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Does Paracetamol During Pregnancy Cause Autism: प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासिटामोल लेने को लेकर हाल के दिनों में कई दावे स...
22/01/2026

Does Paracetamol During Pregnancy Cause Autism: प्रेग्नेंसी के दौरान पैरासिटामोल लेने को लेकर हाल के दिनों में कई दावे सामने आए हैं. यहां तक कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं ने भी यह कह दिया कि प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल लेने से बच्चों में ऑटिज़्म जैसी दिमागी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. लेकिन अब इस दावे पर बड़ा फैक्ट-चेक सामने आया है. चलिए आपको बताते हैं कि क्या सच में यह खतरनाक है या फिर इसको लेकर फेक दावों की बौछार लगा दी गई थी.
रिसर्च में निकला कोई खतरा नहीं
मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित एक रिव्यू में साफ कहा गया है कि गर्भावस्था के दौरान पैरासिटामोल लेने से बच्चों में ऑटिज्म, एडीएचडी या आर्टिफिशियल डिसेबिलिटी का कोई क्लिनिकली महत्वपूर्ण खतरा नहीं बढ़ता. इस स्टडी में अब तक हुए रिसर्च की गहराई से रिव्यू की गई. रिसर्चर का कहना है कि पहले जो स्टडी पैरासिटामोल को दिमागी बीमारियों से जोड़ती थीं, उनमें कई तरह की खामियां थीं. इनमें डेटा कन्फ्यूज़न, गलत याददाश्त पर आधारित जानकारी और दूसरे हेल्थ फैक्टर्स का असर शामिल था, जिससे नतीजे भरोसेमंद नहीं माने जा सकते.
इस नई रिव्यू के मुताबिक, बच्चों में ऑटिज़्म या न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याओं की वजह पारिवारिक और जेनेटिक फैक्टर्स ज्यादा हो सकते हैं. यानी एक ही परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे लक्षण दिखना ज्यादा तर्कसंगत वजह है, न कि पैरासिटामोल का सीधा असर. रिसर्च में उन स्टडीज को ज्यादा अहमियत दी गई, जिनमें एक ही मां की दो प्रेग्नेंसी की तुलना की गई. एक में पैरासिटामोल लिया गया और दूसरी में नहीं. ऐसे स्टडी जेनेटिक्स और घर के माहौल जैसे फैक्टर्स को बेहतर तरीके से अलग कर पाते हैं.
तीन स्टेप में बांटा गया है
रिसर्चर ने पैरासिटामोल और प्रेग्नेंसी से जुड़े स्टडीज को तीन स्टेप्स में जांचा. पहले स्टेप में गर्भवती महिलाओं द्वारा पैरासिटामोल के इस्तेमाल से जुड़ी 4,147 स्टडी को देखा गया, जिनमें से 4,092 को इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उनके नतीजे इस विषय से सीधे तौर पर जुड़े नहीं थे. दूसरे स्टेप में 55 फुल टेक्स्ट रिसर्च पेपर्स की गहराई से रिव्यू की गई. इनमें से भी 12 स्टडी को डिजाइन की कमी, डेटा अधूरा होने या विषय से मेल न खाने की वजह से हटा दिया गया.
अंतिम स्टेप में 43 स्टडी को व्यवस्थित तरीके से रिव्यू किया गया. इनमें से 17 हाई क्वालिटी वाली रिसर्च को डिटेल स्टैटिक्स एनालिसिस के लिए चुना गया, जिसमें खासतौर पर भाई-बहनों की तुलना वाले स्टडीज को प्राथमिकता दी गई, ताकि जेनेटिक और पारिवारिक प्रभाव को अलग किया जा सके.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
स्टडी की सीनियर राइटर प्रोफेसर अस्मा खलील का कहना है कि बिना पुख्ता सबूत ऐसे दावे करना गर्भवती महिलाओं में बेवजह डर पैदा कर सकता है. मौजूदा साइंटफिक साक्ष्य इन दावों का समर्थन नहीं करते. एक्सपर्ट ने दोहराया है कि मौजूदा मेडिकल गाइडलाइंस के तहत डॉक्टर की सलाह से लिया गया पैरासिटामोल प्रेग्नेंसी में सुरक्षित माना जाता है, दर्द या बुखार जैसी स्थिति में यह अब भी एक भरोसेमंद विकल्प है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Which Vegetable Helps Increase Height: लंबाई भले ही काफी हद तक जेनेटिक्स पर निर्भर करती हो, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं क...
22/01/2026

