Homoeo Clinic

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With Ankkit Makhija – I'm on a streak! I've been a top fan for 19 months in a row. 🎉
30/01/2026

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29/01/2026

हमने सुन रखा है कि राम की मरजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। और हमने जो उसको अर्थ दिए हैं, वे नासमझी से भरे हैं। राम की बिना मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि इस संसार में दो मर्जियां काम नहीं कर रही हैं। पत्ते की मर्जी और इस अस्तित्व की मर्जी, दो नहीं हैं। यह पूरा अस्तित्व इकट्ठा है। और जब पत्ता हिलता है, तो पूरे अस्तित्व के हिलने के कारण ही हिलता है।
अकेला पत्ता हिल नहीं सकता है। हवाएं न हों, फिर पत्ता न हिल सकेगा। सूरज न हो, तो हवाएं न हिल सकेंगी। सब संयुक्त है। और एक छोटा—सा पत्ता भी हिलता है, तो उसका अर्थ यह हुआ कि सारा अस्तित्व उसके हिलने का आयोजन कर रहा है। उस क्षण में सारे अस्तित्व ने उसे हिलने की सुविधा दी है। उस सुविधा में रत्तीभर भी कमी हो और पत्ता नहीं हिल पाएगा।

राम की बिना मर्जी के पत्ता नहीं हिलता है, इसका केवल इतना ही अर्थ है। ऐसा कुछ अर्थ नहीं कि कोई राम जैसा व्यक्ति ऊपर बैठा है और एक—एक पत्ते को आज्ञा दे रहा है कि तुम अब हिलो, तुम अब मत हिलो। वैसी धारणा मूढ़तापूर्ण है।

लेकिन अस्तित्व एक है। दूर, अरबों प्रकाश वर्ष दूर जो तारे हैं, उनका भी हाथ आपके बगीचे में हिलने वाले पत्ते में है। उनके बिना ये पत्ते नहीं हिल सकते।

समुद्र में लहर उठती है, चांद का हाथ उसमें है। चांद के बिना वह लहर नहीं उठ सकती। चांद में रोशनी है, क्योंकि सूरज का हाथ उसमें है। चांद के पास अपनी कोई रोशनी नहीं है। सूरज से उधार प्रतिबिंब है, प्रतिफलन है। चांद से सागर हिलता है। और जब सागर हिलता है, तो आपके भीतर भी कुछ हिलता है। क्योंकि सारा जीवन सागर से पैदा हुआ है।

आपके भीतर पचहत्तर प्रतिशत सागर का पानी है। आप पचहत्तर प्रतिशत सागर हैं। और आपके भीतर जो जल है, उसका स्वाद ठीक सागर के जैसा स्वाद है। उतनी ही नमक की मात्रा है, उतना ही खारा है, उतने ही रासायनिक द्रव्य हैं उसमें। मछली ही सागर में नहीं जीती, आप भी सागर में जीते हैं। फर्क इतना है कि मछली के चारों तरफ सागर है; आपके भीतर सागर है। आपके भीतर नमक कम हो जाए, आपकी मृत्यु हो जाएगी। ज्यादा हो जाए, आप अड़चन में पड़ जाएंगे। ठीक सागर की जितनी मात्रा है, उतनी ही आपके भीतर होनी चाहिए।

वह जो बच्चा पहली दफा मां के गर्भ में पैदा होता है, तो मां के गर्भ में ठीक सागर की स्थिति हो जाती है। ठीक सागर जैसे पानी में ही बच्चे का पहला जन्म होता है। बच्चा पहले मछली की तरह बड़ा होता है।

जब सागर हिलता है, तो आपके भीतर भी कुछ हिलता है। अगर सागर के पास बैठकर आपको सुख मालूम होता है, तो आपने कभी सोचा नहीं होगा, क्यों? वह जो सागर का कंपन है, जीवन है, वह आपके छोटे—से सागर को भी कंपाता है, जीवंत करता है।

अगर रात चांद को देखकर आपको अच्छा लगता है, सुखद मालूम होता है, एक शांति मिलती है, तो वे चांद की किरणें हैं, जो आपके भीतर के सागर को कंपित कर रही हैं, जीवंत कर रही हैं।

पूर्णिमा की रात दुनियाभर में सबसे ज्यादा लोग पागल होते हैं; अमावस की रात सबसे कम। पागलपन में भी एक ज्वार भाटा है। पूर्णिमा की रात दुनिया में सबसे ज्यादा अपराध होते हैं; अमावस की रात सबसे कम। आप शायद उलटा सोचते होंगे कि अमावस की अंधेरी रात सबसे ज्यादा अपराध होने चाहिए। अपराध नहीं होते हैं। क्योंकि अमावस की रात लोग उत्तेजित नहीं होते हैं। पूर्णिमा की रात उत्तेजित हो जाते हैं।

पागलों के लिए पुराना शब्द है, चांदमारा। अंग्रेजी में शब्द है, लुनाटिक । लूनाटिक चांद से बना है। पागलपन में चांद का हाथ है।

