Astro Shiv Shankar Chaturvedi

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ॐ नमो भगते वासुदेवाय

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🌕🔥 होली पर चंद्र ग्रहण – धर्म, ज्योतिष और भविष्य का संकेत 🔥🌕जब होलिका दहन की पवित्र अग्नि जल रही हो और और कुछ समय पश्चात...
03/03/2026

🌕🔥 होली पर चंद्र ग्रहण – धर्म, ज्योतिष और भविष्य का संकेत 🔥🌕
जब होलिका दहन की पवित्र अग्नि जल रही हो और और कुछ समय पश्चात आकाश में सिंह राशि में चंद्र ग्रहण लगे — तो यह केवल संयोग नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक और कर्मिक संकेत माना जाता है।
⭕चंद्रमा मन का कारक है और सिंह सूर्य की अग्नि, सत्ता, आत्मसम्मान और नेतृत्व की राशि।
जब चंद्र पर छाया पड़ती है, तो अहंकार, प्रतिष्ठा, राजनीति, राजसत्ता, प्रशासन और बड़े पदों पर बैठे लोगों की परीक्षा होती है।
🕉️धर्म शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में की गई साधना, मंत्र जाप और दान का फल हजार गुना बढ़ जाता है।
यह समय है —
✨ अहंकार त्यागने का
✨ भीतर की नकारात्मकता जलाने का
✨ कर्मों की शुद्धि का
🔱 12 राशियों पर विस्तृत प्रभाव और उपाय ग्रहण समाप्ति पर 🔱
♈ मेष
संतान, शिक्षा और मान-सम्मान में उतार-चढ़ाव।
क्रोध और जल्दबाजी से हानि हो सकती है।
उपाय:
ः_शिवाय 108 बार जप
लाल मसूर दान
होलिका की अग्नि में गुड़ अर्पित करें
♉ वृषभ
माता, घर, वाहन से जुड़ी चिंता।
भावनात्मक अस्थिरता संभव।
उपाय:
#चंद्र_गायत्री मंत्र जप
चावल-दूध दान
सोमवार को शिव अभिषेक
♊ मिथुन
संचार और रिश्तों में भ्रम।
भाई-बहनों से मतभेद संभव।
उपाय:
#हनुमान_चालीसा पाठ
हरे वस्त्र धारण
तुलसी को जल अर्पित करें
♋ कर्क
आर्थिक क्षेत्र में अस्थिरता।
अनावश्यक खर्च से बचें।
उपाय:
#महामृत्युंजय मंत्र जप
दूध का दान
शिवलिंग पर जल चढ़ाएं
♌ सिंह (सबसे अधिक प्रभावित)
व्यक्तित्व, प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति पर सीधा प्रभाव।
आत्मसम्मान की परीक्षा होगी।
उपाय:
#आदित्य_हृदय_स्तोत्र पाठ
तांबे का दान
सूर्य को अर्घ्य
♍ कन्या
गुप्त शत्रु सक्रिय हो सकते हैं।
नींद और मानसिक शांति प्रभावित।
उपाय:
#शिव_पंचाक्षरी मंत्र
सफेद मिठाई दान
ध्यान साधना
♎ तुला
मित्रों और योजनाओं में रुकावट।
लाभ में विलंब।
उपाय:
#दुर्गा_सप्तशती पाठ
गरीबों को वस्त्र दान
चंद्रमा को अर्घ्य
♏ वृश्चिक
करियर में अचानक परिवर्तन।
उच्च पदों पर दबाव।
उपाय:
#शनिदेव मंत्र
काले तिल दान
पीपल वृक्ष के नीचे दीपक
♐ धनु
भाग्य और धर्म में परीक्षा।
यात्रा में बाधा।
उपाय:
#विष्णु_सहस्रनाम
पीले चने दान
गाय को गुड़-चना
♑ मकर
ऋण, स्वास्थ्य और मानसिक दबाव।
पुराने रोग उभर सकते हैं।
उपाय:
#शनि_गायत्री
काली उड़द दान
सरसों के तेल का दीपक
♒ कुम्भ
दांपत्य जीवन में असंतुलन।
साझेदारी में सावधानी।
उपाय:
#शिव_पार्वती पूजन
सफेद फूल अर्पित करें
मंत्र जाप
♓ मीन
कार्यस्थल पर दबाव, स्वास्थ्य पर ध्यान आवश्यक।
उपाय:
#गायत्री_मंत्र जप
केसर तिलक

🌑 ग्रहण काल में क्या करें?
✔️ मंत्र जाप
✔️ ध्यान
✔️ दान
✔️ होलिका अग्नि में नकारात्मकता का त्याग
❌ क्या न करें?
❌ शुभ कार्य आरंभ न करें
❌ विवाद से बचें
🌟 विशेष चेतावनी
सिंह राशि सत्ता और नेतृत्व की राशि है —
इस ग्रहण का प्रभाव राजनीति, प्रशासन और बड़े निर्णयों पर दिखाई दे सकता है।
विश्व स्तर पर भी नेतृत्व परिवर्तन या बड़े निर्णयों की भूमिका बन सकती है।
📢 यह केवल भविष्यवाणी नहीं, चेतावनी है।
जो साधना करेगा वह सुरक्षित रहेगा।

आचार्य दया शंकर चतुर्वेदी जी पंजाब 9646351008 094646 61008

*|| बँटवारे की वो दीवार:-||*          *************जब माँ की एक कराह ने*  *ढहा दिया भाइयों का अहंकार।*           *******...
25/02/2026

