर्वेद में ‘एककुष्ठ’ कहते हैं।
अस्वेदनं महावस्तु यन्मत्स्यशकलोपम्। तदेक कुष्ठम्।।
च.चि. ७/२१

उसके परिजनों को यह भी बताया कि यह रोग किसी कीटाणु जीवाणु से नहीं होता बल्कि शरीर का वात त्वचाश्रित हो जाता है फिर कुपित (Aggrivate or Hyper) हो जाता है। परिणामत: त्वचि स्फुटनरुक्षते।। अ.सं.नि. १५/१२ त्वचा फटती है, छिलके निकलते हैं और रूखापन होता है। इसे कुष्ठ इसलिए कहा गया है कि ‘कुष्णाति अंगं बपु: य:’ यह अंगों को कुरूप कर देता है इसीलिए इसे कुष्ठ रोग कहते हैं।

दरअसल ‘सोरायसिस’ को अंग्रेजी डॉक्टर कभी न ठीक होने वाली बीमारी बताते हैं, तो कुछ डॉक्टर केनाकार्ट, स्टेरॉयड आदि देते रहते हैं जिससे रोग केवल दब जाता है फिर भयंकर रूप से उभरता है और जटिल हो जाता है। हमने समझाया कि गलत खान-पान और रहन-सहन (गलत जीवनशैली) के कारण से ‘वात’ दोष कुपित (Aggrivate) होता है यह रसधातु, रक्तधातु और मांसधातु को दूषित करता है, चूँकि उपधातु ‘त्वचा’ मांसधातु से सम्बन्ध रखती है। (च.चि. १५/१९-२०) और ज्यों-ज्यों मांस धातु दूषित होती है तो त्वचा भी विकारग्रस्त होने लगती है उसमें रक्तवह और मांसवह स्रोतस् अतिप्रवृत्ति दोष से ग्रसित हो जाते हैं और त्वचा का निर्माण तथा क्षरण बड़ी तेजी से होने लगता है। बस! यही सोरायसिस है, इसे अंग्रेजी डॉक्टर ‘आटो इम्युन डिजीज’ (ओआईडी) कहते हैं। चूँकि इन्हें मधुमेह भी है अत: इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और कमजोर हो गयी, परिणामत: रोग और बिगड़ गया। हमने सांत्वना दी कि परेशान न हों, निश्चित लाभ मिलेगा।

दरअसल यहाँ पर लगातार कई वर्षों से सोरायसिस रोगियों की चिकित्सा की जा रही है और कई हजार सोरायसिस रोगियों की चिकित्सा की जा चुकी है। रोग, रोगी के अनुसार सभी में सकारात्मक परिणाम आते हैं। पश्चात् हमने निम्नांकित चिकित्सा व्यवस्था विहित किया-

सोरायसिस क्योर योग- ताल सिन्दूर ५ ग्राम, वृ.वातचिन्तामणि रस ३ ग्राम, वसंत कुसुमाकर रस ३ ग्राम, प्रबालपंचामृत मु.यु. ८ ग्राम, माणिक्य पिष्टी ५ ग्राम, हरिद्राघनसत्व और निम्बघन १५ ग्राम और असरोल चूर्ण ३० ग्राम। सभी को घोंटकर ६० मात्रा पानी से।

- कैशोर गुग्गुल, वातारि गुग्गुल, पंचतिक्त घृत गुग्गुल, निर्गुण्डी पराश्रयीकन्द, गिलोय घन और चोपचीनी सभी २०-२० ग्राम मिलाकर ६० मात्रा। १-१ मात्रा दोपहर व रात भोजन के ३० मिनट पूर्व गरम जल से।

गुग्गुलतिक्तक घृतम्- १०-१० ग्राम सुबह ५ बजे और शाम को ५ बजे पिघलाकर गरम जल से।
ल् सोरिया ऑयल दिन में २ बार मालिश करना है पश्चात् स्नान करना है।

