12/11/2025
गोपाल मुखर्जी मतलब गोपाल पाठा
गोपाल पाठा का जन्म 13 मई, 1913 को बोबाजार, कोलकाता में हुआ था। क्यों याद किया जाता है ? इन्हें मुस्लिम लीग के द्वारा वर्ष 1946 में पाकिस्तान की मांग को ले कर सीधी कार्रवाई के नाम पर किये जा रहे हिंदुओं के नरसंघार से हिंदू लोगों की रक्षा के लिए एक समूह बनाने और प्रतिरोध करने के लिए जाना जाता है।
#प्रतिघात
ये कहानी वीरक वशिष्ठ जी की कहानी "नोआखली आपबीती" के संदर्भ में लिखी जा रही है, नोआखली में हिंदुओं के निर्दयी वीभत्स नरसंहार के विरुद्ध जो प्रतिकार हुआ, उसे जानें।
-------------
बात 16 अगस्त की है, जिहादियों ने कलकत्ता और आस पास के क्षेत्रों में जघन्यता और बेरहमी से हिंदुओं का कत्ल किया था, यह कथानक तो सब पढ़ समझ ही चुके होंगे।
कहानी इसके बाद की है।
अगले दिन 17 अगस्त को हिंदुओं की इस जघन्य सामूहिक हत्या, लूटपाट और बलात्कार की खबर कलकत्ता के एक खटीक तक पहुंची, ये थे गोपाल पाठा, उनका वास्तविक नाम गोपाल मुखर्जी था लेकिन बकरे का मांस विक्रय करने के कारण उनका नाम गोपाल पाठा प्रसिद्ध हो गया था, पाठा बंगाली में बकरे को कहते हैं।
उनके घर के सामने एक पान की दुकान थी, डायरेक्ट एक्शन डे के दिन जिहादियों ने उनके घर के सामने दंगा किया। गंदगी का ढेर घर के दरवाजे पर लगा कर आग लगा दी और पान की दुकान भी जला दी। घर की महिलाएं दरवाजा अंदर से बंद करके घर के अंदर ही बैठी रहीं।
लेकिन गोपाल पाठा के मुहल्ले के पुरुष रक्त से साहसी थे, जब वे प्रतिकार हेतु केवल इकट्ठा भर हुए, तो उस जिहादी भीड़ ने उल्टे पैर रास्ता पकड़ लिया, खटिकों से भिड़ने के लिए देह कटाने वाला साहस चाहिए जो इन महालोलुप, भोगी, कपटी जिहादियों के पास हो ही नहीं सकता था।
गोपाल पाठा जानते थे कि शहर के एक कोने से शुरू हुई आग अपने घर तक पहुंचेगी ही। उनके ही समान उनका एक और मित्र था जुगल चंद्र घोष, ये एक अखाड़ा चलाते थे, इसमें स्थानीय लड़के पहलवानी किया करते थे, जुगल जी के प्रति उनके लड़के समर्पित थे और गुरु भाव होने के कारण उनकी आज्ञा अकाट्य रूप से मानते थे। जुगल घोष के ही साथ एक वाहन में गोपाल पाठा 17 अगस्त की सुबह इस क्रूर हत्याकांड का वीभत्स दृश्य देखने निकल पड़े, उन्होंने जो देखा वो सब दुहराने की जरूरत नहीं है। गोपाल पाठा ने जो कुछ भी देखा, सुना, समझा उससे अर्जित अपार दुख और क्रोध से उन्होंने जुगल घोष से केवल एक बात कही "तुम देखना, इसका भयंकर प्रतिरोध होगा।"
गोपाल पाठा केवल खटीक ही नहीं थे, उन्होंने प्राकृतिक विपदा के समय लोगों की सहायता के लिए एक राष्ट्रीय संगठन बनाया था जिसमें नवयुवकों को सम्मिलित किया गया था, वे सुभाष चंद्र बोस के घोर समर्थक थे और क्रांतिकारियों से भी उनका मेल जोल था।
वापस लौटकर उन्होंने अपने मुहल्ले के पुरुषों को इकट्ठा किया, फिर अपने संगठन के लड़कों को, फिर जुगल घोष के अखाड़े के पहलवानों को, जिसे जो बेहतर हथियार मिला उसे वही लेकर आने को कहा गया। ये सभी पुरुष डंडे, रॉड, फावड़े, छोटे बड़े हथौड़े, कुदाल, टंगिया, खुरपी, छेनी, चाकू, फरसे, हंसिया, गंडासे, गैंती, धारदार चाकू और तलवारें, यहां तक कि चारपाई खटिया के पाए भी, लेकर एक हिन्दू लड़ाके बन गए थे जिनके क्रोध की सीमा नहीं थी। इसके बाद जिन जिन दुकानों को लूट लिया गया था उन मारवाड़ियों से, जिन फैक्टरी और सॉ मिल को लूटा