DeeptiA Gupta Tarot Reader Spiritual Healer

DeeptiA Gupta  Tarot Reader Spiritual Healer Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from DeeptiA Gupta Tarot Reader Spiritual Healer, Astrologist & Psychic, indrapuram, Ghaziabad.

01/11/2021

कल धनतेरस पर खरीदारी का समय शाम 6.14 से 8.12 तक होगा ।
पांच धातु, सोना चांदी, कांसा तांबा व पारद ही खरीदना श्रेष्ठ होगा ।

01/11/2021

जब हम मंगल दोष का विचार करते हैं तो हम ये देखते है की मंगल की दृष्टि 2nd,4th,7th,8th भाव पर न हो। क्योंकि 2nd भाव जातक की आयु व 8th भाव जीवनसाथी की आयु का है।जब मंगल 5th भाव मे बैठ कर चतुर्थ दृष्टि से 8th भाव को देखता है, तो नियमानुसार यह भी मंगल दोष की श्रेणी में आता है। देखा गया है कि पंचम का मंगल कष्ट देता है,पांचवे भाव / स्थान में मंगल होने से व्यक्ति बुद्धिमान तो होता है परन्तु संतान, स्त्री आदि सुख की कमी होती है। पंचम भाव में मंगल को अधिकांशतः विद्वानों ने अच्छा नहीं माना है। भले ही वह लग्नानुसार या अन्य ग्रहों की युति या दृष्टि के कारण उसके फल अलग अलग जातक को अलग अलग मिलेंगे।

जय श्री राम 🙏🏻🙏🏻

कुंडली के सप्तम भाव में शनि का प्रभाव1)कुंडली के सप्तम भाव में शनि का प्रभाव जानने के लिए सर्वप्रथम हम शनि और सप्तम भाव ...
31/10/2021

कुंडली के सप्तम भाव में शनि का प्रभाव

1)कुंडली के सप्तम भाव में शनि का प्रभाव जानने के लिए सर्वप्रथम हम शनि और सप्तम भाव के नैसर्गिक कारक के संदर्भ में जानकारी प्राप्त करेंगे
सप्तम भाव को विवाह का कारक भाव माना जाता है। शनि जब सप्तम भाव में हो तब यह वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है। जातक की पत्नी लोअर क्लास से संबंध रखने वाली हो सकती है। जातक की पत्नी अपने उम्र से ज्यादा उम्र की दिखने वाली हो सकती है। यदि सनी कुंडली में शुभ स्थिति में हो तब बुरे प्रभाव कम होते हैं। उत्तम सनी जातक को स्थिर और सुखी वैवाहिक जीवन देता है। जातक अपनी पत्नी के कंट्रोल में रह सकता है।
3) सप्तम भाव में स्थित शनि यदि पीड़ित हो तब यह जातक के वैवाहिक जीवन में तरह-तरह के परेशानियां देता है। यदि शनि सूर्य के द्वारा पीड़ित हो तब जातक का वैवाहिक जीवन स्थिर और ईगो से भरा हुआ होता है। शनि यदि मंगल से पीड़ित हो तो पति और पत्नी के बीच झगड़े और विवाद के कारण पुलिस केस की संभावना रहती है। यदि पीड़ित शनि गुरु के साथ संबंध स्थापित करता हो तब जातक का वैवाहिक जीवन तो स्थिर होता है लेकिन तनावपूर्ण होता है। यदि सप्तम भाव में स्थित शनि चंद्रमा से युत हो तो तब यह विवाह में विलंब करता है, साथ ही जातक को अविवाहित रखने की योग का भी निर्माण करता है। चंद्रमा से के कारण जातक गुप्त संबंध रखता होगा, जो वैवाहिक जीवन में परेशानी का कारण हो सकता है। सप्तम भाव में स्थित शनि यदि बुध के साथ हो तो वैवाहिक जीवन में बेवजह के तनाव परेशानी और विवाद के कारण जातक डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। सप्तम भाव में स्थित शनि यदि राहु से पीड़ित हो तब जातक के जीवनसाथी का व्यवहार अटपटा और अजीब सा हो सकता है। यह तलाक और दूसरे मृत्यु तुल्य कष्ट का कारण हो सकता है। सप्तम भाव में शनि केतु के साथ तलाक या अलगाव या पति या पत्नी के मृत्यु का कारण हो सकता है। परंतु किसी भी प्रकार के बुरे प्रभाव तभी होंगे जब कारक शुक्र और शुक्र भी पीड़ित हो और बुरी दशा है या गोचर चल रही हो। सामान्यतः सप्तम भाव में शनि बहुत ज्यादा बुरा नहीं होता है क्योंकि शनि को सप्तम भाव में दिक्बल भी प्राप्त होता है। सप्तम भाव में शनि की स्थिति के कारण जातक की पत्नी पुराने ख्यालात वाली हो सकती है।
4) सप्तम भाव में स्थित शनि विवाह में विलंब का कारण हो सकता है। यदि सप्तम भाव में स्थित शनि चंद्रमा के साथ हो तो अविवाहित रहने के योग का भी निर्माण करता है। सप्तम भाव में स्थित शनि यदि ‌अन्य पापी ग्रह से युत हो तो तलाक अलगाव इत्यादि का कारण हो सकता है।
5) सप्तम भाव को मारक भाव भी बोलते हैं, यदि सप्तम भाव में स्थित शनि अशुभ हो तो जातक या जातक की पत्नी को स्वास्थ्य से संबंधित समस्या दे सकता है। यदि सप्तम भाव में स्थित शनि बहुत ज्यादा पीड़ित पति पत्नी की मृत्यु का कारण हो सकता है। सप्तम भाव में स्थित शनि माता और पिता के लिए भी शुभ नहीं माना जा सकता है।
6) भाव में स्थित शनि कान से या पेटसे संबंधित समस्या दे सकता है।
7) सप्तम भाव में स्थित शनि जातक को तरह-तरह की यात्राएं दे सकता है। जातक को विदेश यात्राओं का भी संयोग देता है। जातक अपने जन्म स्थान से दूर विभिन्न कार्यों के लिए भटकता रहता होगा।
8) सप्तम भाव में स्थित शनि जातक को उद्यमी बनाता है। जातक कठोर मेहनत करने वाला व्यक्ति होता है। जातक को अपने कार्यस्थल पर सफलता के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। जातक को अपने जीवन में देरी से सफलता मिलती है।
9) सप्तम भाव में स्थित शनि जातक को राजनीति में सफलता दिला सकता है। यदि सप्तम भाव में स्थित शनि उत्तम स्थिति में हो तो जातक को अच्छी प्रसिद्धि मिलती है। यदि सप्तम भाव में स्थित हो तो जातक की बदनामी का कारण हो सकता है। जातक अपने जीवन में लोअर क्लास के व्यक्तियों से सहायता प्राप्त करता है।
10) सप्तम भाव चतुर्थ भाव का भाव भाव भी होता है। अतः सप्तम भाव में स्थित शनि जातक के सुख को भी प्रभावित करता है। शनि की स्थिति पर जातक के सुख निर्भर करेंगे। सामान्यतः सप्तम भाव में स्थित शनि जातक के सुख के लिए उत्तम नहीं माना गया है। सप्तम भाव में स्थित शनि के जातक के लग्न पर पूर्ण दृष्टि डालता है, अतः यह जातक के शारीरिक संरचना को भी प्रभावित करता है। जैसा कि हम जानते हैं शनि की दृष्टि लग्न पर हो या शनि लग्न में हो तब जातक देखने में बहुत ज्यादा आकर्षक नहीं होता है। जातक लेडीज़ स्वभाव का हो सकता है।

