26/04/2022
खादर मेरठ गंगा किनारे मे पशुओं के अवशेष मिलना एक आश्चर्यजनक बात है, 2016 में अमर उजाला अनुज मित्तल की रिपोर्ट मे पाया गया था, की पशुओ के अबशेष खेती मे प्रयोग होता है, ये बात समझ से बाहर है। जिसको विधायक संगीत सोम जी ने जोरो से उठाया था, अब गायों के शरीर को बेचना बहुत कॉमन बात हो गयी है, इंसान की चालाकी देखिए पहले तो आवारा पशुओं को गौशाला में बांध कर रखना, उसको इतना खाना देना जिससे वह बस जिंदा रह सके, फिर गायों के नाम से इमोशनल करके पब्लिक से पैसा बनाना, उसके बाद गायों का इंश्योरेंस कराना, जब मर जायेगी तब मारी हुई गाय से पैसा लेना , फिर मरे हुए शरीर को कसाईओ को बेचना जिसको हिंदू कम्युनिटी ही मुस्लिम कसाईयो या बाल्मीकि समाज को बेचती है। उससे 3 फायदा होता है गायों से इस चालक इंसान को, गायों का इंसोरेंस करवा कर ,जला कर या चुरावा कर झूठी f.i.r. करा देना, अब यह गायों के साथ हो रहा है। धरती पर गायों पर इस अत्याचार से बुरा क्या हो सकता है? आप खुद सोच लीजिए। गाय तो मर कर भी इंसान को पैसा दे रही है, तड़प कर भी पैसा देती है, जिन्दा रह कर भी पैसा देती है। फिर भी इंसान की पैसे की हवस नहीं जाती। करोना से इंसान मारा तो हाय हाय करने लागा, गायों का इतना बुरी तरह से जाला कर मारा जाता है। सब चुप रहते हैँ कहाँ गए हिंदू अब ? फिर गायों को माता कहना बंद कर दो। और मुस्लिम को दोष देना बंद करो। रिपोर्ट रविन्द्र आर्य 7838195666 (gzb)