सोते समय धेनुहरीतकी २ गोली गरम पानी से।

पथ्यपालन में- भैषज्य रत्नावलीकार के वचनों को ध्यान रखा गया कि दूध और दूध से बने पदार्थ तथा गन्ना और गन्ने से बने पदार्थ पूरी तरह से वर्जित किया गया।

दूषित कार्यों/कर्मों में लिप्त रहना, किये हुये उपकारों को न मानना, गुरु और गुरुतुल्य लोगों की निन्दा करना, उन्हें तकलीफ पहुँचाना, इन कार्यों से दूषित हार्मोन्स (रस) मस्तिष्क में स्रवित होते हैं फिर वे शरीर में शोषित होकर शरीर में विषाक्तता उत्पन्न करते हैं जिससे सामान्य या कठिन चर्म विकार होते हैं। ऐसे ही गलत तरीके से भोजन, गलत तरीके से पेय पदार्थ लेने, दिन में सोना, प्रचण्ड सूर्यताप में रहना, मिथ्याहार, स्वेदकर्म, मैथुन कर्म में गलत विधि अपनाना, मल, मूत्र के वेगों को रोकना, गन्ना से बने पदार्थों का सेवन, अति शारीरिक पिरश्रम, खट्टे पदार्थ, तिल, उड़द, द्रवान्न (खिचड़ी आदि), भारी अन्न, दाह पैदा करने वाले पदार्थ, कब्ज करने वाले पदार्थ, मूली, सलाद, दूषित जल, मांसाहार, अण्डा, दही, दूध, गुड़, मद्य आदि पदार्थों को इस रोगी को सेवन नहीं करना चाहिए।

आयुर्वेद विज्ञान में बताये ये परहेज पूरी तरह से वैज्ञानिक हैं। अभी १६ जनवरी २०१८ को अमेरिका के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्त्ताओं ने सचेत किया कि स्तन वैंâसर के रोगियों को ब्रेड और सोयाबीन का सेवन नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि इनमें जीनोस्ट्रोजीन्स पाया जाता है, ये रोग को बढ़ाते हैं तथा दवाओं के प्रभाव को कम करते हैं।

चूँकि इस सोरायसिस के रोगी को मधुमेह भी था इसलिए मीठी चीजें स्वत: नहीं लेता था। इसलिए उस सोरायसिस ग्रस्त शिक्षक की चिकित्सा करना और सहज हो गया। अन्यथा रोगी को यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि मीठा न खाओ क्योंकि इस रोग को मधुर रस भी बढ़ाता है, वह इसलिये कि मधुर रस के अति सेवन से रसधातु की विकृति हो जाती है और उधर मांसधातु ‘कफ’ दोष से सम्बन्ध रखती है, तो उधर रसधातु भी कफदोष से सम्बन्ध रखती है जो कि पृथ्वी महाभूत और जल महाभूत से निर्मित है। मधुर रस, रसधातुु, कफदोष ये तीनों पृथ्वी महाभूत को बढ़ाते हैं। इसलिए सोरायसिस बढ़ता है।

एक माह बाद जब यह शिक्षक पुन: दिखाने आया तो अपने से चलकर आया और बहुत खुश था, बार-बार यही कहता था कि चित्रकूट आकर मैं ‘आयुष ग्राम चिकित्सालय’ में जीवनदान पा गया, नहीं तो लगता था कि अब जियेंगे ही नहीं। आज चिकित्सा करते हुये ६ माह हो गये रोगी इतना खुश है जो कि वर्णनातीत है। अभी पिछले बुधवार को शहडोल से वे शिक्षक पुन: दिखाने आये और २ माह की औषधियाँ लेकर चले गये।
जरा सोचें कि देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारे भारत की चिकित्सा आयुष इसी देश में विद्यमान है जबकि ज्ञान और जागरूकता के अभाव में मानव कष्ट उठा रहा है, यत्र-तत्र भटक रहा है।

