23/04/2026
प्रश्न : क्या पितरों में केवल पुरुष (जैसे दादा, पिता) ही माने जाते हैं, या महिलाओं (जैसे माता, दादी) को भी शामिल किया जाता है? क्या हम जप या तर्पण में उन्हें भी समर्पित कर सकते हैं?
उत्तर :
यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण और तार्किक है। अक्सर 'पितर' शब्द सुनकर लोग सोचते हैं कि इसका संबंध केवल 'पिता' या पुरुष वंश से है। लेकिन सनातन धर्म और आध्यात्मिक विज्ञान की दृष्टि से इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक और गहरा है।
आइए, इस भ्रम को बहुत सरलता और स्पष्टता के साथ दूर करते हैं —
पहली बात — 'पितर' शब्द का वास्तविक अर्थ
हाँ, यह सही है कि शब्दकोश में 'पितर' का अर्थ पिता या पुरुष पूर्वजों से लिया जाता है। लेकिन शास्त्रीय और आध्यात्मिक संदर्भ में, 'पितर' शब्द का उपयोग उस सम्पूर्ण ऊर्जा धारा के लिए किया जाता है जिससे हमारा अस्तित्व अस्तित्व में आया है।
👉 पितर का अर्थ है — आपके समस्त पूर्वज (Ancestors)।
👉 इसमें शामिल हैं — पिता, दादा, परदादा (पितृ पक्ष)।
👉 और इसके साथ ही — माता, दादी, नानी, परनानी (मातृ पक्ष)।
संक्षेप में, स्त्री और पुरुष दोनों ही 'पितृगण' का अभिन्न अंग हैं। आपका शरीर आधा माता से और आधा पिता से बना है, इसलिए दोनों की ऊर्जा आपके भीतर समान रूप से बसी हुई है।
उदाहरण: जैसे एक पेड़ की वृद्धि के लिए जड़ें (Roots) जिम्मेदार होती हैं। चाहे वे जड़ें मिट्टी के किस हिस्से में हों, वे सभी पेड़ को पोषण देती हैं। वैसे ही, मातृ और पितृ दोनों पक्ष के पूर्वज आपको जीवन और ऊर्जा प्रदान करते हैं।
दूसरी बात — क्या महिलाओं को तर्पण/जप समर्पित किया जा सकता है?
बिल्कुल, हाँ।
जब आप पितृ तर्पण करते हैं या कोई जप करते हैं, तो उसका उद्देश्य उन सभी आत्माओं को शांति और तृप्ति प्रदान करना है जो आपके वंश से जुड़ी हैं।
👉 तर्पण में लिंग का भेद नहीं, बल्कि 'रक्त और संबंध' का महत्व होता है।
👉 इसलिए, माता, दादी, नानी और अन्य महिला पूर्वजों को भी उतनी ही श्रद्धा के साथ जल अर्पित किया जा सकता है और स्मरण किया जा सकता है।
वास्तव में, मातृ शक्ति (Mother Energy) सृजन और पालन-पोषण की प्रतीक है। उनकी कृपा के बिना पितृ पक्ष का आशीर्वाद अधूरा माना जाता है।
तीसरी बात — शास्त्रीय दृष्टिकोण और मंत्र भाव
अगर हम प्राचीन ग्रंथों और मंत्रों के भाव को देखें, तो वहां स्पष्टता मिलती है।
अक्सर तर्पण के समय यह भाव लिया जाता है:
"मातृ-पितृ-पूर्वजाः सर्वे, तृप्तिं यान्तु मम अर्पणात्"
अर्थात — मेरे द्वारा किया गया यह अर्पण मेरी माता, पिता और उनके सभी पूर्वजों (स्त्री-पुरुष दोनों) को तृप्त करे।
इससे स्पष्ट है कि कर्मकांड की दृष्टि से भी महिला पूर्वजों को शामिल करना न केवल सही है, बल्कि आवश्यक भी है।
चौथी बात — नाम न पता हो तो क्या करें?
अक्सर लोग चिंता करते हैं कि उन्हें अपनी नानी या परनानी का नाम नहीं पता, तो क्या वे उन्हें तर्पण दे सकती हैं?
👉 उत्तर है — हाँ, निश्चित रूप से।
👉 आध्यात्मिकता में 'भाव' और 'इरादा' (Intention) सबसे शक्तिशाली होता है।
आप मन ही मन या ऊंची आवाज में यह संकल्प ले सकते हैं:
"मेरे मातृ पक्ष और पितृ पक्ष के सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों, दादा-दादी, नाना-नानी और उनके पूर्वजों को मेरा यह नमन और तर्पण समर्पित है।"
ब्रह्मांड और ऊर्जा की भाषा नामों से ज्यादा 'आवृत्ति' (Frequency) और 'भाव' को समझती है। आपका शुद्ध भाव सीधे उन तक पहुंच जाता है।
पाँचवीं बात — पितर 'लिंग' नहीं, 'ऊर्जा' हैं
सबसे गहरी समझ यह है कि पितर कोई शारीरिक पहचान नहीं, बल्कि एक ऊर्जात्मक कड़ी (Energy Link) हैं।
👉 जहाँ से आपका शरीर आया है, वे आपके पितर हैं।
👉 जहाँ से आपके संस्कार और गुण आए हैं, वे आपके पितर हैं।
चूंकि महिलाएं (माता, दादी) जीवन देने वाली और संस्कार देने वाली मुख्य स्रोत हैं, इसलिए उन्हें पितृ पूजा से बाहर रखना वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से असंगत है।
छठी बात — विशेष रूप से मातृ पक्ष को कैसे याद करें?
यदि आप चाहें, तो आप मातृ पक्ष के लिए विशेष प्रार्थना भी कर सकती हैं।
👉 अमावस्या या विशेष तिथियों पर, जब आप तर्पण करें, तो थोड़ा अतिरिक्त जल मातृ पक्ष के लिए अर्पित करें।
👉 प्रार्थना करें: "हे मेरी मातृ कुल की शक्तियों, हे मेरी दादी और नानी, आप मुझे अपने आशीर्वाद से ओत-प्रोत करें।"
यह आपके भीतर की स्त्री ऊर्जा (Feminine Energy) को संतुलित करने और परिवार में सुख-शांति लाने में बहुत सहायक होता है।
सातवीं बात — श्रद्धा में भेद नहीं
याद रखें, भगवान और ऊर्जा किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।
👉 आपकी श्रद्धा जितनी निस्वार्थ और शुद्ध होगी, आपका संदेश उतनी ही तेजी से और प्रभावी ढंग से अपने गंतव्य तक पहुंचेगा।
👉 चाहे वह पितृ पक्ष हो या मातृ पक्ष, दोनों ही आपके अस्तित्व के आधार स्तंभ हैं।
आखिरी बात
भाई/बहन, इस भ्रम में न पड़ें कि पितर केवल पुरुष हैं।
सच्चाई यह है:
👉 पितर = सभी पूर्वज (स्त्री + पुरुष)।
👉 तर्पण और जप में सभी को समान अधिकार और सम्मान प्राप्त है।
दोनों पक्षों को याद करना, दोनों का आशीर्वाद लेना — यही पूर्णता है। यही सनातन धर्म का संतुलित मार्ग है।
जय पितर देव 🙏
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