Sanjeevani ayurved

Sanjeevani ayurved Complete cure from chronic diseases by Ayurvedic treatment without any side effects.

01/07/2024
11/05/2024

हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने करीब 13 साल के अंतराल पर भारतीयों के लिए भोजन संबंधी गाइडलाइंस को संशोधित किया है। NIN ने वैज्ञानिक निष्कर्षों, जीवनशैली में बदलाव, बीमारियों और खान-पान की आदतों को ध्यान में रखते हुए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए है। इसमें लोगों को कम तेल और चीनी व प्रोटीन सप्लीमेंट से बचने की सलाह दी गई है।

NIN ने पहली बार पैकेज्ड फूड लेबल की व्याख्या के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किए। ICMR के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने संशोधित गाइडलाइंस जारी करते हुए बताया कि खाना पकाने के तेल का इस्तेमाल कम करना बेहद अहम है। भारत में जितने भी कुकिंग आयल मिलते हैं, उन सभी में पाम आयल ब्लेंड किया जाता है, इसलिए तेल का सेवन कम करना होगा।

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को लेकर भी गाइडलाइंस दिए गए हैं। फैक्ट्री में बनने वाले तमाम खाद्य उत्पादों में भी तरह-तरह से पाम आयल इस्तेमाल होता है। भारत की रसोइयों में बेशक खानपान का हम लोगों को जो तरीका है, उसमें हम सरसों, नारियल और मूंगफली का तेल इस्तेमाल करते हैं लेकिन बाजार में जो वेजीटेबल आयल है, उसमें बड़ी मात्रा में पाम आयल मिला होता है। हमारी रोज़ाना की जिंदगी पाम आयल हर ओर है, इसलिए देख-समझकर खाएं।

ICMR ने कहा कि स्वस्थ जीवन शैली अपनाने से समय से पहले होने वाली मृत्यु को रोका जा सकता है। NIN ने भारतियों को ये ख़ास सलाह दी हैं-

1.कम नमक खाना
2.तेल और वसा का कम मात्रा में उपयोग करना
3.उचित व्यायाम करना
4.चीनी और जंक फूड को कम खाना
5.स्वस्थ जीवन शैली अपनाना और पोषक तत्वों से 6.भरपूर भोजन का सेवन करना
7.प्रोटीन सप्लीमेंट से बचना
8.एयर-फ्राइंग और ग्रेनाइट-कोटेड कुकवेयर को बढ़ावा देना
9.पाम आयल से दूर रहना

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10/05/2024

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* डा. सुधाकर वर्धन शुक्ल की फेसबुक वाॅल पर लगी पोस्ट पर मेरी टिप्पणी *

आयुर्वेद की औषधियों पर एलोपैथी वालों को रिसर्च करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेद+एलोपैथी का सम्यक् व विशद ज्ञान रखने वाले चिकित्सक से परामर्श कर लेना चाहिये।
आयुर्वेद का अपना विज्ञान है और उसे समझने की भाषा और वर्तनी एलोपैथिक से भिन्न है। अपने तैंतालीस वर्षों के चिकित्साभ्यास में बसंत कुसुमाकर रस का मधुमेह की चिकित्सा में शर्करा के मानकों में कोई सकारात्मक प्रभाव मुझे भी नहीं मिला है। वास्तव में यह रस नवीन कोशिकाओं के जनन में उपयोगी है और वृक्क और अग्नाशय के मृत कोशिकाओं के स्थान पर नयी कोशिकाओं के बनने तथा मरणासन्न कोशिकाओं के मरण को बाधित कर उन्हें पुनर्जीवित करने में सहयोगी होता है। इससे रक्तशर्करा के स्तर में परोक्ष सुधार तो सम्भव है यदि अग्नाशय के बीटा सेल्स के घटने की बात हो। ग्लूकोज रेजिसदटेंस के मामलों में ऎसा लाभ शायद नहीं ही मिलेगा।
वास्तव में आयुर्वेद सम्बन्धी मामलों को एलोपैथी के नजरिये पर फिट करने की कोशिश ही सही नहीं है।
बेहतर होगा कि वे मछली के पेड़ पर चढ़ सकने की योग्यता के दृष्टिकोण से आयुर्वेद को आंकने और मापने का यत्न न करें। ऎसी सारी रिसर्चें यदि एलोपैथी की प्रयोग और परीक्षण शालाओं में करनी ही हों तो उनका मुखिया (Chair person) आयुर्वेद का होना चाहिये।

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