जय श्री राधे श्याम 🙏🏻🙏🏻

12/10/2021

जानियें, किन पेड़ो की जड़ें करती है - रत्नों का काम जो जातक रत्न नही धारण कर सकते

ज्योतिष के अनुसार रत्नों से प्राप्त होने वाला शुभ प्रभाव अलग-अलग ग्रहों से संबंधित पेड़ों की जड़ों को धारण करके भी प्राप्त किया जा सकता है।
एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार यदि अपनी राशि,नक्षत्र और कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुरूप जड़ों को धारण किया जाये तो विस्मयकारी तरीके से लाभ होता है।
आपकी कुंडली में जो ग्रह आपके लिये हितकारी और प्रगतिकारक हैं , उस ग्रह से सम्बंधित मंत्रों का जाप कर धारण करें और प्रतिदिन जाप करते रहें तो निश्चित ही लाभ होता है ।
* सूर्य -
यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच का होकर तुला राशि में है और केंद्र में या लग्नस्थ है तो कृत्तिका नक्षत्र वाले दिन बेल पत्र की जड़ प्रात:काल तोडक़र,शिवालय में शिवजी को समर्पित करें और ऊँ भास्कराय ह्रीं मंत्र का जाप करने के पश्चात गुलाबी धागे से धारण करें। प्रतिदिन इस मंत्र का जाप करते रहें. रोग,संतानहीनता जैसी अन्य कई समस्याओं का समाधान होगा।

* चंद्र -
यदि आप की कुंडली में चंद्र नीच का होकर वृश्चिक राशि में है,या राहु,केतु और शनि द्वारा प्रभावित है तो, रोहिणी नक्षत्र वाले दिन खिरनी की जड़, शुद्ध करके शिवजी को समर्पित करें और ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स:चंद्रमसे नम: मंत्र का जाप कर के सफेद धागे में धारण करें. फेफड़े सम्बंधित रोग,एकाकीपन और भावनात्मक समस्याओं का समाधान होगा।

* मंगल -
आपकी कुंडली में मंगल नीच का होकर कर्क राशि में हो या आप मांगलिक हों तो मृगशिरा नक्षत्र वाले दिन अनंतमूल अथवा खेर की जड़ की जड़ शुद्धिकरण के पश्चात हनुमान जी की पूजा करके ऊँ अं अंगारकाय नम: मंत्र का जाप कर के नारंगी धागे से धारण करें। क्रोध,अवसाद और वैवाहिक बाधा से मुक्ति मिलेगी।