Which Vegetable Helps Increase Height: लंबाई भले ही काफी हद तक जेनेटिक्स पर निर्भर करती हो, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सही पोषण के बिना शरीर का संतुलित विकास संभव नहीं है. खासकर ग्रोथ एज में हड्डियों, जोड़ों और मांसपेशियों को मजबूत रखने के लिए कुछ सब्ज़ियों का नियमित सेवन बेहद जरूरी होता है. चलिए आपको कुछ सब्जियों और फूड्स के बारे में बताते हैं, जो बच्चों की हाइट ग्रोथ में मददगार साबित होंगी.
हरी पत्तेदार
पालक, केल, पत्ता गोभी और अरुगुला जैसी हरी पत्तेदार सब्ज़ियां लंबाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं. इनमें कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करते हैंय साथ ही इनमें मौजूद विटामिन K बोन डेंसिटी बढ़ाने में सहायक माना जाता है, जो ग्रोथ के लिए जरूरी है.
केल
केल को सुपरफूड माना जाता है. इसमें कैल्शियम और विटामिन C अच्छी मात्रा में होता है, जो हड्डियों की मजबूती और शरीर के विकास को सपोर्ट करता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ग्रोथ एज में केल को डाइट में शामिल करने से हड्डियों का विकास बेहतर हो सकता है.
पत्ता गोभी और अरुगुला
पत्ता गोभी पाचन तंत्र को मजबूत करती है, जिससे शरीर पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से एब्ज़ॉर्ब कर पाता है. वहीं अरुगुला में मौजूद कैल्शियम और मैग्नीशियम हड्डियों की ग्रोथ और मजबूती में मदद करते हैं.
शकरकंद
शकरकंद विटामिन A से भरपूर होता है, जो हड्डियों की सेहत के लिए जरूरी माना जाता है. इसके अलावा इसमें मौजूद फाइबर गट हेल्थ को बेहतर बनाता है, जिससे शरीर को ग्रोथ से जुड़े पोषक तत्व सही तरह से मिल पाते हैं. आप इसे उचित मात्रा में डाइट में शामिल कर सकते हैं.
बीन्स और क्विनोआ
बीन्स पौधों से मिलने वाला अच्छा प्रोटीन और आयरन का स्रोत हैं, जो टिश्यू ग्रोथ में मदद करते हैं. वहीं क्विनोआ में मौजूद मैग्नीशियम और फॉस्फोरस हड्डियों की मजबूती को सपोर्ट करते हैं, जिससे लंबाई के विकास में मदद मिल सकती है. आप इसको डाइट में शामिल कर सकते हैं.
ध्यान रखने वाली बातयह साफ है कि एक तय उम्र के बाद लंबाई बढ़ना संभव नहीं होता, लेकिन सही सब्ज़ियों से भरपूर डाइट हड्डियों को मजबूत बनाकर ग्रोथ को सपोर्ट जरूर करती है और लंबाई को बनाए रखने में मदद करती है. अगर लंबाई बढ़ाने या बच्चों की ग्रोथ को लेकर चिंता है, तो हरी पत्तेदार सब्जियों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. सही डाइट के साथ ये सब्जियां शरीर के विकास में के लिए जरूरी होती हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Beer Allergy Symptoms In Adults: बियर के शौकीनों को अक्सर लगता है कि बियर में ज्यादातर पानी होता है, इसलिए इससे कोई नुकस...
22/01/2026

