श्री कनिष्क ज्योतिष & कर्मकांड सेवा केंद्र डेगाना

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💠विवाह💠दुर्गापाठ💠अनुष्ठान (ग्रहशांति/गृहप्रवेश)💠रूद्राभिषेक 💠पूजा-अर्चना 💠वास्तुशास्त्र/वास्तुशांति/वास्तुहवन💠देव प्राणप्रतिष्ठा 💠अखंड रामचरित मानस पाठ(संगीतमय)💠सुंदरकांड पाठ (संगीतमय)💠वाल्मीकि रामायण पाठ 💠वाल्मीकि सुंदरकांड पाठ 💠श्रीमद्भागवत

02/01/2026

श्रीखोजीजी महाराज: संक्षिप्त परिचय
​जन्म: 16वीं शताब्दी, मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
​स्थान: ईटाखोई (किशनगढ़, राजस्थान)।
​बचपन का नाम: चतुर्भुज।
​पिता: चेतनदासजी (वत्स गोत्रीय लापस्या जोशी)।
​गुरु: श्री अनन्तानन्दजी के शिष्य श्री गयेशजी (अथवा माधवदासजी)।
​प्रसिद्ध नाम: 'खोजीजी' (गुरु की खोज करने के कारण)।
​प्रमुख जीवन घटनाएँ और चमत्कार
​गंगा-यमुना के दर्शन: मात्र 11 वर्ष की आयु में, हरिद्वार जाने के हठ के दौरान, 'धानणी के तालाब' पर ही उन्हें साक्षात् गंगा-यमुना ने दर्शन दिए। उनके पूर्वजों की अस्थियां तालाब में डालने पर ही हरिद्वार पहुँच गईं, जिसका प्रमाण उनके साथियों ने वहाँ देखा।
​पथवारी के जौ का प्रमाण: जब लोग उनकी यात्रा पर संदेह कर रहे थे, तब उनके द्वारा बोए गए 'जौ' (यव) चमत्कारिक रूप से बड़े हो गए, जो उनकी सिद्धता का प्रमाण बना।
​तपस्या: उन्होंने पुष्कर के पास 'नाग पहाड़' की गुफा में और फिर 'बालू के घड़े' पर तपस्या की। आज भी पुष्कर में "खोजीजी का घड़ा" और चतुर्भुज मंदिर प्रसिद्ध है।
​राव मुकुन्दसिंह का गर्व भंग: पालडी के जागीरदार मुकुन्दसिंह ने जब उन्हें स्थान छोड़ने को कहा, तो खोजीजी ने अपनी चद्दर में धूनी की अग्नि भरकर अपनी शक्ति दिखाई, जिससे राव उनके शिष्य बन गए।
​गंगा का प्रकटीकरण: पालडी में उनके आह्वान पर गंगाजी प्रकट हुईं। आज भी "खोजीजी की बावड़ी" का मीठा जल इसका साक्ष्य है।
​परम भक्त रानाबाई: उनकी शिष्या रानाबाई (हरनावा गाँव) एक महान सिद्ध संत हुईं, जिन्होंने प्रेतराज का दमन किया और आज राजस्थान में लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं।
​भगवान का 'कांजर' रूप में दर्शन: भगवान श्रीकृष्ण ने एक अछूत (कांजर) का वेश धरकर उन्हें दर्शन दिए। जब लोगों ने संदेह किया, तो खोजीजी ने स्पष्ट किया कि वह साक्षात् 'कमलाकान्त' थे।
​आध्यात्मिक शिक्षा और रचनाएँ
​खोजीजी महाराज ने अपने गुरु के अंतिम समय की घटना (आम के फल में जीव) के माध्यम से "अन्ते या मतिः सा गतिः" (अंत समय में जैसी मति वैसी गति) के गूढ़ रहस्य को समझाया।
​प्रमुख रचनाएँ: श्री उपदेश वल्लरी और श्री जनकजा प्रपत्तिसार।
​प्रमुख पीठ: पालडी (मारवाड़), त्रिवेणी धाम (जयपुर), डाकोर (गुजरात), अयोध्या और जनकपुर।

श्रीखोजीजी महाराज: संक्षिप्त परिचय​जन्म: 16वीं शताब्दी, मार्गशीर्ष पूर्णिमा।​स्थान: ईटाखोई (किशनगढ़, राजस्थान)।​बचपन का ...
02/01/2026

