Astro Arvind Kumar Vasudeva

Astro Arvind Kumar Vasudeva Astrologer Arvind Kumar Vasu Deva from Hoshiarpur Punjab

24/12/2022

Najoomi Ji's answer: In Vedic astrology, intelligence and mental abilities are believed to be influenced by the position and strength of various planets in a person's birth chart. However, it is not accurate to say that any one planet is solely responsible for making a person intelligent. Rather,...

राशि के अनुसार नवरात्रि में माता पूजनइस नवरात्रि क्या कहती है आपकी राशि, जाने राशि अनुसार आपको माता जी की पूजा किन पुष्प...
30/03/2022

राशि के अनुसार नवरात्रि में माता पूजन

इस नवरात्रि क्या कहती है आपकी राशि, जाने राशि अनुसार आपको माता जी की पूजा किन पुष्पों से करना चाहिए -

मेष राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप गुड़हल, गुलाब, लाल कनेर, लाल कमल अथवा किसी भी तरह के लाल पुष्प हों उससे पूजा करें, मां भगवती प्रसन्न होंगी।

वृष राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप श्वेत कमल, गुडहल, श्वेत कनेर, सदाबहार, बेला, हरसिंगार आदि सफेद रंग के फूल मां दुर्गा को अर्पित करें।

मिथुन राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप पीले कनेर, गुड़हल, द्रोणपुष्पी, गेंदा और केवड़ा के पुष्प से करें कृपा बरसेगी।

कर्क राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप श्वेत कमल, श्वेत कनेर, गेंदा, गुडहल, सदाबहार, चमेली रातरानी और अन्य जितने भी प्रकार के श्वेत और गुलाबी पुष्प हैं उन्हीं से माँ की आराधना करके प्रसन्न करके चन्द्र जनित दोषों से मुक्त हुआ जा सकता है।

सिंह राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप कमल, गुलाब, कनेर, गुड़हल से मां की पूजा करके कृपा पा सकते हैं, गुड़हल का पुष्प सूर्य और मां दुर्गा को अति प्रिय है।

कन्या राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप गुड़हल, गुलाब, गेंदा, हरसिंगार एवं किसी भी तरह के अति सुगंधित पुष्पों से मां दुर्गा की आराधना करके माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

तुला राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप श्वेत कमल, श्वेत कनेर, गेंदा, गुड़हल, जूही, हरसिंगार, सदाबहार, केवड़ा,बेला चमेली आधी पुष्पों से मां भगवती की आराधना कर मां की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

वृश्चिक राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन किसी भी तरह के लाल पुष्प, पीले पुष्प, एवं गुलाबी पुष्प से पूजा करके मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

धनु राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप कमल पुष्प, कनेर, गुड़हल, गुलाब, गेंदा, केवड़ा, और कनेर पुष्पों से पूजा-अर्चना करके मां का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

मकर राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप नीले पुष्प, कमल, गेंदा, गुलाब, गुड़हल आदि से मां शक्ति की पूजा-आराधना करके उनकी कृपा दृष्टि पाई जा सकती है।

कुंभ राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप नीले पुष्प, गेंदा, सभी प्रकार के कमल, गुड़हल, बेला, चमेली, रात की रानी, आदि से मां भगवती की आराधना करके उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

मीन राशि :
इस नवरात्रि में माताजी का पूजन आप पीले कनेर, कमल, गेंदा, गुलाब, गुड़हल के पुष्पों को माता रानी को अर्पित करें। इससे आपकी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
Jyotishi ज्योतिषी

हमारा ऋग्वेद हमे बांट कर भोजन करने को कहता है। हम जो अनाज खेतों मे पैदा करते है, उसका बंटवारा तो देखिए।1. जमीन से चार अं...
05/02/2022

हमारा ऋग्वेद हमे बांट कर भोजन करने को कहता है। हम जो अनाज खेतों मे पैदा करते है, उसका बंटवारा तो देखिए।