* बुध -
यदि आपकी कुंडली में बुध द्वादश,अष्टम भाव में या नीच का होकर मीन राशि में है, तो आप अश्लेशा नक्षत्र वाले दिन विधारा (आंधी झाड़ा) की जड़ गणेश भगवान को को समर्पित करने के पश्चात ऊँ बुं बुधाय नम: मंत्र का जाप कर के हरे रंग के धागे में धारण करें। इस से बुद्धि विकसित होगी तथ निर्णय लेने में हो रही त्रुटि का भी समाधान होगा।

* गुरु -
आपकी कुंडली में यदि गुरु राहु द्वरा युक्त है,राहु द्वारा दृष्ट है या नीच का होकर मकर राशि में है तो शुद्ध और ताजी हल्दी की गाँठ अथवा केले की जड़ पीले धागे में, पुनवर्सु नक्षत्र वाले दिन कृष्ण भगवान या बृहस्पति देव जी की पूजा कर के ॐ बृं बृहस्पतये नम: मंत्र का जप करके धारण करें। व्यवसाय,नौकरी,विवाह सम्बन्धी समस्या और लीवर सम्बन्धी रोगों में लाभ होगा।

* शुक्र -
यदि आपकी कुंडली में शुक्र अष्टम भाव में है या नीच का होकर कन्या राशि में है, तो आप सरपोंखा अथवा गुलर की जड़, भरणी नक्षत्र वाले दिन सफेद धागे से सायंकाल के समय लक्ष्मी जी का पूजन कर ऊँ शुं शुक्राय नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें। संतानहीनता,कर्ज की अधिकता और धन के अभाव जैसी समस्या से मुक्ति मिलेगी।

* शनि -
आपकी कुंडली में यदि शनि सूर्य युक्त है,सप्तम भाव में है या नीच का होकर मेष राशि में है तो आप अनुराधा नक्षत्र वाले दिन बिच्छू या बिच्छौल की घांस अथवा शमी पेड़ की जड़ को नीले धागे से काली जी की पूजा के पश्चात ऊँ शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें. कार्यों में हो रहे विलम्ब,कानूनी अड़चन और रोगों से मुक्ति मिलेगी।

* राहु -
आपकी कुंडली में राहु लग्न,सप्तम या भाग्य स्थान मे है, तथा शुभ ग्रहों से युक्त है तो आप आर्द्रा नक्षत्र वाले दिन सफेद चंदन का टुकड़ा शिव जी का अभिषेक कर के भूरे धागे में ऊँ रां राहुए नम: मंत्र का जाप कर के धारण करें। रोग,चिड़चिड़ापन,क्रोध,बुरी आदतों तथा अस्थिरता से मुक्ति मिलेगी।

* केतु -
यदि आपकी कुंडली में केतु,चन्द्र या मंगल युक्त होकर लग्नस्थ है, तो आप अश्विनी नक्षत्र वाले दिन गणेश जी का पूजन करने के पश्चात शुद्ध की हुई असगन्ध या अश्वगन्धा की जड़, ऊँ कें केतवे नम: मंत्र का जाप करने के पश्चात, नारंगी धागे से धारण करें. चर्म सम्बन्धी रोग,किडनी रोगों और वैवाहिक समस्याओं में से मुक्ति मिलेगी।

याद रखें कि समस्या से पूर्ण मुक्ति के लिये, आपको सम्बंधित ग्रहों के मंत्रों का जाप भी प्रतिदिन करना चाहिए।

जय माता दी🙏🏻🙏🏻

06/10/2021

ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्।। 🙏 सर्व पितृ को नमन 🌸

01/10/2021

कमलगट्टे की माला, जीवित माला है।
अर्थात
प्रत्येक कमलगट्टे में , कमल की बेल (पौधा) उत्पन्न करने की क्षमता है।

कमलगट्टे के जीवन-अंश को नष्ट भी नहीं करना है, और पूजा के काम मे भी लाना है।

इसके लिए, कमलगट्टे की माला में लगने वाली डोरी को ही , नीम के तेल में, कपूर व मेंथा आयल मिला कर, इस में , डोरी को भिगो कर रखिये।
अब इसकी माला बना/बनवा कर , इस पर वुड-पेंट करवा लें।
कभी खराब नहीं होगी

🙏🙏

किसी के जीवन कितनी ही जटिल समस्या क्यों न हो, अगर वह मां बगलामुखी की शरण में जाकर माता से प्रार्थना करें एवं मां बगलामुख...
01/10/2021

किसी के जीवन कितनी ही जटिल समस्या क्यों न हो, अगर वह मां बगलामुखी की शरण में जाकर माता से प्रार्थना करें एवं मां बगलामुखी के इस सरल मंत्र का केवल २१ दिनों तक हर रोज हल्दी की संस्कारित माला से ११ माला जप करना है। जप के बाद आखरी दिन नीचे बताई गई सामग्रियों से दशांश मंत्रों का हवन करना है। हवन में गाय का घी एवं आम, पीपल, पलाश गुलर एवं अकाव की लकड़ी ही प्रयोग करना है।