Beer Allergy Symptoms In Adults: बियर के शौकीनों को अक्सर लगता है कि बियर में ज्यादातर पानी होता है, इसलिए इससे कोई नुकसान नहीं होगा. लेकिन सच यह है कि बियर में मौजूद कुछ तत्व और उसके साथ खाई जाने वाली चीजें मिलकर एलर्जी या गंभीर रिएक्शन का कारण बन सकती हैं. चलिए आपको बताते हैं कि किन चीजों को बियर के साथ खाने से बचना चाहिए, वरना इससे एलर्जी का खतरा रहता है.
गेहूं और जौ से बनी चीजें न खाएं
बियर में माल्टेड जौ का इस्तेमाल होता है. ऐसे में बियर के साथ ब्रेड, पिज़्ज़ा, पास्ता, बिस्कुट जैसी गेहूं, जौ से बनी चीजें खाने से एलर्जी का खतरा बढ़ सकता है. इससे खुजली, पेट दर्द, उल्टी या सांस लेने में दिक्कत हो सकती है.
यीस्ट वाले फूड से बचें
बियर में पहले से यीस्ट मौजूद होता हैय ऐसे में पिज़्ज़ा, बर्गर बन और बेकरी आइटम जैसे यीस्ट वाले फूड खाने से शरीर में रिएक्शन तेज हो सकता है, जिससे गैस, उल्टी और स्किन एलर्जी हो सकती है.
पैकेट वाले नमकीन और चिप्स न खाएं
फ्लेवर्ड चिप्स और प्रोसेस्ड स्नैक्स में मौजूद प्रिज़र्वेटिव और केमिकल बियर के साथ मिलकर पेट और स्किन से जुड़ी एलर्जी को बढ़ा सकते हैं.
ज्वार से बनी चीजें अवॉयड करें
कुछ बियर में ज्वार का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में ज्वार की रोटी या ज्वार से बने स्नैक्स खाने से कुछ लोगों में एलर्जी के लक्षण सामने आ सकते हैं.
बियर के साथ दूसरी शराब न मिलाएं
बियर के साथ व्हिस्की, रम या वोडका पीने से अल्कोहल इंटॉलरेंस के लक्षण तेज हो सकते हैं, जैसे लो ब्लड प्रेशर, उल्टी, चक्कर और सांस की परेशानी हो सकती है.
बियर से एलर्जी होना कम मामलों में होता है, लेकिन बियर के साथ गलत चीजें खाना कई बार गंभीर रिएक्शन का कारण बन सकता है. अगर शरीर बार-बार संकेत दे रहा है, तो बियर के साथ खाने वाली चीजों को बदलना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है.
एलर्जी के लक्षण क्या हो सकते हैं?
अगर बियर पीने के बाद ये लक्षण दिखें, तो सावधान हो जाना चाहिए-

चेहरे या शरीर पर लालिमा और खुजली
पित्ती निकलना
छींक आना, सांस लेने में दिक्कत
सीने में जकड़न
मतली, उल्टी या दस्त
पेट दर्द और सूजन

कुछ मामलों में लक्षण तुरंत दिखते हैं और स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।
कहीं ये शराब से एलर्जी तो नहीं?
कई लोगों को लगता है कि उन्हें बियर से एलर्जी है, जबकि असल में उन्हें अल्कोहल इंटॉलरेंस होती है. इसमें शरीर शराब को सही तरीके से तोड़ नहीं पाता. ऐसे लोगों को थोड़ी सी शराब पीते ही नाक बंद होना, चेहरा लाल होना, उल्टी या लो ब्लड प्रेशर जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. इसका एक ही इलाज है शराब से पूरी तरह दूरी.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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Which Meat Is Better For Protein Intake: प्रोटीन हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन हर प्रोटीन स्रोत एक जै...
22/01/2026