(साभार - चिकित्सा पल्लव : जून 2020)

अपामार्ग (Achyranthes aspera Linn)अपामार्ग शिखरी ह्यध: शल्यो मयूरक:। मर्कटी दुग्रहा चापि किणिहीखर मंजरी।। अपामार्ग सरस्त...
01/01/2026

अपामार्ग (Achyranthes aspera Linn)

अपामार्ग शिखरी ह्यध: शल्यो मयूरक:।
मर्कटी दुग्रहा चापि किणिहीखर मंजरी।।
अपामार्ग सरस्तीक्ष्णो दीपनस्तिक: कटु:।
पाचनो रोनश्छर्दिकफमेदोऽनिलापह:।।
(भा.प्र. २१९-२२०)

अपामार्ग को चिरचिरा, शिखरी, अध: शल्य, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमञ्जरी आदि नामों से जाता है। अपामार्ग तिक्त तथा कटु रसयुक्त सारक, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, पाचक, रोचक एवं वमन, कफ, मेद, वायु, हृद्रोग, आध्मान, अर्श, कण्डू, शूल, उदररोग और अपची को दूर करता है।
अपामार्ग (चिरचिरा) बहूपयोगी, भारत के सभी प्रान्तों के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्रों में स्वत: उत्पन्न होने वाला पौधा है। यह पौधा विशेष रूप से वर्षा ऋतु में पाया जाता है किन्तु कहीं-कहीं वर्षपर्यन्त भी मिलता है। वर्षा की पहली फुहार पड़ते ही यह अंकुरित होने लगता है। यह सर्दियों में फलता-फूलता है तथा गर्मियों में परिपक्व होकर फलों के साथ पौधा भी सूख जाता है। इसके पुष्प हरी, गुलाबी कलियों से युक्त तथा बीज चावल जैसे होते हैं। जिन्हें अपामार्ग तंडुल कहते हैं।

अपामार्ग को लैटिन भाषा में एकायरेन्थिस् एस्पेरा (Achyranthes aspera) कहते हैं। यह एमारेन्थेसी (Amaranthaceae) कुल का पौधा है।

संस्कृत भाषा में नाम- अपामार्ग को संस्कृत भाषा में शिखरी, अध:शूल, मयूरक, मर्कटी, दुर्ग्रहा, किणिही, खरमंजरी, प्रत्याकपुष्पी आदि नामों से जाना जाता है।
प्रादेशिक भाषा में नाम- अपामार्ग को विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में निम्नांकित नामों से जाना जाता है-
हिन्दी- चिरचिरा, अपामार्ग, लटजीरा
उर्दू- चिरचिटा
असमिया- अपंग
कन्नड़- उत्तरणी
कोकणी- कान्टमोग्रो
गुजराती- अघेड़ो
तमिल- नायुरुवि
तेलगू- अपामार्गमु
बंगला- अपांग, चिरचिटी
नेपाली- दतिवन
पंजाबी- कुत्री, पुठखण्डा
मराठी- अघाड़ा
मलयालम् - वनकटलटी, कटलटी
अंग्रेजी- Washerman's plant
अरबी- अत्कुमह
फारसी- खरेवाजहुन
गणवर्गीकरण-

स्वरूप- अपामार्ग का पौधा ३०-९० से.मी. ऊँचा, वर्षायु अथवा बहुवर्षायु प्राय: काष्ठीय आधार युक्त, शाकीय होता है। इसका काण्ड रक्ताभ, बैंगनी वर्ण का होता है। इसकी शाखायें मोटी, धारीदार तथा चतुष्कोणीय होती हैं। इसके पत्र विपरीत, २.५-१२.५ से.मी. लम्बे होते हैं। पत्रों के आकार अलग-अलग होते हैं। इसके फल कपड़ों में चिपक या हाथ में चुभ जाते हैं। इसके बीज रक्ताभ, भूरे रंग के, उपबेलनाकार, शीर्ष पर शुण्डित तथा आधार पर गोल होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से नवम्बर तक होता है।