इस मंत्र का जप 21 दिनों तक एक अनुष्ठान के रूप में करना है। 21दिनों तक संभव हो तो भूमि पर शयन करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। अपने काम स्वयं करें। नाखुन एवं सिर का बाल न काटे। जप रात १० से लेकर १ बजे से पहले ही एक निर्धारित समय पर ही करना है। जप के समय गाय के घी का दीपक जलते रहना चाहिए। पूजा में 9 दिनों तक धुले हुये पीले वस्त्र पहने।

मंत्र-

ऊँ श्री हृीं ऐं भगवती बगले मे श्रियं देहि-देहि स्वाहा।।
इस मंत्र के प्रयोग से साधक कभी दरिद्र नहीं होता।



1- संतान प्राप्ति के लिए: अशोक के पत्ते, कनेर के पुष्प, तिल व दुग्ध मिश्रित चावल से हवन करना चाहिए।

2- अत्यधिक धन प्राप्ति के लिए चंपा के पुष्प से हवन करना चाहिए।

3- देव-स्तवन एवं तंत्र-सिद्धि के लिए नमक, शक्कर, घी से हवन करना चाहिए।

4- आकर्षण के लिए सरसों से हवन करना चाहिए।

5- वशीकरण एवं उच्चाटन के लिए गिद्ध एवं कौए के पंख, तेल, राई, शहद, शक्कर से हवन करना चाहिए।

6- शत्रु नाश के लिए शहद, घी, दुर्वा से हवन करना चाहिए।

7- रोग नाश के लिए गुग्गल, घी से हवन करना चाहिए।

8- राजवश्यता के लिए गुग्गल व तिल से हवन करना चाहिए।

9- जेल से मुक्ति व गृह-शांति के लिए पीली सरसों, काले तिल, घी, लोभान, गुग्गल, कपूर, नमक, काली मिर्च, नीम की छाल से हवन करना चाहिए।

माता बगलामुखी की साधना जिस घर में होती है उस घर के लोग शत्रु, रोग, दुख-दारिद्रय, कलह आदि से मुक्त रहते हैं।

30/09/2021

प्रणाम मित्रों...
!!!!!!!!!!!!!!!
माँ जगदंबा आप सबकी मनोकामना जल्द पूरी कर दें....!!
इसके लिए मैं सतत कार्यरत हूँ......!!
जैसा की मैंने पहले भी अपनी पोस्ट मे आप सबसे सामर्थ्यानुसार पूजा -पाठ की गुजारिश की थी।
कई लोगों ने उसे आपने दैनिक पुजा पाठ मे एख्तियार भी किया है।
''
जो हिन्दू है और पित्र दोष को समझते है और जो नहीं समझते है उनके लिए भी इस दोष लगे जातक को संघर्षमय जीवन व्यतीत करना होता है। हर एक कार्य मे बधाये अपना हाथ फैलाये खड़ी रहती है ।
कोई कार्य आसानी से नहीं होता ...
अब इसका कारण भी जान लीजिये .....इसका मुख्य कारण है हमारे पूर्वजो(माता-पिता,दादा-दादी,चाचा-चाची और अन्य पूर्वज ) द्वारा किए गए कोई दोषमय कार्य और उनकी अत्रप्त इच्छाए और कुल में बिना विवाह संस्कार के अथवा नवजात की या कम उम्र में असमय मौत...!!
परिवार के सदस्यों द्वारा धर्म सम्मत कार्य या वह कर्म न किये जाना जिनसे इनको मुक्ति और शांति मिलती।
इस कारण उनकी आत्मा को शांति नहीं मिल पाती और उन सब की पूर्ति के लिए वो हमारे कार्यों मे अपरोक्ष रूप से बाधा बनते है।
''
सब लोग इस बिषय से परिचित नहीं होते और जो होते है वो इस दोष का निवारण किसी विद्वान पंडित द्वारा कराते है। और अपने पितरो को मुक्ति दिलाते है और बाधा मुक्त होते है।
''
इन सबसे मुक्ति के लिए एक आसान सा उपाय है,
इसको सब लोग कर लें जिससे की आगे की रहें आसान हो जाए ,
और हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद हमें मिल जाए...!!
,,
💐💐💐💐💐
*जिनके गुरु हैं, और जो गुरु मंत्र जाप कर रहे हैं।
वह निःसंकोच साधना सम्पन्न कर लें। बस मुझे मेसेंजर में एक बार बता दें।
कोई भी बिना गुरु के कोई भी साधना न करें।
जिनके गुरु नही वह तत्काल मुझे मेसेंजर में लिख दें।
मैं आआपकि यह कमी पूर्ण करवा दूँगा।
अभी 1 अक्टूबर की सूर्योदय तक गुरुपुष्यामृत योग है।
आपकी उन्नति ही मेरा उद्देश्य है। आपको साधना में कोई नुकसान न हो। इसका भी मुझे ध्यान देना है।
इस साधना से आआपकि कुलदेवी भी अपरोक्ष रूप से प्रसन्न होकर सुबह फल और आपका साथ देने लगेंगी।
यह साधना हर साधक को अवश्य ही करना चाहिए
इसीलिए आप यदि यह साधना करें तो मुझे मेसेंजर में अवश्य ही लिख दें।
💐💐💐💐💐