1. जमीन से चार अंगुल भूमि का,

2. गेहूं के बाली के नीचे का पशुओं का,

3. पहले पेड़ की पहली बाली अग्नि की ,

4. बाली से गेहूं अलग करने पर मूठ्ठी भर दाना पंछियो का,

5. गेहूं का आटा बनाने पर मुट्ठी भर आटा चीटियो का,

6. फिर आटा गूथने के बाद चुटकी भर गुथा आटा मछलियो का,

7. फिर उस आटे की पहली रोटी गौमाता की,

8. पहली थाली घर के बुज़ुर्ग़ो की और फिर हमारी,

9. आखिरी रोटी कुत्ते की

ये हमे सिखाती है हमारी भारतीय संस्कृति और मुझे गर्व है कि मै इस संस्कृति का हिस्सा हूँ...🙏🚩👍

01/02/2022

Remove negativity from your house

Put yellow mustard, camphor, asafoetida and fennel Seeds and 5 cloves on burning cow's dung and rotate it in the whole house including the bathroom in such a way that the smoke spreads everywhere. After a while, spray Gangajal all over the house by pouring it in a spray bottle, whatever negative energy there is in the house will go out of the house.

Note - If you living abroad/outside India and cow dung is not available nearby...
You can also do this remedy on dried coconut Husk/ coir.

07/01/2022
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पीछे से धक्का लगाने वाला शख्स हाथी को ट्रक में चढ़ा सकता हैलेकिन सिर्फ इतने से ही हाथी को एहसास ह...
18/12/2021

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पीछे से धक्का लगाने वाला शख्स हाथी को ट्रक में चढ़ा सकता है
लेकिन सिर्फ इतने से ही हाथी को एहसास है कि मेरे पीछे कोई है जो मेरी मदद कर रहा है
और इसी एहसास के सहारे हाथी ट्रक में चढ़ जाएगा
कभी कभी हमें भी ऐसे ही हल्के से सहारे की जरूरत होती है।

कभी कभी तो मैं एक ज्योतिषी के रूप में स्वयं को भी इसी इंसान जैसा समझता
जय श्री राम

24/11/2020

#देवउठनीएकादशी
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के बाद निद्रा अवस्था से जागते हैं। इसके अलावा इस दिन को देवताओं के जागने का दिन भी माना जाता है। देवश्यनी एकादशी पर भगवान विष्णु के सोने के बाद सभी शुभ कार्य बंद हो जाते हैं और इसके बाद जब भगवान विष्णु अपने निद्राकाल से जागते हैं तब धरती पर एक बार फिर से सभी शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं।

इसके अलावा इस दिन को तुलसी विवाह के नाम से भी जाना जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम से कराया जाता है। शालिग्राम को भगवान विष्णु का ही प्रतीक माना जाता है। शालिग्राम और तुलसी की शादी सनातन धर्म के अनुसार पूरे रीति-रिवाज से कराई जाती है। शास्त्रों के अनुसार जब देवता जागते हैं तो सबसे पहली प्रार्थना तुलसी की ही सुनते हैं। इसके अलावा जिन लोगों के यहां कन्या नहीं होती। वह लोग भी इस दिन तुलसी विवाह कराकर कन्यादान का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

ब्रह्माजी बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! अब पापों को हरने वाली पुण्य और मुक्ति देने वाली एकादशी का माहात्म्य सुनिए। पृथ्वी पर गंगा की महत्ता और समुद्रों तथा तीर्थों का प्रभाव तभी तक है जब तक कि कार्तिक की देव प्रबोधिनी एकादशी तिथि नहीं आती। मनुष्य को जो फल एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञों से मिलता है वही प्रबोधिनी एकादशी से मिलता है। नारदजी कहने लगे कि हे पिता! एक समय भोजन करने, रात्रि को भोजन करने तथा सारे दिन उपवास करने से क्या फल मिलता है सो विस्तार से बताइए।

ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र। एक बार भोजन करने से एक जन्म और रात्रि को भोजन करने से दो जन्म तथा पूरा दिन उपवास करने से सात जन्मों के पाप नाश होते हैं। जो वस्तु त्रिलोकी में न मिल सके और दिखे भी नहीं वह हरि प्रबोधिनी एकादशी से प्राप्त हो सकती है। मेरु और मंदराचल के समान भारी पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा अनेक जन्म में किए हुए पाप समूह क्षणभर में भस्म हो जाते हैं।

जैसे रुई के बड़े ढेर को अग्नि की छोटी-सी चिंगारी पलभर में भस्म कर देती है। विधिपूर्वक थोड़ा-सा पुण्य कर्म बहुत फल देता है परंतु विधि ‍रहित अधिक किया जाए तो भी उसका फल कुछ नहीं मिलता। संध्या न करने वाले, नास्तिक, वेद निंदक, धर्मशास्त्र को दूषित करने वाले, पापकर्मों में सदैव रत रहने वाले, धोखा देने वाले ब्राह्मण और शूद्र, परस्त्री गमन करने वाले तथा ब्राह्मणी से भोग करने वाले ये सब चांडाल के समान हैं। जो विधवा अथवा सधवा ब्राह्मणी से भोग करते हैं, वे अपने कुल को नष्ट कर देते हैं।

परस्त्री गामी के संतान नहीं होती और उसके पूर्व जन्म के संचित सब अच्छे कर्म नष्ट हो जाते हैं। जो गुरु और ब्राह्मणों से अहंकारयुक्त बात करता है वह भी धन और संतान से हीन होता है। भ्रष्टाचार करने वाला, चांडाली से भोग करने वाला, दुष्ट की सेवा करने वाला और जो नीच मनुष्य की सेवा करते हैं या संगति करते हैं, ये सब पाप हरि प्रबोधिनी एकादशी के व्रत से नष्ट हो जाते हैं।
जो मनुष्य इस एकादशी के व्रत को करने का संकल्प मात्र करते हैं उनके सौ जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो इस दिन रात्रि जागरण करते हैं उनकी आने वाली दस हजार पीढि़याँ स्वर्ग को जाती हैं। नरक के दु:खों से छूटकर प्रसन्नता के साथ सुसज्जित होकर वे विष्णुलोक को जाते हैं। ब्रह्महत्यादि महान पाप भी इस व्रत के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। जो फल समस्त तीर्थों में स्नान करने, गौ, स्वर्ण और भूमि का दान करने से होता है, वही फल इस एकादशी की रात्रि को जागरण से मिलता है।
हे मुनिशार्दूल। इस संसार में उसी मनुष्य का जीवन सफल है जिसने हरि प्रबोधिनी एकादशी का व्रत किया है। वही ज्ञानी तपस्वी और जितेंद्रीय है तथा उसी को भोग एवं मोक्ष मिलता है जिसने इस एकादशी का व्रत किया है। वह विष्णु को अत्यंत प्रिय, मोक्ष के द्वार को बताने वाली और उसके तत्व का ज्ञान देने वाली है। मन, कर्म, वचन तीनों प्रकार के पाप इस रात्रि को जागरण से नष्ट हो जाते हैं।

इस दिन जो मनुष्य भगवान की प्रसन्नता के लिए स्नान, दान, तप और यज्ञादि करते हैं, वे अक्षय पुण्य को प्राप्त होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी के दिन व्रत करने से मनुष्य के बाल, यौवन और वृद्धावस्था में किए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन रात्रि जागरण का फल चंद्र, सूर्य ग्रहण के समय स्नान करने से हजार गुना अधिक होता है। अन्य कोई पुण्य इसके आगे व्यर्थ हैं। जो मनुष्य इस व्रत को नहीं करते उनके अन्य पुण्य भी व्यर्थ ही हैं।
अत: हे नारद! तुम्हें भी विधिपूर्वक इस व्रत को करना चाहिए। जो कार्तिक मास में धर्मपारायण होकर अन्न नहीं खाते उन्हें चांद्रायण व्रत का फल प्राप्त होता है। इस मास में भगवान दानादि से जितने प्रसन्न नहीं होते जितने शास्त्रों में लिखी कथाओं के सुनने से होते हैं। कार्तिक मास में जो भगवान विष्णु की कथा का एक या आधा श्लोक भी पढ़ते, सुनने या सुनाते हैं उनको भी एक सौ गायों के दान के बराबर फल मिलता है। अत: अन्य सब कर्मों को छोड़कर कार्तिक मास में मेरे सन्मुख बैठकर कथा पढ़नी या सुननी चाहिए।