श्रीखोजीजी महाराज: संक्षिप्त परिचय
​जन्म: 16वीं शताब्दी, मार्गशीर्ष पूर्णिमा।
​स्थान: ईटाखोई (किशनगढ़, राजस्थान)।
​बचपन का नाम: चतुर्भुज।
​पिता: चेतनदासजी (वत्स गोत्रीय लापस्या जोशी)।
​गुरु: श्री अनन्तानन्दजी के शिष्य श्री गयेशजी (अथवा माधवदासजी)।
​प्रसिद्ध नाम: 'खोजीजी' (गुरु की खोज करने के कारण)।
​प्रमुख जीवन घटनाएँ और चमत्कार
​गंगा-यमुना के दर्शन: मात्र 11 वर्ष की आयु में, हरिद्वार जाने के हठ के दौरान, 'धानणी के तालाब' पर ही उन्हें साक्षात् गंगा-यमुना ने दर्शन दिए। उनके पूर्वजों की अस्थियां तालाब में डालने पर ही हरिद्वार पहुँच गईं, जिसका प्रमाण उनके साथियों ने वहाँ देखा।
​पथवारी के जौ का प्रमाण: जब लोग उनकी यात्रा पर संदेह कर रहे थे, तब उनके द्वारा बोए गए 'जौ' (यव) चमत्कारिक रूप से बड़े हो गए, जो उनकी सिद्धता का प्रमाण बना।
​तपस्या: उन्होंने पुष्कर के पास 'नाग पहाड़' की गुफा में और फिर 'बालू के घड़े' पर तपस्या की। आज भी पुष्कर में "खोजीजी का घड़ा" और चतुर्भुज मंदिर प्रसिद्ध है।
​राव मुकुन्दसिंह का गर्व भंग: पालडी के जागीरदार मुकुन्दसिंह ने जब उन्हें स्थान छोड़ने को कहा, तो खोजीजी ने अपनी चद्दर में धूनी की अग्नि भरकर अपनी शक्ति दिखाई, जिससे राव उनके शिष्य बन गए।
​गंगा का प्रकटीकरण: पालडी में उनके आह्वान पर गंगाजी प्रकट हुईं। आज भी "खोजीजी की बावड़ी" का मीठा जल इसका साक्ष्य है।
​परम भक्त रानाबाई: उनकी शिष्या रानाबाई (हरनावा गाँव) एक महान सिद्ध संत हुईं, जिन्होंने प्रेतराज का दमन किया और आज राजस्थान में लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं।
​भगवान का 'कांजर' रूप में दर्शन: भगवान श्रीकृष्ण ने एक अछूत (कांजर) का वेश धरकर उन्हें दर्शन दिए। जब लोगों ने संदेह किया, तो खोजीजी ने स्पष्ट किया कि वह साक्षात् 'कमलाकान्त' थे।
​आध्यात्मिक शिक्षा और रचनाएँ
​खोजीजी महाराज ने अपने गुरु के अंतिम समय की घटना (आम के फल में जीव) के माध्यम से "अन्ते या मतिः सा गतिः" (अंत समय में जैसी मति वैसी गति) के गूढ़ रहस्य को समझाया।
​प्रमुख रचनाएँ: श्री उपदेश वल्लरी और श्री जनकजा प्रपत्तिसार।
​प्रमुख पीठ: पालडी (मारवाड़), त्रिवेणी धाम (जयपुर), डाकोर (गुजरात), अयोध्या और जनकपुर।

इनके साथ शास्त्री अनिल कुमार इंदौरिया – मुझे लगातार सराहना मिल रही है! मैं लगातार 17 महीनों से टॉप फ़ैन की लिस्ट में बना...
31/12/2025

इनके साथ शास्त्री अनिल कुमार इंदौरिया – मुझे लगातार सराहना मिल रही है! मैं लगातार 17 महीनों से टॉप फ़ैन की लिस्ट में बना हुआ हूँ. 🎉

30/12/2025

. #एकादशी_व्रत_शंका_समाधान :
श्री हरि को प्रिय एकादशी आदि कुछ व्रतों को वेध रहित तिथियों में ही करना चाहिए अर्थात शुद्ध तिथि में ही व्रत करना चाहिए ! कोई भी तिथि उदया तिथि मिलने पर ही शुद्ध मानी जाती है ! परन्तु चन्द्रमा से सम्बन्धित व्रत जैसे गणेश चतुर्थी, करवा चौथ, आदि चन्द्रोदय पर वह तिथि मिलने पर ही शुद्ध होती हैं !
एकादशी दो प्रकार की होती है सम्पूर्णा तथा विद्धा इसमे विद्धा भी दो प्रकार की होती है पूर्व विद्धा और पर विद्धा, पूर्व विद्धा अर्थात दशमी मिश्रित एकादशी जो परित्याज्य होती है !

सम्पूर्णा वह एकादशी होती है जिसमें सूर्योदय एकादशी तिथि में हो और अगले सूर्योदय के पूर्व ही एकादशी तिथि समाप्त हो जाय !

