वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी

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 #महुआ के फूल , सुंदर, और मीठी सुंगंध वाले , जब पुष्पित होते हैं तो वातावरण में नशीली खुशबू छा जाती है।ग्रामीणों पर आदिव...
15/04/2026

#महुआ के फूल , सुंदर, और मीठी सुंगंध वाले , जब पुष्पित होते हैं तो वातावरण में नशीली खुशबू छा जाती है।

ग्रामीणों पर आदिवासियों पर जब अकाल आया था तब गांववासी, आदिवासी सालभर महुआ खाकर ही जीवित रहे थे। यही महुआ उनका मुख्य भोजन हुआ करता था..! महुआ फूल से पचासों प्रकार के व्यंजन पकवान बनाए जाते थे। महुआ को उबालकर खाया जाता है। महुआ को गेहूं के आटा के साथ उबालकर( मोहकरी नाम) बनाकर खाया जाता है। महुआ को उबालकर चने के सत्तू के साथ खाया जाता है। महुआ को उबालकर गेहूं का आटा मिलाकर तेल में पकाकर मीठी पूरी(पुआ) बनाकर खाया जाता है। महुआ को उबालकर गेहूं का आटा मिलाकर तेल में पकाकर मीठी फुलौरी बनाकर खाया जाता है। महुआ को उबालकर गेहूं का आटा कढ़ाई में भूनकर मीठी लापसी बनाकर खाया जाता है। महुआ को उबालकर मीठा पानी निकलता है उसमें सिंघाड़ा का भूना आटा मिलाकर लापसी की तरह का व्यंजन (काची) बनाकर खाया जाता है। महुआ को भूनकर लड्डू बनाकर खाया जाता है। महुआ को भूनकर भूने चने के साथ भूंजा बनाकर खाया जाता है। महुआ को भूनकर भूनी तिल के साथ कूटकर (बुकवा) बनाकर खाया जाता है।

मधुक अर्थात महुआ, आम आदमी का पुष्प और फल दोनों हैं। आम आदमी का फल होने के कारण यह जंगली हो गया, और जंगल के प्राणियों का भरपूर पोषण किया। आज के शहरी लोग इसे आदिवासियों का अन्न कहते हैं। सच तो यह है कि गांव में बसने वालों उन लोगों के जिनके यहां महुआ के पेड़ है, बैसाख और जेठ के महीने में इसके फूल नाश्ता और भोजन हैं।

पांचवे दशक में महुआ ग्रामीण जन-जीवन का आधार होता था। प्रत्येक घर में शाम को महुआ के सूखे-फूल को धो-साफ कर चूल्हों में कंडा-उपरी की मंद आंच में पकाने के लिए रख देते थे। रातभर वह पकता,पक कर छुहारे की तरह हो जाता। ठंडा हो जाने पर उसे दही, दूध के साथ खाने का आनन्द अनिर्वचनीय होता। कुछ लोग आधा पकने पर कच्चे आम को छीलकर उसी में पकने के लिए डाल देते। वह खटमिट्ठा स्वाद याद आते ही आज भी मुंह में पानी आ जाता है। लेकिन न वे पकाने वाली दादियां रहीं न, माताएं अब तो सिर्फ उस मिठास की यादें भर शेष हैं। इसे डोभरी कहते, इसे खाकर पटौंहा में कथरी बिछाकर जेठ के घाम को चुनौती दी जाती थी। लगातार दो महीने सुबह डोभरी खाने पर देह की कान्ति बदल जाती थी। डोभरी का अहसास आज भी जमुहाई ला देता है।

महुआ के पेड़ों के नीचे पडे मोती के दाने टप-टप चूते हैं सुबह देर तक, इन्हें भी सूरज के चढ़ने का इन्तजार रहता है। जो फूल कूंची में अधखिले रह जाते है, रात उन्हें सेती है, दूसरे दिन उनकी बारी होती है। पूरे पेड़ को निहारिये एक भी पत्ता नहीं, सिर्फ टंगे हुए, गिरते हुए फूल। दोपहर और शाम को विश्राम की मुद्रा में हर आने-जाने वाले पर निगाह रखते हैं। कुछ इतने सुकुमार होते हैं कि कूंची में ही सूख जाते हैं, वे सूखकर ही गिरते हैं, उनकी मिठास मधु का पूर्ण आभाष देती है। जब वृक्ष के सारे फूल धरती को अर्पित हो जाते हैं तब ग्रीष्म के सूरज को चुनौती देती लाल-लाल कोपलों से महुआ, अपना तन और सिर ढकता है। कुछ ही दिनों में पूरा वृक्ष लहक उठता है। नवीन पत्तों की छाया गर्मी की लुआर को धता बताती है। फूल तो झर गये लेकिन वृक्ष का दान अभी शेष है। वे कूंचियां जिनसे फूल झरे थे, महीने डेढ़ महीने बाद गुच्छों में फल बन गए। परिपक्व होने पर किसान इनको तोड़-पीटकर इनके बीज को निकाल-फोड़कर बीजी को सुखाकर इसका तेल बनाते है। रबेदार और स्निग्ध, इस तेल को गांव डोरी के तेल के नाम से जानता है। ऐंड़ी की विबाई, चमडे की पनही को कोमल करने देह में लगाने से लेकर खाने के काम आता है। गांव की लाठी कभी इसी तेल को पीकर मजबूत और सुन्दर साथी बनती थी, जिसे सदा संग रखने की नसीहत कवि देते थे।

महुआ गर्मी के दिनों का नाश्ता तो है ही कभी-कभी पूरा भोजन भी होता है। बरसात के तिथि,त्यौहारों में इसकी बनी मौहरी (पूड़ी) सप्ताह तक कोमल और सुस्वाद बनी रहती है। मात्र आम के आचार के साथ इसे लेकर पूर्ण भोजन की तृप्ति प्राप्त होती है। इस महुए के फूल के आटे का कतरा सिंघाडे के फूल को फीका करता है। सूखे महुए के फूल को खपड़ी (गगरी) में भूनकर, हल्का गीला होने पर बाहर निकाल भुने तिल को मिलाकर, दोनों को कूटकर बडे लड्डू जैसे लाटा बनाकर रख लेने से वर्षान्त के दिनों में पानी के जून में, नाश्ते के रूप में लेने से जोतइया की सारी थकान एक लाटा और दो लोटा पानी, दूर कर देता है। लाटा को काड़ी में छिलका रहित झूने चने के साथ कांड़कर चूरन बना कर सुबह एक छटांक चूरन और एक गिलास मट्ठा पीकर ताउम्र पेट की बीमारियों को दफा किया जा सकता है।

संसार के किसी भी वृक्ष के फूल के इतने व्यंजन नहीं बन सकते। व्रत त्यौहार में हलछठ के दिन माताएं महुआ की डोभरी खाती है। ईसका वृक्ष भले सख्त हो फूल और फल तो अत्यंत कोमल हैं।
जब आपने नारियल जैसे सख्त फल को अपना लिया है तो महुए ने भला कैसा गुनाह किया है। अपनाईये खाईये और खिलाईये !