और अगर पागलपन में चांद का हाथ है, तो बुद्धिमत्ता में भी चांद का हाथ होगा। और अगर बुद्ध को पूर्णिमा की रात बुद्धत्व प्राप्त हुआ, तो चांद के हाथ को इनकार नहीं किया जा सकता। सब जुड़ा है, सब संयुक्त है। हम अलग अलग नहीं हैं।

ओशो
गीता दर्शन

23/01/2026
17/01/2026
17/01/2026

are Unique

09/01/2026

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

उन से नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़ज़ाएँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

बिखरी ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शाइ'री
झुकती आँखों ने बताया मय-कशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है

~ निदा फ़ाज़ली

06/01/2026

जनवरी की सुबह भी रोज़ जैसी ही है, वही हल्की ठंड, वही धुंध, वही चुपचाप उगता सूरज। बाहर से देखो तो कुछ भी अलग नहीं लगता। लोग निकल रहे हैं अपने-अपने काम पर, चाय की दुकानों पर भाप उठ रही है, अख़बारों की सुर्ख़ियाँ रोज़ की तरह ही हैं। पर सच कहूं तो अब इसमें वो बात नहीं रही जो कभी हुआ करती थी। शायद सुबह बदली नहीं है, बदला मैं हूँ, या शायद मैं भी नहीं बदला, बस भीतर कुछ चुपचाप बैठ गया है।

पहले जनवरी की सुबह में एक उत्साह होता था। ठंड से सिकुड़ते हाथों में चाय का कप पकड़ते हुए लगता था कि दिन कुछ अलग होगा। आज वही चाय है, वही कप है, वही ठंड है, पर भीतर कोई हलचल नहीं, जैसे मन ने तय कर लिया हो कि ज्यादा उम्मीद नहीं करनी है। उम्मीद करना अब थका देता है। अब सुबह का मतलब सिर्फ इतना रह गया है कि रात बीत गई और एक और दिन शुरू हो गया।

मैं खिड़की के पास कॉफी का मग लिए हुए खड़ा-खड़ा धुंध को देखता हूँ। धुंध हर चीज़ को ढक लेती है, जैसे ज़िंदगी भी कई बार हमारे सामने की सच्चाइयों को धुंधला कर देती है। पहले मैं इस धुंध में सपने ढूंढ लिया करता था, अब इसमें बस अस्पष्टता दिखती है। चीज़ें हैं पर साफ़ नहीं हैं। लोग हैं पर पास नहीं हैं। बातें हैं पर कहने लायक नहीं हैं।

जनवरी की सुबह ठंडी होती है, पर आजकल ठंड बाहर से ज़्यादा भीतर लगती है। ये वो ठंड नहीं है जिसे स्वेटर से ठीक किया जा सके। ये वो ठंड है जो चुप्पी में बस जाती है। बात करने का मन नहीं करता, शिकायत करने का भी मन नहीं करता। बस दिन को जैसे-तैसे निभाने की आदत पड़ गई है। मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ, न ही किसी से बहुत खुश। ये बीच की हालत सबसे अजीब होती है, जहाँ इंसान न टूटता है, न पूरी तरह जीता है।

अब सुबह जल्दी उठने का भी कोई विशेष कारण नहीं रहता। न किसी से मिलने की जल्दी, न किसी लक्ष्य की बेचैनी। काम हैं, ज़िम्मेदारियाँ हैं, उन्हें निभा लिया जाता है। पर भीतर से कोई आवाज़ नहीं आती कि आज कुछ अच्छा होने वाला है। पहले मन खुद से बातें करता था, अब वो भी कम हो गई हैं। शायद मन भी समझ गया है कि हर बात का जवाब नहीं मिलता।

जनवरी की सुबह मुझे ये भी याद दिलाती है कि साल खत्म हो गया है। लोग अपने पिछले साल का हिसाब लगाते हैं क्या पाया, क्या खोया। मैं सोचता हूँ, मैंने क्या बदला? शायद कुछ भी नहीं। वही अकेलापन, वही सीमित दायरा, वही कुछ चुनिंदा लोग, वही ढेर सारे अनकहे शब्द। फर्क बस इतना है कि अब इन सब से लड़ने की इच्छा भी कम हो गई है। जो है, उसे स्वीकार कर लेने में एक अजीब-सी शांति मिलती है, भले वो शांति थोड़ी भारी क्यों न हो।

सुबह की ये चुप्पी मुझे सिखाती है कि हर दिन खास नहीं होता और हर दिन खास होना ज़रूरी भी नहीं। कुछ दिन बस गुजरने के लिए होते हैं। जनवरी की ये सुबह भी वैसी ही है, न बहुत बुरी, न बहुत अच्छी। बस है और शायद अब मैं भी ऐसा ही हूँ, न बहुत टूटा हुआ, न बहुत मजबूत, बस मौजूद।

सच कहूं तो अब मुझे सुबह से कोई शिकायत नहीं है। अगर वो रोज़ जैसी है, तो ठीक है। मैं भी तो रोज़ जैसा ही हूँ। नयेपन की तलाश अब कम हो गई है। अब मन बस इतना चाहता है कि दिन शांति से बीत जाए, बिना किसी दिखावे के, बिना किसी ज़ोर के। जनवरी की सुबह मुझे यही सिखा रही है कि हर दिन को महसूस करना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी बस उसे होने देना ही काफी है

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