रासायनिक संघटन- अपामार्ग की जड़ में ट्राईटर्पीनोयड, सैपोनिन, एकायरेन्थिन, बीटेन, हेन्ट्रीएकोन्टेन, ग्लाइकोसाईड तथा ओलिएनोलिक अम्ल पाया जाता है। इसके बीज के तैल में लिनोलिईक, ओलीक, पामिरिक, स्टेयरिक, बेहैनिक, एराकिडिक, मिरिस्टिक तथा लारिक अम्ल पाया जाता है। इसके पौधे में प्रचुर मात्रा में पोटाश पाया जाता है।
उत्पत्ति स्थान- अपामार्ग का पौधा पूरे भारत के वन्य एवं ग्राम्य क्षेत्र में स्वत: उत्पन्न होता है।

जाति भेद- जाति भेद से अपामार्ग श्वेत, रक्त अपामार्ग, गिरी अपामार्ग, रक्तपुष्पामार्ग, पक्ष पत्रापामार्ग प्रकार का पाया जाता है।
रस पंचक-
रस- तिक्त, कटु
गुण- लघु
वीर्य- शीत वीर्य
विपाक- कटु
प्रभाव- रेचक, दीपन
प्रयोज्यांग- पत्र, मूल तथा पंचांग
मात्रा- स्वरस १०-२० मि.ली.
मूल चूर्ण- ३-६ ग्राम, क्षार १/२-२ ग्राम।
दोषघ्नता- कफवात शामक, कफपित्त संशोधक।
कर्मघ्नता- शोथहर, वेदना स्थापक, लेखन, विषघ्न, त्वकदोषहर, व्रणशोधक, शिरोविरेचक, रेचन, दीपन, पाचन, पित्तसारक, कृमिघ्न, रक्तशोधक, रक्तवर्धक, शोथहर, मूत्रल, अश्मरीहर, स्वेदजनन, कुष्ठघ्न।
रोगघ्नता- अश्मरी, शर्करा, वातविकार, मूत्रकृच्छ्र, कृमिकुष्ठ, यकृत प्लीहा, विसूचिका, भस्मक, अर्श, वृक्कशूल, योनिशूल।

रोगानुसार प्रयोग
माइग्रेन में- अपामार्ग के बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से आधा सीसी दर्द में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अन्दर जमा हुआ कफ पतला होकर नाक के जरिये निकल जाता है।

नेत्र विकार में- २ ग्राम अपामार्ग चूर्ण में २ चम्मच शहद मिलाकर २-२ बूँद आँख में डालने से नेत्र विकारों में लाभ होता है।

नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, नेत्रकण्डू, नेत्रस्राव, नेत्रों की लालिमा, फूली, रतौंधी आदि विकारों में अपामार्ग की स्वच्छ मूल को साफ तांबे के बर्तन में थोड़ा सा सेंधा नमक मिले हुये दही के पानी के साथ घिसकर अंजन के रूप में लगाने से लाभ होता है।

बहरेपन में- अपामार्ग की साफ, धोई हुई जड़ का रस निकालकर उसमें बराबर मात्रा में तिल का तैल मिलाकर आग में पका लें। जब केवल तैल शेष रहे तब उतार लें, छानकर शीशी में रख लें। इस तैल को गर्म करके हर रोज २-३ बूँद कान में डालने से कान का बहरापन व कर्णपूय दूर हो जाता है।