जाना था उनके मालिकों से उसकी सुरक्षा हेतु, धन इकट्ठा किया गया। उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था जिसके चलते बंगाल में नीग्रो सैनिकों का भी पड़ाव होता था, इन सैनिकों से पैसे के बदले बंदूकें, ग्रेनेड और गोलियां मिलीं। अंत में हर उस हिन्दू को दल में शामिल किया गया जो बच गया था, जिसने अपने लोगों को मरते कटते बलात्कार होते देखा था, जिसने अपने पड़ोसी जिहादी को धोखा देते अपना सब कुछ लूटते देखा था। ये सब उन जिहादियों को जानते थे, इनका मुख्य कार्य ही उन विश्वासघातियों की पहचान करना था।
अब गोपाल पाठा ने इन धधकते हिंदुओं से कहा
"हिंदुओं के शव गिनो, देखो की उन्हें कैसे मारा गया है, मैं हर एक हिन्दू के बदले इन दस जिहादियों की लाशें चाहता हूँ। जब तक तुम एक के बदले दस नहीं मार डालोगे तब तक ये रुकेगा नहीं। अगर हिन्दू के शरीर में पांच घाव दिखाई दें तो जिहादी के शरीर में पचास घाव करो। "
इस प्रकार का एक दल हर हिन्दू मुहल्ले में सुनियोनित तरीके से गुप्त प्रकट रूप से बना दिया गया। जिहादियों ने यह सोचा नहीं था कि हिन्दुओं में इस तरीके का प्रतिरोध तैयार हो चुका है।
18 अगस्त की सुबह उन्होंने फिर हमला किया। हृदय में क्रोध की भट्टी लिए और बुद्धि में शत्रु के समूल विनाश का लक्ष्य लिए हिन्दू पूरी तरह तैयार थे, हिन्दू लड़ाकों ने इतनी जोर का जवाबी आक्रमण किया कि जिहादियों की आँखें हैरत से फटते फटते रह गईं, किसी ने तलवार के जोरदार वार से उनकी खोपड़ी फाड़ दी, तो किसी ने टंगीया से उनका चेहरा फाड़ दिया, किसी ने हथौड़े से उनका सिर फोड़कर भेजा निकाल फेंका तो किसी ने फरसे से उनका सीना चीर दिया। एक ने गंडासे से जिहादियों का झटका करना प्रारम्भ कर दिया तो दूसरे ने गैंती से इनकी पीठ ही खोद डाली। जो अधमरे गिर पड़ते उनकी पसलियों में हंसिया घुसेड़ के घसीटा जाता और गंडासे वाले के पास आने पर उसका सिर उड़ा दिया जाता। जिन्होने कभी हिंदुओं के घर लूटे, बर्बरता से हत्या की, क्रूर बलात्कार किया उन जिहादियों के पेट हिन्दू लड़ाकों ने फरसे से फाड़ डाले और अपने हाथों से उनकी अंतड़ियाँ निकाल कर उन्हीं के मुंह में ठूंस दीं, जिहादियों के पैर अपनी चेतना भूल गए, आधे तो वहीं मार डाले गए जो वापस भागने लगे उन्हें इन नरसिंहों ने दौड़ाना आरंभ किया। यदि किसी हिन्दू को चोट आती भी थी तो उसे उसका पता भी नहीं चलता था, क्रोध और प्रतिशोध की भावना इतनी प्रबल थी, किसी भी जिहादी को छोडना अब उन्हें गंवारा नहीं था, जब तक वो वापस अपने इलाके में पहुँचते इससे पहले ही उन्हें 72 हूरों के पास भेज दिया गया।
गोपाल पाठा का साफ निर्देश था कि अगर जिहादी तुम्हें सुबह सुबह मारते हैं तो तुम सारा दिन चौबीसों घंटे उनकी कटाई करो। जिसने भी हिंदुओं की हत्या की है उसे ढूंढो, घात लगाओ और मार डालो। इसलिए हिन्दू ज्वालामुखियों का दल जिहादियों की बस्ती पर टूट पड़ा, जिहादी अगले हमले की तैयारी कर रहे थे, उन्होने सोचा था कि सुबह गया हुआ झुंड माले गनीमत लेकर लौटता होगा, हिन्दू लड़ाकों ने ऐसा विध्वंस मचाया कि देखने वाले की रूह काँप गयी, खटिकों ने जो चीर फाड़ मचाई उससे उनकी औरतें उल्टियाँ करते करते बेहोश हो गईं, किसी की पीठ फटी पड़ी थी तो किसी की खोपड़ी, मुहल्ले की जमीन पर आंतों का ढेर लग गया था, जो भागने का प्रयास करता उसे गंडासे फेंककर मारा जाता, गंडासा