*|| बँटवारे की वो दीवार:-||*
************
*जब माँ की एक कराह ने*
*ढहा दिया भाइयों का अहंकार।*
**************
*गाँव के उस पुश्तैनी घर में आज सन्नाटा नहीं, बल्कि ईंटों और सीमेंट का शोर था। रमेश और सुरेश, जो कभी एक ही थाली में खाना खाते थे, आज अपने बाप-दादा के घर के बीचों-बीच एक दीवार खड़ी करवा रहे थे। छोटी सी बात पर शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ा कि बात बँटवारे तक आ पहुँची।​घर के बीचों-बीच खड़ी होती वह दीवार सिर्फ कमरों को नहीं, बल्कि एक माँ के कलेजे को भी दो हिस्सों में बाँट रही थी। सावित्री जी आँगन के एक कोने में बैठी अपनी धुंधली आँखों से उस दीवार को ऊँचा होते देख रही थीं। रमेश ने उत्तर का हिस्सा लिया और सुरेश ने दक्षिण का, और उस बेबस माँ को 'हफ़्तों' में बाँट दिया गया-15 दिन बड़े बेटे के पास, 15 दिन छोटे के पास।*

*​दीवार पूरी हो गई। अब एक ही छत के नीचे दो चूल्हे जलते थे। रमेश और सुरेश एक-दूसरे की तरफ देखते भी नहीं थे। अगर कभी नज़र मिल जाती, तो उसमें भाई का प्यार नहीं, बल्कि एक अनकही नफ़रत होती थी।सावित्री जी का कमरा उस दीवार के बिल्कुल करीब था। वे अक्सर रात को दीवार के उस पार से आने वाली आवाज़ों को सुनकर मुस्कुरा लेती थीं कि कम से कम उनके दोनों बच्चे ठीक तो हैं।​रमेश के बच्चों को मना था कि वे 'चाचा' के घर न जाएँ, और सुरेश की पत्नी ने साफ़ कह दिया था कि 'ताऊ' के घर से कुछ नहीं लेना है। घर की वह दीवार बच्चों के मन में भी नफ़रत के बीज बो रही थी।*

*​एक रात अचानक मौसम बदला। मूसलाधार बारिश होने लगी और कड़ाके की बिजली चमकने लगी। सावित्री जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें सीने में तेज़ दर्द उठा। उस समय वे सुरेश के हिस्से में थीं। सुरेश घबरा गया, बाहर इतनी बारिश थी कि शहर से डॉक्टर लाना मुमकिन नहीं था। घर में दवाइयाँ भी खत्म थीं।​दूसरी तरफ रमेश भी जाग रहा था। उसे दीवार के उस पार से अपनी माँ के कराहने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह छटपटा रहा था, पर उसका 'अहंकार' उसे दीवार लाँघने से रोक रहा था। तभी सुरेश की आवाज़ आई, जो अपनी पत्नी से कह रहा था, माँ को बहुत दर्द है, पर रमेश भाई के पास जो पुरानी दवाई रहती थी, वो कैसे लाऊँ?*

*​रमेश से अब और रहा नहीं गया। उसने अपनी अलमारी से दवा की शीशी निकाली और बारिश में भीगता हुआ उस दीवार के पास गया। उसने दीवार के ऊपर से हाथ बढ़ाया और चिल्लाया, सुरेश! ये दवा पकड़, माँ को जल्दी पिला!​सुरेश ने ऊपर देखा। दीवार के उस पार उसका बड़ा भाई भीग रहा था, हाथ में दवा लिए। सुरेश ने तुरंत दवा ली और माँ को पिलाया। थोड़ी देर बाद माँ की साँसें सामान्य हुईं। दोनों भाई उस आधी रात को दीवार के दोनों तरफ खड़े होकर भीग रहे थे। अचानक सुरेश ने एक ईंट उठाई और उस ताज़ा बनी दीवार पर दे मारी। रमेश ने भी उधर से कुदाल उठा ली।*

*​सुबह तक वह दीवार आधी गिर चुकी थी। गाँव वालों ने देखा कि रमेश और सुरेश मिलकर उस मलबे को साफ़ कर रहे थे। सावित्री जी आँगन में बैठी थीं। उनके दोनों बेटे उनके चरणों में थे। रमेश ने रोते हुए कहा, "माँ, ईंटें घर तो बाँट सकती हैं, पर भाई का खून नहीं।​सावित्री जी ने दोनों के सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा, दीवार ने घर बाँटा था, मेरी कोख से जन्मे दो भाइयों की जड़ें तो आज भी एक ही मिट्टी में हैं। उस दिन गाँव ने देखा कि घर छोटा हो गया था, क्योंकि दीवार हट चुकी थी, पर दिल बहुत बड़े हो गए थे।*

*सीख :- ​अहंकार की दीवारें अक्सर रिश्तों की गर्माहट को रोक देती हैं। मुसीबत के समय ईंट-पत्थर काम नहीं आते, बल्कि वो 'अपना खून' ही काम आता है जिसे हम अक्सर पराया समझ बैठते हैं।*

22/02/2026
21/02/2026
*पाँच दिशाओं के पाँच हनुमान...* #हनुमानजी के हर रूप की या तो मूर्तियां हैं और यदि मूर्तियां नहीं बनी हैं तो चित्र या तस्...
14/02/2026

*पाँच दिशाओं के पाँच हनुमान...*

#हनुमानजी के हर रूप की या तो मूर्तियां हैं और यदि मूर्तियां नहीं बनी हैं तो चित्र या तस्वीर बने होंगे, हनुमान की मूर्तियों को किस दिशा में स्थापित किया गया है इसका विशेष महत्व माना गया है... जैसे दक्षिणमुखी हनुमान की पूजा का उद्देश्य और महत्व अलग है उसी तरह उत्तरमुखी हनुमानजी की पूजा का उद्देश्य और महत्व भिन्न है...