¬ अपामार्ग क्षार का घोल तथा अपामार्ग पत्र कल्क में चार गुना तैल मिलाकर तैल पाक कर प्राप्त तैल से कर्णपूरण करने से कर्णनाद एवं बहरापन दूर होता है।
दाँत के दर्द में- अपामार्ग के २-३ पत्तों के स्वरस को रूई के फाहे में डालकर दाँत में लगाने से दाँत का दर्द दूर हो जाता है। अपामार्ग की ताजी जड़ से प्रतिदिन दातून करने से दाँत मोती की तरह चमकने लगते हैं। दन्तशूल, दाँतों का हिलना, मसूढ़ों की कमजोरी तथा मुँह की दुर्गन्ध भी दूर हो जाती है।
श्वास-कास में- अपामार्ग की जड़ में बलगम युक्त खाँसी और दमे को नष्ट करने का चमत्कारिक गुण होता है। इसके ८-१० सूखे पत्ते को हुक्के में रखकर पीने से श्वास रोग में आराम मिलता है।

¬ लगभग १०-२५ मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार में शहद मिलाकर प्रात:-सायं चटाने से बच्चों की श्वास नली तथा वक्ष:स्थल में संचित कफ दूर होकर बाल कास दूर होता है।

¬ खाँसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लसलसा हो गया हो या न्यूमोनिया हो तो १२५-२५० मि.ग्रा. अपामार्ग क्षार व सममात्रा में चीनी मिलाकर ३० मि.ली. गर्म जल से सुबह-शाम सेवन करने से ७ दिन में लाभ होता है।
६ मि.ली. अपामार्ग की जड़ का चूर्ण व ७ नग कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम ताजे जल से सेवन करने पर खाँसी दूर हो जाती है।

¬ अपामार्ग के पंचांग की भस्म बनाकर ५०० मि.ग्रा. भस्म में शहद मिलाकर चाटने से कुक्कुर खाँसी में राहत मिलती है।
विसूचिका में- २-३ ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को दिन में २-३ बार शीतल जल के साथ सेवन करने से विसूचिका तुरन्त नष्ट हो जाती है। अपामार्ग के ४-५ पत्तों का रस निकालकर थोड़ा सा मिश्री मिलाकर सेवन करने से भी विसूचिका में लाभ मिलता है।

उदर विकार में- २० ग्राम अपामार्ग पंचांग को लेकर ४०० मि.ली. पानी में पकाने और काली मिर्च मिलाकर दिन में ३ बार सेवन करने से उदरशूल मिट जाता है।

भस्मक रोगों में- भस्मक रोग में अपामार्ग का चूर्ण ३ ग्राम दिन में दो बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करने से निश्चित् रूप से लाभ होता है। अपामार्ग के ५-१० ग्राम बीजों को पीसकर खीर बनाकर खाने से भस्मक रोग मिट जाता है। यह प्रयोग अधिकतम ३ बार करने से ही रोग ठीक होता है। इसके ५-१० ग्राम बीजों का सेवन करने से भी भस्मक रोग में आराम मिलता है और अर्श में लाभ होता है।

अर्श में- अपामार्ग की ६ पत्तियाँ तथा ५ नग कालीमिर्च को पानी के साथ पीसकर छानकर प्रात: सायं सेवन करने से अर्श में लाभ होता है और उससे निकलने वाला रक्तार्श बन्द हो जाता है। १०-२० ग्राम अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीस-छानकर दो चम्मच शहद मिलाकर पीने से पित्तज या कफज रक्तार्श में लाभ होता है।

यकृत प्लीहा में- ५०-६० मि.ली. अपामार्ग पंचांग क्वाथ को भोजन से पूर्व सेवन करने से पाचक रस में वृद्धि होकर शूल कम होता है। भोजन के २-३ घण्टे पश्चात् अपामार्ग पंचांग पीने से अम्लता कम होती है तथा स्राव उचित मात्रा में होता है जिससे पित्ताश्मरी का शमन हो जाता है।

वृक्कशूल में- अपामार्ग की ५-१० ग्राम जड़ को पानी में पीसकर, घोलकर पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह औषधि बस्ति की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्कशूल के लिए यह प्रधान औषधि है।