क्योंकि महुआ का पेड़ वात (गैस), पित्त और कफ (बलगम) को शांत करता है, वीर्य व धातु को बढ़ाता और पुष्ट करता है, फोड़ों के घाव और थकावट को दूर करता है, यह पेट में वायु के विकारों को कम करता है, इसका फूल भारी शीतल और दिल के लिए लाभकारी होता है तथा गर्मी और जलन को रोकता है। यह खून की खराबी, प्यास, सांस के रोग, टी.बी., कमजोरी, नामर्दी (नपुंसकता), खांसी, बवासीर, अनियमित मासिक-धर्म, वातशूल (पेट की पीड़ा के साथ भोजन का न पचना) गैस के विकार, स्तनों में दूध का अधिक आना, फोड़े-फुंसी तथा लो-ब्लडप्रेशर आदि रोगों को दूर करता है।

" #महुआ – एक पेड़ नहीं, पूरा जीवन है!"
जब धरती पर कोई कल्पवृक्ष है, तो वो महुआ है – जो इंसान, जानवर, और प्रकृति तीनों के लिए अमृत है।

गांवों का स्वाद, जंगल की मिठास, आदिवासी संस्कृति की शान – महुआ का हर फूल, हर फल एक दवा है, एक पकवान है और एक कहानी है।

जब धरती पर किसी कल्पवृक्ष की कल्पना की जाती है, तो सबसे पहले ध्यान आता है – महुआ का। यह पेड़ सिर्फ जंगल की शोभा नहीं, बल्कि एक पूरा जीवन है – जिसमें स्वाद, संस्कृति, सेहत और स्वावलंबन सब कुछ समाया हुआ है।

महुआ एक विशाल, बहुवर्षीय पेड़ है जो भारत के ग्रामीण बहुल क्षेत्रों में विशेष रूप से पाया जाता है। इसके हर हिस्से – फूल, फल, बीज, पत्ते और छाल – का उपयोग होता है। यह पेड़ न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि पशुओं और पूरी पारिस्थितिकी के लिए भी अनमोल है।

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1. #फूलों_में_मिठास, यादों की बात

मार्च–अप्रैल में जब महुआ फूलता है, तो उसकी खुशबू पूरे जंगल को महका देती है। ये फूल:
- पारंपरिक मिठाइयों और पेयों में उपयोग किए जाते हैं।
- ऊर्जा और आयरन से भरपूर होते हैं।
- बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए पोषण का बेहतरीन स्रोत हैं।

महुआ के फूलों से बनी शराब भी कई आदिवासी संस्कृतियों में परंपरागत रूप से तैयार की जाती है – जिसे सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर आदरपूर्वक उपयोग किया जाता है।

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2. #बीजों_से_तेल, जो शरीर और आत्मा को संवार दे

महुआ के बीजों से निकला तेल:
- खाना पकाने के लिए उपयुक्त होता है।
- त्वचा को नमी देता है और जोड़ों के दर्द में राहत देता है।
- कई प्रकार के घरेलू उपचारों में प्रयोग होता है।

यह तेल न केवल स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि एक आजीविका का सशक्त साधन भी है।

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3. #छाल_और_पत्तियाँ – लोकचिकित्सा की शक्ति

महुआ की छाल:
- बुखार, पेचिश, त्वचा संक्रमण जैसी समस्याओं के इलाज में काम आती है।
- इसका काढ़ा या चूर्ण पारंपरिक वैद्य पद्धति में लंबे समय से उपयोग होता आ रहा है।

महुआ की पत्तियों से बने दोना-पत्तल न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि प्लास्टिक का बेहतरीन विकल्प भी हैं।

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4. #ग्रामीण_संस्कृति की आत्मा

महुआ पेड़ केवल संसाधन नहीं है – यह एक *संस्कृति है:
- ग्रामीण समुदायों में इसे पवित्र माना जाता है।
- त्योहारों, अनुष्ठानों, विवाहों और मेले-ठेलों में महुआ की अनिवार्य भूमिका होती है।
- महुआ से जुड़ी लोककथाएं, गीत और नृत्य आदिवासी जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।

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ी_ज़रूरत - महुआ को फिर से अपनाना

आज के युग में जहाँ हर चीज़ पैकिंग और प्रोसेसिंग से होकर गुजरती है, वहाँ महुआ जैसे प्राकृतिक संसाधनों को अपनाना न सिर्फ शरीर के लिए, बल्कि आत्मा के लिए भी ज़रूरी है।

- यह स्थानीय और टिकाऊ जीवनशैली का प्रतीक है।
- यह ग्रामीण समुदायों के सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण की कुंजी है।
- यह हमें प्रकृति से जोड़ने वाला सेतु है।

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महुआ सिर्फ पेड़ नहीं है – यह एक रिश्ता है, जो हमें जड़ों से जोड़ता है।

जब अगली बार आप किसी प्राकृतिक, देसी, और पोषक चीज़ की तलाश में हों – तो महुआ को याद कीजिए। इसे अपने जीवन में लाइए, इसके स्वाद को महसूस कीजिए, और इसकी मिठास को दूसरों से साझा कीजिए।

महुआ अपनाइये, खाइये और खिलाइये.....!

#महुआ के गुण

#आयुर्वेद के अनुसार महुदा के फूल स्वाद में मधुर, पचने में भारी, ठंडे, बलवर्धक, बल और वीर्यवर्धक तथा वायु और पित्त का नाश करने वाले होते हैं।
गुलकंद महुदा पौधे के फूलों से बनाया जाता है।
महुदा फूल का गुलकंद महुदा फूल और चीनी को बराबर वजन लेकर, एक बहुत मोटे कांच के जार में भरकर एक महीने के लिए धूप में रखकर तैयार किया जाता है।
इस गुलकंद को एक चम्मच की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से शरीर की अंदरूनी गर्मी, पेशाब में जलन, हल्का बुखार, खून की कमी और मूत्र संबंधी रुकावट दूर होती है।
#महुआ के कई फ़ायदे हैं. महुआ के फूल, फल, बीज, छाल, और तेल का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है. महुआ के कुछ फ़ायदे ये रहे:
महुआ के फूल से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है.
महुआ के फूलों का इस्तेमाल तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं में किया जाता है.
महुआ के फूलों का इस्तेमाल त्वचा रोगों जैसे त्वचा की जलन, खुजली, और एक्जिमा जैसी समस्याओं को कम करने में किया जाता है.
#महुआ के फल का नियमित सेवन करने से मेटाबॉलिज्म में सुधार होता है, जिससे वज़न घटाने में मदद मिलती है.
महुआ के बीज स्वस्थ वसा (हैल्दी फैट) का अच्छा स्रोत हैं.
महुआ के तेल का इस्तेमाल नसों की कमज़ोरी में किया जाता है.
#महुआ के फूलों का इस्तेमाल घरेलू नुस्खों में कई तरीकों से होता है.
महुआ के फूलों की सब्ज़ी बनाकर खाई जाती है.
गांव मे हमें ये आसानी से मिलता है/
इसके बीज़ भी बहुत ही लाभदायक होतीं है जिसे हम कोलइंदा के नाम से जानते हैं
#महुआ भारतीय उष्णकटिबंधीय वृक्ष है.
महुआ के पेड़ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में बड़े पैमाने पर पाए जाते हैं.