हनुमानजी के किस विग्रह की पूजा करने से क्या होगा.....
*1. #पूर्वमुखी....*

⚜️पूर्व की तरफ जो मुंह है उसे 'वानर' कहा गया है, जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्यो के तेज समान हैं...इनका पूजन करने से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है...

*2. #पश्चिममुखी....*

⚜️पश्चिम की तरफ जो मुंह है उसे 'गरूड़' कहा गया है, यह रूप संकटमोचन माना गया है... जिस प्रकार भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अजर-अमर हैं उसी तरह इनको भी अजर-अमर माना गया है...

*3. #उत्तरामुखी_हनुमान.....*

⚜️उत्तर दिशा देवताओं की मानी जाती है, यही कारण है कि शुभ और मंगल की कामना उत्तरामुखी हनुमान की उपासना से पूरी होती है...उत्तर की तरफ जो मुंह है उसे 'शूकर' कहा गया है... इनकी उपासना करने से अबाध धन-सम्पदा, ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा, लंबी आयु तथा निरोगी काया प्राप्त होती है...

*4. #दक्षिणामुखी_हनुमान.....*

⚜️दक्षिण की तरफ जो मुंह है उसे 'भगवान नृसिंह' कहा गया है, यह रूप अपने उपासको को भय, चिंता और परेशानीयों से मुक्त करवाता है... दक्षिण दिशा में सभी तरह की बुरी शक्तियों के अलावा यह दिशा काल की दिशा मानी जाती है... यदि आप अपने घर में उत्तर की दीवार पर हनुमानजी का चित्र लगाएंगे तो उनका मुख दक्षिण की दिशा में होगा...दक्षिण में उनका मुख होने से वह सभी तरह की बुरी शक्तियों से हमें बचाते हैं...

*5. #ऊर्ध्वमुख.....*

⚜️हनुमानजी का ऊर्ध्वमुख रूप 'घोड़े' के समरूप है , यह स्वरूप ब्रह्माजी की प्रार्थना पर प्रकट हुआ था... मान्यता है कि हयग्रीवदैत्य का संहार करने के लिए वे अवतरित हुए थे...

!! जय श्रीराम !!
ॐ हं हनुमते नमः🙏

वृन्दावन की चींटियाँ: जब एक भक्त ने 'धर्म' से बड़ा 'प्रेम' चुनायह एक सच्ची घटना है, जो एक गौड़ीय मठ के परम वैष्णव भक्त के...
14/02/2026

वृन्दावन की चींटियाँ: जब एक भक्त ने 'धर्म' से बड़ा 'प्रेम' चुना

यह एक सच्ची घटना है, जो एक गौड़ीय मठ के परम वैष्णव भक्त के जीवन से जुड़ी है। वे शरीर से साधारण दिखते थे, किन्तु उनका हृदय "नवनीत" (मक्खन) से भी अधिक कोमल था।

एक बार वे श्रीधाम वृन्दावन दर्शन के लिए पधारे। कई दिनों तक गौड़ीय मठ में रुककर उन्होंने ठाकुर जी की निस्वार्थ सेवा की। तपती धूप की परवाह किए बिना, नंगे पाँव पूरे वृन्दावन की परिक्रमा की। उनके लिए ब्रज की रज (धूल) ही सबसे बड़ा चंदन थी।

जब घर (पटना) लौटने का समय आया, तो मन भारी हो गया। ब्रज से विदाई लेना एक भक्त के लिए मृत्यु-तुल्य कष्ट होता है। मन को समझाते हुए उन्होंने सोचा, "ठाकुर जी का कुछ प्रसाद साथ ले चलता हूँ, इसी बहाने ब्रज का स्वाद कुछ दिन और साथ रहेगा।"

उन्होंने बाजार से रामदाने के लड्डू खरीदे। उन्हें बाँके बिहारी और राधा-रमण जी सहित प्रमुख मंदिरों में भोग लगवाया और प्रसादी रूप में डिब्बे को संभालकर रख लिया। अगली सुबह भारी मन से उन्होंने ट्रेन पकड़ी।

ट्रेन अपनी गति से चल रही थी। वृन्दावन से निकलकर ट्रेन जब मुगलसराय स्टेशन पहुँची, तो शाम घिर आई थी। भक्त जी को पटना जाना था, जहाँ पहुँचने में अभी 3-4 घंटे और लगने थे। पेट में भूख की अग्नि जलने लगी थी।

उन्होंने सोचा, "मुगलसराय में ट्रेन आधे घंटे रुकती है। क्यों न हाथ-मुँह धोकर, अपनी संध्या-आह्निक (जाप) पूरी कर लूँ और फिर थोड़ा प्रसाद पा लूँ?"

हाथ-पैर धोकर वे अपनी सीट पर बैठे और बड़े चाव से लड्डुओं का डिब्बा खोला।

डिब्बा खुलते ही वे ठिठक गए। उन्होंने देखा कि लड्डुओं पर लाल चींटियों का एक झुंड लगा हुआ था।

सामान्य मनुष्य होता तो शायद चींटियों को झाड़ देता और लड्डू खा लेता, या फिर गुस्से में डिब्बा फेंक देता। भक्त जी ने भी पहले सहज भाव से चींटियाँ हटाकर एक-दो लड्डू खा लिए। बचे हुए लड्डू यह सोचकर रख दिए कि आगे किसी को बाँट दूँगा।

किंतु, तभी उनके हृदय में एक विचार कौंधा जिसने उनकी आत्मा को झकझोर दिया।

लड्डू का स्वाद तो कब का गायब हो चुका था, अब तो मन में केवल उन नन्ही चींटियों की चिंता थी। वे सोचने लगे:

> "ये चींटियाँ साधारण नहीं हैं... ये तो मेरे साथ वृन्दावन से आई हैं। ये ब्रज की चींटियाँ हैं! आह! कितनी भाग्यशाली हैं ये, जिनका जन्म उस पावन भूमि पर हुआ जहाँ देवता भी धूल बनने को तरसते हैं।"

फिर एक भयानक ग्लानि ने उन्हें घेर लिया:

> "ये बेचारी अनजाने में मिठास के लोभ में डिब्बे में चढ़ गईं, और मैं पापी इन्हें सैकड़ों मील दूर यहाँ मुगलसराय ले आया! अब ये वापस कैसे जाएंगी? इनका तो पूरा परिवार, इनका घर, इनका सब कुछ वृन्दावन में छूट गया। क्या इन्हें दोबारा ब्रज की धूल मिलेगी? या ये इसी अनजान शहर में तड़प-तड़प कर मर जाएंगी?"

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें लगा जैसे उन्होंने किसी को उसके घर से बेघर कर दिया हो।

आत्मा ने चीत्कार किया—"नहीं! मैं इन्हें ब्रज से वंचित करने का पाप अपने सिर नहीं ले सकता।"

भूख, प्यास, थकान और घर जाने की सारी योजनाएं एक पल में धरी की धरी रह गईं। उस वैष्णव ने तुरंत अपना सामान उठाया। पटना जाने वाली ट्रेन छोड़ दी और वापस वृन्दावन जाने वाली पहली ट्रेन पकड़ ली।

पूरी यात्रा में वे उस मिठाई के डिब्बे को अपनी गोद में ऐसे सहेज कर बैठे रहे जैसे उसमें कोई बहुमूल्य हीरा हो। वे मन ही मन ठाकुर जी से क्षमा मांगते रहे।

अगले दिन जब वे वापस वृन्दावन पहुँचे, तो सीधे उसी मिठाई की दुकान पर गए जहाँ से लड्डू खरीदे थे। उन्होंने वह डिब्बा धीरे से दुकान के पास जमीन पर रखा और चींटियों को बाहर निकलने का मार्ग दे दिया।

फिर उन्होंने हाथ जोड़कर, भीगी पलकों से उन नन्ही जीवों से कहा:
> "मुझे क्षमा कर देना। मेरे भाग्य में अभी ब्रज में निरंतर वास करना नहीं लिखा, मुझे तो वापस संसार में जाना पड़ेगा। किन्तु मैं कौन होता हूँ तुम्हें तुम्हारे घर (ब्रज) से दूर करने वाला? तुम यहीं रहो, जहाँ श्री कृष्ण की लीलाएँ रची बसी हैं।"

दुकानदार यह सब देख रहा था। उसे लगा शायद मिठाई खराब निकल गई है। वह दौड़ा-दौड़ा आया और बोला, "महाराज जी! क्षमा करें, यदि चींटियाँ लग गई हैं तो आप डिब्बा बदल लीजिये, मैं आपको ताजी मिठाई दे देता हूँ।"

वैष्णव ने आँसू पोंछते हुए उत्तर दिया:

> "नहीं भैया! मिठाई में कोई दोष नहीं था। दोष तो मेरी असावधानी में था। मुझसे एक महापाप होते-होते रह गया। मैं इन ब्रजवासियों (चींटियों) का निर्वासन कैसे देख सकता था? बस, इन्हें इनके घर छोड़ने आया था।"

दुकानदार सन्न रह गया। आज तक उसने मिठाई बदलने वाले ग्राहक देखे थे, पैसे वापस मांगने वाले देखे थे, पर चींटियों को घर छोड़ने के लिए सैकड़ों किलोमीटर वापस आने वाला ऐसा पागल प्रेमी नहीं देखा था।

दुकानदार का हृदय पिघल गया। वह रोते हुए उस वैष्णव के चरणों में गिर पड़ा। उधर भक्त की आँखों से प्रेम के आँसू बह रहे थे, और इधर दुकानदार के आँखों से श्रद्धा के।

यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म केवल तिलक लगाने या घंटी बजाने में नहीं है। धर्म उस करुणा में है जो एक नन्ही चींटी में भी उसी परमात्मा को देखता है। वृन्दावन केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, वह एक 'भाव' है।

> बात भाव की है जी,

> बात उस निर्मल मन की है,

> बात ब्रज की है,

> बात मेरे श्री राधा-रमण की है।

*|| श्रीब्रज-रज महिमा ||*       ***********एक बार प्रयाग राज का कुम्भ योग था। चारों ओर से लोग प्रयाग-तीर्थ जाने के लिये ...
12/02/2026

*|| श्रीब्रज-रज महिमा ||*
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*एक बार प्रयाग राज का कुम्भ योग था। चारों ओर से लोग प्रयाग-तीर्थ जाने के लिये उत्सुक हो रहे थे। श्रीनन्द महाराज तथा उनके गोष्ठ के भाई-बन्धु भी परस्पर परामर्श करने लगे कि हम भी चलकर प्रयाग-राज में स्नान-दान-पुण्य कर आवें।किन्तु कन्हैया को यह कब मंज़ूर था। प्रातः काल का समय था, श्रीनन्द बाबा वृद्ध गोपों के साथ अपनी बैठक के बाहर बैठे थे कि तभी सामने से एक भयानक काले रंग का घोड़ा सरपट भागता हुआ आया। भयभीत हो उठे सब कि कंस का भेजा हुआ कोई असुर आ रहा है।*

