Astro Shiv Shankar Chaturvedi

Astro Shiv Shankar Chaturvedi कर्मकाण्ड एवं ज्योतिषीय परामर्श हेतु

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क्रोध के दो मीनट एक युवक ने विवाह के बाद दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार की इच्छा पिता से कही' पिता ने स्वीकृति दी तो वह अ...
06/01/2026

क्रोध के दो मीनट

एक युवक ने विवाह के बाद दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार की इच्छा पिता से कही' पिता ने स्वीकृति दी तो वह अपनी गर्भवती पत्नी को अपने माँ-बाप के जिम्मे छोड़कर व्यापार को चला गया.
परदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया. 17 वर्ष धन कमाने में बीते गए तो सन्तुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई. पत्नी को पत्र लिखकर आने की सूचना दी और जहाज में बैठ गया.
उसे जहाज में एक व्यक्ति मिला जो दुखी मन से बैठा था. सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि इस देश में ज्ञान की कोई कद्र नही है. मैं यहां ज्ञान के सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है.
सेठ ने सोचा इस देश में मैने तो बहुत धन कमाया. यह तो मेरी कर्मभूमि है. इसका मान रखना चाहिए. उसने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई. उस व्यक्ति ने कहा- मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्राएं है.
सेठ को सौदा महंगा लग तो रहा था लेकिन कर्मभूमि का मान रखने के लिए 500 मुद्राएं दे दीं. व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना. सेठ ने सूत्र अपनी किताब में लिख लिया.
कई दिनों की यात्रा के बाद रात्रि के समय अपने नगर को पहुंचा. उसने सोचा इतने सालों बाद घर लौटा हूं क्यों न चुपके से बिना खबर दिए सीधे पत्नी के पास पहुंच कर उसे आश्चर्य उपहार दूं.
घर के द्वारपालों को मौन रहने का इशारा करके सीधे अपने पत्नी के कक्ष में गया तो वहां का नजारा देखकर उसके पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई. पलंग पर उसकी पत्नी के पास एक युवक सोया हुआ था.
अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि मैं परदेस में भी इसकी चिंता करता रहा और ये यहां अन्य पुरुष के साथ है. दोनों को जिन्दा नही छोड़ूंगा. क्रोध में तलवार निकाल ली.
वार करने ही जा रहा था कि उतने में ही उसे 500 अशर्फियों से प्राप्त ज्ञान सूत्र याद आया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट सोच लेना. सोचने के लिए रूका. तलवार पीछे खींची तो एक बर्तन से टकरा गई.
बर्तन गिरा तो पत्नी की नींद खुल गई. जैसे ही उसकी नजर अपने पति पर पड़ी वह ख़ुश हो गई और बोली- आपके बिना जीवन सूना सूना था. इन्तजार में इतने वर्ष कैसे निकाले यह मैं ही जानती हूं.
सेठ तो पलंग पर सोए पुरुष को देखकर कुपित था. पत्नी ने युवक को उठाने के लिए कहा- बेटा जाग. तेरे पिता आए हैं. युवक उठकर जैसे ही पिता को प्रणाम करने झुका माथे की पगड़ी गिर गई. उसके लम्बे बाल बिखर गए.
सेठ की पत्नी ने कहा- स्वामी ये आपकी बेटी है. पिता के बिना इसकी मान को कोई आंच न आए इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान ही पालन पोषण और संस्कार दिए हैं.
यह सुनकर सेठ की आंखों से आंसू बह निकले. पत्नी और बेटी को गले लगाकर सोचने लगा कि यदि आज मैने उस ज्ञानसूत्र को नहीं अपनाया होता तो जल्दबाजी में कितना अनर्थ हो जाता. मेरे ही हाथों मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता.
ज्ञान का यह सूत्र उस दिन तो मुझे महंगा लग रहा था लेकिन ऐसे सूत्र के लिए तो 500 अशर्फियां बहुत कम हैं. ज्ञान अनमोल है.
इस कथा का सार यह है कि जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं. वे क्रोध के दो मिनट हैं.
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भागवत में भी यही संदेश दिया गया है. कहा गया है कि यदि तुम्हारे काम से किसी का अपकार होता है तो उस काम को एक दिन के लिए टाल दो. यदि उपकार होता हो तो तुरंत करो ताकि कहीं उपकार का विचार न बदल जाए...!