#और एक बात और
महुआ के औषधीय गुण भी काफी ज्यादा हैं. महुआ के फूल से जहां शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता ह, वहीं दर्द, बुखार, पेट का अल्सर, ब्रोंकाइटिस, दांत का दर्द आदि समस्याओं में महुआ के फूल फायदेमंद माना जाता है. घरेलू नुस्खों में इनका इस्तेमाल कई तरीकों से होता है. कुछ लोग महुआ के फूलों की सब्जी बनाकर खाते हैं

• महुआ के फूलों का काढ़ा पीने से खांसी में आराम मिलता है।
•महुआ के फूलों को घी में पीसकर फोड़े-फुंसी पर लगाने से आराम मिलता है।
•महुआ के फूलों का चूर्ण शहद के साथ लेने से हिचकी आना बंद हो जाता है।
• महुआ के बीजों से तेल निकलता है, जिसका इस्तेमाल कफ़, पित्त, और दाहनाशक, वातनाशक के रूप में किया जाता हैं।
•महुआ के बीज स्वस्थ वसा का अच्छा स्रोत हैं।
•महुआ के फूलों से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता हैं।
•महुआ के फूल दर्द, बुखार, पेट का अल्सर, ब्रोंकाइटिस, दांत का दर्द जैसी समस्याओं में फ़ायदेमंद माने जाते है।
•महुआ के फूलों की सब्ज़ी बनाकर खाया जाता है।
• महुआ के फूलों से जैम भी बनाया जाता है।
•महुआ के पेड़ की छाल से बने काढ़े को पीने से दस्त की समस्या दूर होती है।

इसी साजिश के तहत महुए की कटाई और नफरत दोनों करवाई
महुए के फल की सब्जी, फूल का ज्यूस, सूखा सेक कर खाया जाता है, उबाल कर खाया जाता है, इसके लड्डू,, ढोकला बनाया जाता है, फूल से अर्क और फल से तेल भी निकाला जाता है, पत्ते पशु खाते है, सुखी लकड़ी ईंधन के काम आती है, सबसे ज्यादा पक्षी निवास करते हैं और दिन को पशु इसकी छाया में आराम भी करते हैं....... एक पेड़ अनेक समाधान

10/04/2026

#सायटिका_sciatica कमर से संबंधित नसों में से अगर किसी एक में भी सूजन आ जाए तो पूरे पैर में असहनीय दर्द होने लगता है, जिसे गृध्रसी या सायटिका (Sciatica) कहा जाता है। यह तंत्रिकाशूल (Neuralgia) का एक प्रकार है, जो बड़ी गृघ्रसी तंत्रिका (sciatic nerve) में सर्दी लगने से या अधिक चलने से अथवा मलावरोध और गर्भ, अर्बुद (Tumour) तथा मेरुदंड (spine) की विकृतियाँ, इनमें से किसी का दबाव तंत्रिका या तंत्रिकामूलों पर पड़ने से उत्पन्न होता है। कभी-कभी यह तंत्रिकाशोथ (Neuritis) से भी होता है। पीड़ा नितंबसंधि (Hip joint) के पीछे प्रारंभ होकर, धीरे धीरे तीव्र होती हुई, तंत्रिकामार्ग से अँगूठे तक फैलती है। घुटने और टखने के पीछे पीड़ा अधिक रहती है। पीड़ा के अतिरिक्त पैर में शून्यता (numbness) भी होती है। तीव्र रोग में असह्य पीड़ा से रोगी बिस्तरे पर पड़ा रहता है। पुराने (chronic) रोग में पैर में क्षीणता और सिकुड़न उत्पन्न होती है। रोग प्राय: एक ओर तथा दुश्चिकित्स्य होता है।

बड़ी उम्र में हड्डियों तथा हड्डियों को जोड़ने वाली चिकनी सतह के घिस जाने के कारण ही व्यक्ति इस समस्या का शिकार बनता है। ‘सायटिका’ का आगमन आमतौर पर यह समस्या 50 वर्ष की उम्र के बाद ही देखी जाती है। व्यक्ति के शरीर में जहां-जहां भी हड्डियों का जोड़ होता है, वहां एक चिकनी सतह होती है जो हड्डियों को जोड़े रखती है। जब यह चिकनी सतह घिसने लगती है तब हड्डियों पर इसका बुरा असर होता है जो असहनीय दर्द का कारण बनता है। सायटिका की समस्या मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी व कमर की नसों से जुड़ी हुई है जिसका सीधा संबंध पैर से होता है। इसीलिए सायटिका में पैरों में तीव्र दर्द उठने लगता है। नसोंपर दबाव का मुख्य कारण प्रौढ़ावस्था में हड्डियों तथा चिकनी सतह का घिस जाना होता है। मुख्य रूप से इस परेशानी का सीधा संबंध उम्र के साथ जुड़ा है। अधिक मेहनत करने वाले या भारी वजन उठाने वाले व्यक्तियों में यह परेशानी अधिकतर देखी जाती है क्योंकि ऐसा करने से चिकनी सतह में स्थित पदार्थ पीछे की तरफ खिसकता है। ऐसा बार-बार होने से अंतत: उस हिस्से में सूखापन आ जाता है और वह हिस्सा घिस जाता है।

सायटिका में पैरों में झनझनाहट होती है तथा खाल चढ़ने लगती है। पैर के अंगूठे व अंगुलियां सुन्न हो जाती हैं। कभी-कभी कुछ पलों के लिए पैर बिल्कुल निर्जीव से लगने लगते हैं। इस समस्या के लगातार बढ़ते रहने पर यह आंतरिक नसों पर भी बुरा असर डालना प्रारंभ कर देती है।

#निदान
इस प्रकार के रोग का निदान एक्स-रे से संभव नहीं। इसलिए एमआरआई कराना आवश्यक होता है। उपचार की बात करें तो सही उपचार पद्धति से लगभग 85-90 प्रतिशत
लोगों को सायटिका से निजात मिल जाती है। फिर भी इसमें पूरी तरह ठीक होते-होते 4 से 6
हफ्तों का समय लग ही जाता है।

लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठे रहने से बचें। हर आधे-एक घंटे में कुछ देर के लिए खड़े रहने की कोशिश करें। इससे कमर की हड्डियों को आराम मिलता है। झुककर भारी वस्तुओं को उठाने की आदत से भी बचने की कोशिश करें। इससे रीढ़ की हड्डियों के जोड़ों पर अधिक जोर पड़ता है। भारी वजन उठाकर लंबी दूर तय न करें। अगर ऐसा करना जरूरी हो भी तो बीच-बीच में कहीं बैठकर थोड़ी देर के लिए आराम कर लें। अगर आपका पेशा ऐसा हो कि आपको घंटों कुर्सी पर बैठा रहना पड़ता हो या कंप्यूटर पर काफी देर तक काम करना पड़ता हो तो कुर्सी में कमर के हिस्से पर एक छोटा सा तकिया लगा लें व सीधे बैठने की कोशिश करें।
वैद्य से सलाह लेकर कमर और रीढ़ की हड्डी से संबंधित कसरत नियमित रूप से करें। चिकित्सक की सलाह अनुसार कमर का बेल्ट भी उपयोग कर सकते हैं। याद रखें कि लंबे समय तक बेल्ट पहनने से कमर का स्नायु तंत्र कमजोर होता है। इसलिए बेल्ट का उपयोग यदा-कदा ही करे।

चिकित्सा के लिए सम्पर्क करें -
ग्राम्य आयुर्वेद भवन चित्रकूट उत्तर प्रदेश
वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