*वह घोड़ा आया और ज्ञान-गुदड़ी वाले स्थल की कोमल- कोमल रज में लोट-पोट होने लगा। सबके देखते-देखते उसका रंग बदल गया, काले से गोरा, अति मनोहर रूपवान हो गया वह। श्रीनन्दबाबा सब आश्चर्यचकित हो उठे। वह घोड़ा सबके सामने मस्तक झुका कर प्रणाम करने लगा।श्रीनन्द महाराज ने पूछा,कौन है भाई तू ?कैसे आया और काले से गोरा कैसे हो गया ?*

*वह घोड़ा एक सुन्दर रूपवान विभूषित महापुरुष रूप में प्रकट हो हाथ जोड़ कर बोला–‘हे व्रजराज ! मैं प्रयागराज हूँ। विश्व के अच्छे बुरे सब लोग आकर मुझमें स्नान करते हैं और अपने पापों को मुझमें त्याग कर जाते हैं, जिससे मेरा रंग काला पड़ जाता है।मैं हर कुम्भ से पहले यहाँ श्री वृन्दावन आकर इस परम पावन स्थल की धूलि में अभिषेक प्राप्त करता हूँ। मेरे समस्त पाप दूर हो जाते हैं। निर्मल- शुद्ध होकर मैं यहाँ से आप व्रजवासियों को प्रणाम कर चला जाता हूँ। अब मेरा प्रणाम स्वीकार करें। इतना कहते ही वहाँ न घोड़ा था न सुन्दर पुरुष।*

*श्रीकृष्ण बोले-बाबा ! क्या विचार कर रहे हो ? प्रयाग चलने का किस दिन मुहूर्त है ?नन्दबाबा और सब व्रजवासी एक स्वर में बोल उठे-‘अब कौन जायेगा प्रयागराज ? प्रयागराज हमारे व्रज की रज में स्नान कर पवित्र होता है, फिर हमारे लिये वहाँ क्या धरा है ?सबने अपनी यात्रा स्थगित कर दी। ऐसी महिमा है श्रीब्रज रज व श्रीधाम वृन्दावन की।*

*धनि धनि श्रीवृन्दावन धाम॥*
************
*जाकी महिमा बेद बखानत,*
*सब बिधि पूरण काम॥*

*आश करत हैं जाकी रज की,*
*ब्रह्मादिक सुर ग्राम॥*

*लाडिलीलाल जहाँ नित विहरत,*
*रतिपति छबि अभिराम॥*

*रसिकन को जीवन धन कहियत,*
*मंगल आठों याम॥*

*नारायण बिन कृपा जुगलवर,*
*छिन न मिलै विश्राम॥*

*|| श्री बृजधाम की जय हो ||*

*🕉️ शिव के कुछ रहस्य 🕉️*  महाशिवरात्रि 15 फरवरी 2026*🔱आदिनाथ शिव-:* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का...
09/02/2026

*🕉️ शिव के कुछ रहस्य 🕉️*
महाशिवरात्रि 15 फरवरी 2026

*🔱आदिनाथ शिव-:*
सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।

*🔱शिव के अस्त्र-शस्त्र-:*
शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।

*🔱भगवान शिव का नाग-:*
शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।

*🔱शिव की अर्द्धांगिनी-:*
शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।

*🔱 शिव के पुत्र-:*
शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

*🔱शिव के शिष्य-:*
शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

*🔱शिव के गण-:*
शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।

*🔱शिव पंचायत-:*
भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

*🔱 शिव के द्वारपाल-:*
नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

*🔱शिव पार्षद-:*
जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।

*🔱सभी धर्मों का केंद्र शिव-:*
शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

*🔱बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय-:*
ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।

*🔱देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव-:*
भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

*🔱शिव चिह्न-:*
वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।

*🔱शिव की गुफा-:*
शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।

*🔱शिव के पैरों के निशान-:*
श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।
रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।

तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।

जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।

रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।

*🔱 शिव के अवतार-:*
वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।

*🔱शिव का विरोधाभासिक परिवार-:*
शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।

*🔱 शिव निवास-:*
ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।

*🔱शिव भक्त-:*
ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी- देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

*🔱शिव ध्यान -:*
शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

*🔱शिव मंत्र-:*
दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- "ॐ नम: शिवाय"। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।

*🔱शिव व्रत और त्योहार-:*
सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।

*🔱शिव प्रचारक-:*
भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

*🔱शिव महिमा-:*
शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।

*🔱शैव परम्परा-:*
दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

*🔱शिव के प्रमुख नाम-:*
शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

*🔱अमरनाथ के अमृत वचन-:*
शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

*🔱शिव ग्रंथ-:*
वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।

*🔱शिवलिंग-:*
वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

*🔱बारह ज्योतिर्लिंग-:*
सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।

*🔱शिव का दर्शन- 😗
शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

*🔱शिव और शंकर-:*
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।

*🔱देवों के देव महादेव-:*
देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।

*🔱शिव हर काल में-:*
भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए।।

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*फाल्गुन की रंगभरी लीला*    *राधा-कृष्ण की होली-*        **************फाल्गुन का माह लगते ही वृन्दावन की गलियाँ जैसे स्...
09/02/2026