परन्तु तीसरे प्रकार की एकादशी जिसे विशेष रूप से पर विद्धा ( द्वादशी युक्त एकादशी ) कहते हैं, शुद्ध होने के कारण व्रत उपवास योग्य सर्वथा उपयुक्त होती है, किन्तु दशमी युक्त पूर्व विद्धा एकादशी में कभी भी उपवास नहीं करना चाहिए !
इन्हे ही विद्धा तिथि कहते हैं !

#सौरधर्मोत्तर !
अरुणोदय काल में अर्थात सूर्योदय से पहले चार दण्ड-काल ( सूर्योदय से 1 घण्टा 36 मिनट पूर्व तक ) में यदि दशमी नाममात्र भी पड़ रही हो तब उक्त एकादशी पूर्व विद्धा दोष से दोषयुक्त होने के कारण सर्वथा वर्जनीय है ! भविष्य पुराण !

द्वादशी मिश्रित एकादशी सर्वदा ही ग्रहण योग्य है -
"द्वादशी मिश्रित ग्राह्या सर्वत्रैकादशी तिथि: !" - पद्मपुराण !

नारद पुराण मे वर्णित है कि जिस समय बहुवाक्य-विरोध के कारण संदेह उपस्थित हो उस समय द्वादशी में उपवास करते हुए त्रयोदशी में पारण करना चाहिए किन्तु "जिस शास्त्र में दशमी विद्धा एकादशी पालन कि बात कही गयी है वह स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा कहे होने पर भी शास्त्र रूप मे गण्य नहीं है" ! -नारद पुराण !

धर्मसिंधु के अनुसार एकादशी दो प्रकार की होती है- 1. विद्धा और 2. शुद्धा !
यदि एकादशी तिथि दशमी तिथि से युक्त हो तब वह विद्धा एकादशी कही जाती है, और यदि सूर्योदय काल में एकादशी द्वादशी तिथि से युक्त होती है तब वह शुद्धा एकादशी कही जाती है अर्थात अरुणोदयकाल में दशमी के वेध से रहित एकादशी हो तब उसे शुद्धा एकादशी माना जाता है ! - धर्मसिंधु !

अग्नि पुराण के अनुसार द्वादशी – विद्धा एकादशी में स्वयं श्रीहरि स्थित होते हैं, इसलिये द्वादशी – विद्धा एकादशी के व्रत का त्रयोदशी को पारण करने से मनुष्य सौ यज्ञों का पुण्यफल प्राप्त करता हैं ! जिस दिन के पूर्वभाग में एकादशी कलामात्र अविशिष्ट हो और शेषभाग में द्वादशी व्याप्त हो, उस दिन एकादशी का व्रत करके त्रयोदशी में पारण करने से सौ यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है ! दशमी- विद्धा एकादशी को कभी उपवास नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह नरक की प्राप्ति करानेवाली है ! . - अग्नि पुराण !

पद्मपुराण मे भगवन एवं ब्रह्मा जी के संवाद में वर्णित है - कि दशमी विद्धा एकादशी दैत्यों कि पुष्टिवर्द्धिनी है इसमें कोई संदेह नहीं है !

ब्रह्म पुराण मे धृतराष्ट्र के प्रति मैत्रेय मुनि कि उक्ति में देखा जाता है कि पहले पत्नी के साथ उन्होंने दशमीयुक्त एकादशी में व्रतोपवास किया था जिसके कारण उनके 100 पुत्रों का विनाश हो गया था !
स्कंदपुराण मे स्पष्ट वर्णित है कि जो लोग दशमी द्वारा दूषित हरिवासर मे उपवास करने के लिए उपदेश करते हैं वह सब पाप पुरुष निश्चय ही शुक्र माया द्वारा मोहित हुए हैं ऐसा जानना शास्त्र सम्मत है !

उक्त पुराण मे ही उमा महेश्वर संवाद में भीे कहा गया है कि जो लोग दशमी विद्धा एकादशी का अनुष्ठान करते हैं वह निश्चय ही नरकवास का रास्ता चुनने की इच्छा करते हैं !

प्राय: सभी शास्त्रों में दशमी से युक्त एकादशी व्रत करने का निषेध माना गया है ! यदि शुद्धा एकादशी सूर्योदय से दो घड़ी तक भी मिल रही हो और वह द्वादशी तिथि से युक्त हो तब भी उसे ही व्रत के लिए ग्रहण करना चाहिए ! परन्तु दशमी से युक्त एकादशी का व्रत कभी नहीं रखना चाहिए !

सामान्य जन साधारण को शुद्धा एकादशी का व्रत रखना ही पुण्यदायक माना गया है !