04/01/2026
🌸 ब्रह्मांड की सबसे कठिन परीक्षा: जब भक्त ने भगवान की छाती पर प्रहार किया 🌸यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि सहनशीलता, क्षमा और...
02/01/2026

🌸 ब्रह्मांड की सबसे कठिन परीक्षा: जब भक्त ने भगवान की छाती पर प्रहार किया 🌸

यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि सहनशीलता, क्षमा और प्रेम की वह पराकाष्ठा है जिसने तिरुमला के भगवान वेंकटेश्वर की लीला की नींव रखी।

🚩 1. ऋषियों का महा-सम्मेलन और एक प्रश्न:

सरस्वती नदी के पवित्र तट पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन हो रहा था। महान तपस्वी, ज्ञानी और ऋषि-मुनि एकत्रित थे। यज्ञ की पूर्णाहूति के समय एक धर्मसंकट आ खड़ा हुआ—"इस महायज्ञ का प्रधान फल किसे अर्पित किया जाए?"

सृष्टि में तीन महाशक्तियां हैं—

* ब्रह्मा (सृजनकर्ता)

* शिव (संहारक)

* विष्णु (पालनहार)

प्रश्न था कि इन तीनों में 'त्रिगुणातीत' (तीनों गुणों से परे) और 'परम सात्विक' कौन है? जो क्रोध और अहंकार से मुक्त हो, वही इस यज्ञ का फल पाने का अधिकारी होगा।

निर्णय लेने का भार महर्षि भृगु को सौंपा गया। वे स्वयं ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे, परम ज्ञानी थे, किन्तु क्रोधी स्वभाव के भी थे। भृगु जी ने स्वीकार किया—"मैं तीनों लोकों में जाकर उनकी परीक्षा लूँगा।"

महर्षि भृगु सबसे पहले अपने पिता ब्रह्मा जी के पास सत्यलोक पहुँचे।

वहाँ ब्रह्मा जी दरबार में बैठे थे। भृगु ने जानबूझकर न उन्हें प्रणाम किया, न उनकी स्तुति की और न ही कोई सम्मान दिया। वे चुपचाप जाकर एक आसन पर बैठ गए।

पुत्र की ऐसी धृष्टता देख ब्रह्मा जी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उन्होंने सोचा, "मैं इसका पिता हूँ, जगत का रचयिता हूँ, और यह मेरा अपमान कर रहा है?"

यद्यपि उन्होंने वाणी से कुछ नहीं कहा, परन्तु उनके मन में 'रजोगुण' (अहंकार और क्रोध) का ज्वार उठ खड़ा हुआ। भृगु ऋषि ने अपने तपोबल से उनके मन के भाव पढ़ लिए।

भृगु ने सोचा— "यहाँ मान-सम्मान की अपेक्षा है। जहाँ रजोगुण है, वहाँ परम शांति नहीं हो सकती।" वे बिना कुछ बोले वहाँ से चल दिए।

इसके बाद भृगु ऋषि बर्फीले कैलाश पर्वत पहुँचे।

वहाँ भगवान शिव अपने गणों और माता पार्वती के साथ बैठे थे। जैसे ही शिव जी ने अपने भाई (भृगु भी ब्रह्मा के पुत्र होने के नाते शिव के भाई तुल्य थे) को आते देखा, वे प्रसन्नता से उन्हें गले लगाने के लिए आगे बढ़े।

किंतु भृगु ने पीछे हटते हुए अपमानजनक शब्द कहे— "ठहरिये महादेव! आप शमशान वासी हैं, भस्म रमाते हैं, आप वेद-मर्यादा से बाहर हैं। मुझे स्पर्श मत कीजिये।"

भगवान शिव का प्रेम क्षण भर में प्रलयंकारी क्रोध में बदल गया। उनका तीसरा नेत्र खुलने को हुआ, हाथ में त्रिशूल चमक उठा। वे भृगु को भस्म करने ही वाले थे कि माता पार्वती ने उनके चरण पकड़ लिए और उन्हें शांत किया।