पितृपक्ष मे जो व्यक्ति अपने पित्रों का श्राद्ध - तर्पण न कर पायेँ हों , वे इस एक दिवसीय प्रयोग को कर अपने पित्रों को प्रसन्न कर सकते हैं -

सर्व पितृ अमावस्या सर्वश्रेष्ठ तिथि है , जिन मृतकों की तिथि ज्ञात ना हो ,या भूल चूक से जिनका श्राद्ध ना कर पाए हों उन सभी का श्राद्ध इस तिथि को कर लिया जाता है।
इस दिन किया गया श्राद्ध उतना ही फलदायी होता है जितना पवित्र तीर्थ " गया जी " में करने से होता है।

हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार किसी भी मृतात्मा को तब तक मोक्ष नहीं मिलता जब तक उसके पुत्र या पौत्र उसका श्राद्ध नहीं करते
और तब तक वे मृतात्माएं पित्र - लोक में ही निवास करती हैं , और इस तरह हर वर्ष पित्र- पक्ष में अपने वंशजों के द्वार पर अपने मोक्ष की कामना लिए वायु रूप मे अवतरित होती रहती है।

यह साधना सर्व पितृ अमावस्या को करने से दिवंगतों को शांति मिलती है तथा करने वाले को पुण्य प्राप्त होता है ।

यह साधना सूर्यास्त के समय करे ... दिशा पूर्व हो,
पीले वस्त्र धारण करे और आसन भी पीला हो।
माला पीले हकीक या हल्दी की हो ,
सामने बजोट पर पीला कपडा बिछाये और उस पर गुरु चित्र स्थापित कर सामान्य पूजन करे ,
फिर वहीं सामने एक शक्कर की ढ़ेरी बनाये,
एक सफ़ेद तिल की बनाये और
एक कटोरी में थोडा घी भी रखे ,
एक नारियल का गोला भी रखे ।

एक माला गुरुमंत्र की ,
5 माला - " ॐ नमो भगवाते वासुदेवाय " की ,
3 माला - गायत्री मंत्र की करें ,

जप के बाद समस्त जप पित्रों को समर्पित कर दे ,इस साधना से पितृ तृप्त होते हैं और साधक को आशीर्वाद देते है।

तत्पश्चात नारियल के गोले को ऊपर से थोडा सा काटकर उसमे ये तिल ,शकर और घी भर दें और गोले को काटे हुये टुकड़े से फिर से बंद कर दे और जोड़ के आस पास गीले आटा लगा दे जिससे कि गोला खुले नहीं ।

इसके बाद " ॐ श्री पितृ देवाय नमः " की 5 माला करें।

इस प्रकार ये साधना के मंत्र जप एवं क्रिया पूर्ण हुई ...

अब इस गोले को किसी पीपल वृक्ष के निचे गाड दें ,

( अभी समय है , पहले से ही कोई एकांत मे लगा या किसी मंदिर मे लगा पीपल देख लें , गड्ढा भी कर लें ... जिससे कि अमावस्या को अधिक समय नहीं लगेगा )

गाड़ते समय ये प्रार्थना करें -

" मेरे माता - पिता की पिछली समस्त पीड़ियों के पित्रों , आप इस तर्पण प्रसाद को ग्रहण करें ...
इस विधान की ऊर्जा से आपको मुक्ति मिले ,
शांति मिले ,
व आपके दुख तथा पापों का निवारण हो ,
आप सभी प्रसन्न होकर हमे इस जीवन के सभी पक्षों मे उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करें।
यदि हमसे कोई भूल या अपराध हुआ हो तो हमे क्षमा करें। "

प्रार्थना करने के बाद बिना पीछे मुड़े या देखे घर आ जायेँ ।

यदि संभव हो तो घर आने के बाद इस सूक्त का पाठ भी अवश्य कर लें -
पितृदोष के निवारण में अत्यंत चमत्कारी फल प्रदान करने वाला ये पितृ-सूक्त सभी के लिए लाभप्रद है ,
श्राद्ध-काल में पितृ-सूक्त का पाठ संध्या समय में तेल का दीपक जलाकर करें तो पितृदोष की शांति होती है। और सर्व विध उन्नति प्राप्त होती है।

पितृ-सूक्त -

रुचिरुवाच
- अर्चितानाम मूर्ताणां पितृणां दीप्ततेजसाम्
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्चक्षुषाम् !

अर्थात -
जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यंत तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्य-
दृष्टि सम्पन्न है, उन पित्रों को मै सदा नमस्कार करता है।

- इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् !

अर्थात -
जो इन्द्र आदि देवताओ, दक्ष, मारीच, सप्त ऋषियो तथा दुसरो के भी
नेता है। कामना की पूर्ति करने वाले उन पित्रों को मैं प्रणाम करता है।

- मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्यांचन्द्रमसोस्तथा
तान् नमस्याम्यहं सर्वान पितरश्चार्णवेषु ये !