इतनी जोर से पड़ता कि पीठ में धँसकर सीने के पार हो जाता। उस समय वे बंगाली वीर ऐसे जान पड़ते थे मानों साक्षात शिव के गण ही वहाँ रक्त यज्ञ कर रहे हों, जैसे वीरभद्र ने माँ सती के प्रतिशोध स्वरूप दक्ष के सिर को काटकर हवनकुंड में होम दिया था वैसे ही वे वीर उन नीच दुर्जनों के मुंड, हाथ पैर और चिथड़े उड़ा रहे थे। हर हर महादेव और जय माँ काली के गगनभेदी जयघोष से पूरा इलाका गूंज उठा, जगदंबा के उन उपासकों ने उन अष्टभुजा वाली माँ का अपने भीतर पलने वाला प्रताप दिखला दिया।
जिहादियों का मूत छुट गया और कईयों के मल, ऐसी हालत में उन्हें भागने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। अब बारी थी फहिम चाचा जैसे लोगों की, हिंदुओं के दल में जो पीड़ित हिन्दू थे उन्होने ऐसे विश्वासघाती पड़ोसियों को पहचानकर अलग से लड़ाकों को इंगित किया, इन धोखेबाज़ों ने ये सोचा नहीं था कि इनकी वीभत्स दुर्गति होगी, हिन्दू पहलवानों ने इन्हें इनके घरों से खींचकर निकाला, फिर कुछ लड़ाके धोखेबाज जिहादीयों को घेरकर खड़े हो जाते, एक लड़ाका जमीन में लकड़ी का एक टुकड़ा रख देता जिस पर दो मुंहा चाकू गड़ा हुआ होता, अब इस हत्यारे, बलात्कारी जिहादी से कहा जाता कि उसकी जान बख्श दी जाएगी अगर वो अपनी दोनों हथेलियाँ इस चाकू के पार कर दे, ऐसा करने में जरा सा भी न नुकुर करने पर एक पहलवान उस जिहादी का सिर पकड़ कर उस चाकू पर दे मारता था, इससे उसका सिर कभी नाक से बिंध जाता था तो कभी मुंह से तो कभी आँख से।
इस प्रकार की अधमरी हालत में जब वह पहुँच जाता तब उसके हाथ में एक चाकू पकड़ाया जाता और कहा जाता कि अपने शिश्न में चिरा लगा तो तुझे जिंदा छोड़ देंगे, वह ये नहीं कर पाता, यह स्पष्ट था कि उसे बलात्कार का फल दिया जा रहा था, ये शब्द उसकी आत्मा तक पहुँच कर उसे इज्जत जाने का भाव देते थे, इसके बाद उसे डंडों से इतना पीटा जाता कि सिर को छोडकर उसका सारा शरीर सूज जाता, हड्डियाँ चटक जातीं, अंत में उसके अंडकोश को खटिया के पाये से फोड़कर शिश्न को पूरी तरह कुचल दिया जाता, ये उस बलात्कारी जिहादी की विदाई का अंतिम चरण होता।
जिन लोगों ने अपनी स्त्रियों के स्तन काटने वालों को पहचाना उन्हें भी मन की शांति मिली, ऐसे वहशियों को दो पहलवान इंगित किए जाने पर पकड़ लेते और लिटा कर एक लड़ाका पेट पर इनके बैठ जाता और खुरपी छेनी से इनकी छातियाँ तब तक छिलता जब तक सारी त्वचा और मांस न हट जाए, जब फेफड़े और हृदय दिखाई देने लगते तो उसे छोड़ दिया जाता, कुछ इस वेदना में ही मर जाते एवं कुछ के फावड़े के प्रहार से शिश्न अंडकोश समेत उखाड़ लिए जाते। यह सब बड़ी ही शीघ्रता से होता, सबको रेकी कर कर के मारा गया, पूरे क्षेत्र में ऐसा कोई जिहादी नहीं बचा जिसने हत्याकांड में साथ दिया हो और जीवित बच गया हो, गोपाल पाठा ने औरतों और बच्चों को छोड़ देने को कहा था, लेकिन जिहादियों को बचाने जो भी पुरुष आया वह भी मार दिया गया, बंदूकें और ग्रेनेड से हमला कर कर के उन्हें भी मार गिराया गया जो किसी कि आड़ लेकर छुपे थे।
गोपाल पाठा कहते थे कि " जो माँ काली का अपमान करता है उसे काली का ग्रास बना देना ही हमारा काम है " इस तरह पूरे क्षेत्र में ऐसा कोई जिहादी परिवार नहीं बचा था जिसके सारे पुरुष मार नहीं दिये गए हों।
केवल वही रिश्तेदार मर्द बचे जो उस वक़्त उस क्षेत्र में नहीं थे, जिहादियों की औरतें बेवा हो गईं बच्चे अनाथ हो गए।