जो कल्याण के लिए इस मास में हरि कथा कहते हैं वे सारे कुटुम्ब का क्षण मात्र में उद्धार कर देते हैं। शास्त्रों की कथा कहने-सुनने से दस हजार यज्ञों का फल मिलता है। जो नियमपूर्वक हरिकथा सुनते हैं वे एक हजार गोदान का फल पाते हैं। विष्णु के जागने के समय जो भगवान की कथा सुनते हैं वे सातों द्वीपों समेत पृथ्वी के दान करने का फल पाते हैं। कथा सुनकर वाचक को जो मनुष्य सामर्थ्य के अनुसार ‍दक्षिणा देते हैं उनको सनातन लोक मिलता है।

व्रत करने की विधि -
ब्रह्माजी की यह बात सुनकर नारदजी ने कहा कि भगवन! इस एकाद‍शी के व्रत की ‍विधि हमसे कहिए और बताइए कि कैसा व्रत करना चाहिए। इस ब्रह्माजी ने कहा कि ब्रह्ममुहूर्त में जब दो घड़ी रात्रि रह जाए तब उठकर शौचादि से निवृत्त होकर दंत-धावन आदि कर नदी, तालाब, कुआँ, बावड़ी या घर में ही जैसा संभव हो स्नानादि करें, फिर भगवान की पूजा करके कथा सुनें। फिर व्रत का नियम ग्रहण करना चाहिए।

उस समय भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निराहार रहकर व्रत करूँगा। आप मेरी रक्षा कीजिए। दूसरे दिन द्वादशी को भोजन करूँगा। तत्पश्चात भक्तिभाव से व्रत करें तथा रात्रि को भगवान के आगे नृत्य, गीतादि करना चाहिए। कृपणता त्याग कर बहुत से फूलों, फल, अगर, धूप आदि से भगवान का पूजन करना चाहिए। शंखजल से भगवान को अर्घ्य दें।
इसका समस्त तीर्थों से करोड़ गुना फल होता है। जो मनुष्य अगस्त्य के पुष्प से भगवान का पूजन करते हैं उनके आगे इंद्र भी हाथ जोड़ता है। तपस्या करके संतुष्ट होने पर हरि भगवान जो नहीं करते, वह अगस्त्य के पुष्पों से भगवान को अलंकृत करने से करते हैं। जो कार्तिक मास में बिल्वपत्र से भगवान की पूजा करते हैं वे ‍मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

कार्तिक मास में जो तुलसी से भगवान का पूजन करते हैं, उनके दस हजार जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। तुलसी दर्शन करने, स्पर्श करने, कथा कहने, नमस्कार करने, स्तुति करने, तुलसी रोपण, जल से सींचने और प्रतिदिन पूजन सेवा आदि करने से हजार करोड़ युगपर्यंत विष्णु लोक में निवास करते हैं। जो तुलसी का पौधा लगाते हैं, उनके कुटुम्ब से उत्पन्न होने वाले प्रलयकाल तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।
तुलसी रोपण का महत्वहे मुनि! रोपी तुलसी जितनी जड़ों का विस्तार करती है उतने ही हजार युग पर्यंत तुलसी रोपण करने वाले सुकृत का विस्तार होता है। जिस मनुष्य की रोपणी की हुई तुलसी जितनी शाखा, प्रशाखा, बीज और फल पृथ्वी में बढ़ते हैं, उसके उतने ही कुल जो बीत गए हैं और होंगे दो हजार कल्प तक विष्णुलोक में निवास करते हैं। जो कदम्ब के पुष्पों से श्रीहरि का पूजन करते हैं वे भी कभी यमराज को नहीं देखते। जो गुलाब के पुष्पों से भगवान का पूजन करते हैं उन्हें मुक्ति मिलती है।