Which Meat Is Better For Protein Intake: प्रोटीन हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन हर प्रोटीन स्रोत एक जैसा फायदेमंद नहीं होता. खासकर जब बात नॉन-वेज प्रोटीन की आती है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि चिकन बेहतर है या मटन. दोनों ही लोकप्रिय हैं, लेकिन सेहत के लिहाज से इनमें बड़ा फर्क माना जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि आपके लिए कौन सा फायदेमंद माना जाता है.
मटन में प्रोटीन के साथ फैट भी ज्यादा
अक्टूबर 2024 में आई एक स्टडी, जिसका ज़िक्र नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में मिलता है उसमें में हाई-फैट डाइट का असर चूहों पर देखा गया. इस रिसर्च में 60 एल्बिनो चूहों को अलग-अलग ग्रुप में बांटा गया और उनके वजन, कैलोरी इनटेक, ब्लड रिपोर्ट और लिवर की स्थिति का स्टडी किया गया. नतीजों में सामने आया कि जिन चूहों को मटन फैट दिया गया, उनमें कैलोरी इनटेक और वजन दोनों ज्यादा बढ़े. इसके अलावा ब्लड शुगर लेवल बढ़ा, ग्लूकोज़ टॉलरेंस खराब हुई और ट्राइग्लिसराइड्स, कोलेस्ट्रॉल व एलडीएल का स्तर भी ऊपर चला गया, जबकि एचडीएल कम पाया गया. लिवर से जुड़े एंजाइम भी बढ़े, जो लिवर पर निगेटिव असर का संकेत है. इन निष्कर्षों से यह साफ होता है कि मटन सिर्फ प्रोटीन ही नहीं, बल्कि फैट भी काफी मात्रा में देता है, जो लंबे समय तक नियमित सेवन में नुकसानदेह हो सकता है.
चिकन हल्का और लीन प्रोटीन
अब बात करते हैं चिकन की. हेल्थलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, चिकन में कैलोरी की मात्रा उसके हिस्से पर निर्भर करती है. ब्रेस्ट में सबसे ज्यादा प्रोटीन होता है, इसके बाद थाई, विंग्स और ड्रमस्टिक आते हैं. इसके बावजूद चिकन को हाई-कैलोरी मीट नहीं माना जाता है. नेशनल चिकन काउंसिल के अनुसार, चिकन एक लीन प्रोटीन है, यानी इसमें फैट की मात्रा कम होती है. इसमें कार्बोहाइड्रेट और फाइबर नहीं होते, जिससे यह उन लोगों के लिए भी बेहतर विकल्प बन जाता है, जिन्हें डाइट को लेकर सावधानी रखनी पड़ती है. इसके अलावा चिकन में सैचुरेटेड फैट और कोलेस्ट्रॉल भी कम होता है, इसलिए हार्ट से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों के लिए इसे ज्यादा सुरक्षित माना जाता है.
सेहत के लिहाज से कौन बेहतर?
अगर दोनों की तुलना की जाए, तो साफ है कि नियमित सेवन के लिए चिकन, मटन से ज्यादा बेहतर विकल्प है. मटन कभी-कभार और सीमित मात्रा में लिया जाए तो ठीक है, लेकिन रोजमर्रा की डाइट में चिकन ज्यादा संतुलित और हल्का प्रोटीन देता है. यानी प्रोटीन के साथ सेहत को प्राथमिकता देनी हो, तो चिकन को प्राथमिकता मिलती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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22/01/2026

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Benefits Of Green Tea At Night: अक्सर लोग डिनर के बाद या तो मोबाइल में उलझ जाते हैं या फिर कुछ देर बाद दोबारा खाने का मन...
22/01/2026