यद्यपि हिंदुओं ने उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था लेकिन प्रकृति ने उन्हें क्षमा नहीं किया। वो सारी बेवा औरतें वेश्या बनने पर मजबूर हो गईं, शौहर न होने पर परिवार में कोई पुरुष न होने पर उन्हें आजीविका के लिए ये करना पड़ा। वैसे भी उनके समुदाय में बिना किसी स्वार्थ के कोई किसी का नहीं होता।
बच गए जिहादियों ने देह के बदले ही उनको पैसे दिये। बच्चों को भुखमरी, प्रताड़ना और शोषण का शिकार होना पड़ा। जिन्होने कभी हिंदुओं की महिलाओं का वीभत्स बलात्कार किया था, बच्चों को काट फेंका था उनकी औरतें अब सारी उम्र नोचे जाने पर मजबूर थीं। बच्चे प्रताड़ना और भीख मांगने पर विवश थे।
इस भयानक रक्तपात, चीर फाड़, उल्टी टट्टीयां मचा देने वाले वीभत्स दृश्य को देखकर गुलाम रसूल की रूह सिहर गयी, उसे इतना अधिक भय व्यापा कि उसने गोपाल पाठा के सामने अपनी बात कह भेजी " बहुत खून खराबा हो गया, आपने भी बहुत खून बहा लिया और हमने भी, अब ये खून खराबा हम और नहीं सह सकते, आप रुक जाइए। " लेकिन गोपाल पाठा इसके लिए राजी नहीं हुए, वे जानते थे कि ये अल तकिया ही है, उन्होने कोई समझौता नहीं किया, परिणामतः गुलाम रसूल लाहौर भाग गया, जाते जाते किसी ने रात में उसकी रेकी कर उसके अंडकोश में चाकू मार दिया था, जिससे वह भयंकर पीड़ा के साथ लाहौर पहुंचा था।
सोहरावर्दी की योजना थी हिंदुओं का कत्ले आम करवा के वो उस क्षेत्र को मुस्लिम बहुल इलाका बना देगा। लेकिन इसके बदले उसे कई मुस्लिम बहुल क्षेत्र गँवाने पड़े।
उसकी योजना थी हावड़ा ब्रिज को उड़वा देने की, इससे कलकत्ता के उस पार वाला इलाका पूर्वी पाकिस्तान में चला जाता, लेकिन गोपाल पाठा की मुंह तोड़ देने वाली कार्यवाही ने उसकी सारी योजना उड़ा दी
जिन्होने हिंदुओं को निरीह पशु समझा था उन्हें हिंदुओं ने ऐसा भयंकर पाठ पढ़ाया कि उन्हें भुलाए नहीं भूलता।
गोपाल पाठा उन दिनों की याद करते हुए कहते थे कि "मुझे केवल बकरे की जगह हिन्दूओं को मारने वाले जिहादी की गर्दन रखनी होती थी" जब अंग्रेजों ने सोहरावर्दी की कुर्सी हटा दी और नए मुसलमानों को वहाँ का शासन दे दिया तो दुरात्मा गांधी कलकत्ता आया, जब तक हिंदुओं की हत्या होती रही उस पापी के पैर कलकत्ता की ओर नहीं बढ़े, जैसे ही मुसलमानों की जान पर बन आयी वो ढोंगी दौड़ा आया, उसने गोपाल पाठा से कहा कि हथियार डाल दे, इस पर गोपाल पाठा ने कहा " जिन शस्त्रों ने मेरे स्वजनों के प्राण तथा स्त्रियों के सम्मान की रक्षा की है उन शस्त्रों को मैं कभी नहीं समर्पित करूंगा" अंततः अंग्रेजों को कलकत्ता में सेना उतारनी पड़ी और मार काट दोनों ओर से रोकी गयी।
इस मुंह तोड़ मार का प्रभाव इतना गहरा था कि आने वाले तीन दशकों तक मुसलमानों ने हिंदुओं की तरफ एक ढेला तक नहीं फेंका, यहाँ तक उन इलाकों में जहां मुस्लिम बहुल संख्या में थे।
जब कभी आपको नोआखाली याद दिलाया जाए तब तब आप उन्हें पाठागिरी का स्मरण कराएं। मुझे ये कहानी अपने पुरखों से पता चली क्योंकि मैं भी एक बंगाली हूँ, कलकत्ता का हर बंगाली गोपाल पाठा को जानता है, आज भी कलकत्ता के हिन्दू अपने घरों में उनकी जयंती मनाते हैं। अपने पूर्वजों के प्रति आदर रखें, उन्हें याद करके सिर झुकाएँ नहीं, गर्व से मस्तक उठाकर जियें।
जी की लेखनी से..✍
A rare photograph of ( )