30/01/2026
यह केवल एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की हार है।
एक गाँव में एक ऐसा घर,
जहाँ पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था।
घर की जिम्मेदारी एक अकेली माँ ने पूरी उम्र निभाई।
और आज जब उसी माँ का भी देहांत हो गया,
तो गाँव और समाज ने अपना चेहरा फेर लिया।
न कोई पड़ोसी आगे आया,
न कोई समाज का ठेकेदार,
न कोई संगठन,
न कोई सहारा।
आज हालात इतने दर्दनाक हो गए कि
उसी घर की बेटियाँ अपनी माँ की अर्थी को कंधा दे रही हैं,
और वही बेटियाँ अपनी माँ को
शमशान घाट तक ले जा रही हैं।
यह दृश्य केवल हृदयविदारक नहीं,
बल्कि समाज के मुँह पर करारा तमाचा है।
सवाल यह नहीं कि बेटियाँ कंधा दे रही हैं—
सवाल यह है कि
👉 गाँव के पुरुष कहाँ थे?
👉 समाज के ठेकेदार कहाँ थे?
👉 वो लोग कहाँ थे जो मंचों पर मानवता की बातें करते हैं?
अगर आज एक बेसहारा परिवार के साथ
समाज खड़ा नहीं हो सकता,
तो फिर समाज कहलाने का अधिकार किसे है?
यह व्यवहार
❌ अमानवीय है
❌ असंवेदनशील है
❌ और पूरी तरह गलत है
ऐसे समाज को आज आत्ममंथन करना चाहिए,
क्योंकि कल यही हाल
किसी और घर का भी हो सकता है।
आज बेटियाँ मजबूरी में कंधा दे रही हैं,
लेकिन असल में
समाज ने अपनी संवेदनशीलता की अर्थी उठा ली है।
यह घटना हमें याद दिलाती है—
अगर समय रहते इंसानियत नहीं जागी,
तो समाज सिर्फ़ भीड़ बनकर रह जाएगा,
मानवता नहीं।
समाजसेवी (social worker)
Dr ajit Kumar Singh