भृगु ने जान लिया— "यहाँ 'तमोगुण' (शीघ्र क्रोध) का वास है। जो इतनी जल्दी क्रोधित हो जाए, वह सृष्टि का सर्वोच्च पालक नहीं हो सकता।"

अंत में, महर्षि भृगु वैकुंठ धाम पहुँचे। यहाँ का वातावरण अद्भुत था।
भगवान नारायण शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में लीन थे। माता लक्ष्मी अत्यंत प्रेम से उनके चरण दबा रही थीं। भृगु ऋषि को लगा कि भगवान उन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं (जबकि वे सो रहे थे)।

ऋषि का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने सोचा— "मैं एक ब्राह्मण द्वार पर खड़ा हूँ और यह सोने का नाटक कर रहे हैं? मुझे इनका अहंकार तोड़ना होगा।"

तभी वह अकल्पनीय घटना घटी जिसने तीनों लोकों को कम्पित कर दिया।

महर्षि भृगु ने आव देखा न ताव, दौड़कर भगवान विष्णु की वज्र समान कठोर छाती पर एक जोरदार लात मारी।

लात लगते ही भगवान नारायण हड़बड़ाकर जाग उठे।
सामने भृगु ऋषि को क्रोध में खड़ा देख, भगवान को न क्रोध आया, न ही उन्होंने दंड दिया। इसके विपरीत, वे जल्दी से शैया से उतरे और भृगु ऋषि के चरणों में गिर पड़े।

नारायण ने भृगु के पैर अपने हाथों में ले लिए और बड़े प्यार से सहलाते हुए बोले:

> "हे ब्रह्मर्षि! क्षमा करें। मुझे आपके आगमन का पता नहीं चला। मेरी छाती तो वज्र की तरह कठोर है और आपके चरण कमल की पंखुड़ी की तरह कोमल हैं। कहीं मेरे कठोर वक्षस्थल से आपके कोमल चरणों में चोट तो नहीं आई?"

> भगवान नारायण धीरे-धीरे उनके पैर दबाने लगे।
यह दृश्य देखकर भृगु ऋषि सन्न रह गए। उनका सारा क्रोध, सारा अहंकार पानी की तरह बह गया। उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। वे समझ गए कि जो अपमान करने वाले के प्रति भी इतनी दया रखे, वही वास्तव में 'सर्वोत्तम' है।

जहाँ भृगु ऋषि नतमस्तक थे, वहीं माता लक्ष्मी का चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था।

उन्होंने भगवान विष्णु से कहा—

"स्वामी! यह कैसी उदारता? इसने आपके वक्षस्थल पर प्रहार किया है। और हृदय तो पत्नी का निवास स्थान होता है। इस ऋषि ने आपकी छाती पर नहीं, मेरे घर पर लात मारी है, मेरे सौभाग्य का अपमान किया है। और आप उसे दंड देने के बजाय उसके चरण दबा रहे हैं?"

विष्णु जी ने मुस्कुराकर कहा— "देवी, ऋषियों का क्रोध भी आशीर्वाद होता है। क्षमा ही मेरा धर्म है।"

किंतु देवी लक्ष्मी का स्वाभिमान आहत हो चुका था। उन्होंने कहा—
"जहाँ मेरे स्वामी का अपमान हो और उसे सहन कर लिया जाए, मैं उस स्थान पर एक क्षण भी नहीं रह सकती।"

उसी क्षण, माता लक्ष्मी वैकुंठ त्यागकर पृथ्वी लोक पर चली गईं।
(यही वह घटना थी जिसके कारण भगवान विष्णु को लक्ष्मी जी को ढूँढने के लिए 'श्रीनिवास' बनकर पृथ्वी पर आना पड़ा और तिरुपति बालाजी की कथा का आरंभ हुआ।)

भृगु ऋषि ने लौटकर ऋषियों की सभा में घोषणा की:

> "मैंने तीनों लोकों को देखा है। ब्रह्मा जी मान चाहते हैं, शिव जी अपमान नहीं सह सकते, किन्तु नारायण ही ऐसे हैं जिन्होंने अपमान का बदला करुणा और प्रेम से दिया। अतः वही सर्वश्रेष्ठ हैं, वही सत्त्वगुणी हैं।"

>बड़प्पन शक्ति दिखाने में नहीं, बल्कि सहन करने और क्षमा करने में है। जो झुकता है, वही पूरी दुनिया को झुकाने की ताकत रखता है।

।। ॐ नमो नारायण ।।

*_|| निन्दक का बुरा क्यों मानें ||;?_*==🔷 यदि कोई हमारे दोष बताता है तो उसका यह उत्तर नहीं है कि वह दोष उस बताने वाले मे...
29/12/2025

*_|| निन्दक का बुरा क्यों मानें ||;?_*
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🔷 यदि कोई हमारे दोष बताता है तो उसका यह उत्तर नहीं है कि वह दोष उस बताने वाले में भी हैं या अन्य लोगों में भी है। ऐसा उत्तर देने का अर्थ है उसके दोष बताने का बुरा मानना, उलाहना देना और विरोध करना। यह आत्म शुद्धि का मार्ग नहीं है। बताने वाला यदि सदोषं है या अन्य लोग भी उस दोष में ग्रस्त हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भी उस दोष को अपनाये रहना चाहिए।

🔶 दीपक द्वारा फैलाये हुए प्रकाश का क्या इसीलिए बहिष्कार किया जाना उचित है कि वह अपने नीचे अंधकार क्यों छिपाये हुए हैं ? ठीक है, यदि दीपक अपने नीचे का अंधकार भी दूर कर सका होता तो उसे सर्वांगपूर्ण कहा जाता। पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके फैलाये हुए प्रकाश का लाभ उठाने से हम वंचित रहें इसका कोई कारण नहीं है। यह भी कोई कारण नहीं है कि दीपक सब जगह का अँधेरा दूर क्यों नहीं करता। यदि वह सुयोग से हमारे घर में जल रहा है तो इसे सौभाग्य ही मानना चाहिए।

🔷 दोष बताने वाला यदि स्वयं निर्दोष रहा होता तो उसकी महानता असाधारण होती, पर यदि वह ऐसा नहीं है तो भी उसके इस उपकार को हमें मानना ही चाहिए कि उसने हमारे दोष बताये और उनकी हानि समझने एवं छोड़ने के लिए हमें उकसाया। ऐसा उपकार यदि कड़ुवे शब्दों में किया गया है तो भी इससे रुष्ट होने की कोई बात नहीं है। गिलोय कड़वी होती है पर उसके अन्य गुण मूल्यवान होने के कारण उसे त्याज्य नहीं माना जाता। हमारे दोष यदि कड़ुवे शब्दों में-निंदा या आक्षेप के रूप में बताये हैं तो भी उचित यही है कि उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए, और उस निंदा में जितना भी अंश सच हो उस बुराई को छोड़ने का प्रयत्न किया जाय।
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28/12/2025

जय माता दी 🙏🙏 ❤️🙏

गुरु,आचार्य,पुरोहित,पंडित और पुजारी का फर्क जानिए।🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸अक्सर लोग पुजारी को पंडितजी या पुरोहित को आचार्य भी क...
27/12/2025

गुरु,आचार्य,पुरोहित,पंडित और पुजारी का फर्क जानिए।
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
अक्सर लोग पुजारी को पंडितजी या पुरोहित को आचार्य भी कह देते हैं और सुनने वाले भी उन्हें सही ज्ञान नहीं दे पाता है। यह विशेष पदों के नाम हैं जिनका किसी जाति विशेष से कोई संबंध नहीं। आओ हम जानते हैं कि उक्त शब्दों का सही अर्थ क्या है ताकि आगे से हम किसी पुजारी को पंडित न कहें।