गरूण पुराण के अध्याय 125 में कहा गया है कि गांधारी ने दशमी से युक्त एकादशी (विद्धा एकादशी) का व्रत रखा लिया था ऐसा करने पर ही उन्हे अपने सभी 100 पुत्रों का वध अपने जीवनकाल में ही देखना पड़ा ! इसलिए दशमी से युक्त एकादशी का व्रत कभी नहीं रखना चाहिए ! यदि कभी ऐसा होता है कि किसी महीने में दशमी से युक्त एकादशी पड़ती है तब मन में संदेह न रखें बल्कि द्वादशी का व्रत रखकर त्रयोदशी में पारण कर व्रत समाप्त करें !

शुक्लपक्ष की एकादशी में पुनर्वसु, श्रवण, रोहिणी और पुष्य नक्षत्र हो, तब वह बहुत शुभ फल प्रदान करने वाली होती है !

त्रिस्पृशा, जिसमें एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथि भी सम्मिलित हो रही हो, वह बड़ी शुभ तिथि मानी जाती है ! कोई ऐसी एकादशी तिथि का व्रत एक बार भी कर ले, तो उसे एक सौ एकादशी करने का फल प्राप्त होता है !

जो लोग एकादशी व्रत नहीं कर पाते हैं, उन्हें इस दिन सात्विक तो रहना ही चाहिए !

एकादशी के दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अण्डा आदि मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए ! छल-कपट और मैथुन आदि का त्याग भी जरूरी है ! एकादशी को चावल भी नहीं खाना चाहिए ।
कनिष्क ज्योतिष & वास्तु सेवा केंद्र डेगाना जंक्शन नागौर राजस्थान

30/12/2025

वास्तु शास्त्र के अनुसार वास्तु की उत्पति कैसे हुई।

पंचक विचार।
24/12/2025

पंचक विचार।

24/12/2025

मैं आज आपको बताने वाला हूं जमीन का सौदा किन-किन नक्षत्र में किन वारों में को करना चाहिए जिससे अपने जमीन का सौदा अच्छा और उत्तम हो

24/12/2025

मैं आपको बताने वाला हूं यात्रा में शुभ शगुन विचार किस प्रकार किया जाता है क्या चीज आपको जब यात्रा करते हो मिलनी चाहिए जिससे आपकी यात्रा मंगल में हो

24/12/2025

मैं आपको बताने जा रहा हूं यात्रा करते समय जो वस्तुएं या जो व्यक्ति आपको मिले वह इस प्रकार के नहीं होने चाहिए नहीं तो आपकी यात्रा अमंगलकारी होती है

24/12/2025

सदा न संग सहेलियाँ:
सखियों का साथ हमेशा नहीं रहता।
सदा न राजा देश:
राजा का शासन भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न जुग में जीवणा:
युगों-युगों तक जीवन नहीं रहता।
सदा न काला केश:
बाल हमेशा काले नहीं रहते (अर्थात बुढ़ापा आता है)।
सदा न फूलै केतकी:
केतकी का फूल हमेशा नहीं खिलता।
सदा न सावन होय:
हमेशा सावन का मौसम नहीं रहता।
सदा न विपदा रह सके:
विपदा हमेशा नहीं रहती।
सदा न सुख भी होय:
सुख भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न मौज बसंत री:
वसंत की मस्ती हमेशा नहीं रहती।
सदा न ग्रीष्म भाण:
ग्रीष्म ऋतु का तेज भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न जोवन थिर रहे:
जवानी हमेशा नहीं रहती।
सदा न संपत माण:
संपत्ति का मान भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह:
किसी का प्रेम भी हमेशा नहीं रहता।
ढलते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छांह:
जैसे पेड़ की छाया ढल जाती है, वैसे ही सब कुछ बदल जाता है।

24/12/2025

सदा न संग सहेलियाँ:
सखियों का साथ हमेशा नहीं रहता।
सदा न राजा देश:
राजा का शासन भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न जुग में जीवणा:
युगों-युगों तक जीवन नहीं रहता।
सदा न काला केश:
बाल हमेशा काले नहीं रहते (अर्थात बुढ़ापा आता है)।
सदा न फूलै केतकी:
केतकी का फूल हमेशा नहीं खिलता।
सदा न सावन होय:
हमेशा सावन का मौसम नहीं रहता।
सदा न विपदा रह सके:
विपदा हमेशा नहीं रहती।
सदा न सुख भी होय:
सुख भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न मौज बसंत री:
वसंत की मस्ती हमेशा नहीं रहती।
सदा न ग्रीष्म भाण:
ग्रीष्म ऋतु का तेज भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न जोवन थिर रहे:
जवानी हमेशा नहीं रहती।
सदा न संपत माण:
संपत्ति का मान भी हमेशा नहीं रहता।
सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह:
किसी का प्रेम भी हमेशा नहीं रहता।
ढलते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छांह:
जैसे पेड़ की छाया ढल जाती है, वैसे ही सब कुछ बदल जाता है।

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