योनिशूल में- अपामार्ग की जड़ को पीसकर, रस निकालकर रुई को भिगोकर योनि में रखने से योनिशूल और मासिक धर्म की रुकावट मिट जाती है।

गर्भधारण में- अनियमित मासिक धर्म या अधिक रक्तस्राव के कारण जो स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर पातीं, उन्हें ऋतु स्नान के दिन उत्तम भूमि में उत्पन्न इस दिव्य औषधि के १० पत्ते या इसकी १० ग्राम जड़ को गाय के १२५ मि.ली. दूध के साथ पीसकर, छानकर ४ दिन तक दिन में ३ बार पिलाने से स्त्री गर्भ धारण कर लेती है। यह प्रयोग यदि एक बार में सफल न हो तो अधिक से अधिक तीन बार करें।

रक्तप्रदर में- अपामार्ग के लगभग १० ग्राम ताजे पत्ते एवं ५ ग्राम हरी दूब, दोनों को पीसकर, ६० मि.ली. जल में मिलाकर छान लें तथा गाय के दूध में २० मि.ली. या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर प्रात:काल ७ दिन तक पिलाने से अत्यन्त लाभ होता है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित करें। इससे रक्त प्रदर निश्चित् रूप से ठीक हो जाता है। यदि गर्भाशय में गाँठ के कारण रक्तस्राव होता है तो इस प्रयोग से गाँठ भी घुल जाती है।

01/01/2026

देवव्यापाश्रय चिकित्सा।

01/01/2026

आयुष चर्चा।

31/12/2025

अंग्रेजी दवाओं का दुष्परिणाम किडनी फेल्योर।

31/12/2025

द्वितीय प्राण-प्रतिष्ठा वार्षिक महोत्सव के पावन अवसर पर पूज्य गुरुदेव आचार्य डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी जी का प्रेरणादायी ।

31/12/2025
31/12/2025

आयुष ग्राम (न्यास) परिसर स्थित
आयुष बिहारी प्रभु श्री राम मंदिर में
द्वितीय प्राण-प्रतिष्ठा वार्षिक महोत्सव
श्रद्धा, भक्ति एवं वैदिक विधि-विधान के साथ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

॥ श्री धन्वंतरये नमः ॥आयुष ग्राम (न्यास) परिसर में स्थित आयुष बिहारी प्रभु श्री राम मंदिर में द्वितीय प्राण-प्रतिष्ठा वा...
31/12/2025

॥ श्री धन्वंतरये नमः ॥

आयुष ग्राम (न्यास) परिसर में स्थित आयुष बिहारी प्रभु श्री राम मंदिर में द्वितीय प्राण-प्रतिष्ठा वार्षिक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं वैदिक विधि-विधान के साथ सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जिस शुभ मुहूर्त में अयोध्या धाम में प्रभु श्री राम की प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई थी, उसी पावन क्षण में आयुष ग्राम में भी आयुष बिहारी प्रभु श्री राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई थी। उसी दिव्य स्मृति के उपलक्ष्य में आयोजित यह दूसरा प्राण-प्रतिष्ठा वार्षिक महोत्सव आस्था, साधना एवं संस्कार का जीवंत प्रतीक बना।

महोत्सव के अंतर्गत गणेश मंत्र जप, तारक महामंत्र जप, द्वादशाक्षर मंत्र जप, विजय महामंत्र जप, हनुमान चालीसा, अखंड रामधुन एवं समस्त प्रतिष्ठित मूर्तियों का विधिवत अभिषेक सम्पन्न हुआ, तत्पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया।

इस दिव्य अनुष्ठान में वर्तमान यजमानों के रूप में पूज्य आचार्य डॉ. मदन गोपाल वाजपेयी जी (राष्ट्रीय आयु०वि० गुरु, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार), डॉ. अवध बिहारी द्विवेदी जी, श्री राजनारायण द्विवेदी जी, श्री राकेश कुमार द्विवेदी जी एवं श्री राजू भइया द्वारा श्रद्धापूर्वक पूजन एवं अभिषेक सम्पन्न किया गया।