Benefits Of Green Tea At Night: अक्सर लोग डिनर के बाद या तो मोबाइल में उलझ जाते हैं या फिर कुछ देर बाद दोबारा खाने का मन बनाने लगते हैं. ऐसी स्थिति में डिनर के बाद ग्रीन टी पीने की आदत एक साधारण लेकिन असरदार विकल्प के रूप में देखी जा रही है. यह न तो किसी सख्त डाइट का हिस्सा है और न ही किसी बड़े फिटनेस लक्ष्य से जुड़ी हुई, लेकिन इसके कुछ छोटे फायदे जरूर सामने आते हैं.
मीठा या स्नैक खाने की तलब कम होती है
सबसे पहले, डिनर के बाद ग्रीन टी पीने से देर रात होने वाली बेवजह की भूख पर असर पड़ सकता है. गर्म पेय होने की वजह से यह दिमाग को यह संकेत देता है कि खाना खत्म हो चुका है. इससे मीठा या स्नैक खाने की आदत धीरे-धीरे कम हो सकती है, वह भी बिना किसी जबरदस्ती के.
पहले से ज्यादा सुकून
इसके अलावा, यह आदत शाम के समय को थोड़ा शांत बनाने में मदद कर सकती है. डिनर और सोने के बीच ग्रीन टी पीना एक छोटा सा ब्रेक बन जाता है, जो लगातार स्क्रीन देखने की आदत को भी कम कर सकता है. इससे दिन के अंत में मानसिक रूप से रिलैक्स महसूस किया जा सकता है.
डिनर की मात्रा पर भी ध्यान जाने लगा
डिनर की मात्रा पर भी इसका अप्रत्यक्ष असर देखा जाता है। जब लोगों को यह पता होता है कि खाने के बाद हल्का ग्रीन टी लिया जाएगा, तो वे अक्सर खाना धीरे और संतुलित मात्रा में खाते है. इससे ओवरईटिंग की संभावना कम हो सकती है. इससे यह सोच भी खत्म हो जाती है कि यह सोच भी खत्म हो गई कि सोने से पहले यही आखिरी मौका है खाने का.
नींद के पैटर्न में हल्का बदलाव दिखा
हालांकि, नींद के मामले में इसका असर हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता. कुछ लोगों को डिनर के बाद ग्रीन टी पीने से हल्कापन महसूस होता है, जबकि कुछ मामलों में अगर चाय बहुत तेज या देर रात पी जाए, तो नींद आने में दिक्कत भी हो सकती है. इसलिए समय और मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है.
छोटा-सा रिचुअल बनना
सबसे अहम बात यह रही कि अगर आप डिनर के बाद ग्रीन टी का सेवन करते हैं, तो यह दिन को समेटने का एक निजी तरीका बन जाता है. जिसमें न कोई नियम था, न अनुशासन का दबाव. बस एक छोटी-सी आदत, जो व्यस्त दिनों में भी स्थिरता का एहसास आपको महसूस हो सकती है.
कुल मिलाकर, डिनर के बाद ग्रीन टी पीना कोई चमत्कारी उपाय नहीं है, लेकिन यह एक सधी हुई रूटीन बनाने में मदद कर सकता है. यह आदत शाम के समय को व्यवस्थित करती है, अनावश्यक खाने से बचाव करती है और दिन के अंत में एक हल्का, संतुलित रूटीन तैयार करती है.
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Kidney Health In Men: आजकल कई पुरुष अपनी ताकत और फिटनेस पर खास ध्यान देते हैं। जिम जाना, मसल्स बनाना और दिल की सेहत का ख...
22/01/2026