गुरु👉 गु का अर्थ अंधकार और रु का अर्थ प्रकाश। अर्थात जो व्यक्ति आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरु होता है। गुरु का अर्थ अंधकार का नाश करने वाला। अध्यात्मशास्त्र अथवा धार्मिक विषयों पर प्रवचन देने वाले व्यक्तियों में और गुरु में बहुत अंतर होता है। गुरु आत्म विकास और परमात्मा की बात करता है। प्रत्येक गुरु संत होते ही हैं; परंतु प्रत्येक संत का गुरु होना आवश्यक नहीं है। केवल कुछ संतों में ही गुरु बनने की पात्रता होती है। गुरु का अर्थ ब्रह्म ज्ञान का मार्गदर्शक।

आचार्य👉 आचार्य उसे कहते हैं जिसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हो और जो गुरुकुल में विद्यार्थियों को शिक्षा देने का कार्य करता हो। आचार्य का अर्थ यह कि जो आचार, नियमों और सिद्धातों आदि का अच्छा ज्ञाता हो और दूसरों को उसकी शिक्षा देता हो। वह जो कर्मकाण्ड का अच्छा ज्ञाता हो और यज्ञों आदि में मुख्य पुरोहित का काम करता हो उसे भी आचार्य कहा जाता था। आजकल आचार्य किसी महाविद्यालय के प्रधान अधिकारी और अध्यापक को कहा जाता है।

पुरोहित👉 पुरोहित दो शब्दों से बना है:- 'पर' तथा 'हित', अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। प्राचीन काल में आश्रम प्रमुख को पुरोहित कहते थे जहां शिक्षा दी जाती थी। हालांकि यज्ञ कर्म करने वाले मुख्य व्यक्ति को भी पुरोहित कहा जाता था। यह पुरोहित सभी तरह के संस्कार कराने के लिए भी नियुक्त होता है। प्रचीनकाल में किसी राजघराने से भी पुरोहित संबंधित होते थे। अर्थात राज दरबार में पुरोहित नियुक्त होते थे, जो धर्म-कर्म का कार्य देखने के साथ ही सलाहकार समीति में शामिल रहते थे।

पुजारी👉 पूजा और पाठ से संबंधित इस शब्द का अर्थ स्वत: ही प्रकाट होता है। अर्थात जो मंदिर या अन्य किसी स्थान पर पूजा पाठ करता हो वह पुजारी। किसी देवी-देवता की मूर्ति या प्रतिमा की पूजा करने वाले व्यक्ति को पुजारी कहा जाता है।

पंडित👉 पंडः का अर्थ होता है विद्वता। किसी विशेष ज्ञान में पारंगत होने को ही पांडित्य कहते हैं। पंडित का अर्थ होता है किसी ज्ञान विशेष में दश या कुशल। इसे विद्वान या निपुण भी कह सकते हैं। किसी विशेष विद्या का ज्ञान रखने वाला ही पंडित होता है। प्राचीन भारत में, वेद शास्त्रों आदि के बहुत बड़े ज्ञाता को पंडित कहा जाता था। इस पंडित को ही पाण्डेय, पाण्डे, पण्ड्या कहते हैं। आजकल यह नाम ब्रह्मणों का उपनाम भी बन गया है। कश्मीर के ब्राह्मणों को तो कश्मीरी पंडितों के नाम से ही जाना जाता है। पंडित की पत्नी को देशी भाषा में पंडिताइन कहने का चलन है।

ब्राह्मण👉 ब्राह्मण शब्द ब्रह्म से बना है। जो ब्रह्म (ईश्वर) को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता, वह ब्राह्मण कहा गया है। जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है। जो ज्योतिषी या नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं, ज्योतिषी है। पंडित तो किसी विषय के विशेषज्ञ को कहते हैं और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथावाचक है। इस तरह वेद और ब्रह्म को छोड़कर जो कुछ भी कर्म करता है वह ब्राह्मण नहीं है। जिसके मुख से ब्रह्म शब्द का उच्चारण नहीं होता रहता, वह ब्राह्मण नहीं। स्मृतिपुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। 8 प्रकार के ब्राह्मण श्रुति में पहले बताए गए हैं। इसके अलावा वंश, विद्या और सदाचार से ऊंचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। ब्राह्मण को धर्मज्ञ विप्र और द्विज भी कहा जाता है जिसका किसी जाति या समाज से कोई संबंध नहीं।

