25/12/2025
शिव पुराण में एक कथा आती है, जब स्वयं माता सती भगवान् विष्णु की माया को देख भ्रमित हो गयीं तथा भगवान् महेश्वर की कही बात पर भी अविश्वास कर स्वयं भगवान् विष्णु की माया-लीला में प्रवेश कर गयीं।
एक समय की बात है, तीनों लोकों में विचरने वाले भगवान् रुद्र सती के साथ बैल पर आरूढ़ हो इस भूतल पर भ्रमण कर रहे थे।
घूमते-घूमते वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मण सहित भगवान् श्रीराम को देखा, जो रावण द्वारा छलपूर्वक हर कर ले गयी अपनी प्यारी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे। वे 'हा सीते !' ऐसा उच्चस्वर से पुकारते, जहाँ-तहाँ देखते और बारंबार रोते थे। उनके मन में विरह का आवेश छा गया था।
सूर्यवंश में उत्पन्न, दशरथनन्दन, भरताग्रज श्रीराम आनन्द रहित हो लक्ष्मण के साथ वन में भ्रमण कर रहे थे और उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। उस समय भगवान् शंकर ने बडी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया, किन्तु भगवान् शंकर ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने को प्रकट नहीं किया, और जय जयकार करके वे दूसरी ओर चल दिये।
शिव की मोह में डालने वाली ऐसी लीला देख सती को बड़ा विस्मय हुआ। वे उनकी माया से मोहित हो उनसे इस प्रकार बोलीं, 'नाथ! ये दोनों पुरुष कौन हैं; इनकी आकृति विरहव्यथा से व्याकुल दिखायी दे रही है।
इनमें जो ज्येष्ठ है, उसकी अंगकान्ति नीलकमल के समान श्याम है। उसे देखकर किस कारण से आप आनन्दविभोर हो उठे थे? आपका चित्त क्यों अत्यन्त प्रसन्न हो गया था ? आप इस समय भक्त के समान विनम्र क्यों हो गये थे ?
सती की यह बात सुनकर भगवान् शंकर ने कहा, 'प्रिये ! ये दोनों भाई वीरों द्वारा सम्मानित हैं। इनके नाम हैं-श्रीराम और लक्ष्मण। इनका प्राकट्य सूर्यवंश में हुआ है। ये दोनों राजा दशरथ के विद्वान् पुत्र हैं। इनमें जो गोरे रंग के छोटे बन्धु हैं, वे साक्षात् शेष के अंश हैं। उनका नाम लक्ष्मण है। इनके बड़े भैया का नाम श्रीराम है। इनके रूप में भगवान् विष्णु ही अपने सम्पूर्ण अंश से प्रकट हुए हैं। ये साधुपुरुषों की रक्षा और लोगों के कल्याण के लिये इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।'
भगवान् शिव की बात सुनकर भी सती के मन को इस पर विश्वास नहीं हुआ। और हो भी कैसे ?, भगवान् विष्णु की माया बड़ी प्रबल है, वह सम्पूर्ण लोकों को मोह में डाल देने वाली है। सती के मन में संशय देख भगवान् शिव बोले, 'देवि! मेरी बात सुनो। यदि तुम्हारे मन में मेरे कथन पर विश्वास नहीं है तो तुम वहाँ जाकर अपनी ही बुद्धि से श्रीराम की परीक्षा कर लो। प्रिये! जिस प्रकार तुम्हारा मोह या भ्रम नष्ट हो जाय, वह करो। तुम वहाँ जाकर परीक्षा करो। तब तक मैं इस बरगद के नीचे खड़ा हूँ।'
भगवान् शिव की आज्ञा से सती वहाँ गयीं और मन-ही-मन यह सोचने लगीं कि 'मैं वनचारी राम की कैसे परीक्षा करूँ ? विचार आया, मैं सीता का रूप धारण करके राम के पास चलूँ। यदि राम साक्षात् विष्णु हैं, तब तो सब कुछ जान लेंगे; अन्यथा वे मुझे नहीं पहचानेंगे। ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीराम के समीप उनकी परीक्षा लेने के लिये गयीं।
सती को सीता के रूप में सामने आयी देख शिव-शिव का जप करते हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम सब कुछ जान गये और हँसते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले, 'सतीजी! आपको नमस्कार है। भगवान् शम्भु कहाँ गये हैं ? आप पति के बिना अकेली ही इस वन में क्योंकर आयीं? देवि! आपने अपना रूप त्यागकर किसलिये यह नूतन रूप धारण किया है? मुझ पर कृपा करके इसका कारण बताइये ?'