अर्थात -
जो मनु आदि राजार्षियों, मुनिश्वरो तथा सूर्य चंद्र के भी नायक है,
उन समस्त पित्रों को मैं जल और समुद्र मै भी नमस्कार करता है।

- नक्षत्राणां ग्रहणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलि !

अर्थात -
जो नक्षत्रों ,ग्रहो,वायु,अग्नि,आकाश और द्युलोक एवं पृथ्वीलोक के
जो भी नेता है, उन पित्रों को मै हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।

- देवर्षिणां ग्रहाणाम सर्वलोकनमस्कृतान्
अभयस्य सदादातृन नमस्येहं कृतांजलिः !

अर्थात -
जो देवर्षियो के जन्मदाता, समस्त लोको द्वारा वन्दित तथा सदा
अक्षय फल के दाता है। उन पित्रों को मै हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।

- प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरूणाय च
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः !

अर्थात -
प्रजापति, कश्यप, सोम,वरूण तथा योगेश्वरो के रूप् में स्थित पित्रों
को सदा हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।

- नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु
स्वयंभूवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे !

अर्थात -
सातो लोको मे स्थित सात पितृगणो को नमस्कार है। मै योगदृष्टि
संपन्न स्वयंभू ब्रह्मजी को प्रणाम करता हूँ ।

- सोमाधारान् पितृगणानयोगमूर्तिधरांस्तथा
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् !

अर्थात – चंद्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित और योगमूर्तिधारी पितृगणों को मै
प्रणाम करता हूँ। साथ ही संपूर्ण जगत के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।

- अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितृनहम्
अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः !

अर्थात -
अग्निस्वरूप् अन्य पितरो को भी प्रणाम करता हूँ क्याकि यह संपूर्ण
जगत अग्नि और सोममय है।

- ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः !

अर्थात -
जो पितृ तेज मे स्थित है जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप
मै दृष्टिगोचर होते है तथा जो जगतस्वरूप और ब्रह्मस्वरूप है

- तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः !

अर्थात -
उन संपूर्ण योगी पित्रों को मै एकाग्रचित होकर प्रणाम है
उन्हे बारम्बार नमस्कार है ... वे स्वधाभोजी पितृ मुझ पर प्रसन्न हो।

!! ॐ नमः शिवाय !!

28/09/2021

कारक – दादा , परिश्रम , पहलवानी , शक्ति , हिम्मत , साहस , शौर्य , शत्रुता , दुख , चिंता , दुर्भाग्य , अन्याय , संकट , बुरी आदतें , झूठ , अत्महत्या , जुआरी , शराबी , अंधकार , दुर्घटना , विधर्मी , जहर , सरीसृप्त , महामारी , विदेसी भूमि पर जीवन , अभाव , देश से निष्कासन , झगड़ा , कटु भाषण , पाखंडी , तुच्छ विचारों वाला , अंग विच्छेद

👉राहु के गुण दोष प्रायः शनि के समान ही होते हैं ।

शनि की भांति राहु काला , धीमी गति वाला , रोगप्रद , स्नायु रोग कारक , पृथकताजनक , लंबा , विदेश गमन , अधार्मिक मनुष्य , गंदगी , भ्रम , जादू , अंधकार प्रिय , भय ,कष्ट तथा त्रुटियों का कारक होता है ।

राहु अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल अचानक देता है । यह अचानक फल देने के लिए प्रसिद्ध है ।

राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है । बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है , जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है ।

इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है।

इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है।

राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है , जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है , हार नहीं मानता है अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।

राहु धन भाव पंचम भाव या लाभ भाव में विराजमान होकर अचानक लाभ करवाता है बशर्ते इन भावों के स्वामी बलवान हो ।

राहु पर यदि कुंडली के राजयोग बनाए वाले ग्रह तथा शुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है तो राहु अपनी भुक्ति में उन शुभ ग्रहों के राजयोग का फल करता है ।

परंतु यदि अष्टमेश द्वादशेश आदि से युक्त दृष्ट हो तो धन हानि एवं दरिद्रता भी देता है ।

गलत तरीके से धन प्राप्त करने के लिए राहु ही प्रेरित करता है । जब राहु शनि के साथ विराजमान हो तो राहु में शनि के भी गुण समाहित हो जाते हैं जिसके कारण राहु की दृष्टि जहां पड़ती है वहां पृथकता आदि अनिष्ट फल देता है ।

👉संसार में जितने भी गलत एवं खतरनाक कार्य होते हैं जितने भी खतरनाक बीमारियां होती हैं उन सब में राहु का योगदान होता है ।

बिना राहु के योगदान से यह संभव नही है । राहू पर यदि शुभ प्रभाव एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ जाए तो अच्छा फल भी देता है वरना समाज विरोधी और गलत कार्य करवाता है ।

👉राहु कभी भी पीड़ित नहीं होता है , बल्कि यह सभी ग्रहों को पीड़ित करता है ।

सूर्य सभी ग्रहों का राजा है सभी को प्रकाश देते है परंतु राहु की दृष्टि सूर्य पर पड़ जाए या राहु सूर्य के साथ बैठ जाए सूर्य भी पीड़ित हो जाते है । सूर्य पर शनि राहु की दृष्टि या युति के कारण ही पितृदोष बनता है ।