 #पत्नी_वामांगी_क्यों_कहलाती_है_? हमारे शास्त्रों में पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है... बाएं अंग का अधिक...
08/04/2026

#पत्नी_वामांगी_क्यों_कहलाती_है_? हमारे शास्त्रों में पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है... बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है।

इसका कारण यह है...कि भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर शरीर*...... शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्री पुरुष की वामांगी होती है ... इसलिए सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, द्विरागमन, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती।

वामांगी होने के बावजूद भी कुछ कामों में स्त्री को दायीं ओर रहने के बात शास्त्र कहता है। शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं ओर बैठना चाहिए।

पत्नी के पति के दाएं या बाएं बैठने संबंधी इस मान्यता के पीछे #तर्क यह है..., कि जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है। क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं।
यज्ञ, कन्यादान, विवाह यह सभी काम पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं ओर बैठने के नियम हैं।

सनातन धर्म में पत्नी को पति की वामांगी कहा गया है, यानी कि पति के शरीर का बांया हिस्सा, इसके अलावा पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है, दोनों शब्दों का सार एक ही है, जिसके अनुसार पत्नी के बिना पति अधूरा है।

पत्नी ही पति के जीवन को पूरा करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है, और उसे वह सभी सुख प्रदान करती है जिसके वह योग्य है, पति-पत्नी का रिश्ता दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है, चाहे सोसाइटी कैसी भी हो..

हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत में भी भीष्म पितामह ने कहा था कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिये, क्योंकि, उसी से वंश की वृद्धि होती है, वह घर की लक्ष्मी है और यदि लक्ष्मी प्रसन्न होगी तभी घर में खुशियां आयेगीं...... इसके अलावा भी अनेक धार्मिक ग्रंथों में पत्नी के गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है।

गरुड़ पुराण में पत्नी के गुणों को समझने वाला एक श्लोक मिलता है .....

सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।।

अर्थात जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं। वास्तव में वही पत्नी है। घर के सदस्यों का आदर-सम्मान करती हो, बड़े से लेकर छोटों का भी ख्याल रखती हो।

सर्वेषु धर्मकार्येषु पत्नी तिष्ठति दक्षिणे।
विप्रपादप्रक्षालने अभिषेके च वामतः।।

पत्नी को, सांसारिक कार्योंमे जैसे भोजन, किसी को वस्त्र देते समय, आशीर्वाद लेते समय वाम(left) में और आध्यात्मिक कार्यों में जैसे यज्ञ, पूजा पाठ में दक्षिण(right) में।
आशीर्वादे अभिषेके च पादप्रक्षालने तथा ।

युद्धे तू पृष्ठत भागे सन्मागे अग्र तो निषेत।
रितु काले च वामांगे पुण्य काले च दक्षिणे।।

वामे सिन्दूरदाने च वामे चैव द्विरागमने,
वामे शयनैकश्यायां भवेज्जाए प्रियार्थिनी।
कन्यादाने विवाहे च प्रतिष्ठा-यज्ञकर्मणि,
सर्वेषु धर्णकार्येषु पत्नी दक्षिणत-स्मृता।।

पत्नी को पति के बाएं ओर तब बैठना चाहि जब सिंदूर दान. द्विरागमन के समय, भोजन, सहवास, सोते समय, आशीर्वाद और बड़ों की सेवा करते समय।

पत्नी को अपने पति के दाएं ओर तब बैठना चाहिए जब कन्यादान, शादी, यज्ञकर्म, पूजा या फिर और कोई धर्म-कर्म का काम हो।

08/04/2026

स्वास्थवर्धक गुणकारी बेल का शर्बत...गर्मियों की शुरुआत के साथ ही बेल भी बाजार में दिखने लगते हैं....बेल के पेड़ का धार्मिक महत्व के साथ साथ उपचारात्मक महत्व भी है. भारत में इस फल के पेड़ को बिल्व, श्री फल, सदाफल, शाण्डिल्रू आदि नामों से भी जाना जाता है.

रोगों को नष्ट करने की अदभुत क्षमता के कारण ही इसे बिल्व कहा जाता है. इसका सूखा गूदा बेलगिरी एवं इसका गूदा या मज्जा बल्वकर्कटी कहलाता है.

बेल के फल का खोल हल्का हरे रंग का एवं चिकना होता है. पक जाने पर यह सुनहरे पीले रंग में परिवर्तित हो जाता है जिसे तोड़ने पर बड़ा ही मीठा, रेशेदार एवं सुगंधित गूदा निकलता है.

बेल से धार्मिक मान्यताएँ भी जुड़ी हैं. हिंदू इसे महादेव का ही रूप मानते हैं. हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि बेल के जड़ में भगवान शिव का वास होता है. इसके तीन पत्तों की डाली बिल्वपत्र को लोग साक्षात् त्रिदेव का स्वरुप मानते हैं. इसके पाँच पत्तों की डाली को लोग तीन पत्तों से भी ज्यादा शुभ मानते हैं और पूजा के लिए इसे इकट्ठा करना चाहते हैं. धर्मग्रंथों में भी पाँच पत्तों की डाली की महत्ता का वर्णन है.

बेल का सेवन स्वास्थ्य के लिए काफी गुणकारी होता है. इसके पेड़ के लगभग हर हिस्से का अपना एक अलग महत्व है. इस मौसम में इसका शरबत मुरब्बा सेहत के लिए बहुत गुणकारी माना जाता है. आयुर्वेद में तो इसे बहुत फायदेमंद माना गया है.

बेल में कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं. यह प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है, साथ ही इसमें विटामिन सी की भी प्रचुर मात्रा पाई जाती है. इसका शरबत पीने से पेट को राहत और मन को ताजगी मिलती है. इससे कब्ज, अपच और गैस की समस्या से भी निजात मिलती है. आयुर्वेद में इसे डायरिया या अतिसार की स्थिति में भी बहुत फायदेमंद बताया गया है.

इसका एक गुण यह भी है कि यह जल्दी खराब नहीं होता और इसे कई दिन तक रखा जा सकता है. शरबत बनाने के लिए इसे तोड़कर गूदा निकाल लें और कुछ देर पानी में भिगो दें. इसके बाद रेशे और गूदे को अच्छी तरह छानकर अलग कर लें. इसमें जरूरत के हिसाब से पानी मिलाएं और फ्रिज में स्टोर कर लें. इसमें चीनी या शहद व कालीमिर्च मिला सकती हैं.

बेल को हृदय रोगों में भी अच्छा माना जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, इससे शुगर स्तर भी संतुलित रहता है और यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखता है. हालांकि हार्ट और डायबिटीज के रोगी इसका सेवन किस रूप में और कितनी मात्रा में करें, इसके बारे में अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें.

बाजार में मिलने वाले बेल के शरबत के बजाय घर में ही इसे तैयार करें. इससे एसिडिटी जैसी समस्याओं में राहत मिलती है, साथ ही गर्मी से होने वाले मुंह के छालों में भी आराम मिलता है. कुछ शोधों में यह कैंसर रोगियों के लिए भी फायदेमंद साबित हुआ है. इसे रक्त शोधक भी कहा जाता है. इसके नियमित सेवन से रक्त संबंधी दोष दूर होते हैं.