आचार्य दया शंकर चतुर्वेदी

शिव पुराण में एक कथा आती है, जब स्वयं माता सती भगवान् विष्णु की माया को देख भ्रमित हो गयीं तथा भगवान् महेश्वर की कही बात...
25/12/2025

शिव पुराण में एक कथा आती है, जब स्वयं माता सती भगवान् विष्णु की माया को देख भ्रमित हो गयीं तथा भगवान् महेश्वर की कही बात पर भी अविश्वास कर स्वयं भगवान् विष्णु की माया-लीला में प्रवेश कर गयीं।
एक समय की बात है, तीनों लोकों में विचरने वाले भगवान् रुद्र सती के साथ बैल पर आरूढ़ हो इस भूतल पर भ्रमण कर रहे थे।
घूमते-घूमते वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मण सहित भगवान् श्रीराम को देखा, जो रावण द्वारा छलपूर्वक हर कर ले गयी अपनी प्यारी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे। वे 'हा सीते !' ऐसा उच्चस्वर से पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंबार रोते थे। उनके मन में विरह का आवेश छा गया था।
सूर्यवंश में उत्पन्न, दशरथनन्दन, भरताग्रज श्रीराम आनन्द रहित हो लक्ष्मण के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय भगवान् शंकर ने बडी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया, किन्तु भगवान् शंकर ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने को प्रकट नहीं किया, और जय जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये।
शिव की मोह में डालने वाली ऐसी लीला देख सती को बड़ा विस्मय हुआ। वे उनकी माया से मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं, 'नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं; इनकी आकृति विरहव्यथा से व्याकुल दिखायी दे रही है।
इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी अंगकान्ति नीलकमल के समान श्याम है। उसे देखकर किस कारण से आप आनन्दविभोर हो उठे थे? आपका चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन्न हो गया था ? आप इस समय भक्त के समान विनम्र क्यों हो गये थे ?
सती की यह बात सुनकर भगवान् शंकर ने कहा, 'प्रिये ! ये दोनों भाई वीरों द्वारा सम्मानित हैं। इनके नाम हैं-श्रीराम और लक्ष्मण। इनका प्राकट्य सूर्यवंश में हुआ है। ये दोनों राजा दशरथ के विद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे रंग के छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेष के अंश हैं। उनका नाम लक्ष्मण है। इनके बड़े भैया का नाम श्रीराम है। इनके रूप में भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूर्ण अंश से प्रकट हुए हैं। ये साधुपुरुषों की रक्षा और लोगों के कल्याण के लिये इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।'
भगवान् शिव की बात सुनकर भी सती के मन को इस पर विश्वास नहीं हुआ। और हो भी कैसे ?, भगवान् विष्णु की माया बड़ी प्रबल है, वह सम्पूर्ण लोकों को मोह में डाल देने वाली है। सती के मन में संशय देख भगवान् शिव बोले, 'देवि! मेरी बात सुनो। यदि तुम्हारे मन में मेरे कथन पर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर अपनी ही बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा कर लो। प्रिये! जिस प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय, वह करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो। तब तक मैं इस बरगद के नीचे खड़ा हूँ।'
भगवान् शिव की आज्ञा से सती वहाँ गयीं और मन-ही-मन यह सोचने लगीं कि 'मैं वनचारी राम की कैसे परीक्षा करूँ ? विचार आया, मैं सीता का रूप धारण करके राम के पास चलूँ। यदि राम साक्षात् विष्णु हैं, तब तो सब कुछ जान लेंगे; अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे। ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीराम के समीप उनकी परीक्षा लेने के लिये गयीं।
सती को सीता के रूप में सामने आयी देख शिव-शिव का जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये और हँसते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले, 'सतीजी! आपको नमस्कार है। भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं ? आप पति के बिना अकेली ही इस वन में क्योंकर आयीं? देवि! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप धारण किया है? मुझ पर कृपा करके इसका कारण बताइये ?'