राहु सबसे ज्यादा पीड़ित सूर्य , चंद्रमा ,मंगल एवं गुरु को करता है ।

इन ग्रहों के साथ संबंध बनाकर कई प्रकार के रोग एवं परेशानी देता है ।
राहु किसी भी राशि का स्वामी नहीं होता है परंतु मिथुन राशि में उच्च का होता है और धनु राशि में नीच का माना जाता है ।

इसलिए अपने जीवन में होने वाले किसी भी कमी को पूरा करने के लिए राहु केतु को प्रबल करने के बजाय सूर्य , चंद्रमा , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि इनमें से जो उस कमी वाले भाव के स्वामी हैं उन्हें प्रबल करना चाहिए ।

👉यदि राहु किसी शुभ ग्रह या किसी भाव को पीड़ित ना कर रहा हो एवं राहु पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तब बहुत अच्छे तरीके से विशेषण करने के बाद ही राहु से संबंधित रत्न धारण करना चाहिए ।

👉 राहु प्रधान व्यक्ति में शनि के संबंधित गुण रहते हैं ऐसे व्यक्ति धोखा देने वाले या छल करने वाले होते हैं परंतु ऐसे व्यक्ति जल्दी हिम्मत नहीं हारते हैं बहुत संघर्ष करते हैं जीतने के लिए संघर्ष करते रहते हैं ऐसे व्यक्ति बहुत जुगाड़ू होते हैं प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने से पीछे नहीं हटते ऐसे व्यक्तियों का कई बार बनता काम अंत में बिगड़ जाता है

👉राहु जिन जिन ग्रहों के साथ संबंध बनाता है उन ग्रहों से संबंधित होने वाली बीमारी देता है ।

राहु से संबंधित बीमारी – डर , सर्पदंश , जहर फैलना , दवा से संक्रमण , पागलपन , मानसिक रोग , स्मृति नाश , दुर्घटना , शोक , आंखों के नीचे काले घेरे , नशेड़ी , मोटापा , वायु रोग , भूत , प्रेत , डायन , ऊपरी बाधा , कैंसर इत्यादि

21/09/2021

. यदि लग्न सप्तम, दशम भाव का कार्येश हो तब जातक को कारोबार के द्वारा धनार्जन होगा और यदि षष्ठ और दशम का कार्येश हो तो नौकरी से धन अर्जित करेगा।

2. तृतीय भाव का कार्येश हो तो लेखन, छपाई, एजेंसी, कमीशन एजेंट, रिपोर्टर, सेल्समैन और संस्‍थाओं से धन प्राप्त होगा। मतलब यह कि वह इस क्षेत्र में अपना करियर बनाएगा।


3. अगर द्वितीय और पंचम का कार्येश हो तो जमीन, घर, बगीचे, वाहन और शिक्षा संस्थानों से धन प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त नाटक, सिनेमा, ढोल, रेस, जुआ, मंत्र, तंत्र और पौरोहित्य कर्म से धन अर्जित करेगा।

4. यदि द्वितीय और सप्तम का कार्येश हो तो विवाह, विवाह मंडल, पार्टनरशिप और कानूनी सलाहकार के कार्य से धन अर्जित करेगा।

5. यदि दशम भाव में एक से अधिक ग्रह हों और उसमें से जो ग्रह सबसे अधिक बलवान होगा, जातक उसके अनुसार ही व्यापार करेगा। जैसे दशम भाव में मंगल बलवान हो तो जातक प्रॉपर्टी, निवेश आदि का व्यवसाय करेगा अथवा पुलिस या सेना में जाएगा।


6. यदि दशम भाव में कोई ग्रह न हो तो दशमेश यानी दशम भाव के स्वामी के अनुसार व्यापार तय होगा। यदि दशम भाव में शुक्र हो तो व्यक्ति कॉस्मेटिक्स, सौंदर्य प्रसाधन, ज्वेलरी आदि के कार्यों से लाभ अर्जित करता है। दशम भाव का स्वामी जिन ग्रहों के साथ होता है, उनके अनुसार व्यक्ति व्यापार करता है।

7. सूर्य के साथ गुरु हो तो व्यक्ति होटल व्यवसाय, अनाज आदि के कार्य से लाभ कमाता है। एकादश भाव आय स्थान है। इस भाव में मौजूद ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यापार तय किया जाता है।


8. जन्म कुंडली में कोई ग्रह जब लग्नेश, पंचमेश या नवमेश होकर दशम भाव में स्थित हो या दशमेश होकर किसी भी त्रिकोण (1, 5, 9 भावों) में या अपने ही स्थान में स्थित हों तो व्यक्ति की आजीविका के पर्याप्त साधन होते हैं। वह व्यवसाय या नौकरी में अच्छी प्रगति करता है। दशमेश या दशम भावस्थ ग्रह का बल और शुभता दोनों उसके शुभ फलों में द्विगुणित वृद्धि करते हैं।