*फाल्गुन की रंगभरी लीला*
*राधा-कृष्ण की होली-*
*************
*फाल्गुन का माह लगते ही वृन्दावन की गलियाँ जैसे स्वयं मुस्कुराने लगती हैं। वायु में केसर, चंदन और पुष्पों की सुगंध घुल जाती है। आम्र-मंजरियों पर कोयल मधुर स्वर में कुहुकने लगती है। यमुना तट पर लहरें भी आज कुछ अधिक चंचल थीं, मानो जानती हों कि आज श्री राधा-श्याम की रंगभरी होली की लीला रचने वाली है।वृन्दावन के कदम्ब वृक्षों पर गुलाबी पंखुड़ियाँ झर रही थीं। गोपियाँ अपने आँगन में रंग घोल रही थीं।लाल, पीला, हरा, गुलाबी। कोई टेसू के फूल उबाल रही थी, कोई केसर और गुलाल में सुगंध मिला रही थी। सबके मुख पर एक ही चर्चा थी।आज श्यामसुंदर होली खेलने आने वाले हैं।*

*उधर नंदलाल अपने सखाओं के संग मुस्कुरा रहे थे।हाथ में पिचकारी, सिर पर मोरपंख, मुख पर शरारती हँसी।सुदामा बोले, श्याम! आज तो राधा रानी को बिना रंग लगाए नहीं छोड़ेंगे। कृष्ण हँसते हुए बोले,अरे सखा,आज रंग नहीं, प्रेम बरसेगा।ज्यों ही कृष्ण और सखा राधाकुंड की ओर बढ़े, गोपियों ने पहले ही मोर्चा संभाल लिया।राधा रानी के नेत्रों में चंचलता थी, होंठों पर मंद मुस्कान। जैसे ही श्याम ने पिचकारी से रंग उड़ाया, राधा ने अपनी सखी के संग उन पर गुलाल फेंक दिया। क्षणभर में पूरा वातावरण रंगमय हो गया।*

*होरी खेले रघुवीरा अवध में…!*
*की जगह आज वृन्दावन में गूँज रहा था—!*

*होरी खेले गिरधर गोपाल,*
*रंग बरसे राधे के गाल…!*

*श्याम ने यमुना जल में केसर घोलकर राधा पर डाला।राधा मुस्कुरा उठीं। उनके कपोल गुलाबी हो गए। लटें भीगकर गालों पर आ गिरीं। कृष्ण ठिठक गए—ऐसी छवि देखकर स्वयं मोहित हो गए। राधा ने धीरे से कहा,कान्हा, आज रंग से नहीं, प्रेम से भिगो।फिर क्या था, कृष्ण ने रंग नहीं, अनुराग उड़ाया। चारों ओर हँसी, ठिठोली, मधुर गीत, मंजीरों की झंकार, पखावज की थाप। गोपियाँ घूम-घूमकर नाचने लगीं। कोई कृष्ण के कपड़ों पर रंग लगाती, कोई उनके गालों पर। सखाएँ श्याम के साथ राधा पर रंग उड़ाते और राधा सखियों के संग श्याम को घेर लेतीं।*

*एक क्षण ऐसा आया जब कृष्ण ने राधा का हाथ पकड़कर उन्हें कदम्ब के नीचे खींच लिया। वहाँ पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवता भी आकाश से पुष्प बरसा रहे थे। राधा ने लज्जा से आँखें झुका लीं। कृष्ण बोले, “राधे, फाल्गुन केवल रंगों का नहीं, आत्मा के मिलन का पर्व है।राधा मुस्कुराईं,श्याम, जब तुम पास होते हो, हर दिन होली बन जाता है।यमुना तट पर रंगीन जल में प्रतिबिंब पड़ रहा था। मोर नाच रहे थे। कोयल गीत गा रही थी। गोपियों के कंगन खनक रहे थे। वातावरण ऐसा था मानो स्वयं प्रेम साकार होकर खेल रहा हो।*

*फिर सभी ने मिलकर फूलों की होली खेली। गुलाब, मोगरा, चंपा की वर्षा हुई। कृष्ण ने बाँसुरी उठाई और मधुर राग छेड़ा। राग में ऐसा रस था कि सबका मन झूम उठा। राधा ने नेत्र बंद कर लिए। प्रेम की धारा बह चली।संध्या होते-होते रंग शांत हुए, पर मन और भी रंगीन हो गया। सबने यमुना जल से मुख धोया। राधा-श्याम संग बैठे। कृष्ण बोले, होली सिखाती है।वैमनस्य छोड़ो, प्रेम अपनाओ।राधा ने कहा, और हर हृदय में भक्ति का रंग भरो।फाल्गुन की वह संध्या अमर हो गई। आज भी जब होली आती है, वृन्दावन की हवाओं में वही लीला गूँज उठती है।श्याम की हँसी, राधा की मुस्कान और प्रेम के अनगिनत रंग।*

*|| होली केवल पर्व नहीं, प्रेम की अनुभूति है ||*

🌷🌷 श्री गरुड़ासना लक्ष्मी स्तवनम् 🌷🌷         (, हिन्दी अर्थ सहित)🍁ध्यानम्पीताम्बरां गरुड़स्थां शङ्खचक्रगदाधराम्।तेजःपुञ्...
08/02/2026