Kidney Health In Men: आजकल कई पुरुष अपनी ताकत और फिटनेस पर खास ध्यान देते हैं। जिम जाना, मसल्स बनाना और दिल की सेहत का ख्याल रखना उनकी प्राथमिकता होती है. लेकिन इसी दौड़ में सेहत का एक बेहद अहम हिस्सा किडनी की सेहत अक्सर नजरअंदाज हो जाता है. किडनी से जुड़ी समस्याओं का एक शुरुआती और बेहद खामोश संकेत है यूरिन में प्रोटीन का आना, जिसे मेडिकल भाषा में प्रोटीन्यूरिया कहा जाता है.
शुरुआती दौर में प्रोटीन्यूरिया के कोई साफ लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन यह अंदरूनी तौर पर किडनी को हो रहे नुकसान का इशारा हो सकता है. अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो आगे चलकर यह गंभीर बीमारियों का रूप ले सकता है. मेदांता, गुरुग्राम में नेफ्रोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट के सीनियर डायरेक्टर डॉ. मनीष जैन के मुताबिक, पुरुष अक्सर इस छिपे हुए संकेत को पहचान नहीं पाते. उन्होंने इसके बारे में बताया है.


किडनी कैसे काम करती है?
किडनी हमारे शरीर का फिल्टर सिस्टम है. यह खून से गंदगी और अतिरिक्त तरल पदार्थ को छानकर पेशाब के जरिए बाहर निकालती है. इसके साथ ही ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने और रेड ब्लड सेल्स बनाने में भी इसकी अहम भूमिका होती है. स्वस्थ किडनी में मौजूद खास फिल्टर (ग्लोमेरुली) यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रोटीन जैसे बड़े तत्व यूरिन में न जाएं.
प्रोटीन्यूरिया क्या है और क्यों है खतरनाक?
जब किडनी के ये फिल्टर खराब होने लगते हैं, तो प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर निकलने लगता है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. शुरुआत में कोई तकलीफ महसूस नहीं होती, इसलिए इसे किडनी की साइलेंट बीमारी भी कहा जाता है. लेकिन जैसे-जैसे नुकसान बढ़ता है, पैरों और टखनों में सूजन, थकान, झागदार पेशाब और रात में बार-बार पेशाब आने जैसी समस्याएं दिखने लगती हैं.
पुरुषों को ज्यादा दिक्कत क्यों?
पुरुषों में हाई ब्लड प्रेशर कम उम्र में होने की संभावना ज्यादा होती है, जो किडनी खराब होने की बड़ी वजह है. इसके अलावा टाइप-2 डायबिटीज का खतरा भी पुरुषों में अधिक देखा जाता है, जिससे समय के साथ किडनी को नुकसान पहुंचता है. बढ़ती उम्र में प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या भी यूरिन के रास्ते में रुकावट पैदा कर सकती है, जिससे किडनी पर दबाव पड़ता है. साथ ही धूम्रपान, ज्यादा शराब पीना, प्रोसेस्ड फूड और रेड मीट का अधिक सेवन जैसी लाइफस्टाइल आदतें भी किडनी के लिए नुकसानदेह साबित होती हैं. लक्षणों को नजरअंदाज करना बीमारी की पहचान और इलाज में देरी कर देता है.
प्रोटीन्यूरिया की पहचान कैसे करें?
इसकी पहचान के लिए किसी जटिल जांच की जरूरत नहीं होती. एक सामान्य यूरिन टेस्ट से भी पेशाब में प्रोटीन का पता चल सकता है. अगर रिपोर्ट में प्रोटीन पाया जाता है, तो डॉक्टर आगे की जांच जैसे स्पॉट यूरिन प्रोटीन-क्रिएटिनिन रेशियो, 24 घंटे की यूरिन जांच और खून के टेस्ट से किडनी की स्थिति को परखते हैं,
किडनी को हेल्दी रखने के आसान उपाय
किडनी की सेहत के लिए सबसे जरूरी है ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना. अगर इनसे जुड़ी कोई समस्या है, तो डॉक्टर की सलाह से दवा, सही खानपान और नियमित एक्सरसाइज अपनाएं। वजन को नियंत्रित रखें, क्योंकि मोटापा हाई बीपी और डायबिटीज दोनों का खतरा बढ़ाता है. रोजमर्रा के खाने में प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा लाल मांस और मीठे पेय पदार्थों को कम करें और फल, सब्जियां, साबुत अनाज और हल्के प्रोटीन को शामिल करें. इसके साथ हेल्थ चेकअप कराते रहें.
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22/01/2026