जो वकुल और अशोक के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं वे सूर्य-चंद्रमा रहने तक किसी प्रकार का शोक नहीं पाते। जो मनुष्य सफेद या लाल कनेर के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं उन पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और जो भगवान पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे करोड़ों गायों के दान का फल पाते हैं। जो दूब के अंकुरों से भगवान की पूजा करते हैं वे सौ गुना पूजा का फल ग्रहण करते हैं।

जो शमी के पत्र से भगवान की पूजा करते हैं, उनको महाघोर यमराज के मार्ग का भय नहीं रहता। जो भगवान को चंपा के फूलों से पूजते हैं वे फिर संसार में नहीं आते। केतकी के पुष्प चढ़ाने से करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। पीले रक्तवर्ण के कमल के पुष्पों से भगवान का पूजन करने वाले को श्वेत द्वीप में स्थान मिलता है।

इस प्रकार रात्रि को भगवान का पूजन कर प्रात:काल होने पर नदी पर जाएँ और वहाँ स्नान, जप तथा प्रात:काल के कर्म करके घर पर आकर विधिपूर्वक केशव का पूजन करें। व्रत की समाप्ति पर विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दक्षिणा देकर क्षमायाचना करें। इसके पश्चात भोजन, गौ और दक्षिणा देक गुरु का पूजन कें, ब्राह्मणों को दक्षिणा दें और जो चीज व्रत के आरंभ में छोड़ने का नियम किया था, वह ब्राह्मणों को दें। रात्रि में भोजन करने वाला मनुष्य ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा स्वर्ण सहित बैलों का दान करे।

जो मनुष्य मांसाहारी नहीं है वह गौदान करे। आँवले से स्नान करने वाले मनुष्य को दही और शहद का दान करना चाहिए। जो फलों को त्यागे वह फलदान करे। तेल छोड़ने से घृत और घृत छोड़ने से दूध, अन्न छोड़ने से चावल का दान किया जाता है।

इसी प्रकार जो मनुष्य भूमि शयन का व्रत लेते हैं उन्हें शैयादान करना चाहिए, साथ ही तुलसी सब सामग्री सहित देना चाहिए। पत्ते पर भोजन करने वाले को सोने का पत्ता घृत सहित देना चाहिए। मौन व्रत धारण करने वाले को ब्राह्मण और ब्राह्मणी को घृत तथा मिठाई का भोजन कराना चाहिए। बाल रखने वाले को दर्पण, जूता छोड़ने वाले को एक जोड़ जूता, लवण त्यागने वाले को शर्करा, मंदिर में दीपक जलाने वाले को तथा नियम लेने वाले को व्रत की समाप्ति पर ताम्र अथवा स्वर्ण के पत्र पर घृत और बत्ती रखकर विष्णुभक्त ब्राह्मण को दान देना चाहिए।

एकांत व्रत में आठ कलश वस्त्र और स्वर्ण से अलंकृत करके दान करना चाहिए। यदि यह भी न हो सके तो इनके अभाव में ब्राह्मणों का सत्कार सब व्रतों को सिद्ध करने वाला कहा गया है। इस प्रकार ब्राह्मण को प्रणाम करके विदा करें। इसके पश्चात स्वयं भी भोजन करें। जिन वस्तुओं को चातुर्मास में छोड़ा हो, उन वस्तुअओं की समाप्ति करें अर्थात ग्रहण करने लग जाएँ।
हे राजन! जो बुद्धिमान इस प्रकार चातुर्मास व्रत निर्विघ्न समाप्त करते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं और फिर उनका जन्म नहीं होता। यदि व्रत भ्रष्ट हो जाए तो व्रत करने वाला कोढ़ी या अंधा हो जाता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि राजन जो तुमने पूछा था वह सब मैंने बतलाया। इस कथा को पढ़ने और सुनने से गौदान का फल प्राप्त होता है।