🌷🌷 श्री गरुड़ासना लक्ष्मी स्तवनम् 🌷🌷
(, हिन्दी अर्थ सहित)
🍁ध्यानम्
पीताम्बरां गरुड़स्थां शङ्खचक्रगदाधराम्।
तेजःपुञ्जां त्रिनेत्रां तां नमामि हरिप्रियाम्॥
अर्थ —
पीताम्बरधारिणी, गरुड़ पर आरूढ़, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली,
तेज के पुंज समान, त्रिनेत्री, श्रीहरि की प्रिया लक्ष्मी को मैं नमन करता हूँ।
🍁
ॐ नमः श्रीमहालक्ष्म्यै गरुड़ारूढमूर्तये।
विष्णुवक्षःस्थलस्थायै नित्यश्रीरूपिणी नमः॥१
अर्थ —
गरुड़ पर विराजमान, विष्णु के वक्षस्थल में निवास करने वाली
नित्य श्रीस्वरूपा महालक्ष्मी को नमस्कार।
🍁
शङ्खचक्रगदापद्मैः शोभितायै हरिप्रियै।
गरुड़स्कन्धसंस्थायै लक्ष्म्यै नित्यं नमो नमः॥२
अर्थ —
शंख-चक्र-गदा-पद्म से सुशोभित, हरि की प्रिया,
गरुड़स्कंध पर स्थित लक्ष्मी को बार-बार प्रणाम।
🍁
सुवर्णपक्षसंयुक्ते गरुडे परमेश्वरे।
विराजसे यया देवि तामहं श्रीं नमाम्यहम्॥३
अर्थ —
स्वर्ण पंखों वाले गरुड़ पर जिनसे शोभा बढ़ती है,
ऐसी श्रीदेवी को मैं नमन करता हूँ।
🍁
यत्र धर्मः सदा तिष्ठेत् यत्र नारायणः स्वयम्।
तत्र लक्ष्मीः स्थिरा नित्यं भवतीति श्रुतिर्मता॥४
अर्थ —
जहाँ धर्म और स्वयं नारायण स्थित होते हैं,
वहाँ लक्ष्मी सदा स्थिर रहती हैं — यही शास्त्र वचन है।
🍁
अलक्ष्मीहरणि देवि दारिद्र्यदुःखनाशिनि।
गरुड़वाहिनि श्रीदेवि भक्ताभीष्टप्रदायिनि॥५
अर्थ —
अलक्ष्मी और दरिद्रता का नाश करने वाली,
गरुड़वाहिनी श्रीदेवी भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करें।
🍁
वैष्णवी विष्णुवामाङ्गे नित्यनिवासकारिणि।
गरुडवेगसमायाता मम गेहे स्थिरा भव॥६
अर्थ —
विष्णु के वामांग में निवास करने वाली वैष्णवी देवी,
गरुड़ के वेग से आकर मेरे गृह में स्थिर हों।
🪷
न भयं न च दैन्यं स्यात् न शोकः न च दुर्भगम्।
यत्र त्वं श्रीरूपेण वससि हरिवल्लभे॥७
अर्थ —
जहाँ आप श्रीरूप में निवास करती हैं,
वहाँ भय, दीनता, शोक और दुर्भाग्य नहीं रहते।
🍁
सौम्यवक्त्रां सुवर्णाभां कमलाक्षीं प्रसन्नताम्।
गरुड़ोपरिसंस्थां तां वन्दे श्रीहरिप्रियाम्॥८
अर्थ —
सौम्य मुख, स्वर्णवर्ण, कमलनेत्र, प्रसन्न
गरुड़ पर स्थित हरिप्रिया लक्ष्मी को मैं वंदन करता हूँ।
🍁
गरुड़स्य यथा वेगो विष्णोराज्ञाप्रवाहकः।
तथा शीघ्रमिहायाहि स्थिरश्रीं मे प्रयच्छ मे॥९
अर्थ —
जिस प्रकार गरुड़ विष्णु की आज्ञा शीघ्र पहुँचाता है,
उसी प्रकार शीघ्र आकर मुझे स्थिर लक्ष्मी प्रदान करें।
🍁
निष्कलङ्के विशुद्धे च वैकुण्ठे नित्यसंस्थिते।
गरुड़स्कन्धमारूढे भक्तवत्सलि ते नमः॥१०
अर्थ —
निष्कलंक, शुद्ध वैकुण्ठ में स्थित
और गरुड़ पर आरूढ़ भक्तवत्सला लक्ष्मी को प्रणाम।
🍁
अन्नवस्त्रधनैश्वर्यपुत्रपौत्रविवर्धिनि।
गरुड़वाहिनि देवि मे सर्वं संवर्धय प्रभो॥११
अर्थ —
अन्न, वस्त्र, धन, पुत्र-पौत्र और ऐश्वर्य को बढ़ाने वाली देवी,
मेरे समस्त वैभव को बढ़ाएँ।
🍁
चञ्चलात्वं परित्यज्य स्थैर्यरूपा भवामि मे।
गरुड़ारूढलक्ष्म्यै ते नमो वैकुण्ठवासिनि॥१२
अर्थ —
हे देवी, चंचलता त्यागकर
मेरे जीवन में स्थिर लक्ष्मी बनकर निवास करें।
🍁
अविद्यां हर मे देवि विष्णुभक्तिप्रदायिनि।
गरुड़ेन समारूढा ज्ञानदीपं प्रकाशय॥१३
अर्थ —
अविद्या को हरकर विष्णु-भक्ति और ज्ञान का दीप जलाएँ।
🍁
राज्यं यशो धनं धर्मं दया विवेकमेव च।
प्रयच्छ गरुड़ारूढे नारायणसमन्विते॥१४
अर्थ —
राज्य, यश, धन, धर्म, दया और विवेक प्रदान करें।
🍁
यथा गरुड़पक्षेण लोकान् व्याप्य प्रतिष्ठितः।
तथा मम गृहे देवि श्रीः सर्वत्र प्रतिष्ठताम्॥१५
अर्थ —
जैसे गरुड़ अपने पंखों से लोकों को व्याप्त करता है,
वैसे ही मेरे घर में सर्वत्र लक्ष्मी प्रतिष्ठित हों।
🍁
न क्लेशो न च शत्रुः स्यात् न रोगो न च बाधकः।
गरुड़वाहिनि देवि यत्र त्वं वर्तसे सदा॥१६
अर्थ —
जहाँ आप निवास करती हैं,
वहाँ क्लेश, शत्रु, रोग और बाधा नहीं रहती।
🍁
शुद्धसत्त्वस्वरूपायै विष्णुशक्त्यै नमो नमः।
गरुड़वाहनस्थायै लक्ष्म्यै वैकुण्ठवासिनि॥१७
अर्थ —
शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, विष्णु-शक्ति, वैकुण्ठवासिनी लक्ष्मी को नमन।
🍁
यः स्मरेत् गरुड़ारूढां लक्ष्मीं प्रातः समाहितः।
न तस्य दारिद्र्यदोषो न विष्णुकृपाहीनता॥१८
अर्थ —
जो प्रातः एकाग्र होकर गरुड़ासना लक्ष्मी का स्मरण करता है,
वह दरिद्रता और विष्णु-कृपा से वंचित नहीं होता।
🍁
नित्यं श्रीनारायणयोः अभेदेन प्रतिष्ठिता।
गरुड़ारूढदेवेशि तुभ्यं नित्यं नमो नमः॥१९
अर्थ —
नारायण से अभिन्न रूप से स्थित
गरुड़ारूढा लक्ष्मी को सदा नमन।
🍁
अर्थकामौ च धर्मं च मोक्षं च प्रददासि यत्।
गरुड़वाहिनि लक्ष्मि चतुर्वर्गप्रदायिनि॥२०
अर्थ —
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष —
चारों पुरुषार्थ देने वाली लक्ष्मी को प्रणाम।
🍁
काले काले सहायं मे कुरु देवि कृपानिधे।
गरुड़वेगसमायाता दुःखं सर्वं विनाशय॥२१
अर्थ —
समय-समय पर सहायता कर
गरुड़ के वेग से आकर मेरे दुःखों का नाश करें।
🍁
यत्र यत्र हरिः साक्षात् तत्र लक्ष्मीर्न संशयः।
एतद् ज्ञात्वा नमामि त्वां गरुड़ारूढमूर्तिकाम्॥२२
अर्थ —
जहाँ हरि हैं, वहाँ लक्ष्मी अवश्य हैं —
यह जानकर मैं गरुड़ारूढा देवी को प्रणाम करता हूँ।
🍁
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै गरुड़वाहिन्यै नमः।
नारायणप्रियायै नित्यश्रीप्रदायिन्यै॥२३
अर्थ —
गरुड़वाहिनी, नारायणप्रिया, नित्य श्री प्रदान करने वाली लक्ष्मी को नमन।
🍁
ॐ गरुड़ारूढे देवि विष्णुपत्नि प्रसीद मम।
नित्यश्रीं प्रददासि त्वं भक्तस्य गृहे स्थिराम्॥२४॥
अर्थ—
हे गरुड़ारूढ़े देवि, विष्णुपत्नि, मेरी कृपा करो।
भक्त के गृह में नित्य स्थिर श्री प्रदान करो।