डायबटीज के रोगियों के लिए बेल बहुत ही ज्यादा लाभप्रद होता है. इसकी पत्तियों को पीस कर दिन में दो बार इसका सेवन करने से ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है.

बेल का सेवन कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में काफी मददगार साबित होता है. इस प्रकार यह कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से होनेवाली बीमारियों को भी रोकता है.

महिलाएँ यदि नियमित रूप से बेल का रस पीयें तो उनमें भविष्य में ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना काफी कम होगी.

बेल के रस में गुनगुने पानी एवं शहद डाल कर नियमित सेवन करने से खून साफ हो जाता है.

लू लगने पर इसके पत्तों को मेहंदी की तरह पैर के तलवों, सिर, हाथ, छाती, आदि पर मालिश करने से इससे तुरंत राहत मिल जाती है.

बेल के रस में थोड़ी मात्रा में घी मिलाकर उसका नियमित सेवन करने पर दिल से जुड़ी बीमारियों से बचाव होता है.

आयुर्वेद में बेल के रस का डायरिया में होनेवाले फायदे का वर्णन है. इसे चीनी या गुड़ के साथ पीने से डायरिया से बचाव हो जाता है.

इतने सारे स्वास्थवर्धक गुणकारी बेल का शर्बत आप जरूर फायदा उठाइये.....

06/04/2026

स्पेशल डिस्काउंट ऑफर पुरुष मित्र इस वीडियो पूरा जरूर देखिए राजा महाराजा भस्म फार्मूला धातुरोग, यौन कमजोरी, शीघ्रपतन के लिए के राजाओं वाला कीमती रामबाण आयुर्वेदिक फार्मुला

बसंत कुसुमाकर रस- 1 ग्राम
त्रिवंग भस्म 5 ग्राम
अभ्रक भस्म 10 ग्राम
गिलोय सत्व 10 ग्राम
सिद्ध मकरध्वज 2 ग्राम
प्रवाल पिष्टी 10 ग्राम

सभी को मिलाकर खरल में डालकर घुटाई कर लें। आपका #राजा_महाराजा_भस्म_फार्मूला तैयार हो गया।
आधा ग्राम सुबह, आधा ग्राम शाम को शहद या दूध से लें। चंद्रप्रभा वटी- दो दो गोली सुबह-शाम गुनगुने दूध से लें।

वैवाहिक जीवन में शारीरिक कमी को बीच में न आने दें। संभोग-शक्ति बढ़ाने के लिए बहुत आसानी से ये योग बना कर, इसका लगातार दो से तीन माह लगातार सेवन करने से शीघ्रपतन कुछ समय में कम होने लगता है।

भस्में अनेक विधियों द्वारा बनाकर उचित अनुपान-भेद से अनेक रोगों में प्रयोग की जाती हैं और लाभ भी होता है। ऐसी अवस्था में यह शंका या प्रश्न उठाना कि अनुपान (जिसके साथ भस्म प्रयोग की जाती है) से जो लाभ होता है, वह अनुपान का प्रभाव है, भस्म तो नाममात्र की ही प्रभावकारी होती है, किन्तु यह केवल अज्ञानता है और अनुपान को स्वतन्त्र रूप से प्रयोग करके उसके गुणों का परीक्षण कर इसे दूर किया जा सकता है। भस्मों के योगवाही होने के कारण अनुपान से भस्मों के गुण अवश्य बढ़ते हैं। क्योंकि अनुभव इस बात को बताता है, कि जब भस्म साथ में न हो तब केवल अनुपान की इतनी थोड़ी मात्रा देने से शरीर पर कोई असर नहीं होता है। यह तो भस्म में ही ताकत है कि इतनी थोड़ी मात्रा में ही सम्पूर्ण शरीर पर अपना प्रभाव करती है। किसी भी धातु-उपधातु की भस्म हो, उसमें ऐसी रासायनिक शक्ति विद्यमान रहती है कि मुख में डालते ही सम्पूर्ण शरीर की नसों में व्याप्त हो जाती है और अपने स्वाभाविक एवं मौलिक गुण-धर्म एवं उस प्रत्येक औषध के प्रभाव की जिसमें वह भस्म बनायी गयी है, या जो अनुपान रूप में प्रयोग किया जा रहा है, उसके गुण-धर्म को भी सम्पूर्ण शरीर में विशेषकर रोगस्थान में अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक पहुंचा देती है। अतः सभी भस्मों को उचित अनुपान के साथ प्रयोग करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त होती है और यही ठोस कारण है कि आज आयुर्वेद के अलावा यूनानी, एलोपैथी आदि अन्य प्रसिद्ध चिकित्सा-पद्धतियों में भी भस्मों का प्रचुर प्रयोग बढ़ रहा है। जो दवा सेरों खाने से तब कहीं अपना प्रभाव शरीर में प्रकट करती है, वह 1-2 माशे की मात्रा में ही एक रत्ती भस्म के संग मिलाकर देने से तत्काल ही सेर भर औषध के प्रभाव से भी अधिक प्रभाव प्रकट करती है। यद्यपि यह प्रभाव भावित (भावना दी हुई) औषधियों का ही क्यों न हो, किन्तु औषध को इतनी स्वल्प मात्रा और प्रभाव को एवं उस तात्कालिक शक्ति को देखकर बरबस यह कहना पड़ेगा कि यह चमत्कार भस्म के ही हैं, जो उक्त औषध के साथ सम्मिलित होकर उसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं।

अतः अभ्रक भस्म को ही क्यों, सभी भस्मों को उचित अनुपान के साथ व्यवहार करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है तथा मिलती भी रही है। अतः निर्भय होकर भस्मों का प्रयोग किया जा सकता है।

#बसंत_कुसुमाकर_रस - छोटी आयु में अप्राकृतिक ढंग (हस्तमैथुन, गुदामैथुन आदि) से वीर्य नाश करने से अथवा ज्यादा स्त्री-प्रसंग (मैथुन) करने से वीर्य पतला हो जाता है, ऐसे मनुष्य का स्त्रियों के विषय में सोचने मात्र से वीर्य-पतन हो जाता है। ऐसी स्थिति में बसन्त कुसुमाकर के सेवन से बहुत शीघ्र फायदा होता है, क्योंकि यह रसायन और वृष्य होने के कारण वीर्यवाहिनी शिरा तथा अण्डकोष में ताकत पहुँचाता है, जिससे वीर्यवाहिनी शिरा में वीर्य धारण करने की शक्ति उत्पन्न होती है।

#सिद्ध_मकरध्वज_रसायन_गुटिका - यह अत्यन्त कामोत्तेजक, बलवर्धक और पुष्टिकारक है। यह दिल और दिमाग के लिये पुष्टिकारक, शीघ्रपतननाशक, स्तम्भनशक्तिवर्धक, नपुंसकतानाशक और बल-वीर्य बढ़ाने में अपूर्व गुणकारी है। इसके सेवन से क्षीण हुए धातु पुष्ट होकर शरीर का भार बढ़ने लगता है। नशीली वस्तु का सेवन किए बिना स्तम्भन शक्ति बढ़ाने के लिए यह प्रसिद्ध उत्कृष्ट औषधि है। ढलती आयु में सम्भोग शक्ति बनाये रखने के लिए इस वटी का प्रयोग करना सर्वोत्तम है। गाढ़ी निद्रा और मानसिक बलवृद्धि के लिए भी यह अत्युत्तम औषधि है।