श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सती उस समय आश्चर्यचकित हो गयीं। वे शिवजी की कही हुई बात का स्मरण करके और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज्जित हुईं। श्रीराम को साक्षात् विष्णु जान अपने रूप को प्रकट करके मन-ही-मन भगवान् शिव के चरणारविन्दों का चिन्तन कर प्रसन्नचित्त हुई सती उनसे इस तरह बोलीं- 'रघुनन्दन! स्वतन्त्र परमेश्वर भगवान् शिव मेरे तथा अपने पार्षदों के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए इस वन में आ गये थे। यहाँ उन्होंने सीता की खोज में लगे हुए लक्ष्मण सहित आपको देखा। उस समय सीता के लिये आपके मन में बड़ा क्लेश था और आप विरहशोक से पीड़ित दिखायी देते थे। उस अवस्था में आपको प्रणाम करके वे चले गये, और उस वटवृक्ष के नीचे अभी खड़े ही हैं। भगवान् शिव बड़े आनन्द के साथ आपके वैष्णवरूप की उत्कृष्ट महिमा का गान कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने आपको चतुर्भुज विष्णु के रूप में नहीं देखा तो भी आपका दर्शन करते ही वे आनन्दविभोर हो गये। इस निर्मल रूप की ओर देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। मेरे पूछने पर भगवान् शम्भु ने जो आपका परिचय बताया उसे सुनकर मेरे मन में भ्रम उत्पन्न हो गया। अत: राघवेन्द्र ! मैंने उनकी आज्ञा लेकर आपकी परीक्षा की है। श्रीराम! अब मुझे ज्ञात हो गया कि आप साक्षात् विष्णु हो। अब मेरा संशय दूर हो गया फिर भी महामते ! आप भगवान् शिव के वन्दनीय कैसे हो गये ? मेरे मन में यह एक संदेह है। इसे निकाल दो और शीघ्र ही मुझे पूर्ण शान्ति प्रदान करो।'
सती का यह वचन सुनकर श्रीराम के नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान खिल उठे। उन्होंने मन-ही-मन अपने प्रभु भगवान् शिव का स्मरण किया, किन्तुआज्ञा न होने के कारण वे सती के साथ भगवान् शिव के निकट नहीं गये।
सती का प्रश्न सुनकर श्रीराम बोले, 'देवि! प्राचीन काल में एक समय भगवान् शम्भु ने अपने परात्पर धाम में विश्वकर्मा को बुलाकर उनके द्वारा अपनी गोशाला में एक रमणीय भवन बनवाया, जो बहुत ही विस्तृत था। उसमें एक श्रेष्ठ सिंहासन का भी निर्माण कराया। उस सिंहासन पर भगवान् शंकर ने विश्वकर्मा द्वारा एक छत्र बनवाया, जो बहुत ही दिव्य, सदा के लिये अद्भुत और परम उत्तम था। तत्पश्चात् उन्होंने सब ओर से इन्द्र आदि देवगणों, सिद्धों, गन्धर्वो, नागादिकों तथा सम्पूर्ण उपदेवों को भी शीघ्र वहाँ बुलवाया। समस्त वेदों और आगमों को, पुत्रों सहित ब्रह्माजी को, मुनियों को तथा अप्सराओं सहित समस्त देवियों को, जो नाना प्रकार की वस्तुओं से सम्पन्न थीं, आमन्त्रित किया। इनके सिवा देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और नागों की सोलह-सोलह कन्याओं को भी बुलवाया, जिनके हाथों में मांगलिक वस्तुएँ थीं। वीणा, मृदंग आदि नाना प्रकार के वाद्यों को बजवाकर सुन्दर गीतों द्वारा महान् उत्सव रचाया। सम्पूर्ण ओषधियों के साथ राज्याभिषेक के योग्य द्रव्य एकत्र किये गये प्रत्यक्ष तीर्थों के जलों से भरे हुए पाँच कलश भी मँगवाये गये। इनके सिवा और भी बहुत-सी दिव्य सामग्रियों को भगवान् शंकर ने अपने पार्षदों द्वारा मँगवाया और वहाँ उच्चस्वर से वेदमन्त्रों का घोष करवाया।
देवि! भगवान् विष्णु की पूर्ण भक्ति से महेश्वरदेव सदा प्रसन्न रहते थे इसलिये उन्होंने प्रीतियुक्त हृदय से श्रीहरि को वैकुण्ठ से बुलवाया और शुभ मुहूर्त में श्रीहरि को उस श्रेष्ठ सिंहासन पर बिठाकर महादेवजी ने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उन्हें सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित किया। उनके मस्तक पर मनोहर मुकुट बाँधा गया और उनसे मंगल-कौतुक कराये गये। यह सब हो जाने के बाद महेश्वर ने स्वयं ब्रह्माण्ड मण्डप में श्रीहरि का अभिषेक किया और उन्हें अपना वह सारा ऐश्वर्य प्रदान किया, जो दूसरों के पास नहीं था।
