28/09/2021
कारक – दादा , परिश्रम , पहलवानी , शक्ति , हिम्मत , साहस , शौर्य , शत्रुता , दुख , चिंता , दुर्भाग्य , अन्याय , संकट , बुरी आदतें , झूठ , अत्महत्या , जुआरी , शराबी , अंधकार , दुर्घटना , विधर्मी , जहर , सरीसृप्त , महामारी , विदेसी भूमि पर जीवन , अभाव , देश से निष्कासन , झगड़ा , कटु भाषण , पाखंडी , तुच्छ विचारों वाला , अंग विच्छेद
👉राहु के गुण दोष प्रायः शनि के समान ही होते हैं ।
शनि की भांति राहु काला , धीमी गति वाला , रोगप्रद , स्नायु रोग कारक , पृथकताजनक , लंबा , विदेश गमन , अधार्मिक मनुष्य , गंदगी , भ्रम , जादू , अंधकार प्रिय , भय ,कष्ट तथा त्रुटियों का कारक होता है ।
राहु अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल अचानक देता है । यह अचानक फल देने के लिए प्रसिद्ध है ।
राहु की तामसिक प्रवृत्ति के कारण वह चालाक है और व्यक्ति को भौतिकता की ओर पूर्णतया अग्रसर करता है । बहुत महत्वाकांक्षी व लालची बनाता है , जिसके लिए व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद की नीतियां अपनाकर जीवन में आगे बढ़ता है ।
इसी तरह यह व्यक्ति को भ्रमित भी रखता है। एक के बाद दूसरी इच्छाओं को जागृत करता है।
इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति हेतु वह विभिन्न धार्मिक कार्य व यात्राएं भी करता है।
राहु प्रधान व्यक्ति में दिखावा करने की प्रवृत्ति विशेष रूप से पायी जाती है। राहु कार्य जाल में फंसाता है , जीवन में आकर्षण को बनाये रखता है , हार नहीं मानता है अर्थात इच्छा शक्ति को जागृत रखता है।
राहु धन भाव पंचम भाव या लाभ भाव में विराजमान होकर अचानक लाभ करवाता है बशर्ते इन भावों के स्वामी बलवान हो ।
राहु पर यदि कुंडली के राजयोग बनाए वाले ग्रह तथा शुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है तो राहु अपनी भुक्ति में उन शुभ ग्रहों के राजयोग का फल करता है ।
परंतु यदि अष्टमेश द्वादशेश आदि से युक्त दृष्ट हो तो धन हानि एवं दरिद्रता भी देता है ।
गलत तरीके से धन प्राप्त करने के लिए राहु ही प्रेरित करता है । जब राहु शनि के साथ विराजमान हो तो राहु में शनि के भी गुण समाहित हो जाते हैं जिसके कारण राहु की दृष्टि जहां पड़ती है वहां पृथकता आदि अनिष्ट फल देता है ।
👉संसार में जितने भी गलत एवं खतरनाक कार्य होते हैं जितने भी खतरनाक बीमारियां होती हैं उन सब में राहु का योगदान होता है ।
बिना राहु के योगदान से यह संभव नही है । राहू पर यदि शुभ प्रभाव एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ जाए तो अच्छा फल भी देता है वरना समाज विरोधी और गलत कार्य करवाता है ।
👉राहु कभी भी पीड़ित नहीं होता है , बल्कि यह सभी ग्रहों को पीड़ित करता है ।
सूर्य सभी ग्रहों का राजा है सभी को प्रकाश देते है परंतु राहु की दृष्टि सूर्य पर पड़ जाए या राहु सूर्य के साथ बैठ जाए सूर्य भी पीड़ित हो जाते है । सूर्य पर शनि राहु की दृष्टि या युति के कारण ही पितृदोष बनता है ।
राहु सबसे ज्यादा पीड़ित सूर्य , चंद्रमा ,मंगल एवं गुरु को करता है ।
इन ग्रहों के साथ संबंध बनाकर कई प्रकार के रोग एवं परेशानी देता है ।
राहु किसी भी राशि का स्वामी नहीं होता है परंतु मिथुन राशि में उच्च का होता है और धनु राशि में नीच का माना जाता है ।
इसलिए अपने जीवन में होने वाले किसी भी कमी को पूरा करने के लिए राहु केतु को प्रबल करने के बजाय सूर्य , चंद्रमा , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि इनमें से जो उस कमी वाले भाव के स्वामी हैं उन्हें प्रबल करना चाहिए ।
👉यदि राहु किसी शुभ ग्रह या किसी भाव को पीड़ित ना कर रहा हो एवं राहु पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तब बहुत अच्छे तरीके से विशेषण करने के बाद ही राहु से संबंधित रत्न धारण करना चाहिए ।
👉 राहु प्रधान व्यक्ति में शनि के संबंधित गुण रहते हैं ऐसे व्यक्ति धोखा देने वाले या छल करने वाले होते हैं परंतु ऐसे व्यक्ति जल्दी हिम्मत नहीं हारते हैं बहुत संघर्ष करते हैं जीतने के लिए संघर्ष करते रहते हैं ऐसे व्यक्ति बहुत जुगाड़ू होते हैं प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने से पीछे नहीं हटते ऐसे व्यक्तियों का कई बार बनता काम अंत में बिगड़ जाता है
👉राहु जिन जिन ग्रहों के साथ संबंध बनाता है उन ग्रहों से संबंधित होने वाली बीमारी देता है ।
राहु से संबंधित बीमारी – डर , सर्पदंश , जहर फैलना , दवा से संक्रमण , पागलपन , मानसिक रोग , स्मृति नाश , दुर्घटना , शोक , आंखों के नीचे काले घेरे , नशेड़ी , मोटापा , वायु रोग , भूत , प्रेत , डायन , ऊपरी बाधा , कैंसर इत्यादि