#अभ्रक_भस्म - यह अनेक रोगों को नष्ट करता है, देह को दृढ़ करता है एवं वीर्य बढ़ाता है। तरुणावस्था प्राप्त कराता है और सम्भोग (मैथुन) करने की शक्ति प्रदान करता है। मानसिक दुर्बलता होने पर कार्य करने का उत्साह नष्ट हो जाता है। चित्त में अत्यधिक चंचलता रहती है। रोगी निस्तेज, चिन्ताग्रस्त और क्रोधी हो जाता है, ऐसी अवस्था में अभ्रक भस्म का सेवन मुक्तापिष्टी के साथ करना अधिक लाभप्रद है। अभ्रक भस्म योगवाही है। अतः यह अपने साथ मिले हुए द्रव्यों के गुणों को बढ़ाती है। पाचन विकार को नष्ट कर आंत को सशक्त बनाने और रुचि उत्पन्न करने के लिए अभ्रक भस्म का मिश्रण देना अत्युत्तम है। धातुक्षीणता की बीमारी में प्रवाल पिष्टी के साथ इसका सेवन करना उत्तम होता है।

#त्रिबंग_भस्म - वीर्यवर्द्धक होती है। अतः जननेन्द्रिय(लिंग )की शिथिल नसों को सख्त कर देती है, जिससे वीर्य का स्वतः (अपने-आप) वीर्य स्राव हो जाना तथा स्वप्नावस्था या स्त्री-प्रसंग की इच्छा होते ही अथवा स्त्री-प्रसंग से पूर्व ही जो वीर्यस्राव हो जाता है, वह रुक जाता है। त्रिबंग भस्म के सेवन करने से जननेन्द्रिय की मांसपेशियाँ और नसें कड़ी हो जातीं, साथ ही शुक्र भी गाढ़ा हो जाता है। अतः वीर्य विकार के लिये यह त्रिबंग भस्म बहुत उपयोगी है।

#प्रवाल _पिष्टी - पित्तनाशक और सौम्य होने के कारण पित्त युक्त शुष्क कास, रक्तप्रदर, रक्त-पित्त, अम्लपित्त, नेत्र-प्रदाह और वमन आदि विकारों में विशेष हितकर है। पित्तविकारों की तो यह सर्वोत्कृष्ट दवा है। पित्त की तीक्ष्णता, उष्णता एवं अम्लता को शांत करने में यह अपूर्व है। यह अपने शीतवीर्य-शामक और प्रसादक गुणों के कारण अनेक रोगों में उपयुक्त होती है। शुक्रस्थान की अत्यन्त निर्बलता अथवा स्नायुमण्डल की दुर्बलता के कारण शुक्र बहुत पतला और शक्तिहीन हो जाता है। इस अवस्था में प्रवाल पिष्टी का निरन्तर सेवन करने से स्थायी लाभ होता है।

#गिलोय_सत्व - गिलोयका सत्त्व-स्वादिष्ठ, पथ्य, हलका, दीपन, नेत्रोंको हितकारी धातु-वर्द्धक, मेधाजनक, अवस्थास्थापक, तथा वातरक्त, त्रिदोष, पाण्डुरोग, तीव्रज्वर, वमन, जीर्णज्वर, पित्त, कामला, प्रमेह, अरुचि, श्वास, खाँसी, हिचकी, बवासीर, क्षय, दाह, मूत्र-कृच्छ्र, प्रदर, सोमरोग, पित्त, प्रमेह और शर्करारोग को दूर करता है।

#राजा_महाराजा_भस्म_फार्मूला

#स्वस्थ रहना है तो भारतीय चिकित्सा पद्धति को अपनाना ही होहमारेगा अन्यथा एक बार एलोपैथी चिकित्सा के चक्कर में फंसे तो बिमारियों के जाल से निकलना मुश्किल होगा

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वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
मो०- 093360 55537

 #कब्ज,  #मलावरोध,  #पेट_साफ_न_होना  ( ) सौच न आने या खुलकर ना आने को ही कब्ज या मलावरोध कहते हैं इसी को कब्जियत या कोस्...
06/04/2026

#कब्ज, #मलावरोध, #पेट_साफ_न_होना ( ) सौच न आने या खुलकर ना आने को ही कब्ज या मलावरोध कहते हैं इसी को कब्जियत या कोस्टबद्धता या कॉन्स्टिपेशन भी कहा जाता है।

#कब्ज_रोग_के_मुख्य_कारण :-

• मुख्यतः यह रोग-आँतों की गति कम (Peristalsis) होने से उत्पन्न होता है। यकृत/जिगर (लीवर Liver) की कार्यक्षमता कम होना भी इसके मुख्य कारणों में हैं। इसके अतिरिक्त विद्युत चालित चक्की का चिकना, महीन, बारीक आटा बिना छिलके की दाल, पालिश किये हुए चावल, चोकर रहित आटा की रोटियाँ, छिलका निकाल कर बनाई हुई हरी सब्जियाँ, रेशा रहित आहार का अत्यधिक उपयोग, पानी कम पीने की आदत, परिश्रम रहित अकर्मण्य जीवन यापन, मल त्याग के लिए तम्बाकू, चाय या बीड़ी-सिगरेट सेवन करने की लत/आदत, बार-बार विरेचन/जुलाव लेकर मल त्याग करने की आदत, मलोत्सर्जन की वेग को बलात रोके रहना, चिन्ता, भय, क्रोध और मानसिक विकार, लम्बे समय तक चलने वाले रोग, अत्यधिक परिश्रम तथा अपर्याप्त आहार, मैदा से निर्मित खाद्य पदार्थों को अधिकता से खाना, भोजन में परिवर्तन, कम फाइबर युक्त भोजन खाना तथा पानी कम मात्रा में पीना, गर्भावस्था, भारी (गरिष्ठ) पानी पीना, पानी में बदलाव, वृद्धावस्था में आँतें निर्बल/कमजोर हो जाना, मधुमेह, पोरफायरिया और मानिसक चिन्तन, बहुत सी अंग्रेजी दवाएं यथा कोडीन, ओपिएट्स, एण्टासिड, बेहोशी लाने वाली दवाएं, गैंगिलियोन को ब्लाक करने की दवाएं, मल त्याग में अधिक दर्द होने पर यथा-ऐनल फिशर में, बवासीर में, प्रोक्टाईटिस में रोगी दर्द के भय के कारण मल त्याग हेतु नहीं जाता है। पेट से सम्बन्धित रोग होने की दशा में (वमन, कार्सिनोमा, ओप्मकोलन, पायलेरिक आऊटलेट आब्स टूक्शन।) बड़े आपरेशन के बाद (चूंकि रोगी व्यक्ति कई-कई दिनों तक बिस्तर/पलंग पर लेटा रहता है तथा मुख द्वारा कुछ भी न लेने से मल खुश्क हो जाता है।), मानसिक विकारों द्वारा (एटोनेमिक नर्वस सिस्टम में परिवर्तन आने के कारण), अफीम का अधिक सेवन, रात्रि जागरण, विटामिन 'बी' की कमी, निरन्तर बैठे रहना, क्लर्की जीवन तथा मानसिक कार्य करने वालों में यह कब्ज (कोष्ठबद्धता) एक आम रोग है।