20/11/2020

॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥
सप्तशतीके कुछ सिद्ध सम्पुट-मन्त्र

#श्रीमार्कण्डेयराणान्तर्गत #देवीमाहात्म्य में 'श्लोक’, 'अर्धश्लोक' और 'उवाच' आदि मिलाकर ७०० मन्त्र हैं । यह माहात्म्य #दुर्गासप्तशती के नाम से प्रसिद्ध है । सप्तशती अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष - चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाली है । जो पुरुष जिस भाव और जिस कामना से श्रद्धा एवं विधि के साथ सप्तशती का पारायण करता है, उसे उसी भावना और कामना के अनुसार निश्चय ही फल -सिद्धि होती है । इस बात का अनुभव अगणित पुरुषों को प्रत्यक्ष हो चुका है । यहाँ हम कुछ ऐसे चुने हुए मन्त्रों का उल्लेख करते हैं, जिनका सम्पुट देकर विधिवत् पारायण करने से विभिन्न पुरुषार्थों की व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से सिद्धि होती है ।

इनमें अधिकांश सप्तशती के ही मन्त्र हैं और कुछ बाहर के भी हैं-
(१) सामूहिक कल्याणके लिये-
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि सा न:॥

(२) विश्वके अशुभ तथा भयका विनाश करनेके लिये-
यस्या: प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च ।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥

(३) विश्वकी रक्षा के लिये-
या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:
पापात्मनां कृतधियां ह्रदयेषु बुद्धि: ।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

(४) विश्वके अभ्युदयके लिये-
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्रा: ॥

(५) विश्वव्यापी विपत्तियोंके नाश के लिये-
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥

(६) विश्वके पाप - ताप - निवारणके लिये -
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्य : ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥

(७) विपत्ति-नाशके लिये-
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥

(८)विपत्तिनाश और शुभकी लिये-
करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद: ।

(९) भय - नाश के लिये-
(क ) सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
(ख) एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु न: सर्वभीतिभ्य: कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥
(ग) ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥

(१०)पाप-नाशके लिये-
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव ॥

(११) रोग-नाशके लिये-
रोगानशोषानपहंसि तुष्टा
रूष्टा तु कामान्‌ सकलानभीष्टान्‌ ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥

(१२) महामारी-नाशके लिये-
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी .
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

(१३) आरोग्य और सौभाग्यकी प्राप्तिके लिये-
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

(१४) सुलक्षणा पत्नीकी प्राप्तिके लिये-
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥

(१५ ) बाधा-शान्तिके लिये-
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्यद्वैरिविनाशनम्‌॥७॥

(१६) सर्वविध अभ्युदयके लिये-
ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां
तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्ग : ।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥

(१७) दारिद्र्यदु:खादिनाशके लिये –
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्‌यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥

(१८) रक्षा पानेके लिये-
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके ।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च ॥

(१९) समस्त विद्याओंकी और समस्त स्त्रियोंमें मातृभावकी प्राप्तिके लिये-
विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:
स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्ति : ॥

(२० ) सब प्रकारके कल्याणके लिये-
सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

(२१) शक्ति-प्राप्तिके लिये-
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

(२२) प्रसन्नताकी प्राप्तिके लिये-
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि ।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥

(२३) विविध उपद्रवोंसे बचनेके लिये-
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा
यत्रारयो दस्युबलानि यत्र ।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये
तत्र स्थिता त्वंपरिपासि विश्वम्॥

(२४) बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादिकी प्राप्तिके लिये-
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित: ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय : ॥

(२५)भुक्ति-मुक्तिकी प्राप्तिके लिये-
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

(२६) पापनाश तथा भक्तिकी प्राप्तिके लिये-
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

(२७) स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्तिके लिये-
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तय: ॥

(२८) स्वर्ग और मुक्तिके लिये-
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

(२९) मोक्षकी प्राप्ति के लिये-
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु: ॥

(३०) स्वप्नमें सिद्धि-असिद्धि जाननेके लिये-
दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके ।
मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय ॥

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