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजी की कही हुई बात का स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीराम को साक्षात् विष्णु जान अपने रूप को प्रकट करके मन-ही-मन भगवान् शिव के चरणारविन्दों का चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती उनसे इस तरह बोलीं- 'रघुनन्दन! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान् शिव मेरे तथा अपने पार्षदों के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए इस वन में आ गये थे। यहाँ उन्होंने सीता की खोज में लगे हुए लक्ष्मण सहित आपको देखा। उस समय सीता के लिये आपके मन में बड़ा क्लेश था और आप विरहशोक से पीड़ित दिखायी देते थे। उस अवस्था में आपको प्रणाम करके वे चले गये, और उस वटवृक्ष के नीचे अभी खड़े ही हैं। भगवान् शिव बड़े आनन्द के साथ आपके वैष्णवरूप की उत्कृष्ट महिमा का गान कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने आपको चतुर्भुज विष्णु के रूप में नहीं देखा तो भी आपका दर्शन करते ही वे आनन्दविभोर हो गये। इस निर्मल रूप की ओर देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। मेरे पूछने पर भगवान् शम्भु ने जो आपका परिचय बताया उसे सुनकर मेरे मन में भ्रम उत्पन्न हो गया। अत: राघवेन्द्र ! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है। श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप साक्षात् विष्णु हो। अब मेरा संशय दूर हो गया फिर भी महामते ! आप भगवान् शिव के वन्दनीय कैसे हो गये ? मेरे मन में यह एक संदेह है। इसे निकाल दो और शीघ्र ही मुझे पूर्ण शान्ति प्रदान करो।'
सती का यह वचन सुनकर श्रीराम के नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु भगवान् शिव का स्मरण किया, किन्तुआज्ञा न होने के कारण वे सती के साथ भगवान् शिव के निकट नहीं गये।
सती का प्रश्न सुनकर श्रीराम बोले, 'देवि! प्राचीन काल में एक समय भगवान् शम्भु ने अपने परात्पर धाम में विश्वकर्मा को बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशाला में एक रमणीय भवन बनवाया, जो बहुत ही विस्तृत था। उसमें एक श्रेष्ठ सिंहासन का भी निर्माण कराया। उस सिंहासन पर भगवान् शंकर ने विश्वकर्मा द्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदा के लिये अद्भुत और परम उत्तम था। तत्पश्चात् उन्होंने सब ओर से इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धों, गन्धर्वो, नागादिकों तथा सम्पूर्ण उपदेवों को भी शीघ्र वहाँ बुलवाया। समस्त वेदों और आगमों को, पुत्रों सहित ब्रह्माजी को, मुनियों को तथा अप्सराओं सहित समस्त देवियों को, जो नाना प्रकार की वस्तुओं से सम्पन्न थीं, आमन्त्रित किया। इनके सिवा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की सोलह-सोलह कन्याओं को भी बुलवाया, जिनके हाथों में मांगलिक वस्तुएँ थीं। वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकार के वाद्यों को बजवाकर सुन्दर गीतों द्वारा महान् उत्सव रचाया। सम्पूर्ण ओषधियों के साथ राज्याभिषेक के योग्य द्रव्य एकत्र किये गये प्रत्यक्ष तीर्थों के जलों से भरे हुए पाँच कलश भी मँगवाये गये। इनके सिवा और भी बहुत-सी दिव्य सामग्रियों को भगवान् शंकर ने अपने पार्षदों द्वारा मँगवाया और वहाँ उच्चस्वर से वेदमन्त्रों का घोष करवाया।
देवि! भगवान् विष्णु की पूर्ण भक्ति से महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते थे इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हृदय से श्रीहरि को वैकुण्ठ से बुलवाया और शुभ मुहूर्त में श्रीहरि को उस श्रेष्ठ सिंहासन पर बिठाकर महादेवजी ने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया। उनके मस्तक पर मनोहर मुकुट बाँधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जाने के बाद महेश्वर ने स्वयं ब्रह्माण्ड मण्डप में श्रीहरि का अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरों के पास नहीं था।