इस पावन अवसर पर आयुष ग्राम चिकित्सालय एवं आयुष ग्राम गुरुकुलम का समस्त स्टाफ तथा श्रद्धालुगण उपस्थित रहे और पूज्य प्रभु श्री राम से आशीर्वाद प्राप्त किया।

आयुर्वेदीय वनस्पति से निर्मित एक चमत्कारी कल्प चतु:षष्टि प्रहरी पिप्पला पिप्पली जिसे लैटिन भाषा में पाइपर लौंगन (Pipur L...
31/12/2025

आयुर्वेदीय वनस्पति से निर्मित एक चमत्कारी कल्प चतु:षष्टि प्रहरी पिप्पला

पिप्पली जिसे लैटिन भाषा में पाइपर लौंगन (Pipur Longum Linn) कहा जाता है, यह पिप्पली (Piperaceai-पाइपरेसी) कुल का पादप है। इसकी लता गन्धयुक्त होती है जो भूमि पर फैलती है या दूसरे वृक्षों के सहारे ऊपर उठ जाती है।
आयुर्वेद ग्रन्थों में तो- १. पिप्पली २. गजपिप्पली ३. सैंहली ४. वनपिप्पली भेद से ४ प्रकार की पिप्पली वर्णित है पर व्यवहार में दो ही प्रकार की पिप्पली- बड़ी एवं छोटी ही प्रयोग की जाती है।

बड़ी पिप्पली आजकल मलेशिया, इण्डोनेशिया और सिंगापुर से आयातित होती है और छोटी पिप्पली ‘वन पिप्पली’ है इस देश में अधिक प्राप्त होती है। यह भारत के उष्ण प्रदेशों में तथा मलेशिया, इण्डोनेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका तथा निकोबार द्वीप में उत्पन्न होती है। व्यापारिक प्रयोग के लिए इसकी खेती भी की जाती है। इसका गीला फल गुरु, मधुर रस और शीतवीर्य होता है इसीलिए भाव प्रकाश में इसे पित्त प्रशमनी कहा गया है यही फल जब सूख जाता है तो ‘शुष्क तु प्रकोपिनी’ के अनुसार पित्त प्रकुपित करने वाला हो जाता है।

पिप्पली के गुण- पिप्पली लघु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, रस-कटु विपाक-मधुर, वीर्य-अनुष्णशीत है। यद्यपि पिप्पली का प्रयोग अनेकों आयुर्वेदिक औषधि निर्माण में होता है पर इससे एक ऐसे विशिष्ट योग का निर्माण भी होता है जो वास्तव में अनेक रोगों में त्वरित और चामत्कारिक परिणाम देता है उसका नाम है- ‘चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली।’

यह इतना शक्तिशाली कल्प है कि क्षयरोग तक के कीटाणुओं का नाश कर देता है। यह एक श्रेष्ठ ‘एण्टीबायोटिक’ (जन्तुघ्न) गुण सम्पन्न है और वात कफ जनित विकारों में उत्तम लाभ देता है अत: प्रसूत ज्वर, शीत ज्वर, कफ ज्वर, जीर्ण शूल (Pain) के साथ कोरोना से बचाव में भी श्रेष्ठ लाभ पहुँचाता है। यह हृदय की शिथिलता में त्वरित लाभ पहुँचाता है।
निर्माण विधि-बड़ी पिप्पली का फाण्ट १०० मि.ली. लेकर छोटी पिप्पली के कपड़छन चूर्ण में मिलाकर ६४ बार (लगातार ८ दिन) तक घुटाई कर छाया में सुखाकर अच्छी तरह चूर्ण कर सुरक्षित रख लें।