अगर आपको बार बार ध्यान लगाने में परेशानी हो रही है, नाम भूलने लगे हैं या दिमाग हमेशा भारी महसूस रहता है तो इसे सिर्फ मानसिक थकान समझकर नजरअंदाज करना सही नहीं है. डॉक्टरों के अनुसार कई बार ये लक्षण दिमाग की नहीं, बल्कि दिल की बीमारी की ओर इशारा करते हैं. वहीं हार्ट डिजीज हमेशा सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे आम संकेतों से ही सामने आए ऐसा जरूरी नहीं है. जब दिमाग के लक्षण बताते हैं दिल की परेशानीकई डॉक्टरों के अनुसार वह अक्सर ऐसे मरीज देखते हैं जो मेमोरी लॉस या ब्रेन फॉग की शिकायत लेकर आते हैं. लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता है कि इसके पीछे दिल से जुड़ी समस्या छिपी होती है. उनके अनुसार कई रिसर्च लगातार यह साबित कर रही है कि दिमाग की सेहत सीधे तौर पर दिल की सेहत पर निर्भर करती है.ब्रेन फॉग भी हो सकता है हार्ट का लक्षणडॉक्टर बताते हैं कि कई लोग उनके पास शिकायत लेकर आते हैं कि वह मीटिंग में लोगों के नाम भूलने लगे हैं और दिमाग पहले जैसा तेज नहीं रहा. उन्हें न तो सीने में दर्द था और नहीं सांस फूलने की दिक्कत, लेकिन जांच के दौरान सामने आया कि उनके शरीर में ब्लड सर्कुलेशन से जुड़े कुछ जरूरी लक्षण गड़बड़ थे. वहीं दिल से दिमाग तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही थी, जिसका असर सीधे उसकी सोचने समझने की क्षमता पड़ रहा था.कम ब्लड फ्लो और कमजोर मेमोरीएक्सपर्ट्स के अनुसार कई रिसर्च बताती है कि दिल के कार्य क्षमता में हल्की सी कमी भी दिमाग तक पहुंचने वाले ब्लड सर्कुलेशन को घटा सकती है. इससे मेमोरी, फोकस और कॉग्निटिव फंक्शन पर असर पड़ता है. वहीं जनरल ऑफ सेरेब्रल ब्लड फ्लो एंड मेटाबॉलिज्म 2024 में पब्लिश एक रिसर्च में भी सामने आया था कि हल्का कार्डियोवैस्कुलर इंपेयरमेंट दिमागी कार्य क्षमता को प्रभावित कर सकता है.शुरुआती संकेतों को पहचानना क्यों है जरूरी?इसके अलावा एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि ब्रेन फॉग या याददाश्त में कमी को सिर्फ उम्र या तनाव से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. दरअसल फंक्शनल मेडिसिन का मकसद यही है की बड़ी बीमारी बनने से पहले शरीर के छोटे-छोटे संकेत को पहचाना जाए. वहीं अगर समय रहते इन लक्षणों पर ध्यान दिया जाए, तो दिल से जुड़ी गंभीर समस्याओं को बढ़ने से रोका जा सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.l

कई रिसर्च बताती है कि दिल के कार्य क्षमता में हल्की सी कमी भी दिमाग तक पहुंचने वाले ब्लड सर्कुलेशन को घटा सकती है. इ.....