तदनन्तर शम्भु ने श्रीहरि का स्तवन किया और बोले, 'आज से विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। तुम सम्पूर्ण देवता श्रीहरि को प्रणाम करो और ये वेद मेरी ही तरह इन श्रीहरि का वर्णन करें। रुद्रदेव ने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरुडध्वज को प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदि ने भी उस समय श्रीहरि की वन्दना की। इसके बाद देवताओं के समक्ष महेश्वर ने श्रीहरि को इस तरह बड़े-बड़े वर प्रदान किये, 'हरे! तुम मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पालक और संहारक होओ। धर्म, अर्थ और काम के दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करने वाले दुष्टों को दण्ड देने वाले होओ; महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न, जगत्पूज्य जगदीश्वर बने रहो। समरांगण में तुम कहीं भी जीते नहीं जा सकोगे। मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे। तुम मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकार की शक्तियाँ ग्रहण करो। एक तो इच्छा आदि की सिद्धि दूसरी नाना प्रकार की लीलाओं को प्रकट करने की शक्ति और तीसरी तीनों लोकों में नित्य स्वतन्त्रता। हरे! जो तुमसे द्वेष करने वाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्न पर्वक दण्डनीय होंगे। विष्णो ! मैं तुम्हारे भक्तों को उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा।
तुम इस माया को भी ग्रहण करो जिसका निवारण करना देवता आदि के लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित होने पर यह विश्व जडरूप हो जायगा। हरे! तुम मेरी बायीं भुजा हो और विधाता दाहिनी भुजा हैं। तुम इन विधाता के भी उत्पादक और पालक होओगे। तुम यहाँ रहकर विशेष रूप से सम्पूर्ण जगत् का पालन करो। नाना प्रकार की लीलाएँ करने वाले विभिन्न अवतारों द्वारा सदा सबकी रक्षा करते रहो। मेरे चिन्मय धाम में तुम्हारा जो यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान है, वह गोलोक नाम से विख्यात होगा। हरे! भूतल पर जो तुम्हारे अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका अवश्य दर्शन करूँगा। वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।
इस प्रकार श्रीहरि को अपना अखण्ड ऐश्वर्य सौंपकर भगवान् शिव स्वयं कैलास पर्वत पर रहते हुए अपने पार्षदों के साथ स्वच्छन्द क्रीडा करते हैं। तभी से भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ गोपवेष धारण करके आये और गोप-गोपी तथा गौओं के अधिपति होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। वे श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त हो समस्त जगत् की रक्षा करने लगे। वे शिव की आज्ञा से नाना प्रकार के अवतार ग्रहण करके जगत् का पालन करते हैं।
इस समय वे ही श्रीहरि भगवान् शंकर की आज्ञा से चार भाइयों के रूप में अवतीर्ण हैं। उन चार भाइयों में सबसे बड़ा मैं राम हूँ, दूसरे भरत हैं, तीसरे लक्ष्मण हैं और चौथे भाई शत्रुघ्न हैं। देवि ! मैं पिता की आज्ञा से सीता और लक्ष्मण के साथ वन में आया था। यहाँ किसी निशाचर ने मेरी पत्नी सीता को हर लिया है और मैं विरही होकर भाई के साथ इस वन में अपनी प्रिया का अन्वेषण करता हूँ। जब आपका दर्शन प्राप्त हो गया, तब सर्वथा मेरा कुशल-मंगल ही होगा। माँ सती ! आपकी कृपा से ऐसा होने में कोई संदेह नहीं है। देवि ! निश्चय ही आपकी ओर से मुझे सीता की प्राप्ति विषयक वर प्राप्त होगा। आपके अनुग्रह से उस दुःख देने वाले पापी राक्षस को मारकर मैं सीता को अवश्य प्राप्त करूँगा। आज मेरा महान् सौभाग्य है जो आप दोनों ने मुझ पर कृपा की। जिस पर आप दोनों दयालु हो जायें, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है।
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती देवी को प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आज्ञा से उस वन में विचरने लगे। पवित्र हृदय वाले श्रीराम की यह बात सुनकर सती मन-ही-मन शिवभक्ति परायण रघुनाथजी की प्रशंसा करती हुई बहुत प्रसन्न हुईं। पर अपने कर्म को याद करके उनके मन में बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी। वे उदास होकर शिवजी के पास लौटीं।

“जय श्री राम”

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