तदनन्तर शम्भु ने श्रीहरि का स्तवन किया और बोले, 'आज से विष्णु हरि स्वयं मेरे वन्दनीय हो गये। तुम सम्पूर्ण देवता श्रीहरि को प्रणाम करो और ये वेद मेरी ही तरह इन श्रीहरि का वर्णन करें। रुद्रदेव ने उपर्युक्त बात कहकर स्वयं ही श्रीगरुडध्वज को प्रणाम किया। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों और सिद्ध आदि ने भी उस समय श्रीहरि की वन्दना की। इसके बाद देवताओं के समक्ष महेश्वर ने श्रीहरि को इस तरह बड़े-बड़े वर प्रदान किये, 'हरे! तुम मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पालक और संहारक होओ। धर्म, अर्थ और काम के दाता तथा दुर्नीति अथवा अन्याय करने वाले दुष्टों को दण्ड देने वाले होओ; महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न, जगत्पूज्य जगदीश्वर बने रहो। समरांगण में तुम कहीं भी जीते नहीं जा सकोगे। मुझसे भी तुम कभी पराजित नहीं होओगे। तुम मुझसे मेरी दी हुई तीन प्रकार की शक्तियाँ ग्रहण करो। एक तो इच्छा आदि की सिद्धि दूसरी नाना प्रकार की लीलाओं को प्रकट करने की शक्ति और तीसरी तीनों लोकों में नित्य स्वतन्त्रता। हरे! जो तुमसे द्वेष करने वाले हैं, वे निश्चय ही मेरे द्वारा प्रयत्न पर्वक दण्डनीय होंगे। विष्णो ! मैं तुम्हारे भक्तों को उत्तम मोक्ष प्रदान करूँगा।
तुम इस माया को भी ग्रहण करो जिसका निवारण करना देवता आदि के लिये भी कठिन है तथा जिससे मोहित होने पर यह विश्व जडरूप हो जायगा। हरे! तुम मेरी बायीं भुजा हो और विधाता दाहिनी भुजा हैं। तुम इन विधाता के भी उत्पादक और पालक होओगे। तुम यहाँ रहकर विशेष रूप से सम्पूर्ण जगत् का पालन करो। नाना प्रकार की लीलाएँ करने वाले विभिन्न अवतारों द्वारा सदा सबकी रक्षा करते रहो। मेरे चिन्मय धाम में तुम्हारा जो यह परम वैभवशाली और अत्यन्त उज्ज्वल स्थान है, वह गोलोक नाम से विख्यात होगा। हरे! भूतल पर जो तुम्हारे अवतार होंगे, वे सबके रक्षक और मेरे भक्त होंगे। मैं उनका अवश्य दर्शन करूँगा। वे मेरे वर से सदा प्रसन्न रहेंगे।
इस प्रकार श्रीहरि को अपना अखण्ड ऐश्वर्य सौंपकर भगवान् शिव स्वयं कैलास पर्वत पर रहते हुए अपने पार्षदों के साथ स्वच्छन्द क्रीडा करते हैं। तभी से भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ गोपवेष धारण करके आये और गोप-गोपी तथा गौओं के अधिपति होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ रहने लगे। वे श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त हो समस्त जगत् की रक्षा करने लगे। वे शिव की आज्ञा से नाना प्रकार के अवतार ग्रहण करके जगत् का पालन करते हैं।
इस समय वे ही श्रीहरि भगवान् शंकर की आज्ञा से चार भाइयों के रूप में अवतीर्ण हैं। उन चार भाइयों में सबसे बड़ा मैं राम हूँ, दूसरे भरत हैं, तीसरे लक्ष्मण हैं और चौथे भाई शत्रुघ्न हैं। देवि ! मैं पिता की आज्ञा से सीता और लक्ष्मण के साथ वन में आया था। यहाँ किसी निशाचर ने मेरी पत्नी सीता को हर लिया है और मैं विरही होकर भाई के साथ इस वन में अपनी प्रिया का अन्वेषण करता हूँ। जब आपका दर्शन प्राप्त हो गया, तब सर्वथा मेरा कुशल-मंगल ही होगा। माँ सती ! आपकी कृपा से ऐसा होने में कोई संदेह नहीं है। देवि ! निश्चय ही आपकी ओर से मुझे सीता की प्राप्ति विषयक वर प्राप्त होगा। आपके अनुग्रह से उस दुःख देने वाले पापी राक्षस को मारकर मैं सीता को अवश्य प्राप्त करूँगा। आज मेरा महान् सौभाग्य है जो आप दोनों ने मुझ पर कृपा की। जिस पर आप दोनों दयालु हो जायें, वह पुरुष धन्य और श्रेष्ठ है।
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर कल्याणमयी सती देवी को प्रणाम करके रघुकुलशिरोमणि श्रीराम उनकी आज्ञा से उस वन में विचरने लगे। पवित्र हृदय वाले श्रीराम की यह बात सुनकर सती मन-ही-मन शिवभक्ति परायण रघुनाथजी की प्रशंसा करती हुई बहुत प्रसन्न हुईं। पर अपने कर्म को याद करके उनके मन में बड़ा शोक हुआ। उनकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी। वे उदास होकर शिवजी के पास लौटीं।
“जय श्री राम”