#कब्ज_के_लक्षण
रोगी में कब्ज के लक्षण मुख्यतः नीचे लिखी बातों पर निर्भर करते हैं

(1) क्षुधानाश/भूख न लगना।
(2) शरीर गिरा हुआ रहना / आलस्य ।
(3) चक्कर आना।
(4) सिर भारी रहना।
(5) जी मिचलाना।
(6) खट्टी डकारें आना।
(7) गुदा द्वार से वायु / गैस का निकलना ।।
(8) पेट भारी रहना।
(9) मानसिक तनाव बने रहना।
(10) जीभ फटी हुई अथवा सफेद होना।
(11) किसी भी कार्य में मन नहीं लगना।
(12) शौच/दस्त साफ न होना।
(13) मल (पाखाना) कम मात्रा में निकलना।
(14) भूख नष्ट हो जाना ।
(15) पेट में भारीपन तथा मीठा-मीठा दर्द होना।
(16) रोगी के शरीर ओर सिर में भारीपन रहना।।
(17) कभी-कभी मुख से दुर्गन्ध की अनुभूति होना।
(18) जिह्वा मलावृत रहना।
(19) पेट में वायु/गैस बनना।
(20) रक्त पर दुष्प्रभाव होने के कारण रक्तभार (ब्लडप्रैशर) में वृद्धि।
(21) मुख का स्वाद/जायका खराब रहना।
(22) आलस्य, सुस्ती, अनिद्रा तथा ज्वर आदि लक्षणों का मिलना।
(23) कब्ज के दीर्घकालिक रोग से बवासीर (पाइल्स), गृध्रसी (सायटिका पेन) आदि रोगों की उत्पत्ति ।
(24) किसी-किसी रोगी को चाय या सिगरेट का सेवन किये बिना मल त्याग न होना
(25) रोगी के मल त्याग हेतु जाने पर भी (काफी देर तक मल त्याग हेतु बैठे रहने के
बाद भी) मल त्याग की प्रवृत्ति न होना।

* #कब्ज_की_जटिलतायें (Complications of Constipation)*

(1) मल द्वार का विदर (A**l Fissure)
(2) वासीर (Piles)
(3) मूत्र आना रुक जाना (Retention of Urine)
(4) मल का बड़ी आँत और मल द्वार से चिपक जाना (Impaction of Stool)
(5) बड़ी आँत (कोलन) में घाव/व्रण (अल्सर) (Colonic Ulser)
(6) विरेचक बड़ी आँत (Catharitic Colon)
(7) शौच / दस्त पर नियन्त्रण न रहना (In continue of Bowel)
(8) क्सीजन की कमी के कारण बड़ी आँत की सूजन (Ischaemic Colitis)
(9) मल द्वार का नीचे खिसक जाना (Prolapse of Reactum)
(10) कोलन सख्त होकर पाइप जैसा हो सकता है।
(11) लगातार मल त्याग में जोर लगाने से बवासीर, भगन्दर, (फिस्टयूत्त) इनग्वीनल हार्निया, वायोकार्डियल इन्फार्कशन्स अधिकतर हो सकते हैं।
(12) कब्ज रोग से पीड़ित रोगी में स्वाभाविक स्फूर्ति नहीं रहती।

#शोभान्जन_वटी के सेवन से पाचक अग्नि की शिथिलता दूर हो पुनः उसमें चेतना आ जाती है अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन करने से अजीर्ण हो गया हो तो शोभान्जन वटी की दो गोली खा लेने से भोजन जल्दी पच जाता है
शोभान्जन वटी के सेवन से अम्लपित्त में मुंह में खट्टा या कड़वा पानी आना बंद हो जाता है और अन्न का परिपाक भली-भांति होने लगता है पेट के दर्द को कम करने के लिए शोभान्जन वटी की गोली गर्म जल के साथ खा लेने से दर्द में आराम हो जाता है
यह मंदाग्नि, अजीर्ण, अम्लपित्त, उदरशूल और वायूगोला आदि का शीघ्र नाश करती है।
अधिक भोजन या गरिष्ठ भोजन, बासी आदि भोजन करने से उत्पन्न मंदाग्नि कब्जियत आदि इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं।
यह मंदाग्नि को नष्ट कर जठराग्नि को प्रदीप्त करती है। इसकी दो तीन खुराक खाने से ही भूख खूब खुलकर लगती है और भोजन भी ठीक-ठीक पचने लग जाता है।
किसी भी तरह का अजीर्ण हो उसे नष्ट करने के लिए शोभान्जन वटी का प्रयोग अवश्य करें। मात्रा से अधिक भोजन कर लिया हो तो उसे भी यह पचा देती है।
पेट में वायु भर जाने से पेट फूल जाता हो उस समय शोभान्जन वटी की दो गोली गर्म जल के साथ देने से तत्काल लाभ होता है।
शोभान्जन वटी बड़ी आंत तथा छोटी आंत की विकृति को नष्ट करती है।
किसी भी कारण से अग्नि मन्द होकर भूख ना लगती हो, अन्न में अरुचि हो, जी मिचलाता हो, पेट भारी रहता हो, वमन की इच्छा हो या वमन हो जाता हो, अपच दस्त होते हों, या कब्ज रहता हो आदि उपद्रव होने पर शोभान्जन वटी अद्भुत कार्य करती है।
इसके सेवन से भोजन पच कर खूब भूख लगती है और दस्त साफ आता है। जिन्हें बार बार भूख कम लगने की शिकायत हो उन्हें शोभान्जन वटी अवश्य लेनी चाहिए।
अजीर्ण की शिकायत अधिक दिनों तक बनी रहने पर पित्त कमजोर हो जाता है और कफ तथा आंव की वृद्धि हो जाती है इसमें हृदय भारी हो जाना, पेट में भारीपन बना रहना आदि लक्षण होने पर शोभान्जन वटी देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है।
शोभान्जन वटी पित्त को जागृत कर कफ और आंव के दोष को पचाकर बाहर निकाल देती है और पाचक रस की उत्पत्ति कर भूख जगा देती है।
यह दीपक पाचक तथा वायुनाशक है।
अजीर्ण के कारण पेट में वायु भर जाती है जिससे डकारें आने लगती हैं इस वायु को पचाने तथा डकारों को बंद करने के लिए शोभान्जन वटी बहुत उपयोगी है।
शोभान्जन वटी के प्रयोग से उर्ध्ववात का शमन शीघ्र ही हो जाता है।
शोभान्जन वटी आम को पचाती तथा अजीर्ण मन्दाग्नि पेट दर्द-परिणाम-शूल, पित्तज शूल आदि रोगों को दूर करती है। इसके नियमित सेवन से पेट-सम्बन्धी किसी व्याधि(रोग) के होने का डर नहीं रहता है, क्योंकि उदर सम्बन्धी व्याधियों का मूल अजीर्ण और कब्ज, इसके सेवन से ना तो अजीर्ण ही हो सकता है और न कब्ज ही होता है। इसलिए उदर सम्बन्धी व्याधियों से रक्षा के लिए शोभान्जन वटी का नियमित प्रयोग करना अति श्रेष्ठ उपाय है।

