26/01/2026
26 जनवरी 2026 —
उस दिन की स्मृति में
जब भारत ने यह घोषित किया कि
इस देश का सर्वोच्च शासक
कोई व्यक्ति नहीं,
कोई दल नहीं,
बल्कि भारत का संविधान होगा।
गणतंत्र का वास्तविक अर्थ
सिर्फ़ शासन व्यवस्था नहीं है,
संविधान की सर्वोच्चता ही गणतंत्र की आत्मा है।
*👉संविधान : राष्ट्र की आत्मा--*
भारतीय संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं है।
यह उन करोड़ों सपनों का दस्तावेज़ है
जिनमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय की आकांक्षा है।
संविधान यह नहीं पूछता कि आप
किस जाति, धर्म या वर्ग से हैं—
वह केवल यह पूछता है
कि आप नागरिक हैं या नहीं।
जब संविधान बोलता है,
तो राजा और रंक के बीच
कोई अंतर नहीं करता।
*👉संविधान से दूरी, गणतंत्र की कमजोरी--*
आज खतरा संविधान से नहीं,
संविधान से हमारी दूरी से है।
जब कानून
केवल कमज़ोरों के लिए सख़्त हो
और ताक़तवरों के लिए लचीला—
तो गणतंत्र खोखला हो जाता है।
जब संविधान
शपथ में तो याद किया जाए,
पर निर्णयों में भुला दिया जाए—
तो गणतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
*👉संविधान और नागरिक--*
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने चेतावनी दी थी—
“संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो,
यदि उसे लागू करने वाले अच्छे नहीं होंगे
तो वह असफल हो जाएगा।”
संविधान तभी जीवित रहता है
जब नागरिक उसमें विश्वास करते हैं।
जब हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
उपयोग जिम्मेदारी से करते हैं
जब हम समानता के अधिकार को
विशेषाधिकार में नहीं बदलते
और जब हम अपने कर्तव्यों को
अधिकारों से कम नहीं आँकते
तभी संविधान काग़ज़ से निकलकर
समाज में उतरता है।
भारत सच्चा गणतंत्र कैसे बने?
भारत तभी सच्चा गणतंत्र बनेगा जब—
संविधान सत्ता पर नियंत्रण रखे, न कि सत्ता संविधान पर
न्याय तेज़ और निष्पक्ष हो
नागरिक कानून से ऊपर नहीं,
बल्कि कानून के साथ खड़े हों
और असहमति को राष्ट्रविरोध नहीं,
बल्कि संवैधानिक अधिकार समझा जाए|
साथियो,
संविधान ने हमें अधिकार दिए,
लेकिन उसने हमसे चरित्र भी माँगा है।
यदि संविधान
हमारे भाषणों में नहीं,
हमारे आचरण में दिखाई दे—
तो भारत केवल एक गणतंत्र नहीं,
एक संवैधानिक आदर्श बनेगा।
आइए, इस गणतंत्र दिवस पर
संकल्प लें—
कि हम संविधान को
केवल सम्मान नहीं देंगे,
पालन भी करेंगे।
जय संविधान।
जय भारत।