मात्रा एवं अनुपान- २५० से ५०० मि.ग्रा. तक दिन में २ बार शहद से या रोगानुसार उचित अनुपान के साथ सेवनीय है।

कुछ रोगों में अनुभूत प्रयोग

१. मूत्रकृच्छ्र- पेशाब में अचानक कड़क या जलन होने पर चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली ५०० मि.ग्रा., यवक्षार ५०० मि.ग्रा. मिलाकर १ कप मीठे दूध के साथ सेवन करने से तुरन्त लाभ मिलता है।

२. शीतज्वर/मलेरिया में- ठण्ड देकर आने वाले शीतज्वर में यदि रक्त परीक्षण में मलेरिया पॉजिटिव की रिपोर्ट आये तो पुटपक्व विषमज्वरान्तक लौह २५० मि.ग्रा., सेंधा नमक २५० मि.ग्रा., शु. हिंगु १२५ मि.ग्रा. अच्छी तरह घोंटकर दिन में ३ बार शहद से चटाने से ३ दिन में मलेरिया ज्वर समाप्त हो जाता है। रक्ताणु (हेमोग्लोबिन) की वृद्धि होती है, दुर्बलता का नाश होता है, भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। यह सैकड़ों बार का हमारा अनुभूत प्रयोग है। इसके विपरीत मलेरिया ज्वर में एलोपैथिक चिकित्सा से क्या-क्या दुष्परिणाम होते हैं यह सर्व विदित है। विषम ज्वर के बाद भी रक्त के लाल कणों का पुनर्निर्माण करने, थकी हुयी प्लीहा को आराम देने और यकृत् क्रिया को उद्दीप्त करने का कार्य यदि कोई योग कर सकता है तो वह है उपर्युक्त योग।

३. फायलेरिया ज्वर में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५०-२५० मि.ग्रा., नित्यानन्द रस २५० मि.ग्रा., आरोग्यवर्द्धिनी वटी २५० मि.ग्रा., प्रवालपिष्टी २५० मि.ग्रा., चन्द्रप्रभा वटी २५० मि.ग्रा. घोंटकर दिन में ३ मात्रा दशमूल क्वाथ और अभयादि क्वाथ के अनुपान से एक वर्ष तक सेवन करने से फायलेरिया ज्वर से तो मुक्ति मिलती ही है साथ ही फायलेरिया से भी मुक्ति मिलती है। यह योग वात-कफ प्रधान श्लीपद में वात-कफ प्रकृति के रोगियों में विशेष उपयोगी है।

४. क्षयरोग में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली ५०० मि.ग्रा., स्वर्णमालती वसंत १२५-२५० मि.ग्रा., वंशलोचन चूर्ण २५० मि.ग्रा., गिलोयघन ५०० मि.ग्रा., प्रवालपिष्टी २५० मि.ग्रा., रुदन्ती चूर्ण २ ग्राम मिलाकर दिन में २-३ बार सेवन करने से क्षयरोग में सत्वर लाभ होता है।

५. हृदय की शिथिलता में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५० मि.ग्रा., अभ्रक भस्म सहस्रपुटी १२५ मि.ग्रा., मोतीपिष्टी १२५ मि.ग्रा., अर्जुनघन २५० मि.ग्रा. मिश्रित कर दिन में २-३ बार सेवन करने से तत्काल सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है।

६. वातार्श में- चतु:षष्ठि प्रहरी पिप्पली २५० मि.ग्रा., अर्शोघ्नी वटी ५०० मि.ग्रा., शु. भल्लातक १२५ मि.ग्रा. मिलाकर जल के साथ दिन में दो बार ४० दिन तक सेवन करने से बादी बवासीर (वातार्श) समूल नष्ट हो जाता है।

भोजनोपरान्त अभयारिष्ट और द्राक्षासव २०-२० मि.ली. बराबर जल के साथ मिलाकर देने से विशेष लाभ होता है।

(साभार - चिकित्सा पल्लव : जून 2020)

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