🍁गरुड़पक्षध्वजाकारं तेजोमयं विभावसु।
तत्रारूढा त्वया देवि श्रीः सर्वं सम्पूर्णताम्॥२५॥
अर्थ—
गरुड़ के पंख तेजस्वी ध्वज के समान हैं।
उस पर आरूढ़ होकर हे देवि, मेरी समस्त श्री पूर्ण करो।

🍁
वैकुण्ठाद् वरयामासि गरुडवेगवेगिता।
ममाशेषदुरितं नाश्य स्थिरं धनं प्रयच्छ॥२६॥
अर्थ—
वैकुण्ठ से गरुड़ के वेग से आकर,
मेरे समस्त पापों का नाश कर स्थिर धन दो।
🍁
हरिपादपद्मभक्त्या त्वं पूजिता सततं जनैः।
भक्तानां त्वं कृपासिंधु गरुड़स्थेति वन्दिताः॥२७॥
अर्थ—
हरि के चरणों की भक्ति से सब द्वारा पूजित होकर,
हे गरुड़स्थे, भक्तों के कृपा सागर बनी रहो।
🍁
अलक्ष्मीं नाशयाशु त्वं दारिद्र्यं च विनाशय।
गरुड़ारूढमहालक्ष्मि सर्वकामं प्रदासि हि॥२८॥
अर्थ—
अलक्ष्मी और दारिद्र्य को शीघ्र नाश करो।
हे गरुड़ारूढ़ महालक्ष्मि, समस्त कामनाएँ पूरी करो।
🍁
शङ्खचक्रगदापद्मधरं पद्मासने स्थिताम्।
गरुडस्कन्धसंयुक्तां तां भजे श्रीहरिप्रियाम्॥२९॥
अर्थ—
शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाली, पद्मासनस्थित,
गरुड़ के स्कंध पर युक्त हरिप्रिया श्री को मैं भजता हूँ।
🍁
यत्र त्वं वससि देवि तत्र नारायणः स्वयम्।
गरुड़वाहिनि लक्ष्मी तुभ्यं नमो नमो नमः॥३०॥
अर्थ—
जहाँ तुम निवास करती हो, वहाँ स्वयं नारायण होते हैं।
हे गरुड़वाहिनि लक्ष्मी, तुम्हें बार-बार नमस्कार।

🍁
इदं स्तवनं यः पठेत् भक्त्या लक्ष्मीसमाहितः।
स स्थिरश्रीः समृद्धश्च विष्णुभक्तो भवेद् ध्रुवम्॥३१
अर्थ —
जो भक्तिभाव से इस स्तवन का पाठ करता है,
वह स्थिर लक्ष्मी, समृद्धि और विष्णु-भक्ति प्राप्त करता है।

🍀🍀आचार्य दया शंकर चतुर्वेदी हाजीपुर पंजाब

9646351008 9464661008

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Hajipur
144221

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