आजकल सेहत को लेकर लोग पहले से ज्यादा सजग हो गए हैं. खासतौर पर डायबिटीज जैसी बीमारी में यह समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि...
22/01/2026

आजकल सेहत को लेकर लोग पहले से ज्यादा सजग हो गए हैं. खासतौर पर डायबिटीज जैसी बीमारी में यह समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या खाना सही है और क्या नहीं, अक्सर लोग सोचते हैं कि फल का जूस पीना ज्यादा हेल्दी होता है, क्योंकि वह फल से ही बना होता है. लेकिन क्या सच में जूस उतना ही फायदेमंद है जितना पूरा फल. डाइटीशियन के अनुसार, डायबिटीज के मरीज हो या बिल्कुल हेल्दी लोग, दोनों के लिए फल खाना जूस पीने से कहीं ज्यादा बेहतर और सुरक्षित ऑप्शन है. ऐसे में आइए जानते हैं कि फल और फल के जूस में क्या फर्क है, जूस क्यों नुकसान कर सकता है और फल क्यों सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद माने जाते हैं.
फल का जूस क्यों नहीं है हमेशा सही?
1. ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकता है - जब फल को जूस बना दिया जाता है, तो उसमें मौजूद नेचुरल शुगर बहुत जल्दी शरीर में पहुंच जाती है. खासकर बाजार में मिलने वाले पैक्ड जूस या ज्यादा मीठे जूस ब्लड शुगर को अचानक बढ़ा सकते हैं. यह डायबिटीज के मरीजों के लिए खतरनाक हो सकता है.
2. फाइबर खत्म हो जाता है - फल का सबसे बड़ा फायदा उसका फाइबर होता है. लेकिन जूस बनाते समय यह फाइबर लगभग निकल जाता है. फाइबर न होने की वजह से शुगर सीधे ब्लड में जाती है और शुगर लेवल तेजी से बढ़ता है.
3. कैलोरी और चीनी ज्यादा मिलती है - एक गिलास जूस में कई फलों की मात्रा होती है. इससे शरीर को जरूरत से ज्यादा कैलोरी और शुगर मिल जाती है, जो वजन बढ़ाने और शुगर कंट्रोल बिगाड़ने का कारण बन सकती है.
4. एक्सपर्ट की सलाह - डाइटीशियन मुस्कान कुमारी बताती हैं कि अगर डायबिटीज का मरीज जूस लेना ही चाहता है, तो वह भी सिर्फ घर का बना ताजा जूस, बहुत कम मात्रा में पैक्ड जूस और बहुत मीठे जूस से पूरी तरह बचना चाहिए.
फल खाना क्यों है ज्यादा फायदेमंद?
1. फाइबर से शुगर रहती है कंट्रोल में - पूरा फल खाने से शरीर को भरपूर फाइबर मिलता है. यह फाइबर शुगर को धीरे-धीरे ब्लड में पहुंचने में मदद करता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल अचानक नहीं बढ़ता.
2. विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर - फल खाने से शरीर को जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स मिलते हैं, जो इम्यूनिटी मजबूत करते हैं और शरीर को बीमारियों से बचाते हैं.
3. प्राकृतिक मिठास होती है सुरक्षित - फलों में मौजूद मिठास प्राकृतिक होती है. सही मात्रा में फल खाने से यह मिठास शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि एनर्जी देती है.
4. हेल्दी स्नैक का बेस्ट ऑप्शन - भूख लगने पर फल खाना एक बेहतरीन स्नैक ऑप्शन है. यह पेट भी भरता है और अनहेल्दी चीजें खाने से बचाता है.
डायबिटीज और नॉर्मल लोगों के लिए सही विकल्प क्या?
डायबिटीज के मरीजों के साथ-साथ नॉर्मल लोगों को भी रोजाना फल खाने की आदत डालनी चाहिए. फल न सिर्फ शुगर कंट्रोल में मदद करते हैं, बल्कि पूरे शरीर को स्वस्थ रखते हैं. अगर आपके आसपास कोई डायबिटीज से पीड़ित है, तो यह जानकारी उनके लिए बहुत जरूरी है. और अगर नहीं है, तब भी अपनी सेहत के लिए फल को जूस से ऊपर रखें.
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सच में जूस उतना ही फायदेमंद है जितना पूरा फल. डाइटीशियन के अनुसार, डायबिटीज के मरीज हो या बिल्कुल हेल्दी लोग, दोनों .....

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