07/02/2026
ॐ उच्चारण :
ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है - अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु औरमहेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।
विधि :
ओ३म् के उच्चारण के लिए किसी निश्चित स्थान पर एकांत जगह पर आसन बिछाकर पदमासन, सुखासन में बैठे। हाथ ज्ञान मुद्रा में घुटनों पर रखे। नेत्र कोमलता से बंद करें तथा दो-तीन बार गहरे लम्बे श्वास लें और श्वास गहरा भरे, बिना मुंह खोलकर व बोलकर ओ का उच्चारण करें। कंठ से स्पंदन हो और इसके बाद होठ बंद करते हुए म का गुंजन करे। धीरे-धीरे लंबा गुंजन का अभ्यास करे। जब तक आनन्द मिलता रहे करते रहे। इसे नियमित श्रद्धाभाव और प्रसन्न-चित्त होकर करें। ब्रह्म-मुहूर्त में करने पर आनन्द मिलता है। अंत में कुछ देर के लिए शांत बैठे।
लाभ:
इससे शरीर को अनेक प्रकार से लाभ होता है तथा शरीर के कोषाणुओं का नव निर्माण होता है। शरीर स्वस्थ, सुंदर तथा पवित्र बनता है। कंठ नली में स्वर तन्तु की ट्यूनिंग होती है, फेफडों की कार्य क्षमता बढती है। आसनों के करने से अनेक प्रकार के विकार दूर होते हैं तथा रक्त की शुद्धि होती है। हृदय को कम काम करना पडता है। उससे विश्राम भी मिलता है। पाचन क्रिया सुधरती है तथा निकासन प्रणाली सुचारु रूप से कार्य करती है। ग्रंथियों से संतुलित स्त्राव निकलता है। मन की शक्ति बढती है, मन हल्का, प्रसन्न व पवित्र बनता है। एक मंगलमय वातावरण निर्मित होता है तथा हर प्रकार का तनाव दूर होता है। दमा, रक्तचाप आदि ठीक हो जाते हैं। नर को नारायण की ओर बढाने की क्षमता ओंकार ध्वनि में है। बुद्धि तीव्र, स्मरण शक्ति का विकास तथा निर्णायक क्षमता की वृद्धि होती है और तन, मन, बुद्धि को स्वस्थ रखती है।
मंगेश त्रिवेदी yogacharya