#हरीतकी_रसायन_वटी
यह बटी दीपन-पाचन तथा जायकेदार होने से बहुत प्रसिद्ध है। अजीर्ण रोग को नाश करने के लिए यह बहुत लाभदायक है। भोजन के बाद 2-4 गोली जल के साथ लेने से अन्न अच्छी तरह हजम हो जाता और दस्त भी साफ निकलता है। अरुचि, अजीर्ण, पेट दर्द, पेट में वायु का जमा होना, आँव की शिकायतें, कब्जियत, रक्त-विकार और अम्लपित्त आदि रोगों में यह बटी बहुत फायदा करती है। जो लोग भोजन अच्छी तरह पचने के लिए सोडा वाटर का व्यवहार करते हैं, उनके लिए उसकी अपेक्षा यह अमृत के समान गुणकारी हैं। इससे भोजन अच्छी तरह पचता और खुल कर भूख लगती है और चित्त हमेशा प्रसन्न रहता है। इसके नियमित सेवन से किसी देश के जल का बुरा प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता। इसमें यह विचित्र और अद्भूत शक्ति है। अमीर-गरीब सभी के योग्य, उत्तम गुणदायक यह दवा है।

#त्रिफला_वटी - इस वटी के सेवन से जठराग्रि शीघ्र प्रदीप्त होती है। भस्मक रोग नष्ट होता है। अधिक भोजनकर लेने पर भी उसका पाचन शीघ्र होता है। सब प्रकार के अजीर्ण, वर, गुल्म, शूल, वातरक्त महाशोय, का नाश होता है। बात, पित्त तथा कफ विनष्ट होते हैं। निद्रा, आलस्य, अरोचक, परिणाम शूल और प्रवाहिका में उपकारी है।

त्रिफला वटी एक अति उपयोगी सुन्दर और वैद्यों के प्रतिदिन के कार्य में आने वाला योग है। जब अजीर्ण से या अन्य किसी कारण उदर में शूल हो तो इसका उपयोग तत्काल लाभ करता है। जब उदर में वायु भरता है और रुद्ध होकर कष्ट देता है, उस समय इससे तत्काल शान्ति मिलती है। अतिसार को स्थिति में जिसमें कि वायु के साथ जल मिश्रित मल निकल जाता है, त्रिफला वटी 2 ग्राम या 4 ग्राम में उसके समभाग में सजीखार या सोडाबाईकार्य मिलाकर देने से अतिसार शान्त हो जाते हैं। यह देखा गया है कि जब शूल में या किसी अन्य उदर कष्ट में पित्त का अनुषङ्ग विशेष हो अतिसार को रोकना हो तब उसमें सब्जीखार या साडाबाईका मिलाने से उस वी में मिले हुए अम्ल और इस क्षार के योग से जब पेट में समीकरण प्रक्रिया होती है तो उससे तत्काल उद्गार एवं अपान आकर रोगी को शांति प्राप्त होती है।

* #पथ्य_कुपथ्य*
प्रातः समय जागकर नित्य ऊषापान (ठण्डा पानी पीना) और प्रातः भ्रमण (मॉर्निंग वाक् करना) तथा स्नान करना हितकर होता है।
कब्ज में-पका अमरूद, उबली गाजर, पपीता का सेवन कम चिकनाई वा आहार (यथा-गाय का दूध, पनीर, चोकर युक्त आटा की रोटी, मौसमी फल, दाल के स्थान पर हरी सब्जी (बथुआ, पालक आदि), आम, अंगूर, किशमिश, मुनक्का, खजूर, संतरा, नाशपाती एवं कागजी नींबू के रस का उपयोग करें।
• बासी भोजन, वात बर्द्धक भोजन, चिकना और तला हुआ आहार नहीं लेना चाहिए।

* #पेट_के_रोगों_से_बचने_के_सरल_उपाय*

किसी भी बीमारी के हो जाने पर उसका इलाज करने से अच्छा तो यही है कि बीमारी को होने ही ना दिया जाए। इन नियमों को अपनाकर उदर रोगों से बड़ी ही आसानी से बचा जा सकता है।

*( #1)* सबसे पहली बात तो यह है कि प्रत्येक पदार्थ खूब चबा चबाकर खाना चाहिए जिससे दांतों का काम आंतों को ना करना पड़े। इससे आंतों पर अतिरिक्त कार्यभार नहीं पड़ेगा और पाचन तंत्र सदैव दूरस्त रहेगा।

*( #2)* भोजन कभी भी ठूंस-ठूंसकर यानि अधिक मात्रा में ना करें बल्कि सदैव भूख से एक रोटी कम ही खाना चाहिए।

*( #3)* भोजन करने का समय निश्चित कर लेना चाहिए और प्रतिदिन लगभग उसी समय पर भोजन करना चाहिए। इस उपाय से पाचन क्रिया व्यवस्थित रहती है‌। समय निश्चित करते समय इस बात का ध्यान रखें कि सुबह और रात के भोजन के मध्य में कम से कम 5 घंटे का अंतर रहे और रात का भोजन सोने से कम से कम 2 घंटे पहले कर लिया जाये।

*( #4)* भोजन करने में न तो कम समय लगना चाहिए और ना ही अधिक सामान्यतः एक समय का भोजन करने में 15 मिनट का समय लगना चाहिए।

*( #5)* व्यावहारिक जीवन में गरिष्ठ पदार्थों व मिर्च-मसाले युक्त पदार्थों से बच पाना असंभव ही है विशेषकर दावत तथा पार्टियों आदि में तो इनका सेवन करना ही पड़ता है ऐसी स्थिति में यह पदार्थ कम ही मात्रा में खाएं और परस्पर विरुद्ध प्रकृति के पदार्थ जैसे - गरम दूध व ठंडे पेय आदि का साथ-साथ सेवन न करें।

*( #6)* अगर बाजार में बनी चाट-पकौड़ी खानी पड़े तो ऐसे स्थान से लें जहां साफ-सफाई का ध्यान रखा जाता हो और जहां खाद्य पदार्थों पर मक्खियां न भिनभिनाती हों।

*( #7)* प्रतिदिन कुछ ना कुछ शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए। यदि और कुछ परिश्रम संभव ना हो सके तो प्रतिदिन दो-तीन किलोमीटर दौड़ने ही जाया करें। इससे पाचन तंत्र के साथ-साथ पूरा शरीर चुस्त दुरुस्त बना रहता है।

*( #8)* प्रत्येक पंद्रह दिन में एक दिन का उपवास अवश्य करना चाहिए। इससे पाचन अंगों को विश्राम मिल जाता है और वे फिर से कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। उपवास में बिल्कुल भूखे रहने की जरूरत नहीं है बल्कि थोड़ी मात्रा में दूध या फल लिया जा सकता है। उपवास में ताजा पानी पर्याप्त मात्रा में पीना चाहिए।

*( #9)* जब भी पेट में भारीपन महसूस हो, भोजन के प्रति अरुचि हो तो अच्छा यही है कि एक समय का भोजन न किया जाए। इससे पाचन संबंधी परेशानी अपने-आप दूर हो जाती हैं।

उपरोक्त नियम सरल होने के साथ साथ व्यवहारिक भी हैं। इन्हें अपनाना बहुत ही आसान है। आप भी उक्त नियमों को अपनाकर अपने पाचन-तंत्र को सदैव स्वस्थ रख सकते हैं और पेट के रोगों से बच सकते हैं।

वैद्य पंडित पुष्पराज त्रिपाठी
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