10/11/2025
ज्ञान (Knowledge)
हम क्या जानते हैं, और कैसे जानते हैं?
यह किताब यहीं से शुरू होती है,सबसे पुराना और ज़रूरी सवाल-“मैं जो देखता-सुनता हूँ, क्या वह सच है?”
ब्लाकबर्न बताते हैं कि हम रोज़मर्रा में बहुत कुछ “जानते” हैं ,मौसम कैसा है, कौन-सा रास्ता कहाँ जाता है, कौन-सा फल मीठा होता है।पर जब हम थोड़ा गहराई से सोचते हैं, तो एक डर उठता है-अगर हमारी इंद्रियाँ धोखा दे दें तो? क्या होगा अगर हम सपना देख रहे हों? क्या होगा अगर पूरा संसार किसी भ्रम की तरह हो?
प्लेटो और गुफा की कहानी
ब्लैकबर्न , प्लेटो की प्रसिद्ध “गुफा” वाली उपमा याद दिलाते हैं।कई लोग एक अँधेरी गुफा में हैं और बाहर की चीज़ें नहीं देखते,
सिर्फ दीवार पर पड़ती परछाइयाँ देखते हैं।
वे वही परछाइयाँ “सत्य” मान लेते हैं।पर जब कोई बाहर निकलता है,तो उसे असली दुनिया दिखाई देती है-ज्ञान यानी अंधेरे से बाहर निकलने की कोशिश।
डेसकार्ट- “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ”
रेने डेसकार्ट ने कहा था:“हर चीज़ पर शक करो,लेकिन इस बात पर शक नहीं कर सकते कि ‘शक करने वाला कोई है’।”इसलिए उसने कहा-“Cogito ergo sum”,मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।
यानि सोचने की क्षमता ही हमारे अस्तित्व का सबूत है।ब्लैकबर्न कहते हैं,यह विचार हमें दिखाता है कि संदेह भी ज्ञान की ओर एक कदम है, दुश्मन नहीं।
अनुभव और तर्क -दो रास्ते
दर्शन में दो बड़े मत हैं:
1. अनुभववाद (Empiricism): ज्ञान इंद्रियों से आता है (जैसे Hume, Locke)।
2. तर्कवाद (Rationalism): ज्ञान दिमाग़ के विचारों से आता है (जैसे Descartes, Spinoza)।
ब्लैकबर्न दोनों में संतुलन रखते हैं।वे कहते हैं- “हम आँखों से देखते हैं,पर दिमाग़ से समझते हैं।” इंद्रियाँ हमें “कच्चा माल” देती हैं,पर सोच उसे “अर्थ” देती है।
ह्यूम का सवाल - क्या निश्चितता संभव है?
डेविड ह्यूम ने कहा कि हम कभी भी “निश्चित” नहीं हो सकते कि कल सूरज उगेगा।हम ऐसा इसलिए मानते हैं क्योंकि
हर रोज़ अब तक ऐसा हुआ है।यानि हमारा ज्ञान आदत पर भी टिका है,सिर्फ तर्क पर नहीं।
ब्लैकबर्न इस बिंदु पर कहते हैं-“ज्ञान सौ प्रतिशत भरोसा नहीं,बल्कि इतना भरोसा है जिससे हम ज़िंदगी चला सकें।”
गेटियर की समस्या – सही जवाब भी गलत हो सकता है
20वीं सदी में एडमंड गेटियर ने एक मुश्किल सवाल उठाया-“अगर मेरा विश्वास सच निकले,पर वह सिर्फ़ संयोग से सही हो,तो क्या वह ‘ज्ञान’ कहलाएगा?”
उदाहरण के लिए तुम सोचो तुम्हारा दोस्त दफ़्तर में है क्योंकि उसकी कुर्सी पर कोट पड़ा है,पर असल में वह छुट्टी पर है फिर भी किसी और कारण से वह सच में वहीं है।
क्या तुम्हें ‘पता’ था या बस ‘अंदाज़ा’ लगा था?
ब्लैकबर्न कहते हैं ,ज्ञान का मतलब सिर्फ़ सच जानना नहीं,बल्कि सही वजह से जानना है।
ब्लैकबर्न का निष्कर्ष – सोचते रहो, पर डरो मत।वे कहते हैं कि ज्ञान का मतलब पूर्ण निश्चितता नहीं,बल्कि लगातार सुधार है।
गलतियाँ हमें कमजोर नहीं, बल्कि समझदार बनाती हैं।“ज्ञान एक यात्रा है, मंज़िल नहीं।” हम अनुभव, तर्क, चर्चा और सबूत से सत्य के करीब जाते हैं भले ही कभी पूरी तरह न पहुँच पाएं।
हम दुनिया को इंद्रियों से देखते हैं,पर समझने का काम सोच करती है।संदेह बुरा नहीं ,यह सोच को ईमानदार बनाता है।सही ज्ञान वह है जो तर्क और सबूत दोनों पर टिका हो।”मैं सोचता हूँ”-यही मानवता का आधार है।सोचना सीखो,क्योंकि बिना सवाल किए मिला ज्ञान सिर्फ़ अंधविश्वास होता है।
सरल शब्दों में:
हम दुनिया को इंद्रियों से देखते हैं,
पर समझने का काम सोच करती है।
संदेह बुरा नहीं -यह सोच को ईमानदार बनाता है।
सही ज्ञान वह है जो तर्क और सबूत दोनों पर टिका हो।
“मैं सोचता हूँ”- यही मानवता का आधार है।
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मन (Mind)
“मैं कैसे सोचता हूँ?” यह प्रमुख सवाल है।
ब्लैकबर्न कहते हैं हम जानते हैं कि हमारा मस्तिष्क एक भौतिक अंग है: नसें, रसायन, विद्युत संकेत।पर सवाल यह है कि विचार, यादें, भावनाएँ,ये कहाँ से आती हैं?
क्या वे मस्तिष्क की क्रियाएँ हैं,या कुछ ऐसा जो भौतिक नहीं?
यही “मन का दर्शन” (Philosophy of Mind) कहलाता है।
डेसकार्ट का दोहरा दृष्टिकोण – द्वैतवाद (Dualism)
रेने डेसकार्ट का मानना था कि मन और शरीर दो बिल्कुल अलग चीज़ें हैं: शरीर भौतिक (material) है जो विज्ञान से समझा जा सकता है।मन अभौतिक (immaterial) है जो सोचता, महसूस करता, निर्णय लेता है।उसने कहा ,“शरीर मशीन की तरह है,पर सोचने वाला मन उस मशीन का मालिक है।”
ब्लैकबर्न बताते हैं कि यह विचार आकर्षक है,क्योंकि यह हमें “केवल पदार्थ” से अधिक मानता है।पर यही सोच आगे जाकर सबसे बड़ी दार्शनिक उलझन बन जाती है।
राइल की आलोचना,”Ghost in the Machine”
20वीं सदी में दार्शनिक गिल्बर्ट राइल ने डेसकार्ट के इस द्वैतवाद की आलोचना की।उसने कहा,“मन को शरीर से अलग मानना वैसा ही है जैसे किसी विश्वविद्यालय देखने आए व्यक्ति को
सारे भवन दिखाने के बाद यह पूछना कि
‘अब मुझे बताओ, विश्वविद्यालय कहाँ है?’”
यानि,मन कोई अलग चीज़ नहीं,बल्कि उन्हीं प्रक्रियाओं का नाम है जो शरीर करता है।
उसने डेसकार्ट की सोच को “Ghost in the Machine” कहा-एक ऐसा भूत जो मशीन में रहता है पर जिसका अस्तित्व कभी साबित नहीं होता।
आधुनिक दृष्टिकोण :मन = मस्तिष्क?
अब आधुनिक विज्ञान यह कहता है कि
विचार, भावना, याद ,सब मस्तिष्क की क्रिया हैं।न्यूरॉन्स के बीच संकेत, रासायनिक बदलाव,और इन सबका पैटर्न ही “सोच” बनाता है।
ब्लैकबर्न इस विचार को समझाते हुए कहते हैं,“जैसे बिजली के प्रवाह से कंप्यूटर चलता है,वैसे ही मस्तिष्क की विद्युत-रासायनिक गतिविधि से चेतना बनती है।”पर वे यह भी पूछते हैं कि “क्या सचमुच इतना ही है?”
अनुभव का रहस्य – ‘Qualia’
ब्लैकबर्न फिर एक सूक्ष्म सवाल उठाते हैं-
अगर मस्तिष्क सब कुछ है,तो फिर “अनुभव” का रंग कहाँ से आता है?
उदाहरण के लिए जब हम लाल गुलाब देखते हैं,तो हमें “लालपन” महसूस होता है।यह अनुभूति (experience) किसी रसायन या विद्युत संकेत में नहीं दिखती।
इसे दर्शन में कहते हैं - Qualia
यानि अनुभव की आत्मीय गुणवत्ता।
ब्लैकबर्न कहते हैं ,“चेतना वही रहस्य है जो हर सिद्धांत से फिसल जाता है।”
व्यवहारवाद और कार्यवाद (Behaviorism & Functionalism)
Behaviorism:20वीं सदी में कुछ विचारकों (जैसे Skinner) ने कहा,
“मन” जैसी कोई चीज़ नहीं;बस व्यवहार है जिसे देखा जा सकता है।
पर ब्लैकबर्न कहते हैं,यह सोच अधूरी है।
क्योंकि व्यवहार तो वही दिखाता है,जो मन छिपा नहीं पाता पर हर भावना, हर विचार का एक भीतर का अनुभव भी होता है,
जिसे कोई बाहरी पर्यवेक्षक नहीं देख सकता।
Functionalism:
बाद के विचारकों (जैसे डेनियल
डेनेट) ने कहा -मन का अर्थ उसकी “संरचना” नहीं,बल्कि उसके “कार्य” में है।जैसे कंप्यूटर का दिमाग हार्डवेयर नहीं,
बल्कि उसका प्रोग्राम है।
ब्लैकबर्न इसे अधिक व्यावहारिक दृष्टि मानते हैं।वे कहते हैं ,“मन एक कार्य है जो शरीर करता है,पर उसका अर्थ अनुभव से बनता है।”
चेतना की पहेली
ब्लैकबर्न स्वीकार करते हैं कि
अब तक कोई सिद्धांत “चेतना” को पूरी तरह नहीं समझा पाया।विज्ञान उसके ‘कैसे’ (how) की व्याख्या करता है,
पर ‘क्यों’ (why) की नहीं।
वे कहते हैं,“हम जानते हैं कि न्यूरॉन्स जलते हैं,पर यह नहीं जानते कि वे सपने कैसे रचते हैं।” यही दर्शन और विज्ञान का संगम-बिंदु है।
ब्लैकबर्न का निष्कर्ष -“मन एक प्रक्रिया है।” वे कहते हैं मन शरीर से अलग नहीं, उसी की एक गहरी प्रक्रिया है।चेतना पदार्थ से बनी है, पर उसका अनुभव केवल पदार्थ नहीं है।सोच, भावना, याद यह सब मिलकर जीवित अनुभव की बुनावट बनाते हैं।
“मन कोई स्थान नहीं है जहाँ विचार रहते हैं;मन वह प्रवाह है जिसमें विचार जन्म लेते हैं।”
सरल शब्दों में:
डेसकार्ट: मन और शरीर अलग हैं।
राइल : दोनों को अलग मानना भ्रम है।
आधुनिक दृष्टि: मस्तिष्क = मन की भौतिक नींव।
अनुभव (qualia) वह हिस्सा है जो अभी भी रहस्यमय है।
मन कोई वस्तु नहीं, बल्कि प्रक्रिया है,जो देखने, महसूस करने और समझने में लगातार सक्रिय रहती है।
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स्वतंत्र इच्छा (Free Will)
सवाल का मूल – क्या हम अपने कर्मों के मालिक हैं?
सिमोन ब्लैकबर्न इसकी शुरुआत एक सरल पर तीखे प्रश्न से करते हैं:हम रोज़ निर्णय लेते हैं -क्या खाना है, कहाँ जाना है, क्या कहना है।हम सोचते हैं कि हम ये चुनाव स्वतंत्र रूप से करते हैं।
पर क्या वाकई ऐसा है? क्या हमारी हर क्रिया, हर इच्छा के पीछे किसी कारण की लंबी श्रृंखला नहीं होती -परिवार, परवरिश, समाज, जेनेटिक्स, हालात?
यदि हाँ, तो हम स्वतंत्र नहीं,बल्कि “नियत” (determined) हैं।
यही है स्वतंत्र इच्छा बनाम नियतिवाद (Free Will vs Determinism) का प्रश्न।
नियतिवाद (Determinism) – हर चीज़ का कारण होता है।
Determinism कहता है कि
संसार एक मशीन की तरह चलता है ,हर घटना किसी कारण का परिणाम है।अगर हमें उन कारणों का पूरा ज्ञान हो,तो हम भविष्य भी जान सकते हैं।
जैसे,अगर गेंद फेंकी गई है,
तो उसका गिरना तय है, बस कोण और बल जानना होगा।
ठीक वैसे ही,अगर हमारे विचार और इच्छाएँ मस्तिष्क की रासायनिक प्रक्रियाएँ हैं,
तो हमारे निर्णय भी पूर्व निर्धारित हैं।
लैपलेस नामक वैज्ञानिक ने कहा था,“अगर कोई ऐसा बुद्धिमान हो जो हर परमाणु की गति जान ले,तो वह पूरे भविष्य का हिसाब लगा सकता है।”
पर तब ज़िम्मेदारी कहाँ गई?
ब्लैकबर्न यहीं सवाल उठाते हैं:
अगर सब पहले से तय है,
तो “गलत” या “सही” का क्या मतलब रह जाता है? कोई अपराध करे तो क्या वह दोषी है?
या बस परिस्थितियों का परिणाम?
यही नैतिक दुविधा है,यदि सब कुछ नियत है,तो नैतिकता खत्म हो जाती है।
स्वतंत्रता के पक्ष में – हम महसूस करते हैं कि हम चुनते हैं।
हर व्यक्ति यह जानता है कि
कई बार वह कुछ कर सकता है,
और उतनी ही ताकत से उसे न करने का निर्णय भी ले सकता है।
यह “अंदर की अनुभूति” ही
स्वतंत्रता का पहला प्रमाण है।
ब्लैकबर्न कहते हैं,“हम केवल प्रतिक्रिया देने वाली मशीन नहीं हैं;हमारे भीतर ‘ना’ कहने की क्षमता है।”
दो चरम दृष्टिकोण
Libertarianism(सार्त्रे , काँट )मनुष्य पूरी तरह स्वतंत्र है; कोई भी कारण उसे बाँध नहीं सकता।
Hard Determinism(स्पिनोज़ा , लैपलेस )सब कुछ कारणों से तय है; स्वतंत्रता एक भ्रम है।
Compatibilism (मिलनवादी दृष्टिकोण :ह्यूम , हॉब्स)-हम स्वतंत्र और नियत,दोनों हैं, अपने-अपने स्तर पर।
ब्लैकबर्न तीसरे मत,Compatibilism की ओर झुकते हैं।
ह्यूम की दृष्टि – स्वतंत्रता का अर्थ गलत समझा गया है।
डेविड ह्यूम ने कहा -“स्वतंत्रता का मतलब ‘कारणों से मुक्त होना’ नहीं,बल्कि बिना दबाव के कार्य करना है।”
यानि जब मैं वही करता हूँ जो मैं चाहता हूँ,भले ही मेरी इच्छा किसी कारण से बनी हो,तब भी मैं स्वतंत्र हूँ।
ब्लैकबर्न इस पर कहते हैं,“स्वतंत्रता किसी शून्य में नहीं होती;वह हमारे कारणों और विवेक की उपज होती है।”
नैतिक जिम्मेदारी की रक्षा
अगर स्वतंत्रता का मतलब “बिना कारण के करना” हो,तो वह पागलपन है, न कि आज़ादी।
सच्ची स्वतंत्रता यह है कि हम अपने कारणों के स्वामी बनें,
न कि केवल उनके दास।
इसलिए नैतिकता बची रहती है क्योंकि हम अपने कर्मों के इच्छुक भागीदार हैं,
उनके अंधे शिकार नहीं।
आधुनिक संदर्भ – विज्ञान और स्वतंत्रता
ब्लैकबर्न बताते हैं कि
आधुनिक न्यूरोसाइंस यह दिखाता है कि निर्णय लेने से पहले मस्तिष्क कुछ संकेत भेज देता है।कई वैज्ञानिक कहते हैं कि इसका मतलब है,
“दिमाग पहले तय करता है,
मनुष्य बाद में सोचता है कि उसने तय किया।”
पर ब्लैकबर्न सावधान करते हैं ,“निर्णय लेना और उसे महसूस करना एक ही प्रक्रिया के दो पहलू हैं।” विज्ञान कारण बताता है,पर अनुभव यह बताता है कि हम कारणों के साथ भी अर्थ बना सकते हैं।
ब्लैकबर्न का निष्कर्ष – स्वतंत्रता का मतलब है जागरूकता।स्वतंत्रता का अर्थ है जिम्मेदारी से जीना।हर क्रिया के कारण हैं,पर यह हम पर निर्भर है कि हम किस कारण को चुनें।हमारी सबसे बड़ी स्वतंत्रता है-सोचने और अपने निर्णयों पर प्रश्न उठाने की शक्ति।
“मनुष्य स्वतंत्र तब होता है जब वह अपनी ही आदतों और भय के विरुद्ध सोच सके।”
सरल शब्दों में:
Determinism: सब कुछ पहले से तय है।
Libertarianism: हम पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
Compatibilism: हम कारणों के बीच भी स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं।
स्वतंत्रता का मतलब है-अपने कारणों को समझना और उन्हें चुनना।
नैतिकता इसी समझ पर टिकी है।
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ईश्वर (God)
प्रश्न की शुरुआत – विश्वास और बुद्धि के बीच
ब्लैकबर्न इस की शुरुआत एक बहुत मानवीय बिंदु से करते हैं:जब हम दुख, मृत्यु, या अन्याय देखते हैं,तो मन अपने आप पूछता है-“क्या कोई उच्च शक्ति है जो सब देख रही है?”
यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं,बल्कि अर्थ का है क्योंकि ईश्वर का विचार, चाहे सच हो या न हो,हमारे नैतिक और भावनात्मक जीवन का केंद्र रहा है।
वे लिखते हैं -“ईश्वर में विश्वास का अर्थ है ,यह मानना कि अस्तित्व के पीछे कोई अर्थ छिपा है।”
पर दर्शन का काम है इस विश्वास की परीक्षा लेना,क्या यह तर्क से टिकता है? या यह केवल डर और आशा का सहारा है?
अस्तित्व के पक्ष में तर्क (Arguments for God’s Existence)
ब्लैकबर्न यहाँ तीन प्रमुख पारंपरिक तर्कों का विश्लेषण करते हैं।
(i) Ontological Argument – “सोचने मात्र से अस्तित्व”
यह विचार सेंट एनसेल्म से शुरू हुआ था।
उसका कहना था,
“हम एक ऐसे अस्तित्व की कल्पना कर सकते हैं जो सबसे महान है।यदि वह केवल कल्पना में होता,तो उससे भी बड़ा वह होता जो वास्तविक में है।इसलिए वह वास्तविक में भी होना चाहिए और वही ईश्वर है।”
ब्लैकबर्न इस तर्क को सुंदर पर चालाक बताते हैं।वह कहते हैं ,“यह तर्क भाषा से जादू निकालने जैसा है मानो किसी शब्द को बोलने भर से चीज़ें पैदा हो जाएँ।”
उनके अनुसार “अस्तित्व” कोई गुण नहीं है,जो किसी चीज़ में जोड़कर उसे महान बना दे।
(ii) Cosmological Argument – “हर चीज़ का कारण”
यह विचार अरस्तू और थॉमस एक्विनस से आया।कहते हैं -हर चीज़ का कोई कारण होता है,और यह श्रृंखला अनंत नहीं हो सकती।कहीं न कहीं एक “पहला कारण” होना चाहिए जिसे किसी ने नहीं बनाया।
वही “पहला कारण” या “प्रथम कारण” ईश्वर है।
ब्लैकबर्न मानते हैं कि यह तर्क भावनात्मक रूप से आकर्षक है,पर वे पूछते हैं,“अगर हर चीज़ का कारण चाहिए,तो खुद ईश्वर का कारण क्यों नहीं?”
उनका निष्कर्ष है कि यह तर्क “सवाल को टालता है”,हल नहीं करता।
(iii) Design Argument – “व्यवस्था ही साक्ष्य है”
यह तर्क कहता है कि ब्रह्मांड की जटिलता और सुंदरता किसी बुद्धिमान रचयिता के बिना असंभव है।जैसे एक घड़ी अपने आप नहीं बन सकती,वैसे यह दुनिया भी नहीं।
ब्लैकबर्न बताते हैं कि यह विचार बहुत पुराना है,पर डार्विन के इवोल्यूशन सिद्धांत ने इसे हिला दिया।उन्होंने दिखाया कि जीवन की जटिलता धीरे-धीरे प्राकृतिक प्रक्रियाओं से भी बन सकती है।
ब्लैकबर्न का संतुलित मत है ,“डिज़ाइन का तर्क हमें आश्चर्य तो देता है,पर प्रमाण नहीं।”
बुराई की समस्या (The Problem of Evil)
ब्लैकबर्न यहाँ सबसे कठिन प्रश्न उठाते हैं,अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान (all-powerful) और सर्वदयालु (all-good) है,तो संसार में इतना दुःख, अन्याय, और विनाश क्यों है?
कई धार्मिक दार्शनिक कहते हैं कि
बुराई “परीक्षा” है, या “मनुष्य की स्वतंत्रता” का परिणाम।पर ब्लैकबर्न इससे संतुष्ट नहीं।वे कहते हैं,“अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है,तो वह बुराई को रोक सकता था।अगर वह नहीं रोकता,तो या तो वह असमर्थ है,या फिर वह दयालु नहीं।”यह प्रश्न केवल बुद्धि का नहीं,बल्कि करुणा का भी है।
विश्वास का क्षेत्र – Reason के पार
ब्लैकबर्न यह नहीं कहते कि ईश्वर का अस्तित्व असंभव है।वे यह कहते हैं कि
ईश्वर का विचार तर्क से परे है,वह अर्थ और मूल्य के क्षेत्र से जुड़ा है।
“ईश्वर शायद तर्क का विषय नहीं,बल्कि अनुभव का रूपक है,अच्छाई, करुणा और व्यवस्था की दिशा में विश्वास।”
वे मानते हैं कि ईश्वर को मानना या न मानना एक बौद्धिक निर्णय नहीं,बल्कि नैतिक रुख है,हम किस तरह की दुनिया चाहते हैं,यह इस पर निर्भर करता है।
ब्लैकबर्न का निष्कर्ष – “ईश्वर विचार का आईना है”
वे अंत में बहुत शांत स्वर में लिखते हैं,“ईश्वर का विचार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम कौन हैं,और किस प्रकार की सृष्टि में जीना चाहते हैं।”उनके अनुसार ,ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता,पर ईश्वर का विचार मनुष्य की नैतिक चेतना का हिस्सा है।अगर हम यह प्रश्न पूछते हैं,तो यह खुद इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य केवल पशु नहीं बल्कि अर्थ की खोज करने वाला जीव है।
सरल सार:
“ईश्वर” का प्रश्न किसी एक उत्तर से हल नहीं होता।
पारंपरिक तर्क (अस्तित्व, कारण, व्यवस्था) अधूरे हैं।
बुराई और पीड़ा का सवाल सबसे बड़ा विरोधाभास है।
फिर भी “ईश्वर” एक नैतिक और भावनात्मक दिशा का प्रतीक है।
इस प्रश्न का उत्तर शायद बाहर नहीं,हमारे अपने विवेक और करुणा के भीतर छिपा है।
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सत्य (Truth)
क्यों ज़रूरी है यह सवाल
ब्लैकबर्न इसकी शुरुआत बड़े शांत और सटीक शब्दों में करते हैं:“सत्य के बिना भाषा अर्थहीन है,और बिना अर्थ के संवाद असंभव।”
हम हर दिन “सत्य” का दावा करते हैं,किसी समाचार में, किसी बहस में, या अपने अनुभवों में।पर हम शायद ही कभी सोचते हैं कि सत्य वास्तव में होता क्या है।
क्या यह किसी वस्तु की सही तस्वीर है?
या किसी विश्वास का परिणाम? या केवल उपयोगिता का नाम जो काम कर जाए वही सच?
सत्य की पहली परिभाषा – Correspondence (मिलान सिद्धांत)
सबसे पुराना और सीधा विचार है,सत्य वह है जो वास्तविकता से मेल खाता है।
अगर मैं कहूँ, “सूरज उग रहा है,”और वास्तव में सूरज उग रहा है,तो मेरा कथन “सत्य” है।
यह विचार अरस्तू से लेकर आधुनिक विज्ञान तक चलता है।ब्लैकबर्न कहते हैं “सत्य और वास्तविकता के बीच की दूरी जितनी घटे,समझ उतनी बढ़ती है।”
पर वे यह भी बताते हैं कि यह सिद्धांत तब कठिन हो जाता है जब “वास्तविकता” खुद व्याख्या पर निर्भर हो,जैसे राजनीति, नैतिकता, या भावनाओं में।
Coherence Theory – सत्य का सामंजस्य
यह विचार कहता है कि सत्य वह है जो हमारे विश्वासों की पूरी प्रणाली में मेल खाता हो।एक बात तब तक सच है जब तक वह हमारे बाकी ज्ञान से विरोध नहीं करती।
उदाहरण के लिए,अगर मैं मानता हूँ कि “पानी गीला करता है,”तो मैं यह भी मानूँगा कि “गीलापन नमी से आता है।”ये दोनों विचार मिलकर एक “सुसंगत” ढाँचा बनाते हैं।
ब्लैकबर्न मानते हैं कि यह दृष्टिकोण विज्ञान की तरह तर्कसंगत है,पर यह ख़तरा भी रखता है,कभी-कभी एक समूह पूरी तरह “सुसंगत” हो सकता है,और फिर भी झूठा हो।(जैसे कोई साजिश-सिद्धांत जो अंदर से तर्कसंगत लगे,पर वास्तविकता से कटा हो।)
Pragmatic Theory – जो काम करे वही सच
विलियम जेम्स और जॉन डेवी जैसे विचारकों ने कहा-“सत्य वह है जो जीवन में कारगर हो।” अगर कोई विचार हमारे अनुभव को बेहतर बनाता है,हमें समझने, जीने या बदलने की ताक़त देता है,तो वह व्यावहारिक रूप से “सत्य” है।
ब्लैकबर्न इसे मानवीय और उपयोगी दृष्टि मानते हैं,पर सावधान करते हैं,“जो उपयोगी है, वह ज़रूरी नहीं कि सच्चा भी हो।” कभी-कभी झूठ भी सुविधा देता है,पर उससे वास्तविकता नहीं बदलती।
Deflationary View – सत्य कोई रहस्य नहीं
20वीं सदी में कुछ दार्शनिकों (जैसे रामसे , टर्स्की ) ने कहा —
“‘सत्य’ कोई गूढ़ गुण नहीं।कहना ‘यह कथन सत्य है’ और सीधे ‘यह कथन’ कहना,दोनों एक ही बात हैं।”
उदाहरण:
“‘बर्फ़ सफ़ेद है’ सत्य है”
“बर्फ़ सफ़ेद है।”
ब्लैकबर्न के शब्दों में “सत्य शब्द भाषा का औज़ार है,न कि कोई रहस्य।”हम “सत्य” इसलिए कहते हैं ताकि सहमति या असहमति व्यक्त कर सकें,पर यह कोई जादुई वस्तु नहीं।
सापेक्षता और सत्य का संकट
ब्लैकबर्न अब आधुनिक युग की उलझन की ओर इशारा करते हैं ,आज लोग कहते हैं,“हर किसी की अपनी सच्चाई है।” यह विचार आकर्षक लगता है,पर खतरनाक भी है।
क्योंकि अगर सब कुछ सापेक्ष है, तो झूठ और सच का फर्क मिट जाता है।तब किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।
वे कहते हैं,“सत्य की सापेक्षता अंततः विचार की मृत्यु है।”
सहमति के लिए नहीं,बल्कि संवाद के लिए भी हमें यह मानना पड़ेगा कि
कुछ बातें झूठी होती हैं,और कुछ वास्तव में सच।
नीत्शे और विट्टगनस्टेन की चुनौती
नीत्शे ने कहा था,“सत्य तो बस झूठ का वह रूप है जो हमने बार-बार सुनकर स्वीकार कर लिया है।”
ब्लैकबर्न इस कथन को पूरी तरह नहीं नकारते,पर कहते हैं-नीत्शे यह याद दिलाता है कि हर भाषा, हर संस्कृति अपने “सत्य” बनाती है फिर भी यह हमें निराश नहीं, सतर्क बनाना चाहिए कि सत्य केवल बाहर नहीं, अंदर की ईमानदारी में भी खोजा जाता है।
विट्टगनस्टेन का विचार था,
“किसी शब्द का अर्थ उसके उपयोग में है।” इससे यह निकलता है कि सत्य भाषा के नियमों के साथ बंधा है।
ब्लैकबर्न कहते हैं ,“सत्य न तो ईश्वर की आवाज़ है,न मनुष्य की कल्पना ,यह संवाद का परिणाम है।”
ब्लैकबर्न का निष्कर्ष – सत्य का सम्मान
वे इस अध्याय को बहुत शांत पर गहरे स्वर में समाप्त करते हैं:“सत्य का अर्थ है,चीज़ों को वैसे देखना जैसे वे हैं,न कि जैसे हम चाहते हैं कि वे हों।”
वे कहते हैं कि सत्य की खोज कोई बौद्धिक खेल नहीं,बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है।क्योंकि जो व्यक्ति सत्य से भागता है,वह धीरे-धीरे अपने विवेक को भी खो देता है।
सरल सार:
सत्य वह नहीं जो हमें अच्छा लगे,बल्कि जो वास्तविकता से मेल खाए।
“हर किसी की अपनी सच्चाई”कहना सुविधाजनक झूठ है।
झूठी सहूलियत से बेहतर है,असुविधाजनक सत्य।
सत्य की खोज में ही सोच की गरिमा है।
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अच्छाई (Goodness)
अच्छाई की खोज
ब्लैकबर्न कहते हैं-“सत्य हमें यह बताता है कि क्या है,पर नैतिकता हमें यह बताती है कि क्या होना चाहिए।”
मनुष्य का दिमाग तर्क कर सकता है,
पर हृदय और विवेक ही यह तय करते हैं
कि उस तर्क का इस्तेमाल किस दिशा में होगा।
हर समाज, हर युग में लोग यह तय करने की कोशिश करते रहे हैंकि कौन-सा आचरण सही है।पर “सही” की परिभाषा हमेशा आसान नहीं होती।
नैतिकता कहाँ से आती है?
ब्लैकबर्न यहाँ सबसे बुनियादी सवाल पूछते हैं -क्या नैतिकता ईश्वर की आज्ञा से आती है,या यह हमारे अपने विवेक का परिणाम है?
कई लोग मानते हैं कि अच्छा वही है जो धर्म या ईश्वर कहे।पर प्लेटो ने अपने संवाद यूथाइफ़्रो में यह सवाल उठाया था-“क्या कुछ इसलिए अच्छा है क्योंकि ईश्वर उसे अच्छा कहता है,या ईश्वर उसे इसलिए अच्छा कहता है क्योंकि वह वास्तव में अच्छा है?”
अगर पहली बात सही है,तो अच्छा केवल “आज्ञा पालन” बन जाता है और अगर दूसरी बात सही है, तो अच्छाई ईश्वर से भी स्वतंत्र है।
ब्लैकबर्न कहते हैं ,“नैतिकता आदेश नहीं, समझ का परिणाम है।”
नैतिकता का मानवीय स्रोत
मनुष्य सामाजिक प्राणी है।हम दूसरों के साथ रहते हैं,और हमारे फैसले दूसरों को प्रभावित करते हैं।इसलिए नैतिकता केवल व्यक्तिगत बात नहीं,बल्कि संबंधों की संवेदनशीलता है।
हम जो अच्छा कहते हैं,वह इस बात से तय होता है कि वह दूसरों को कैसा महसूस कराता है,और समाज को कैसा बनाता है।“नैतिकता वह भाषा है जिसमें हम दूसरों की पीड़ा समझते हैं।”
उपयोगितावाद (Utilitarianism)-सुख ही अच्छाई?
जेरेमी बेन्थम और जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा था-“अच्छा वही है जो अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख दे।” इसे कहते हैं उपयोगितावाद।
यह दृष्टि सरल और आकर्षक लगती है-क्योंकि यह निर्णयों को तौलने का तरीका देती है।पर ब्लैकबर्न बताते हैं कि यह दृष्टि नैतिकता की गहराई को पूरा नहीं पकड़ पाती।
क्योंकि क्या कभी “सुख” के नाम पर किसी का शोषण जायज़ ठहर सकता है?
क्या हर दर्द गलत और हर आनंद सही है?
वे कहते हैं -“नैतिकता केवल परिणाम नहीं,बल्कि इरादा और सहानुभूति भी है।”
कांट की दृष्टि -नैतिकता का तर्क
इमैनुएल काँट ने कहा-“अच्छा कर्म वह नहीं जो परिणाम से अच्छा हो,बल्कि वह जो कर्तव्य से किया गया हो।”
उसने इसे “Categorical Imperative” कहा ,“ऐसे आचरण करो कि तुम्हारा नियम सबके लिए सार्वभौमिक कानून बन सके।” यानि अगर कोई चीज़ सबके करने पर गलत लगे, तो वह तुम्हा