Astrology and Vaastu TIPS.

Astrology and Vaastu TIPS. ***वास्तु -ज्योतिष एवं अध्यात्मिक संसार में आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन***

वास्तु का ज्योतिष से गहरा रिश्ता है. ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का पूरा प्रभाव होता है. वास्तु शास्त्र में इन ग्रहों की स्थितियों का पूरा ध्यान रखा जाता है. वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार भवन का निर्माण कराकर आप उत्तरी ध्रुव से चलने वाली चुम्बकीय ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में मोजूद अल्ट्रा वायलेट रेज और इन्फ्रारेड रेज, गुरुत्वाकर्षण – शक्ति तथा अनेक अदृश्य ब्रह्मांडीय तत्व जो मनुष्य को प्रभावित करते है के शुभ परिणाम प्राप्त कर सकते है. और अनिष्टकारी प्रभावों से अपनी रक्षा भी कर सकते है. वास्तु शास्त्र में दिशाओं का सबसे अधिक महत्व है. सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र दिशाओं पर ही निर्भर होता है. क्योंकि वास्तु की दृष्टि में हर दिशा का अपना एक अलग ही महत्व है l

वास्तु एक प्राचीन विज्ञान है। हमारे ऋषि मनीषियों ने हमारे आसपास की सृष्टि में व्याप्त अनिष्ट शक्तियों से हमारी रक्षा के उद्देश्य से इस विज्ञान का विकास किया। वास्तु का उद्भव स्थापत्य वेद से हुआ है, जो अथर्ववेद का अंग है। इस सृष्टि के साथ-साथ मानव शरीर भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है और वास्तु शास्त्र के अनुसार यही तत्व जीवन तथा जगत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। भवन निर्माण में भूखंड और उसके आसपास के स्थानों का महत्व बहुत अहम होता है।

भूखंड की शुभ-अशुभ दशा का अनुमान वास्तुविद् आसपास की चीजों को देखकर ही लगाते हैं। भूखंड की किस दिशा की ओर क्या है और उसका भूखंड पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, इसकी जानकारी वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन विश्लेषण से ही मिल सकती है। इसके सिद्धांतों के अनुरूप निर्मित भवन में रहने वालों के जीवन के सुखमय होने की संभावना प्रबल हो जाती है। हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसका घर सुंदर और सुखद हो, जहां सकारात्मक ऊर्जा का वास हो, जहां रहने वालों का जीवन सुखमय हो। इसके लिए आवश्यक है कि घर वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप हो और यदि उसमें कोई वास्तु दोष हो, तो उसका वास्तुसम्मत सुधार किया जाए। यदि मकान की दिशाओं में या भूमि में दोष हो तो उस पर कितनी भी लागत लगाकर मकान खड़ा किया जाए, उसमें रहने वालों की जीवन सुखमय नहीं होता। मुगल कालीन भवनों, मिस्र के पिरामिड आदि के निर्माण-कार्य में वास्तुशास्त्र का सहारा लिया गया है।

09/07/2024
09/07/2024

*🌳भगवान भोलेनाथ के प्रिय बेलपत्र की कहानी ,🌿🌿
🚩स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल का पेड़ निकल आया। चुंकि माता पार्वती के पसीने से बेल के पेड़ का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। वे पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और शाखाओं में दक्षिणायनी व पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं।
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फलों में कात्यायनी स्वरूप व फूलों में गौरी स्वरूप निवास करता है। इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है। बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है।
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बेल वृक्ष का महत्व-

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।

2. अगर किसी की शवयात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुद्धियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।

4. 4, 5, 6 या 7 पत्तों वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।,🌿🌿🌿🌿🌿

6. सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।

8. बेल वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेलपत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।

10. जीवन में सिर्फ 1 बार और वह भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते हैं।🌿🌿🌿🌿🌿

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्द्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाएं। बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं........
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ओम् नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

01/07/2024
27/06/2024
27/06/2024
22/06/2024
22/06/2024

🚩🚩विक्रम संवत 2081 में आषाढ़ मास 23 जून 2024 से 21 जुलाई 2024 तक रहेगा, इस माह कृष्ण पक्ष सिर्फ 13 दिनों का होगा। हिन्दू पंचाग के अनुसार, इस बार आषाढ़ कृष्ण पक्ष की शुरुआत 23 जून से हो रही है, जो 5 जुलाई तक रहेगा।

इसी माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकाली जाती है, एवं इसी माह की पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा का विशेष पर्व भी मनाया जाता हैं।

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