दशम भावस्थ नवग्रह फल-
सूर्य : दशम भाव में स्थित मेष, कर्क, सिंह या धनु राशि का सूर्य सैन्य या पुलिस अधिकारी बनाता है जबकि वृश्चिक राशि का सूर्य चिकित्सा अधिकारी बनाता है।


चंद्र- इस भाव में यदि शुभ चंद्र बली होकर बैठा है तो जातक को दैनिक उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का व्यापार करना चाहिए उससे वह लाभ प्राप्त करेगा। लेकिन यदि मंगल या शनि की युति हो तो असफलता मिलेगी।

मंगल- मेष, सिंह, वृश्चिक या धनु राशि का मंगल जातक को चिकित्सक और सर्जन बनाता है लेकिन यदि मंगल का सूर्य से संबंध हो तो व्यक्ति सुनार या लोहार का कार्य करेगा।

बुध- लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश, नवमेश या दशमेश होकर कन्या या सिंह राशि का बुध गुरु से दृष्ट या युत हो तो व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी सफलता अर्जित करता है। वह प्रोफेसर या लेक्चरर बन सकता है। हालांकि बुध के प्रभाव से जातक बैंककर्मी या बैंक से संबंधित कार्य भी कर सकता है। लेकिन यदि बुध शुक्र के साथ या शुक्र की राशि में हो तो जातक फिल्म या विज्ञापन से संबंधित व्यवसाय करता है।


बृहस्पति- बृहस्पति का संबंध नवम भाव से है। लेकिन यदि वह दशम भाव में स्थित है तो वह नीच का माना जाता है। लेकिन बृहस्पति का संबंध जब नवमेश से हो तो व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धन अर्जित करता है। बृहस्पति यदि बलवान और राजयोगकारक हो तो जातक को न्यायाधीश बना देता है। लेकिन बृहस्पति मंगल के प्रभाव में हो तो जातक फौजदारी वकील बनता है।

शुक्र- दशम भाव में स्थित शुक्र जातक को सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, फैंसी वस्तुओं आदि का निर्माता या विक्रेता बनाता है। शुक्र का संबंध द्वितीयेश, पंचमेश या बुध से हो तो जातक गायन और वादन के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।


शनि- यदि दशम भाव में बलवान शनि का मंगल से संबंध हो तो जातक इलेक्ट्रॉनिक फिल्म में कार्य करता है। यदि बुध से संबंध हो तो मैकेनिकल इंजीनियर बनता है। शनि का संबंध यदि चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से हो तो जातक तेल, कोयला, लोहा आदि के व्यापार से धन अर्जित करता है। लेकिन यदि शनि का राहु से संबंध हो तो व्यक्ति चमड़े, रैक्जीन, रबर आदि के व्यापार में सफल होता है।

राहु- राहु यदि मिथुन राशि का होकर दशम भाव में स्थित हो तो जातक राजनीति, सेना, पुलिस या रेलवे के क्षेत्र में कार्य करता है।

केतु- दशम भाव का केतु धनु या मीन में हो तो जातक व्यापार में सफलता प्राप्त कर खूब वैभव, धन और यश कमाता है, बशर्ते कि उसके शत्रु ग्रह उसके साथ न हो या वह शत्रु ग्रहों से दृष्ट न हो।

21/09/2021

कुंडली में व्यापार या नौकरी को दशम भाव से देखा जाता है। दशम भाव के स्वामी को दशमेश या कर्मेश या कार्येश कहते हैं। इस भाव से यह देखा जाता है कि व्यक्ति सरकारी नौकरी करेगा अथवा प्राइवेट? या व्यापार करेगा तो कौन सा और उसे किस क्षेत्र में अधिक सफलता मिलेगी? सप्तम भाव साझेदारी का होता है। इसमें मित्र ग्रह हों तो पार्टनरशिप से लाभ। शत्रु ग्रह हो तो पार्टनरशिप से नुकसान। मित्र ग्रह सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु होते हैं। शनि, मंगल, राहु, केतु ये आपस में मित्र होते हैं। सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं।

ऐसा भी कहा जाता है कि मन का स्वामी चंद्र जिस राशि में हो, उस राशि से स्वामी ग्रह की प्रकृति के आधार पर या चंद्र से उसके युति अथवा दृष्टि संबंध के आधार पर यदि कोई व्यक्ति अपनी आजीविका अथवा कार्य का चयन करता है। बलवान चंद्र से दशम भाव में गुरु हो तो गजकेसरी नामक योग होता है किंतु गुरु कर्क या धनु राशि का होना चाहिए। ऐसा जातक यशस्वी, परोपकारी धर्मात्मा, मेधावी, गुणवान और राजपूज्य होता है। यदि जन्म लग्न, सूर्य और दशम भाव बलवान हो तथा पाप प्रभाव में न हो तो जातक शाही कार्यों से धन कमाता है और यशस्वी होता है।

Address

Indrapuram
Ghaziabad
201014

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when DeeptiA Gupta Tarot Reader Spiritual Healer posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Practice

Send a message to DeeptiA Gupta Tarot Reader Spiritual Healer:

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram